निहारिका जब लाल जोड़े में सजी, अपनी आँखों में अनगिनत सपने लिए सेठ रामनाथ जी के विशाल और भव्य बंगले ‘आशीर्वाद’ की चौखट पर पहुँची थी, तो उसके मन में एक अजीब सी घबराहट थी। मायके का वो मध्यमवर्गीय लेकिन खुला माहौल, जहाँ उसे हमेशा पढ़ने-लिखने और आगे बढ़ने की आज़ादी मिली थी, क्या इस रईस और साधन-संपन्न ससुराल में भी बरकरार रहेगा? यह सवाल उसके मन के किसी कोने में बार-बार उठ रहा था। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीते, निहारिका की सारी शंकाएं निर्मूल साबित हुईं।
ससुराल वाले न सिर्फ धन-दौलत से अमीर थे, बल्कि दिल के भी बेहद विशाल थे। सास-ससुर का व्यवहार बिल्कुल माता-पिता जैसा था, और पति देवांश तो मानो उसकी हर खुशी को अपनी पलकों पर बिठाकर रखता था। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी। नौकर-चाकरों की एक लंबी फौज थी जो उसके एक इशारे पर काम करने को तत्पर रहती थी। सुबह की चाय से लेकर रात के खाने तक, हर चीज़ सलीके से उसके सामने हाज़िर हो जाती। शादी के शुरुआती कुछ महीने तो मौज-मस्ती, नई-नई जगहों पर घूमने, रिश्तेदारों से मिलने-जुलने और नए जीवन की खुशियों को समेटने में ही पंख लगाकर उड़ गए।
निहारिका बचपन से ही पढ़ाई में अव्वल रही थी। उसने गणित में मास्टर्स और फिर बी.एड. किया था। उसका हमेशा से सपना था कि वह एक अच्छी शिक्षिका बने और बच्चों को ज्ञान के प्रकाश से जोड़े। जब शादी की सारी रस्में और शुरुआती दौर की व्यस्तताएं खत्म हो गईं, तो एक दिन निहारिका ने रात के समय देवांश से अपने मन की बात कही।
उसने बहुत उत्साह से कहा, “देवांश, अब तो घर में सब कुछ व्यवस्थित हो गया है। मुझे लगता है कि अब मुझे अपने करियर पर ध्यान देना चाहिए। मैंने पास ही के एक नामी कॉलेज में लेक्चरर की पोस्ट के लिए बात की है। मैं जॉब करना चाहती हूँ।”
देवांश, जो उस समय अपनी कोई किताब पढ़ रहा था, उसने किताब बंद की और निहारिका की तरफ एक बहुत ही शांत और गंभीर नज़रों से देखा। उसने मुस्कुराते हुए निहारिका का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा, “निहारिका, तुम्हें जॉब करके क्या हासिल करना है? भगवान की दया से हमारे पास पैसों की कोई कमी नहीं है। मेरा बिज़नेस बहुत अच्छा चल रहा है और पिताजी की बनाई हुई इतनी संपत्ति है कि हमारी आने वाली कई पीढ़ियों को भी शायद ही कोई आर्थिक तंगी देखनी पड़े।”
निहारिका ने बीच में टोकते हुए कहा, “बात सिर्फ पैसों की नहीं है देवांश, बात मेरी शिक्षा और मेरी काबिलियत की है। मैं अपनी पढ़ाई का सही इस्तेमाल करना चाहती हूँ।”
देवांश ने बहुत ही कोमलता से लेकिन एक ऐसे तर्क के साथ जवाब दिया, जिसने निहारिका को निशब्द कर दिया। उसने कहा, “तुम्हारी शिक्षा का मैं बहुत सम्मान करता हूँ निहारिका। लेकिन ज़रा सोचो, हमारे देश में कितनी भयंकर बेरोज़गारी है। कितने ही ऐसे युवा हैं जिनके घरों का चूल्हा उनकी नौकरी पर निर्भर करता है। अगर तुम जैसी आर्थिक रूप से पूरी तरह संपन्न महिला उस पद पर बैठ जाएगी, तो किसी ऐसे ज़रूरतमंद इंसान का हक मारा जाएगा जिसे वास्तव में उस नौकरी और उस तनख्वाह की ज़रूरत अपने परिवार का पेट पालने के लिए है। हम भाग्यशाली हैं कि हमें आजीविका के लिए संघर्ष नहीं करना पड़ता। तो क्यों न हम उन मौकों को उनके लिए छोड़ दें, जिन्हें इनकी सख्त दरकार है?”
