अवनि की आंखों में अपमान और बेबसी के आंसू उमड़ आए, लेकिन उसके संस्कारों ने उसे अपनी सास के सामने पलटकर जवाब देने की अनुमति नहीं दी। उसने अपने होंठ भींचे, सिर झुकाया और बिना एक शब्द कहे भारी कदमों से अपने शयनकक्ष की ओर चली गई। कमरे का दरवाजा बंद करते ही उसका संयम टूट गया। वह बिस्तर के कोने पर बैठकर सिसक-सिसक कर रोने लगी।
कानपुर की गुलाबी सुबह में आज एक अलग ही चहल-पहल थी। घर के मुख्य आंगन में तुलसी के चबूतरे को रंगोली से सजाया जा चुका था। विवाह के बाद पहला करवाचौथ हर लड़की के लिए केवल एक व्रत नहीं होता, बल्कि मायके के लाड़-प्यार और ससुराल में नए रिश्तों की नींव के बीच का एक खूबसूरत सेतु होता है। अवनि आज भोर से ही उठी हुई थी। मन में उमंगों की ऐसी हिलोरें थीं जैसे सावन की पहली फुहार धरती को छू गई हो। सास कल्याणी देवी रसोई में फलाहार की तैयारी देख रही थीं। अवनि जब हाथ में पूजा की थाली लिए उनके चरण स्पर्श करने झुकी, तो कल्याणी जी ने बड़े अपनत्व से उसके सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, “सदा सुहागन रहो बहू। आज का दिन बहुत पावन है। जा, जल्दी से स्नान करके अपनी नई पोशाक पहन ले। तेरे पिताजी ने जो संदेश भिजवाया था, उसके अनुसार तेरे भैया-भाभी कभी भी बयाना लेकर पहुंचते ही होंगे। मायके वाले आएं, उससे पहले घर का हर कोना चमकना चाहिए।”
अवनि के चेहरे पर लज्जा और आनंद की लाली एक साथ बिखर गई। वह अपने कमरे में चली आई। उसने गहरे हरे और सुनहरे गोटे वाली वह जरीदार साड़ी निकाली जिसे उसके पिता ने शादी के वक्त बड़े जतन से चुना था। अवनि ने मांग में लाल सिंदूर भरा, हाथों की चूड़ियों को संवारा और जब वह पूरी तरह सज-धजकर बाहर निकली, तो कल्याणी देवी के होंठों से बरबस ही ‘अरे वाह’ निकल पड़ा। उन्होंने तुरंत अपनी उंगली से काजल का हल्का सा टीका निकालकर अवनि के कान के पीछे लगा दिया और बोलीं, “मेरी बहू को किसी की नजर न लगे। एकदम चांद का टुकड़ा लग रही है।”
घर में हंसी-खुशी का माहौल था कि तभी बाहर एक टैक्सी रुकने की आवाज आई। अवनि का दिल जोर से धड़क उठा। दरवाजे पर उसका बड़ा भाई मयंक और भाभी सुहासिनी खड़े थे। अवनि दौड़कर भैया के गले से लग गई। विवाह के छह महीने बाद भाई से इस तरह अचानक अपने नए घर में मिलना उसकी आंखों में खुशी के आंसू भर लाया। कल्याणी देवी और घर के बाकी सदस्यों ने भी हाथ जोड़कर मयंक और सुहासिनी का स्वागत किया। बैठक में मयंक ने एक के बाद एक कई बड़े-बड़े डिब्बे और सजी हुई डलिया रखनी शुरू की।
मयंक ने नम्रता से हाथ जोड़ते हुए कहा, “माताजी, बाबूजी की तबीयत थोड़ी नासाज थी, इसलिए वे लंबी यात्रा नहीं कर सके, पर उनका पूरा आशीर्वाद अवनि और आप सभी के साथ है। यह करवाचौथ की पारंपरिक भेंट है।”
