*कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है* – तोषिका

आपने ऐसा क्यों किया मां? मीरा ने अपनी मां से पूछा। तभी उसकी मां रमा ने बोला “*कुछ बंधन तोड़ देना ही अच्छा होता है* क्योंकि कई बार आत्मसम्मान से ऊपर कुछ नहीं होता है।” “ऐसा क्या हुआ था मां की आपने पापा को छोड़ दिया?” मीरा ने हैरानी में पूछा। रमा का उन पुरानी … Read more

बंधन – खुशी

मीरा एक सुखी परिवार से थी।सुखी परिवार की परिभाषा का अर्थ था जिसमें हर कोई एक दूसरे को वक्त दे जो एक दूसरे का दर्द समझे ।जहां मां के आवाज लगाते ही सब एक जगह इक्कठा हो जाते और खाना खातें गप्पे मारते दिन भर की बातें साझा करते।पापा शाम को ऑफिस से आते तो … Read more

स्वाभिमान की उड़ान

शहर के जाने-माने कपड़ा व्यापारी रघुनाथ जी की जिंदगी में सब कुछ बहुत ही सुचारू रूप से चल रहा था। उनका साड़ियों का थोक व्यापार था, जिसे उन्होंने अपनी बरसों की कड़ी मेहनत और ईमानदारी से सींचा था। उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा गुरूर और उनकी सबसे बड़ी खुशी उनकी इकलौती बेटी, काव्या थी। काव्या … Read more

रिश्तों की एकतरफ़ा पगडंडी और एक करारा जवाब

सुमित्रा स्वभाव से बहुत ही शांत, सुलझी हुई और दूसरों का खयाल रखने वाली महिला थी। उसके पति, सुधीर, एक सरकारी बैंक में मैनेजर थे। उनका परिवार एक बहुत ही सुंदर और शांत हाउसिंग सोसाइटी में रहता था। उसी सोसाइटी के एक दूसरे ब्लॉक में सुधीर के छोटे भाई का परिवार रहता था। सुधीर के … Read more

अल्हड़ गौरैया का नया घोंसला

“सुमित्रा! तुमने वो बेबी लोशन और थर्मामीटर रखा या नहीं? और वो जो छोटी-छोटी सूती की टोपियां मैंने कल बाज़ार से लाकर दी थीं, वो बैग में हैं या तुमने बाहर ही छोड़ दीं?” कमरे में चारों तरफ फैले सामान के बीच खड़े होकर रघुनाथ जी बड़ी बेचैनी से सूटकेस की चेन बंद करने की … Read more

अपनी पहचान का आसमान

सावित्री देवी के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान तैर गई थी। वह अपने आलीशान सोफे पर विराजमान थीं, हाथ में चाय का प्याला था और उनकी नज़रें अपनी बहू मेघा पर गड़ी थीं, जो अभी-अभी बाहर से आई थी। मेघा उनके इस खामोश कटाक्ष और उस कुटिल मुस्कराहट का राज बहुत अच्छी तरह … Read more

सिंदूरी रवायतें और एक नई सुबह

 लेकिन नंदिनी कहाँ मानने वाली थी। उसने दृढ़ निश्चय के साथ सुमित्रा देवी का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली, “रवायतें इंसानों के लिए होती हैं माँ, इंसान रवायतों के लिए नहीं। अगर कोई रिवाज एक माँ को उसके बेटे की खुशी से दूर करता है, तो मैं ऐसे किसी रिवाज को नहीं मानती। आप … Read more

खामोश इंतज़ार की चुभन

 बस, वही एक पल था जिसने दोनों के बीच जमी बरसों की बर्फ को पिघला दिया। उस दिन के बाद से उनका मेल-मिलाप शुरू हो गया। कल्याणी का नर्म दिल अविनाश के उस शालीन और अनवरत समर्पण के आगे हार गया था। धीरे-धीरे वह भी अविनाश को चाहने लगी। दोनों एक-दूसरे पर अपनी जान छिड़कने … Read more

मोहभंग: वो आखिरी कदम

 “जाओ काव्या, लौट जाओ अपने घर,” कबीर ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा। “यह तुम्हारे लिए एक सबक है। भगवान का शुक्र मनाओ कि मैं कोई बुरा इंसान नहीं था, वरना रात के इस अंधेरे में तुम्हारा क्या अंजाम होता, तुम सोच भी नहीं सकती। मैंने तुम्हें सिर्फ यह एहसास दिलाने के लिए यहाँ … Read more

अनकहे शब्दों की चुभन

मैंने आगे कहा, “नए रिश्तों की ज़मीन बहुत नाज़ुक होती है सुमित्रा। इसमें मज़ाक का भारी हल नहीं चलाया जाता, बल्कि प्यार और समझदारी का बीज बहुत नरमी से बोना पड़ता है। तुम्हारी और निशांत की जान-पहचान पुरानी हो सकती है, लेकिन श्रुति के लिए तुम अभी भी ‘सास’ हो, ‘मां’ नहीं बनी हो। मां … Read more

error: Content is protected !!