अपनी पहचान का आसमान

सावित्री देवी के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान तैर गई थी। वह अपने आलीशान सोफे पर विराजमान थीं, हाथ में चाय का प्याला था और उनकी नज़रें अपनी बहू मेघा पर गड़ी थीं, जो अभी-अभी बाहर से आई थी। मेघा उनके इस खामोश कटाक्ष और उस कुटिल मुस्कराहट का राज बहुत अच्छी तरह से जानती थी। वह भी बिना कोई प्रतिक्रिया दिए, एक हल्की सी, पर आत्मविश्वास से भरी मुस्कान के साथ सावित्री देवी को देखकर अपने कमरे की ओर बढ़ गई।

अपने कमरे में पहुँचकर मेघा ने अपनी फाइल खोली और उसमें रखे उस कागज़ को बड़े सहेज कर रखने लगी, जो महज़ एक कागज़ नहीं बल्कि उसकी आज़ादी का परवाना था—उसका नया ज्वाइनिंग लेटर। फाइल बंद करते समय उसकी नज़र अचानक अपनी आर्किटेक्चर की डिग्री पर जाकर ठहर गई। एक पल के लिए समय जैसे रुक सा गया। प्यार से उस सुनहरे फ्रेम वाली डिग्री को सहलाते हुए मेघा अतीत के उन धुंधले पन्नों को पलटने लगी,

जिनमें उसके संघर्ष, उसके सपने और उसकी रातों की नींद दर्ज थी। कितनी रातें उसने जागकर डिज़ाइन और मॉडल तैयार किए थे। उसे आज भी याद था कि कैसे अपनी उंगलियों में छालों के बावजूद उसने अपनी फाइनल इयर की प्रोजेक्ट रिपोर्ट पूरी की थी। उसका बस एक ही सपना था—एक सफल आर्किटेक्ट बनकर अपने पैरों पर खड़ा होना, आत्मनिर्भर बनना।

और वह बनी भी थी। शुरुआती दिनों में सैलरी भले ही उतनी नहीं थी, लेकिन अपने खुद के कमाए पैसों से मिली खुशी और सुकून किसी खजाने से कम नहीं था। उसका आत्मनिर्भर बनने का वह सपना, जिसे उसने अपनी मेहनत से सींचा था, पूरा हो चुका था।

जब मेघा नौकरी में पूरी तरह से रम चुकी थी और सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थी, तभी उसके जीवन में रोहन का रिश्ता आया। शादी से पहले दोनों परिवारों की कई मुलाकातें हुईं।

उस वक्त रोहन और उसके परिवार ने बड़ी-बड़ी बातें की थीं। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि उन्हें मेघा के नौकरी करने से कोई आपत्ति नहीं है। वे खुद को बड़े ही आधुनिक विचारों वाला परिवार बताते थे। इन बातों से आश्वस्त होकर, धूमधाम से रोहन और मेघा की शादी हो गई। मेघा अपने नए जीवन में बहुत खुश थी।

लेकिन, शादी के कुछ ही महीनों बाद घर का असल रंग सामने आने लगा। सावित्री देवी, जो बाहर से बहुत सुलझी हुई लगती थीं, उन्हें मेघा की नौकरी से परेशानी होने लगी। मेघा बहुत समझदार थी। वह सुबह जल्दी उठकर घर का सारा काम खत्म करती, सबके लिए नाश्ता और खाना बनाती, और फिर भागते-दौड़ते ऑफिस जाती।

शाम को लौटकर फिर से घर की ज़िम्मेदारियों में लग जाती। वह घर और अपनी नौकरी के बीच संतुलन बनाने की जी-तोड़ कोशिश करती रही, पर लाख कोशिशों के बाद भी सावित्री देवी कोई न कोई कमी निकाल ही लेतीं। वे उसे जब-तब चार बातें सुनाने से नहीं चूकती थीं।

अक्सर वे मेघा की कम सैलरी का मज़ाक उड़ाते हुए उसे नौकरी छोड़ने का ताना देतीं। “तुम्हारी इस पच्चीस-तीस हज़ार की नौकरी का हमारे घर में क्या मोल है? इतना तो हमारे रोहन की गाड़ी का पेट्रोल और हमारे घर के नौकरों का खर्च है। व्यर्थ में धक्के खाती हो।” ये बातें मेघा के दिल में शूल की तरह चुभतीं, लेकिन फिर भी वह चुपचाप सब सहती रही। वह एक आदर्श बहू का फर्ज़ निभाने के साथ-साथ अपनी नौकरी से भी न्याय करने की कोशिश करती रही।