थाली और टोकरियों में अवनि के लिए श्रृंगार का पूरा सामान, सुगंधित इत्र, मेवों के डिब्बे, पारंपरिक मिठाइयां, साड़ियां, फल और परिवार के सभी बड़ों के लिए मान-सम्मान के तौर पर वस्त्र और लिफाफे रखे थे। अवनि की भाभी सुहासिनी ने भी निर्जला व्रत रखा हुआ था, इसलिए उन्होंने केवल चरणामृत और गंगाजल स्वीकार किया, जबकि मयंक के लिए अवनि ने फटाफट गर्म नाश्ता और अदरक वाली चाय तैयार की। बातचीत का दौर करीब एक घंटे तक चला। मयंक बार-बार घड़ी देख रहा था क्योंकि उसे शाम ढलने से पहले अपने शहर बरेली के लिए निकलना था ताकि वह रात को सुहासिनी के अर्घ्य देने के समय घर पहुंच सके। विदा लेते समय मयंक ने अवनि के सिर पर हाथ रखा और उसके हाथ में एक छोटी सी गुल्लक जैसी डिबिया थमाई, जिसमें बचपन की यादें और ढेर सारा स्नेह समेटा हुआ था।
मयंक और सुहासिनी के दरवाजे से बाहर निकलते ही जैसे बैठक का वातावरण अचानक बदल गया। उनके कदमों की आहट दूर होते ही कल्याणी देवी ने सोफे पर रखे उन उपहारों और पैकेटों की ओर रुख किया। उन्होंने एक-एक करके डिब्बों की गांठें खोलीं। जैसे-जैसे पैकेट खुलते गए, कल्याणी देवी के चेहरे की मुस्कान गायब होती गई और भौंहों पर गहरी सिलवटें उभर आईं।
कल्याणी देवी ने साड़ियों के कपड़े को हाथ लगाकर टटोला, फिर फलों की टोकरी को एक ओर खिसकाते हुए गहरी सांस छोड़ी। अवनि जो रसोई से पानी का गिलास लेकर आ रही थी, उसने सासू मां के चेहरे के बदलते भाव भांप लिए। वह सहमते हुए आगे बढ़ी और धीरे से बोली, “मम्मी जी… क्या बात है? सब ठीक तो है न? क्या कुछ कमी रह गई?”
कल्याणी देवी के भीतर दबा असंतोष एक झटके में शब्दों की शक्ल में बाहर आ गया। वे तल्खी से बोलीं, “कमी? बहू, पूछो कि भेजा क्या है! नाम के लिए इतनी बड़ी-बड़ी डलिया सजाकर ले आए। ये जो साड़ियां समधी जी ने मेरे और ननद के लिए भेजी हैं, ये किस दर्जे की हैं? हमारे खानदान का एक रुतबा है। मोहल्ले में चार औरतें आएंगी, जब वे देखेंगी कि कानपुर के इतने प्रतिष्ठित घर में बरेली से क्या भेंट आई है, तो हमारी क्या इज्जत रह जाएगी? मिठाई भी शहर के किसी आम हलवाई की है। अरे, अगर सामर्थ्य नहीं थी तो इतना ढोंग करने की क्या जरूरत थी? बस तुम्हारे लिए दो-चार कपड़े भेज देते, हम तो समझ जाते कि बेटी वालों का हाथ तंग है।”
अवनि के हाथ से पानी का गिलास लगभग छूटते-छूटते बचा। कल्याणी देवी का हर शब्द उसके अंतर्मन को चीरता हुआ निकल गया। अवनि जानती थी कि उसके पिता एक साधारण सरकारी शिक्षक रहे थे, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी ईमानदारी से जी थी। अपनी दोनों बेटियों की पढ़ाई और शादी के बाद उनके पास केवल उनकी पेंशन की बची-खुची पूंजी थी। उस सीमित साधन में भी उसके पिता और भाई ने अपनी हैसियत से बढ़कर, संभवतः अपनी किसी बचत को तोड़कर, यह सब सामग्री भेजी थी ताकि ससुराल में उनकी बेटी का सिर ऊंचा रहे। बेटी का पिता हमेशा अपनी सामर्थ्य से दुगुना देने का प्रयास करता है, फिर भी समाज के तराजू पर उसका मान हमेशा हल्का क्यों तौल दिया जाता है? क्या त्योहार अपनों के प्रेम, मंगलकामना और आशीर्वाद के आदान-प्रदान के लिए होते हैं या फिर ससुराल की तिजोरियों और अलमारियों को भरने का जरिया?
