सार्थकता की छाँव

निहारिका जब लाल जोड़े में सजी, अपनी आँखों में अनगिनत सपने लिए सेठ रामनाथ जी के विशाल और भव्य बंगले ‘आशीर्वाद’ की चौखट पर पहुँची थी, तो उसके मन में एक अजीब सी घबराहट थी। मायके का वो मध्यमवर्गीय लेकिन खुला माहौल, जहाँ उसे हमेशा पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने की आज़ादी मिली थी, क्या इस … Read more

रिश्तों की जमापूंजी

 “क्या बात है मीरा? मैं देख रहा हूँ कि जब से मैं घर आया हूँ, तुम कुछ परेशान सी हो। तुम्हारी आँखों में भी एक अजीब सी उदासी है। भाई से बात हुई थी तुम्हारी, क्या रिया की शादी की तैयारियों को लेकर तुम वहाँ न जा पाने की वजह से दुखी हो? अगर ऐसी … Read more

तपकर निखरता कुंदन

  ऑफिस से लौटते ही उसने अपना लैपटॉप बैग सोफे के एक किनारे पटका और बिना किसी से कुछ कहे, अपनी आँखें मूँद कर निढाल सा लेट गया। उसकी माँ, कल्याणी देवी, पास ही बैठी थीं और किसी से धीमी आवाज़ में बात कर रही थीं। रोहन का मन इतना उलझा हुआ था कि उसने ध्यान … Read more

रिश्तों की बुनियाद

पल्लवी ने अपने बच्चों को टोकने के बजाय रेवती से कहा, “भाभी, बच्चे तो वही कहेंगे न जो वो देखते हैं। हमारे घर में तो बाथरूम में भी एसी लगा है। खैर, मुझे आपसे और भैया से कुछ जरूरी बात करनी है।” शाम को चाय के समय जब पूरा परिवार एक साथ बैठा, तो पल्लवी … Read more

खामोश प्रीत का मुखर उपहार

 आज वह स्मृति रघुनाथ जी के सीने में किसी खंजर की तरह चुभ रही थी। “इस उम्र में क्या ज़रूरत है?” क्या प्यार और उपहार की कोई उम्र होती है? क्या सुमित्रा का मन नहीं करता होगा कि उसका पति भी उसे खास महसूस कराए? रघुनाथ जी की आँखों से पहली बार आँसू छलक पड़े। … Read more

रिश्तों का आइना

अंजलि की आंखों से अब आंसुओं की धार बह निकली। ये आंसू दर्द के नहीं, बल्कि पछतावे के थे। उसे अपनी सोच पर, अपने उस शक पर घिन आने लगी जो उसने आभासी दुनिया के उस कचरे को देखकर अपने मन में पाला था। जो परिवार उसके लिए अपनी जान छिड़कता है, जो सासू मां … Read more

अदृश्य डोर: ममता का संदूक

नीलिमा  अब अपने आँसू नहीं रोक पाई। उसने रोते हुए ससुर जी के अस्पताल जाने वाली बात बताई और फिर फफकते हुए बोली, “दीदी, मुझे बहुत ज़ोर से भूख लगी है। पिछले तीन दिन से मैंने पेट भर के कुछ नहीं खाया है। यहाँ सब इतने परेशान हैं कि मैं किसी से कुछ कह भी … Read more

धूप के बाद की छाँव

अस्पताल के उस सफेद, नीरस कमरे में लेटे हुए देवनाथ अक्सर खिड़की के बाहर खाली आसमान को घूरते रहते थे। लीवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी ने शरीर को इस कदर खोखला कर दिया था कि करवट लेना भी एक जंग जीतने जैसा लगता था। जब इंसान के पास भविष्य के लिए कुछ खास नहीं बचता, … Read more

अनकहे अल्फ़ाज़: एक नई सुबह की तलाश

इतना सुनते ही इशिता  की आँखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगी। कबीर ने उसे चुप नहीं कराया। उसने इशिता  को रोने दिया, उसके मन के सारे गुबार को आंसुओं के रास्ते बाहर निकलने दिया। जब इशिता  थोड़ी शांत हुई, तो उसने अपने दिल का एक-एक पन्ना कबीर के सामने … Read more

अनुपस्थित

आज एक हफ्ते से ज्यादा हो गया, जगदीश बाबू सुबह की सैर पर नहीं आ रहे हैं. शायद बीमार हो गये हों. अब बुढापे में बीमार होना कौन बडी बात है. सर्दी के प्रकोप को इस उमर में झेलना आसान भी नहीं है. इस साल लगता है सर्दी सारे रिकार्ड तोड कर रहेगी.आठ बजे के … Read more

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