निहारिका हक्की-बक्की रह गई। देवांश की बात में कोई गुस्सा, कोई अहंकार या कोई पुरुषवादी सोच नहीं थी। बल्कि उसमें समाज के प्रति एक अजीब सी संवेदनशीलता थी। लेकिन देवांश के इस नज़रिए ने निहारिका के अंदर के सपनों पर जैसे बर्फ का पानी डाल दिया था। वह समझ ही नहीं पाई कि इस बात का क्या जवाब दे। तर्क के तराजू पर देवांश सही लग रहा था, लेकिन एक स्त्री के आत्मसम्मान और उसकी अपनी पहचान के तराजू पर निहारिका खुद को खाली महसूस कर रही थी। उसने खामोशी से सिर हिला दिया और इस बात को वहीं खत्म कर दिया।
समय अपनी गति से बीतने लगा। निहारिका ने अपनी बी.एड. की डिग्री और शिक्षिका बनने के अपने अरमानों को अपने दिल की सबसे निचली दराज में बंद कर दिया। उसके पास अब करने को कुछ खास नहीं था। घर का सारा काम नौकर संभालते थे। वह कभी अपनी सास के साथ मंदिर चली जाती, कभी किटी पार्टीज़ में हिस्सा ले लेती, तो कभी घंटों शॉपिंग मॉल में वक्त बिताती। लेकिन रात को जब वह बिस्तर पर लेटती, तो उसे एक अजीब सा खालीपन महसूस होता। उसे लगता कि वह एक सोने के पिंजरे में कैद ऐसी चिड़िया है जिसे उड़ना तो आता है, लेकिन उसे उड़ने की ज़रूरत ही नहीं समझी जा रही।
एक दोपहर, जब घर में सब आराम कर रहे थे, निहारिका अपने कमरे की बालकनी में बैठी एक किताब पढ़ रही थी। तभी घर में साफ-सफाई का काम करने वाली युवा नौकरानी, चंपा, बहुत ही घबराई हुई और रोती हुई उसके पास आई। चंपा की उम्र निहारिका के ही बराबर रही होगी, मुश्किल से पच्चीस-छब्बीस साल। चंपा के हाथों में एक सरकारी लिफाफा और कुछ कागज़ात थे।
“क्या हुआ चंपा? तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो और रो क्यों रही हो?” निहारिका ने किताब किनारे रखते हुए पूछा।
चंपा सिसकते हुए बोली, “बहूजी, मैं तो लुट गई। आज सुबह ही डाकिया ये कागज़ दे गया है। मेरे पति तो काम पर गए हैं। मैंने बस्ती में एक-दो लोगों को दिखाया, तो वो कह रहे थे कि ये सरकारी नोटिस है। सरकार हमारी बस्ती तोड़ने वाली है। हमें घर खाली करने को कहा है। बहूजी, मैं कहाँ जाऊँगी अपने छोटे-छोटे बच्चों को लेकर? मेरा तो संसार ही उजड़ जाएगा।”
निहारिका ने तुरंत चंपा के हाथों से वह कागज़ लिया और उसे ध्यान से पढ़ने लगी। कागज़ पढ़ते ही निहारिका के चेहरे पर एक राहत भरी मुस्कान आ गई, लेकिन साथ ही एक गहरी पीड़ा भी उभरी। उसने चंपा को पास बिठाया और कहा, “चंपा, शांत हो जाओ और मेरी बात सुनो। तुम्हारी बस्ती नहीं टूट रही है।”
चंपा ने आँसू पोंछते हुए हैरानी से पूछा, “तो फिर इस कागज़ में क्या लिखा है बहूजी? सब तो कह रहे थे कि…”
“सबको पढ़ना नहीं आता चंपा,” निहारिका ने उसे समझाते हुए कहा, “यह कागज़ तुम्हारी बस्ती टूटने का नहीं, बल्कि तुम्हें पक्का मकान मिलने का है। तुमने जो प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत फॉर्म भरा था, यह उसी की स्वीकृति का पत्र है। इसमें लिखा है कि तुम्हें सरकार की तरफ से पक्का घर आवंटित हो गया है, बस तुम्हें सात दिन के अंदर आधार कार्ड और कुछ ज़रूरी कागज़ात लेकर सरकारी दफ्तर जाना है। अगर तुम ये कागज़ डर के मारे फाड़ देती या किसी गलत आदमी की बात मान लेती, तो तुम्हारे हाथ से अपने पक्के घर का सपना हमेशा के लिए छिन जाता।”
यह सुनते ही चंपा की आँखों में खुशी के आँसू छलक पड़े। वह निहारिका के पैरों में गिरने लगी, लेकिन निहारिका ने उसे रोक लिया। चंपा बार-बार निहारिका को दुआएं दे रही थी, “बहूजी, आप न होती तो आज मैं अनपढ़ गँवार अपना सब कुछ खो देती। पढ़ाई-लिखाई कितनी बड़ी चीज़ है, यह आज मुझे समझ आ गया।”
चंपा तो खुश होकर अपने काम पर लौट गई, लेकिन वह निहारिका के मन में एक गहरा तूफान छोड़ गई। निहारिका बालकनी में खड़ी होकर बहुत देर तक सोचती रही। आज उसे समझ में आया कि देवांश की बात कितनी सही थी, और फिर भी वह कितनी गलत दिशा में सोच रही थी।
शिक्षा का अर्थ सिर्फ स्कूल या कॉलेज में जाकर नौकरी करना और महीने के अंत में तनख्वाह पाना नहीं होता। शिक्षा का असली उद्देश्य तो अज्ञानता के अंधेरे को दूर करना है। और वह अंधेरा तो उसके घर के आँगन में ही फैला हुआ था। चंपा जैसी न जाने कितनी महिलाएँ, कितने बच्चे इस दुनिया में सिर्फ इसलिए ठगे जाते हैं, डराए जाते हैं या अपने हकों से वंचित रह जाते हैं क्योंकि वे साक्षर नहीं हैं। क्या उन्हें साक्षर बनाना, उन्हें उनके अधिकारों के प्रति जागरूक करना किसी स्कूल में पढ़ाने से कम महत्वपूर्ण है?