अवनि की आंखों में अपमान और बेबसी के आंसू उमड़ आए, लेकिन उसके संस्कारों ने उसे अपनी सास के सामने पलटकर जवाब देने की अनुमति नहीं दी। उसने अपने होंठ भींचे, सिर झुकाया और बिना एक शब्द कहे भारी कदमों से अपने शयनकक्ष की ओर चली गई। कमरे का दरवाजा बंद करते ही उसका संयम टूट गया। वह बिस्तर के कोने पर बैठकर सिसक-सिसक कर रोने लगी।
उसी समय बैठक के पास वाले गलियारे में खड़ा अवनि का पति, समर, यह सब कुछ अपनी आंखों से देख चुका था और कानों से सुन चुका था। समर एक समझदार, संवेदनशील और व्यावहारिक सोच वाला युवक था। वह अपनी मां के स्वभाव से भी भली-भांति परिचित था और अवनि के मायके की आर्थिक स्थिति का भी उसे पूरा ज्ञान था। वह जानता था कि अगर इस समय उसने मां पर गुस्सा किया या तीखी बहस की, तो बात सुलझने के बजाय और अधिक बिगड़ जाएगी और घर में कलह का ऐसा बीज बो उठेगा जो पूरे त्योहार की पवित्रता को नष्ट कर देगा। उसने संयम से काम लेने का निर्णय किया।
समर चुपचाप कमरे में दाखिल हुआ। उसने देखा कि अवनि अपने आंसुओं को साड़ी के पल्लू से जल्दी-जल्दी पोंछ रही है ताकि वह सामान्य दिख सके। समर ने बहुत ही सहज भाव से पूछा, “अवनि, क्या हुआ? सब ठीक तो है? तुम्हारी आंखें इतनी लाल क्यों हैं?”
अवनि ने अपने दर्द को भीतर ही समेटते हुए एक फीकी मुस्कान लाने की कोशिश की और बोली, “कुछ नहीं… बस काजल लगाते समय आंख में कुछ तिनका सा चला गया था, उसी से पानी आ रहा है। आप बताइए, आपको कुछ चाहिए था?”
समर अपनी पत्नी के इस बड़प्पन और धैर्य को देखकर भीतर तक हिल गया। जिस लड़की के स्वाभिमान और उसके पिता के त्याग पर इतनी गहरी चोट की गई हो, वह अभी भी अपने ससुराल के मान को बचाने के लिए सच छुपा रही थी, ताकि पति और सास के बीच कोई तनाव न पैदा हो। समर ने अवनि के सिर पर हाथ रखा और बहुत ही शांत स्वर में कहा, “अवनि, तुम्हें कुछ छुपाने की आवश्यकता नहीं है। मैंने सब सुन लिया है। तुम धैर्य रखो, हमारे परिवार की बुनियाद इतनी कमजोर नहीं है कि चंद साड़ियों के फेर में रिश्तों की मिठास खो जाए। मैं मां से बात करता हूं।”
समर कमरे से बाहर निकला और सीधे उस कमरे की तरफ बढ़ा जहां कल्याणी देवी अभी भी सामान को समेटते हुए बड़बड़ा रही थीं। समर जाकर अपनी मां के ठीक सामने तख्त पर शांत भाव से बैठ गया।
कल्याणी देवी ने बेटे को देखा तो अपनी बात का समर्थन पाने के उद्देश्य से तुरंत बोलीं, “देख समर, तू ही देख। ये तेरे ससुर जी ने हमारे लिए वस्त्र भेजे हैं। अरे, इंसान को अपनी हैसियत के हिसाब से नहीं तो कम से कम सामने वाले के ओहदे को देखकर तो मान-सम्मान करना चाहिए। अब ये साड़ियां मैं किसी कामवाली को दे दूं तो भी वह न पहने। यही कद्र है हमारी?”
समर ने न कोई गुस्सा दिखाया, न आवाज ऊंची की। उसने बहुत ही आदर से मां का हाथ अपने हाथ में लिया और मुस्कुराते हुए कहा, “मां, आप बिल्कुल सच कह रही हैं। सम्मान तो हर किसी को अपनी मर्यादा और स्थिति के अनुसार मिलना ही चाहिए। वैसे मां, मुझे एक बात याद आ रही थी। हमारी छोटी बहन, रुचि… उसका भी तो विवाह इसी वर्ष तय होना है ना?”
कल्याणी देवी का चेहरा अपनी लाडली बेटी का नाम सुनते ही खिल उठा। वे बोलीं, “हां, भगवान की कृपा से अच्छा परिवार मिला है। अगले साल तक उसकी भी डोली उठ जाएगी।”
समर ने गंभीर होकर कहा, “हां मां, और जब रुचि की पहली दीवाली या पहला करवाचौथ आएगा, तब हम भी उसके ससुराल वालों के लिए अपनी पूरी सामर्थ्य झोंक देंगे। हम अपनी हैसियत से भी चार कदम आगे बढ़कर बढ़िया से बढ़िया उपहार, जेवर, ब्रांडेड कपड़े और महंगे मेवे भेजेंगे, ठीक है ना मां?”