शादी के डेढ़ साल के भीतर ही मेघा ने एक प्यारे से बेटे, आरव, को जन्म दिया। घर में खुशियां छा गईं, लेकिन मेघा के लिए यह खुशी एक नई बंदिश लेकर आई। मैटरनिटी लीव खत्म होने के बाद जब मेघा ने वापस ऑफिस जाने की बात छेड़ी, तो सावित्री देवी ने साफ शब्दों में अपना पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने दो टूक कह दिया, “मुझसे इस उम्र में किसी बच्चे के पीछे नहीं भागा जाएगा। मेरे घुटनों में दर्द रहता है, मैं पूरे दिन बच्चे की देखभाल नहीं कर सकती। तुम अब एक माँ हो, तुम्हारी प्राथमिकता तुम्हारा बच्चा होना चाहिए, नौकरी नहीं। अभी नौकरी छोड़ दो, जब बेटा थोड़ा बड़ा हो जाए और स्कूल जाने लगे, तब कर लेना।”

मेघा ने उम्मीद भरी नज़रों से रोहन की तरफ देखा, यह सोचकर कि शायद वह उसका साथ देगा। लेकिन रोहन ने भी अपनी माँ की सेहत का हवाला देते हुए मेघा को ही समझाना शुरू कर दिया। “मेघा, माँ की तबीयत ठीक नहीं रहती। तुम तो जानती हो। और फिर हमारे पास पैसों की कौन सी कमी है? तुम आरव के लिए घर पर रह जाओ, कुछ सालों की ही तो बात है।” बेटे की खातिर और परिवार की शांति बनाए रखने के लिए मेघा मान गई। उसने भारी मन से अपने सपनों को एक बक्से में बंद कर दिया और अपना इस्तीफा सौंप दिया। सावित्री देवी की मुराद पूरी हो गई; घर की पढ़ी-लिखी, कमाऊ बहू अब पूरी तरह से उनके नियंत्रण में थी।

वक्त बीतता गया। आरव अब तीन साल का हो चुका था और उसका प्ले-स्कूल में एडमिशन भी हो गया था। मेघा के पास अब दिन में काफी खाली समय रहता था। उसने फिर से नौकरी करने की इच्छा जताई। लेकिन इस बार भी सावित्री देवी ने कोई न कोई नया बहाना खोज लिया। “अभी बच्चा बहुत छोटा है, स्कूल से जल्दी आ जाता है, उसे माँ की ज़रूरत है। अभी घर पर ही रहो।” और सबसे बड़ी निराशा तो उसे रोहन से होती थी। वह ‘श्रवण कुमार’ बनकर, अपनी माँ के हर आदेश को पत्थर की लकीर मान लेता। वह कभी प्यार से मेघा को बहलाता, तो कभी डांट-फटकार और झगड़ा करके उसे नौकरी न करने के लिए मजबूर करता। “तुम क्यों घर का माहौल खराब करना चाहती हो? माँ कह रही हैं तो कुछ सोच कर ही कह रही होंगी।”

मेघा अंदर ही अंदर घुटने लगी थी। वह अक्सर सोचती कि जब उसके घरवाले ही उसकी खुशी और उसकी तरक्की से खुश नहीं रहेंगे, तो ऐसी नौकरी का क्या फायदा जहाँ घर लौटकर रोज़ कलह का सामना करना पड़े। न चाहते हुए भी, उसने अपने मन को मार लिया था और खुद को पूरी तरह से घर के कामों और आरव की परवरिश में झोंक दिया था।

लेकिन एक इंसान कब तक अपने अस्तित्व को मार कर जी सकता है? एक दिन मेघा ने चुपचाप, बिना किसी को बताए, कुछ कंपनियों में अपना रिज्यूमे भेज दिया। उसके तजुर्बे और काबलियत की वजह से उसे एक बहुत अच्छी कंपनी से शानदार पैकेज के साथ ऑफर मिल गया। आज वही ज्वाइनिंग लेटर उसके हाथ में था।

“मैं क्या सुन रहा हूँ?” रोहन की तेज़ और गुस्से से भरी आवाज़ ने कमरे के सन्नाटे को चीर दिया। मेघा ख्यालों की दुनिया से बाहर आई और चौंकी।

“क्या सुना आपने?” मेघा ने अपनी फाइल को अलमारी में सुरक्षित रखते हुए, बिना पलटे, बड़ी ही शांति से पूछा।

रोहन कमरे में तेज़ी से दाखिल हुआ। “तुम नौकरी करोगी? माँ बता रही थीं कि आज तुम्हारा कोई कूरियर आया है और तुम फिर से नौकरी के सपने देख रही हो।”

मेघा ने मुड़कर रोहन की आँखों में देखा और मजबूती से कहा, “इसमें गलत क्या है? मैं पहले भी तो करती थी।”

रोहन का गुस्सा बढ़ने लगा। “मुझे बताना भी ज़रूरी नहीं समझा तुमने? अगर तुम काम पर जाओगी, तो यह घर, मेरा खाना, मम्मी-पापा और आरव की देखभाल कौन करेगा? क्या तुमने यह सब सोचा है?”