निहारिका के अंदर जो एक शिक्षिका महीनों से सोई हुई थी, वह अचानक जाग उठी। उसे अपनी ज़िंदगी का एक नया और बहुत बड़ा मक़सद मिल गया था। उसने तय किया कि वह नौकरी किसी की नहीं छीनेगी, लेकिन वह अपने ज्ञान को ऐसे ही व्यर्थ भी नहीं जाने देगी।
उसी शाम जब देवांश घर लौटा, तो निहारिका ने उसे बालकनी में बुलाया। उसकी आँखों में एक नई चमक थी, वह खालीपन अब हमेशा के लिए जा चुका था।
“देवांश,” निहारिका ने दृढ़ स्वर में कहा, “तुम सही कहते थे। मुझे उस नौकरी की ज़रूरत नहीं है। लेकिन मेरी शिक्षा को एक सही दिशा की ज़रूरत ज़रूर है। मैंने फैसला किया है कि मैं कल से इसी घर के पीछे वाले बड़े अहाते में एक क्लास शुरू करूँगी। मैं चंपा, माली काका की बेटी, ड्राइवर के बच्चों और हमारी बस्ती के उन सभी लोगों को पढ़ाऊंगी जो अनपढ़ हैं या जो पैसों की कमी के कारण स्कूल नहीं जा पाते। मैं उन्हें सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि ज़िन्दगी जीने का सलीका, हिसाब-किताब और उनके अधिकारों के बारे में बताऊंगी।”
देवांश ने निहारिका की आँखों में वह आत्मविश्वास और खुशी देखी जो शादी के शुरुआती दिनों के बाद से कहीं खो गई थी। उसे अपनी पत्नी पर असीम गर्व महसूस हुआ। उसने निहारिका के इस फैसले का न सिर्फ स्वागत किया, बल्कि अगले ही दिन उस अहाते में ब्लैकबोर्ड, किताबें, कॉपियाँ और बच्चों के लिए डेस्क की व्यवस्था भी करवा दी।
निहारिका की ‘उजाला पाठशाला’ शुरू हो गई। जो औरतें कल तक सिर्फ झाड़ू-पोंछा और चूल्हा-चौका जानती थीं, वे अब अपना नाम लिखना सीख रही थीं। जो बच्चे गलियों में कंचे खेलते थे, वे अब पहाड़े याद कर रहे थे। निहारिका का दिन अब कब बीत जाता, उसे पता ही नहीं चलता। उसे अब न किटी पार्टी की ज़रूरत थी और न ही किसी शॉपिंग की। उसे अपनी ज़िंदगी का सबसे बड़ा सुकून उन गरीब बच्चों और औरतों की आँखों में उभरते आत्मविश्वास में मिल रहा था।
उसने साबित कर दिया था कि एक पढ़ी-लिखी महिला अगर ठान ले, तो वह बिना किसी नौकरी या तनख्वाह के भी समाज में एक ऐसा बदलाव ला सकती है, जिसकी गूंज आने वाली कई पीढ़ियों तक सुनाई देती है। निहारिका अब सिर्फ एक रईस घर की बहू नहीं थी, बल्कि दर्जनों चेहरों पर मुस्कान लाने वाली ‘निहारिका मैडम’ बन चुकी थी, जिसका ज्ञान अब वास्तव में सार्थक हो गया था।
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