सिंदूरी रवायतें और एक नई सुबह

 लेकिन नंदिनी कहाँ मानने वाली थी। उसने दृढ़ निश्चय के साथ सुमित्रा देवी का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली, “रवायतें इंसानों के लिए होती हैं माँ, इंसान रवायतों के लिए नहीं। अगर कोई रिवाज एक माँ को उसके बेटे की खुशी से दूर करता है, तो मैं ऐसे किसी रिवाज को नहीं मानती। आप मेरे साथ चल रही हैं, बस।” नंदिनी सुमित्रा देवी को लगभग खींचते हुए कमरे से बाहर ले आई।

जब नंदिनी और सुमित्रा देवी एक साथ हवेली के आंगन में पहुँचीं, तो वहाँ मौजूद सभी लोगों की साँसें अटक गईं। पंडित जी के मंत्रोच्चार अचानक रुक गए। पूरे आँगन में एक सन्नाटा छा गया, जिसे विमला देवी की कड़कती आवाज ने तोड़ा।

बनारस के प्रतिष्ठित चतुर्वेदी परिवार की हवेली आज गेंदे के फूलों और आम के पत्तों से सजी हुई थी। हवा में हवन की समिधा, शुद्ध घी, कपूर और लोबान की पवित्र महक तैर रही थी। आज घर में नई बहू के आगमन के पश्चात कुलदेवी की विशेष पूजा का आयोजन किया गया था। मान्यता थी कि इस पूजा के बिना नवविवाहित जोड़े का दांपत्य जीवन पूर्ण रूप से सुखी नहीं माना जाता। हवेली के आंगन में एक भव्य मंडप सजाया गया था, जहाँ शहर के जाने-माने पंडित मंत्रोच्चार के साथ वेदी तैयार कर रहे थे। घर की सभी सुहागिन औरतें लाल-पीले परिधानों में सजी-धजी, सोलह श्रृंगार किए हुए इधर-उधर व्यस्त थीं। इस सारे कोलाहल के बीच, हवेली के ऊपरी माले पर अपने कमरे में नई बहू नंदिनी आईने के सामने खड़ी थी।

नंदिनी आज भी अपनी भारी बनारसी साड़ी की प्लेट्स और भारी जेवरों से जूझ रही थी। शादी को अभी कुछ ही दिन हुए थे और वह इस नए माहौल, नए रिश्तों और नई जिम्मेदारियों को समझने की कोशिश कर रही थी। आईने में खुद को देखते हुए उसे अचानक अपनी माँ की बहुत याद आई, जिनका देहांत कई साल पहले हो गया था। नंदिनी सोच रही थी कि काश आज उसकी सास, सुमित्रा देवी, यहाँ होतीं तो वह अपने हाथों से उसे तैयार करतीं, उसे आशीर्वाद देतीं और माँ की कमी महसूस न होने देतीं। जब से नंदिनी इस घर में आई थी, उसने देखा था कि उसकी सास सुमित्रा देवी हमेशा घर के एक शांत कोने में ही रहती थीं।

तभी कमरे का दरवाजा खुला और नंदिनी की बड़ी ताई-सास (जेठानी की सास के समान), विमला देवी, ने अंदर कदम रखा। उनके चेहरे पर हमेशा एक कठोरता छाई रहती थी। उन्होंने अपने भारी स्वर में हुक्म चलाते हुए कहा, “अरे बहू, अभी तक तुम्हारा श्रृंगार ही चल रहा है? नीचे मुहूर्त बीता जा रहा है और पंडित जी तुम दोनों पति-पत्नी का इंतजार कर रहे हैं। जल्दी से पल्लू सिर पर रखो और नीचे आओ।” नंदिनी ने घबराहट में अपनी साड़ी का पल्लू सिर पर लिया और झिझकते हुए पूछा, “ताई जी, मैं तो तैयार हूँ, लेकिन माँ जी (सुमित्रा देवी) कहीं नजर नहीं आ रही हैं। मैं सोच रही थी कि उनके साथ ही नीचे मंडप में जाऊँ। क्या वे मेरे कमरे में आ सकती हैं?”

