ऑफिस से लौटते ही उसने अपना लैपटॉप बैग सोफे के एक किनारे पटका और बिना किसी से कुछ कहे, अपनी आँखें मूँद कर निढाल सा लेट गया। उसकी माँ, कल्याणी देवी, पास ही बैठी थीं और किसी से धीमी आवाज़ में बात कर रही थीं। रोहन का मन इतना उलझा हुआ था कि उसने ध्यान ही नहीं दिया कि सामने कुर्सी पर कौन बैठा है।
पिता जी के अचानक हुए देहांत के बाद इस घर की नींव जैसे हिल गई थी। उस वक्त रोहन बहुत छोटा था और उसकी बड़ी बहन मीता की कॉलेज की पढ़ाई चल रही थी। उस भयानक अंधड़ में बड़े भैया, सुमित और भाभी ने ही पूरे परिवार को एक बरगद के पेड़ की तरह अपनी छाँव में सँभाला था। सुमित भैया ने अपनी इच्छाओं को मारकर पिता की हर ज़िम्मेदारी को अपने कंधों पर उठा लिया था। मीता दीदी की शादी के बाद सुमित भैया का प्रमोशन हुआ और उनका तबादला दूसरे राज्य में हो गया। यह परिवार के लिए एक और झटके जैसा था, लेकिन सुमित भैया ने इतनी दूर रहकर भी कभी घर में किसी चीज़ की कमी नहीं होने दी। भाभी का स्वभाव इतना सरल और ममता से भरा था कि दूरी के बावजूद यह परिवार हमेशा एक धागे में पिरोया रहा।
रोहन को अपनी इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद जब एक नामी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी मिली, तो घर में दीवाली सा माहौल हो गया था। उस दिन फोन पर सुमित भैया की आवाज़ में जो गर्व और खुशी थी, वह रोहन आज तक नहीं भूला था। माँ ने तो यहाँ तक कहा था कि सुमित आज अपने पिता से भी ज़्यादा खुश लग रहा है।
लेकिन आज सोफे पर बेजान पड़े रोहन को देखकर कल्याणी देवी से रहा नहीं गया।
“क्या बात है रोहन? तबीयत तो ठीक है? और सामने देख, सुमित भैया आए हैं और तूने उन्हें नमस्ते तक नहीं किया!” माँ की आवाज़ में थोड़ी नाराज़गी और चिंता दोनों थी।
रोहन ने झटके से आँखें खोलीं। सामने सुमित भैया बैठे उसे ही निहार रहे थे।
“अरे! भैया, आप कब आए? मुझे लगा आप अगले महीने आने वाले थे।” रोहन ने हड़बड़ाहट में उठकर उनके पैर छुए, लेकिन वह अपनी कमज़ोरी और थकान को छिपा नहीं पाया।
“कैसा है मेरा शेर?” सुमित भैया ने रोहन को गले लगाते हुए उसकी पीठ थपथपाई। उनकी पारखी नज़रों ने रोहन के चेहरे की उदासी को एक पल में पढ़ लिया था। “मैं तो सुबह ही आ गया था। सोचा तुझे सरप्राइज़ दूँगा, लेकिन तेरा उतरा हुआ चेहरा देखकर लग रहा है कि तू ही मुझे सरप्राइज़ दे रहा है।”
रोहन ने नज़रें चुरा लीं और धीरे से सोफे पर बैठ गया। माँ अंदर से चाय और नाश्ता ले आईं। चाय का कप सुमित के हाथ में देते हुए माँ ने भारी मन से कहा, “सुमित, तू ही इसे समझा। पिछले दस दिनों से इसका यही हाल है। ठीक से खाना नहीं खाता, रात भर जागता रहता है। कल तो कह रहा था कि यह नौकरी छोड़ देगा। इतनी मन्नतों के बाद तो काम मिला है इसे।”
सुमित भैया ने चाय का कप मेज़ पर रखा और रोहन के कंधे पर हाथ रखकर गंभीरता से पूछा, “क्या बात है मेरे भाई? अभी तो तुझे नौकरी शुरू किए आठ महीने ही हुए हैं। ऐसा क्या हो गया कि मैदान छोड़ने की नौबत आ गई?”