“अगर मैं आपको बताती, तो क्या आप मान जाते?” मेघा ने एक तीखी और प्रश्नवाचक दृष्टि से रोहन की ओर देखा। “नहीं… आप मेरी बात सुनते ही सीधे अपनी मम्मी जी के पास जाते। वो फिर से अपनी किसी बीमारी का या आरव का कोई नया बहाना बना देतीं और आप, एक आदर्श ‘श्रवण कुमार’ की तरह, वापस आकर मुझे ही समझाने और चुप कराने लग जाते।”

रोहन तिलमिला उठा। “हाँ! हूँ मैं श्रवण कुमार! बेटा हूँ उनका! उन्होंने मुझे जन्म दिया है, पाला-पोसा है। कुछ उम्मीदें हैं उन्हें मुझसे। इसमें गलत क्या है कि मैं उनका ख्याल रखूँ और उनकी बात मानूँ?”

मेघा की आँखों में इतने सालों का दबा हुआ दर्द और गुस्सा एक साथ छलकने लगा, पर उसकी आवाज़ में गज़ब का ठहराव था। “इसमें कुछ भी गलत नहीं है रोहन। आप बेटे हैं, अपनी माँ की उम्मीदें पूरी कीजिए। लेकिन… मैं पत्नी हूँ आपकी। क्या मेरी कोई अहमियत नहीं? मेरी भी कुछ उम्मीदें थीं आपसे, जब मैंने अपना घर छोड़कर आपके साथ एक नई ज़िंदगी शुरू की थी। मेरी उम्मीद थी कि मेरा पति मेरे मान-सम्मान का, मेरे सपनों का, मेरी खुशियों का ख्याल रखेगा। लेकिन जब मेरा अपना पति ही मेरी इज़्ज़त, मेरी आज़ादी और मेरी खुशी का ख्याल नहीं करता, तो मैं दूसरों से क्या उम्मीद करूँ? मैं इस घर में सिर्फ एक केयरटेकर बनकर नहीं रह सकती।”

“तुम्हें किस चीज़ की कमी है इस घर में, जो तुम बाहर जाकर धक्के खाना चाहती हो? तुम्हें पैसे चाहिए, मैं देता हूँ। तुम्हें गहने चाहिए, मैं दिलाता हूँ,” रोहन ने अपनी आर्थिक हैसियत का रौब दिखाते हुए कहा।

“मुझे पैसों या गहनों की कमी नहीं है रोहन,” मेघा की आवाज़ थोड़ी तेज़ हुई। “मुझे कमी है सम्मान की। मुझे कमी है आत्मनिर्भर होने के उस अहसास की। मुझे कमी है अपने उस वजूद की, जिसे मैंने इस घर की चौखट पर आते ही खो दिया था। मुझे अपने उन अधूरे सपनों की कमी खलती है, जिन्हें मैंने सिर्फ आप लोगों की झूठी शान और सहूलियत के लिए मार दिया था।”

मेघा ने एक गहरी सांस ली और अपना फैसला सुनाते हुए कहा, “मैं अब आपकी और मम्मी जी की किसी भी चिकनी-चुपड़ी बात या किसी इमोशनल ब्लैकमेल में नहीं आने वाली। मैं नौकरी करूँगी, और इसी सोमवार से ज्वाइन कर रही हूँ। घर कैसे चलेगा, बच्चे को कौन संभालेगा, इसका समाधान हम दोनों को मिलकर निकालना होगा। क्योंकि घर और बच्चा जितना मेरा है, उतना आपका भी है। अब यह आपका फैसला है कि आप इस सफर में एक पति बनकर मेरा साथ देते हैं, या फिर मुझे अकेले ही अपने सपनों की उड़ान भरनी होगी।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। रोहन चुप हो गया। उसके पास मेघा की बातों का कोई जवाब नहीं था। वो भीतर तक जानता था कि मेघा गलत नहीं है। सालों से वह सिर्फ एक बेटा होने का फर्ज़ निभा रहा था, अपनी माँ की हाँ में हाँ मिला रहा था। लेकिन आज, मेघा के इन शब्दों ने उसकी आँखों पर पड़ी पट्टी को खोल दिया था। आज पहली बार, वह सिर्फ एक आज्ञाकारी बेटा नहीं, बल्कि एक जीवनसाथी, एक पति बनकर सोच रहा था। उसे एहसास हो रहा था कि जिस पंछी के पंख उसने खुद अपनी माँ के कहने पर कुतर दिए थे, आज वह पंछी आसमान नापने के लिए तैयार था—और उस उड़ान को रोकना अब उसके बस में नहीं था।

आप क्या सोचते हैं? क्या एक बेटे का अपनी माँ के प्रति फर्ज़, एक पति के अपनी पत्नी के प्रति फर्ज़ से हमेशा ऊपर होना चाहिए? क्या परिवार की शांति के लिए हमेशा एक औरत को ही अपने सपनों की कुर्बानी देनी चाहिए? अपने विचार हमें ज़रूर बताएं।

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