नंदिनी की बात सुनते ही विमला देवी की त्यौरियां चढ़ गईं। उन्होंने तीखे स्वर में कहा, “कैसी बात करती हो बहू! तुम्हें पता नहीं कि आज कितना शुभ दिन है? तुम्हारी सास एक विधवा है। हमारे खानदान में और इस समाज के रीति-रिवाजों में विधवाओं का शुभ कार्यों में शामिल होना वर्जित है। उनकी परछाई भी पूजा-पाठ पर पड़े तो अपशकुन माना जाता है। वो अपने कमरे में हैं और वहीं रहेंगी। तुम चुपचाप नीचे चलो, तुम्हारा पति अंशुल तुम्हारा इंतजार कर रहा है।” इतना कहकर विमला देवी पैर पटकते हुए कमरे से बाहर निकल गईं।

नंदिनी वहीं जड़वत खड़ी रह गई। उसके अंदर एक अजीब सी बेचैनी और क्रोध ने जन्म ले लिया। जिस माँ ने अंशुल को जन्म दिया, उसे पाल-पोस कर इतना बड़ा किया, आज उसी के बेटे के जीवन के सबसे बड़े शुभ कार्य में वह अपशकुनी कैसे हो सकती है? नंदिनी ने अपने भारी लहंगे और गहनों की परवाह किए बिना सीधे सुमित्रा देवी के कमरे की तरफ कदम बढ़ा दिए।

सुमित्रा देवी का कमरा हवेली के सबसे पिछले हिस्से में था, जहाँ रोशनी भी मुश्किल से पहुँचती थी। नंदिनी ने जब दरवाजा खोला तो देखा कि सुमित्रा देवी एक साधारण सी सफेद साड़ी पहने, हाथ में रुद्राक्ष की माला लिए, एक कोने में बैठी भगवान का नाम जप रही थीं। उनके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी और दर्द था, जो उनके शांत स्वभाव के पीछे छिपा रहता था। नंदिनी को देखते ही सुमित्रा देवी हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुईं। “अरे नंदिनी बेटी, तुम यहाँ इस वक्त? नीचे पूजा शुरू होने वाली होगी। तुम यहाँ क्यों आ गई? मेरे कमरे में आना तुम्हारे लिए ठीक नहीं है। मैं अभागिन हूँ, जाओ बेटी नीचे जाओ।”

नंदिनी की आँखों में आँसू आ गए। वह दौड़कर अपनी सास के पास गई और उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “माँ, आप अभागिन कैसे हो सकती हैं? आप तो इस घर की जड़ हैं। आपके बिना मेरे और अंशुल के जीवन की कोई भी शुरुआत शुभ कैसे हो सकती है? चलिए मेरे साथ, आपको हमारे साथ पूजा में बैठना होगा।” सुमित्रा देवी ने डर से अपने हाथ पीछे खींचने की कोशिश की, “नहीं बेटी, तू पागल हो गई है। खानदान वाले और तेरी ताई जी क्या कहेंगे? रवायतें मुझे इसकी इजाजत नहीं देतीं। मैं यहीं से तुम दोनों को आशीर्वाद दे दूँगी। तू जिद मत कर।”

लेकिन नंदिनी कहाँ मानने वाली थी। उसने दृढ़ निश्चय के साथ सुमित्रा देवी का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली, “रवायतें इंसानों के लिए होती हैं माँ, इंसान रवायतों के लिए नहीं। अगर कोई रिवाज एक माँ को उसके बेटे की खुशी से दूर करता है, तो मैं ऐसे किसी रिवाज को नहीं मानती। आप मेरे साथ चल रही हैं, बस।” नंदिनी सुमित्रा देवी को लगभग खींचते हुए कमरे से बाहर ले आई।

जब नंदिनी और सुमित्रा देवी एक साथ हवेली के आंगन में पहुँचीं, तो वहाँ मौजूद सभी लोगों की साँसें अटक गईं। पंडित जी के मंत्रोच्चार अचानक रुक गए। पूरे आँगन में एक सन्नाटा छा गया, जिसे विमला देवी की कड़कती आवाज ने तोड़ा।