रोहन की आँखों में एक अजीब सी बेबसी थी। सुमित भैया के स्नेह भरे स्पर्श ने उसके अंदर के रुके हुए बाँध को तोड़ दिया। उसकी आँखें छलक आईं। “भैया, मैं अब और नहीं सह सकता। ऑफिस में काम का इतना भयंकर दबाव है कि साँस लेने की फुर्सत नहीं मिलती। टारगेट पूरे करो तो बॉस कोई नई फाइल थमा देता है, और अगर ज़रा सी चूक हो जाए तो पूरी टीम के सामने बेइज़्ज़त करता है। ऑफिस के बाकी लोग भी मदद करने के बजाय गलतियाँ ढूँढने में लगे रहते हैं। मुझे लगता है मैं इस कॉर्पोरेट राजनीति और तनाव के लिए नहीं बना हूँ। मैं कल ही रिज़ाइन कर दूँगा।”
रोहन की बातें सुनकर कल्याणी देवी का दिल बैठ गया। उन्होंने अपने आँसू पोंछे और रसोई की तरफ चली गईं, क्योंकि वे बेटे को इस तरह टूटते हुए नहीं देख सकती थीं।
सुमित भैया कुछ देर शांत रहे। उन्होंने रोहन को रो लेने दिया। जब रोहन थोड़ा शांत हुआ, तो सुमित भैया ने बेहद कोमल लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा, “रोहन, तुझे क्या लगता है, यह दबाव सिर्फ तेरे ऑफिस में है? यह दबाव हर उस जगह है जहाँ इंसान को खुद को साबित करना होता है।”
रोहन ने सवालिया नज़रों से भैया को देखा।
सुमित भैया ने अपनी बात आगे बढ़ाई, “तूने कभी लोहार को काम करते देखा है? एक लोहे का साधारण टुकड़ा तलवार कैसे बनता है? उसे पहले भयंकर आग में तपाया जाता है, जब वह लाल हो जाता है, तब उस पर भारी हथौड़े से अनगिनत चोटें की जाती हैं। क्या वो लोहा उस आग और हथौड़े की चोट से बचने के लिए भाग सकता है? नहीं। वो उस दबाव को सहता है, उस दर्द को पीता है, तब जाकर वह एक ऐसी धारदार तलवार बनता है जिसकी कीमत होती है। और सोने को ही देख ले, सोना आग में तपकर ही कुंदन बनता है।”
रोहन चुपचाप सुन रहा था। उसके दिमाग में भैया के शब्द गहरे उतर रहे थे।
“आज जो तेरा बॉस या काम का बोझ तुझे हथौड़े की तरह मार रहा है, वो असल में तुझे आकार दे रहा है। अगर तू आज इस दबाव से घबराकर भाग गया, तो तू हमेशा एक साधारण लोहे का टुकड़ा ही रह जाएगा। तुझे कुंदन बनना है रोहन। यह संघर्ष, यह राजनीति, यह बेरुखी—यह सब वो आग है जो तेरी कमज़ोरियों को जलाकर राख कर देगी और तुझे एक बेहतरीन और मज़बूत इंसान बनाएगी। दबाव से घबरा मत, उसका इस्तेमाल खुद को निखारने के लिए कर।”
सुमित भैया के इन शब्दों ने रोहन के अंदर फैले अंधकार में जैसे एक तेज़ रोशनी कर दी। उसे अपनी कायरता पर शर्म आने लगी और साथ ही एक नई ऊर्जा का अहसास भी हुआ। उसे लगा जैसे पिता का हाथ आज भी उसके सिर पर है।
उसने मुस्कुराते हुए अपने आँसू पोंछे और सुमित भैया के हाथ को कसकर पकड़ लिया। “मैं समझ गया भैया। अब मैं भागूँगा नहीं, बल्कि इस आग में तपकर दिखाऊँगा।”
रसोई के दरवाज़े से यह सब देख रही कल्याणी देवी के होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। उन्होंने ईश्वर को धन्यवाद दिया जिसने उन्हें ऐसे दो बेटे दिए, जिनमें से एक जीवन का सार समझता था और दूसरा उसे अपनाने का हौसला रखता था।
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