कल्याणी देवी गर्व से बोलीं, “और नहीं तो क्या! अपनी इकलौती बेटी के ससुराल में क्या हम कोई कमी छोड़ेंगे? हम तो ऐसा सामान भेजेंगे कि उसके ससुराल वाले देखते ही रह जाएं।”
समर ने अपनी मां की आंखों में आंखें डालकर बड़े कोमल, लेकिन सीधे लहजे में अगला तीर छोड़ा, “बिल्कुल मां… लेकिन जरा एक पल के लिए सोचिए। मान लीजिए, हमने अपनी पूरी जमा-पूंजी लगाकर, दिल खोलकर रुचि के लिए सबसे बेहतरीन उपहार भेजे। और वहां पहुंचने के बाद, रुचि की सास उन डिब्बों को खोलकर सबके सामने फेंक दे और कहे कि ‘यह क्या रद्दी सामान भेज दिया? हमारे खानदान की बराबरी यह सामान नहीं कर सकता। तुम्हारे मायके वालों की इतनी ही औकात थी क्या?’ और हमारी भोली सी रुचि उस भरी महफिल में सिर झुकाए, आंसुओं के घूंट पीकर अपने कमरे में जाकर रोए… तब मां, आपके कलेजे पर क्या बीतेगी? क्या आप तब भी यही कहेंगी कि रुचि की सास बिल्कुल सही कर रही हैं?”
कल्याणी देवी जैसे बिजली का झटका खाकर सन्न रह गईं। समर के एक-एक शब्द ने उनकी अंतरात्मा पर हथौड़े की तरह चोट की। एक मां होने के नाते वे अपनी बेटी के अपमान की कल्पना मात्र से सिहर उठीं। उनके जेहन में अचानक वह दृश्य कौंध गया जब अवनि सिर झुकाए चुपचाप कमरे की ओर भागी थी।
समर ने बात को आगे बढ़ाते हुए बहुत ही संवेदनशील लहजे में कहा, “मां, रुचि भी तो किसी की बेटी है, और अवनि भी तो किसी पिता की अपनी जान से प्यारी संतान है। अवनि के पिता एक सीधे-सादे शिक्षक हैं। उन्होंने अपनी पेंशन और जिंदगी भर की कमाई जोड़कर यह सामग्री केवल इसलिए भेजी क्योंकि वे अपनी बेटी से अगाध प्रेम करते हैं और हमारे घर को अपना मानकर हमारा आदर करना चाहते थे। उन्होंने कपड़े नहीं भेजे मां, अपना मान और आशीर्वाद भेजा है। क्या किसी पिता के उस आशीर्वाद की कीमत हम बाजार के कपड़ों के ताने-बाने से लगाएंगे? अगर हमने उपहारों की कीमत देखकर रिश्तों को तौलना शुरू कर दिया, तो फिर परिवार और व्यापार में फर्क क्या रह जाएगा?”