“यह क्या अनर्थ कर रही हो बहू!” विमला देवी चिल्लाईं। “तुम्हारी इतनी हिम्मत कि तुम घर की पुरानी रीतियों को इस तरह पैरों तले रौंदो? पंडित जी के सामने एक विधवा को पूजा के मंडप तक ले आई? क्या तुम्हें इस बात का जरा भी भान है कि यह कितना बड़ा अपशकुन है? इसे तुरंत यहाँ से वापस ले जाओ, वरना देवी माँ का प्रकोप इस घर को बर्बाद कर देगा!”

भीड़ में से अंशुल की बुआ ने भी ताना मारा, “आजकल की पढ़ी-लिखी बहुएँ किसी का आदर-सम्मान नहीं जानतीं। अपने बाप के घर से यही संस्कार सीख कर आई है क्या कि आते ही घर के तौर-तरीके बदल दे? बड़ी आई समाज सुधारक बनने वाली!”

सुमित्रा देवी शर्म और अपमान से गड़ गईं। वे रोते हुए पीछे हटने लगीं, लेकिन नंदिनी ने उनका हाथ नहीं छोड़ा। नंदिनी ने गहरी साँस ली और अपनी नज़रें विमला देवी और वहाँ मौजूद सभी रिश्तेदारों पर गड़ा दीं। उसकी आवाज़ में न तो कोई कंपन था और न ही कोई डर।

“ताई जी, आप मुझे जो चाहे कह सकती हैं, लेकिन मेरे संस्कारों पर उंगली उठाने का हक आपको नहीं है,” नंदिनी ने स्पष्ट और ऊँची आवाज में कहा। “मुझे मेरे पिता ने यही संस्कार दिए हैं कि भगवान की नजर में कोई भी इंसान सिर्फ इसलिए अपवित्र नहीं हो जाता क्योंकि उसके जीवनसाथी की मृत्यु हो गई है। आप मुझे बताइए, जब बाबूजी (अंशुल के पिता) का देहांत हुआ था, तब क्या माँ का मातृत्व भी उनके साथ चिता पर जल गया था? क्या उन्होंने अंशुल को पालने में कोई कसर छोड़ी? जब उन्होंने अपने खून पसीने से इस घर को और अंशुल को सींचा है, तो आज अंशुल की सबसे बड़ी खुशी के दिन वे अपशकुन कैसे हो सकती हैं?”

पंडित जी ने अपनी पोथी समेटते हुए कहा, “बेटी, शास्त्र और मर्यादाओं का पालन करना ही गृहस्थ धर्म है। विधवा स्त्री का मंगल कार्यों में हस्तक्षेप अनिष्ट को निमंत्रण देना है। हम यह पूजा नहीं करा सकते।”

नंदिनी ने पंडित जी की ओर मुड़कर अत्यंत सम्मान लेकिन तार्किकता के साथ कहा, “पंडित जी, किस शास्त्र में लिखा है कि एक माँ की दुआ से अनिष्ट होता है? अगर यह अपशकुन है, तो यह नियम केवल औरतों के लिए ही क्यों है? मेरे दादा जी का जब निधन हुआ था, तो मेरी दादी को ऐसे ही हर शुभ कार्य से निकाल दिया गया था। लेकिन जब मेरे पड़ोस में रहने वाले शर्मा अंकल की पत्नी का देहांत हुआ, तो वे अपनी बेटी के कन्यादान में सबसे आगे बैठे थे, हर पूजा में उन्होंने हिस्सा लिया। तब तो किसी ने नहीं कहा कि वे विधुर हैं तो अपशकुन होगा? यह कैसा पाखंड है जिसे हम धर्म का नाम दे रहे हैं?”

