परिवार कोई बंधन नहीं

तान्या के आंसुओं को अपने आंचल से पोंछा और उसे अपने सीने से लगाते हुए बोलीं, “अरे पगली, मां-बाप कभी अपने बच्चों की नादानियों से नाराज नहीं होते। तुम इस घर की बहू नहीं, हमारी बेटी हो। अगर हम तुम्हें समय पर आने-जाने या सेहत का ध्यान रखने को कहते हैं, तो इसलिए नहीं कि … Read more

संपत्ति का बँटवारा

 “बेटी, पराई या माँगी हुई दौलत से कभी किसी का घर नहीं बसता। सम्मान और सुख हमेशा अपनी मेहनत और समझदारी से मिलता है। तुम्हारे ससुर एक प्रतिष्ठित शिक्षक रहे हैं, तुम्हारे पति एक होनहार इंजीनियर हैं। अगर वहाँ कोई कलह है, तो उसका समाधान बातचीत और सूझबूझ से खोजो, मायके को लूटने से ससुराल … Read more

स्वाभिमान की चमक

नलिनी को शायद उसी क्षण अपनी गलती का भान हुआ कि उनके मुंह से निकले तीखे तीरों ने मर्यादा की सीमा लांघ दी थी। वे झेंपते हुए आगे बढ़ीं और बात को संभालने की कोशिश करते हुए बोलीं, “अरे शारदा, तुम तो बात का बतंगड़ बना रही हो! मैंने तुम्हें थोड़े ही कुछ कहा है? … Read more

स्नेह की पोटली

 वंदना की आंखें नम हो गईं। उसने धीरे से कहा, “मां जी सच कह रही हैं आरोही। बाजार की हर चीज में कीमत होती है, पर मां के हाथ के बने उस एक कौर में जो सुरक्षा और बेफिक्री का अहसास होता है, वह दुनिया की किसी दौलत से नहीं खरीदा जा सकता। जब मैं … Read more

पराए आँगन की छाँव

उमेश जी जब भी चाय की चुस्की लेते हुए अपनी धर्मपत्नी मनोरमा को समझाते कि घर में आई नई बहू को भी वही आदर और दुलार मिलना चाहिए जो उनकी अपनी संतान को मिलता है, मनोरमा जी का चेहरा तमतमा उठता था। उनके भीतर बरसों से जमी परंपराओं और संस्कारों की धूल इतनी गहरी थी … Read more

पेंशन

 “बाबूजी, यह घर, यह परिवार और मेरी यह पूरी जिंदगी आपकी ही तो बदौलत है। आज अगर मैं कमाने लायक बना हूं, तो यह आपकी तीस साल की तपस्या का फल है। यह पेंशन आपकी मेहनत का सम्मान है, यह आपका अधिकार है। आप इसे अपनी मर्जी से जहां चाहे खर्च करें, जिसे चाहे दें। … Read more

ममता के आंसू

“पल्लवी, तुम इतना सब क्यों करती हो? इस घर ने तुम्हें दिया ही क्या है?” देवांश ने बहुत धीमी आवाज में पूछा। पल्लवी ने उठकर बैठते हुए मुस्कुरा कर कहा, “यह मेरा घर है देवांश जी। जब अपने घर की छत टपकती है, तो घर छोड़कर भागा नहीं जाता, बल्कि मिलकर छत की मरम्मत की … Read more

रिश्तों का प्रायश्चित

तरुण तुरंत अपनी ससुराल लौटा। उसने नैना से बिना कोई बहस किए केवल इतना कहा, “नैना, तुमने मुझे क्या से क्या बना दिया। मैंने उस परिवार की बलि चढ़ा दी जिसने मुझे जीवन दिया था। अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी भी इंसानियत बची है, तो मेरे साथ चलो, वरना आज से हमारे रास्ते अलग हैं।” … Read more

अपनापन

जानकी जी ने वात्सल्य से उसके बालों को सहलाया और बोलीं, “पगली, ससुराल कोई पराया घर नहीं होता। जब तुम अपने मां-बाप, अपना बचपन और अपनी सारी पहचान पीछे छोड़कर हमारे घर को अपना बनाने आती हो, तो यह हमारा फर्ज बनता है कि हम तुम्हें सिर्फ बहू बनाकर तिजोरी की चाबियां न सौंपें, बल्कि … Read more

पराई अमानत का अपनापन

  तन्वी की शादी को अभी महज़ छह महीने ही तो बीते थे, लेकिन अनुराधा जी का मन हर पल उसी में अटका रहता था। एक मां का दिल भी बड़ा अजीब होता है; जब तक बेटी घर में रहती है, तब तक उसे सहेजने और संवारने में सांसें खटती रहती हैं, और जब वह विदा … Read more

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