कल्याणी देवी के पास समर के तर्कों का कोई उत्तर नहीं था। उनकी नजरें उस सजी हुई थाली पर पड़ीं जहां अवनि के भाई द्वारा लाए गए रोली, अक्षत और मिठाई के डिब्बे रखे थे। उन्हें अपनी भूल, अपने अहंकार और अपने संकीर्ण दृष्टिकोण का इतनी गहराई से भान हुआ कि उनकी आंखों से पश्चाताप के आंसू छलक पड़े। उन्हें समझ आ गया कि जिस मान-सम्मान की वे उम्मीद कर रही थीं, वह भौतिक वस्तुओं में नहीं बल्कि उन निर्मल भावनाओं में था जिसे वे अपने अहंकार में ठुकरा रही थीं।
कल्याणी देवी बिना एक पल गंवाए उठीं और सीधे अवनि के कमरे की ओर बढ़ गईं।
अवनि अभी भी पलंग पर बैठी अपने आंसुओं को रोकने की कोशिश कर रही थी। दरवाजे की आहट सुनकर उसने घबराकर अपना मुंह फेर लिया। कल्याणी देवी आगे बढ़ीं और उन्होंने दोनों हाथों से अवनि के कंधे थाम लिए। अवनि चौंककर खड़ी हो गई। इससे पहले कि अवनि कुछ समझ पाती, कल्याणी देवी ने अवनि को अपने सीने से लगा लिया।
कल्याणी देवी का गला भर आया था, वे रुंधे हुए स्वर में बोलीं, “मुझे क्षमा कर दे मेरी बच्ची। मैं लालच और झूठी शान के अंधेपन में यह भूल गई थी कि मेरे घर आई बहू किसी का पूरा संसार है। तेरे बाबूजी और भैया ने जो भेजा, वह किसी दौलत से नहीं, अपार प्रेम और श्रद्धा से सींचा हुआ है। मैंने अपने संकीर्ण विचारों से तेरे उस पावन मन को ठेस पहुंचाई जो आज अपने पति की लंबी उम्र के लिए अन्न-जल का त्याग किए बैठी है। अगर हो सके तो अपनी इस नासमझ मां को माफ कर दे।”
सास के मुंह से यह शब्द सुनते ही अवनि की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा, लेकिन इस बार ये आंसू अपमान के नहीं, बल्कि आत्मीयता और सम्मान के थे। अवनि ने झुककर तुरंत अपनी सास के चरण स्पर्श किए और बोली, “नहीं मम्मी जी, ऐसा मत कहिए। आप मेरी मां हैं। मां अगर संतान को कुछ कह भी दे तो संतान कभी उससे रूठती नहीं। आप मुझे क्षमा मांगकर पराया मत कीजिए।”
कल्याणी देवी ने अवनि का माथा चूमा और उसी बरेली वाली साड़ी को अपने हाथ में उठाकर कहा, “आज रात जब हम दोनों छत पर चांद की पूजा करने जाएंगे, तो मैं वही साड़ी पहनूंगी जो तेरे पिता ने मेरे लिए भेजी है। यह मेरे समधी जी का मेरे लिए सबसे अनमोल सम्मान है।”
शाम ढलते-ढलते पूरे घर का माहौल पूरी तरह बदल चुका था। घर में चारों तरफ खुशियों की महक थी। रात को जब आकाश में पूर्ण चंद्रमा अपनी छटा बिखेरने लगा, तो छत पर कल्याणी देवी और अवनि दोनों ने पूरे विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। अवनि ने छलनी की ओट से पहले चांद को और फिर अपने पति समर को देखा। समर की आंखों में अपनी पत्नी के लिए अथाह आदर था और अवनि के मन में समर के उस मौन संबल के लिए असीम कृतज्ञता। कल्याणी देवी ने स्वयं अवनि को पानी पिलाकर उसका व्रत खुलवाया और आशीर्वाद के रूप में अपने खानदानी कंगन अवनि की कलाइयों में पहना दिए।
रात को जब सब अपने-अपने कमरों में चले गए, तो समर ने अपनी जेब से एक छोटा सा मखमली डिब्बा निकाला और अवनि की ओर बढ़ाते हुए मुस्कुराकर कहा, “तुम्हारे पहले करवाचौथ की मेरी तरफ से एक छोटी सी भेंट।”
अवनि ने उस डिब्बे को देखा, फिर समर का हाथ अपने दोनों हाथों में थामते हुए बड़ी भावुकता से बोली, “मुझे किसी आभूषण या उपहार की तृष्णा नहीं है। एक स्त्री के लिए इससे बड़ा उपहार और क्या हो सकता है कि उसका पति उसके स्वाभिमान, उसके मायके के सम्मान और उसके संस्कारों की ढाल बनकर खड़ा हो सके। आपने आज मेरे पिता के पसीने की कमाई और उनके आत्मसम्मान की जो रक्षा की है, वही मेरा जीवन भर का सबसे अनमोल तोहफा है।” समर और अवनि की मुस्कान में आज केवल एक त्योहार का उल्लास नहीं था, बल्कि एक-दूसरे के प्रति आजीवन सम्मान और गहरे प्रेम का सच्चा संकल्प था।
यदि समाज में हर सास अपनी बहू में अपनी बेटी का अक्स देखने लगे और हर बेटा समर की तरह रिश्तों के तराजू को निष्पक्ष होकर संभालना सीख जाए, तो कभी किसी बेटी के पिता का मान किसी चौखट पर नीचा नहीं होगा।
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