नंदिनी के शब्दों ने जैसे पूरे आँगन में एक वैचारिक तूफान खड़ा कर दिया। लोग एक-दूसरे का मुँह देखने लगे। नंदिनी रुकी नहीं, उसने अंशुल की तरफ देखा जो अब तक चुपचाप मंडप में बैठा था। “अंशुल, क्या तुम भी यही मानते हो कि तुम्हारी माँ की परछाई हमारे लिए बुरी है? अगर आज हम इस अंधविश्वास को मान लेंगे, तो हम कभी भी सच्चे मन से भगवान से आशीर्वाद नहीं माँग पाएंगे। अगर माँ इस पूजा में शामिल नहीं होंगी, तो मैं भी इस मंडप में नहीं बैठूँगी। मेरे लिए असली भगवान मेरी माँ हैं।”

अंशुल जो बचपन से ही इन परंपराओं को चुपचाप देखता आ रहा था, आज अपनी पत्नी के शब्दों से मानो नींद से जाग गया। उसे अपनी माँ के वे दिन याद आ गए जब उन्होंने अकेले ही उसे पढ़ाने और काबिल बनाने के लिए रातों की नींदें कुर्बान की थीं। अंशुल तुरंत मंडप से उठा और अपनी माँ के पास आकर खड़ा हो गया। उसने अपनी माँ के आँसू पोंछे और कहा, “नंदिनी बिल्कुल सही कह रही है ताई जी। मैं अंधा हो गया था जो समाज के डर से अपनी माँ को ही किनारे कर दिया। अगर मेरी माँ इस पूजा का हिस्सा नहीं बन सकतीं, तो मुझे भी यह गृहशांति नहीं चाहिए। मेरी शांति मेरी माँ के चरणों में है।”

विमला देवी और अन्य रिश्तेदार अब निशब्द थे। तर्क और भावनाओं के इस प्रहार के आगे उनकी खोखली परंपराओं की दीवार ढह चुकी थी। नंदिनी ने सुमित्रा देवी के दोनों हाथ पकड़कर उन्हें अपने पास खींच लिया। “माँ, बचपन में जब मेरी अपनी माँ गुजरी, तो मैं हमेशा एक माँ के प्यार के लिए तरसती थी। मैंने सोचा था कि शादी के बाद सास के रूप में मुझे मेरी माँ वापस मिल जाएगी। क्या आप मुझे अपनी बेटी नहीं मानेंगी? क्या आप मुझे अपने आशीर्वाद से वंचित कर देंगी?”

सुमित्रा देवी अब अपने आँसुओं को रोक नहीं पाईं। उन्होंने अपनी बाहें फैलाकर नंदिनी को गले से लगा लिया। यह केवल दो औरतों का मिलन नहीं था, बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे एक दमनकारी अंधविश्वास का अंत था। सुमित्रा देवी ने रोते हुए कहा, “तू मेरी बहू नहीं, मेरा वो अभिमान है जिसे यह समाज मुझसे छीन चुका था। तूने आज मुझे फिर से एक माँ बना दिया।”

अंशुल ने पंडित जी से कहा, “पंडित जी, कृपया पूजा शुरू करें, और पहला दीपक मेरी माँ ही जलाएंगी।” पंडित जी, जो खुद भी नंदिनी की बातों से गहराई तक प्रभावित हो चुके थे, उन्होंने मुस्कुराते हुए सिर हिलाया और कहा, “निश्चय ही बेटा, जहाँ इतना सच्चा प्रेम और सम्मान हो, वहाँ ईश्वर स्वयं निवास करते हैं।”

उस दिन चतुर्वेदी हवेली में जो कुलदेवी की पूजा हुई, वह सिर्फ एक धार्मिक रस्म नहीं थी, बल्कि एक सामाजिक बदलाव की शुरुआत थी। सुमित्रा देवी ने अपने हाथों से पहला दीप प्रज्वलित किया। आग की उस लौ में नंदिनी और अंशुल के सुखी भविष्य की चमक तो थी ही, साथ ही उन तमाम रूढ़िवादी बेड़ियों के जलने की रोशनी भी थी, जिन्होंने सालों से औरतों को जकड़ रखा था। नंदिनी ने सिर्फ एक घर की बहू का ही नहीं, बल्कि एक सच्ची बेटी होने का फर्ज निभाया था।

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