रिश्तों की बुनियाद

पल्लवी ने अपने बच्चों को टोकने के बजाय रेवती से कहा, “भाभी, बच्चे तो वही कहेंगे न जो वो देखते हैं। हमारे घर में तो बाथरूम में भी एसी लगा है। खैर, मुझे आपसे और भैया से कुछ जरूरी बात करनी है।”

शाम को चाय के समय जब पूरा परिवार एक साथ बैठा, तो पल्लवी ने अपना असली मुद्दा उठाया। “भैया, सौम्या अब बड़ी हो गई है। उसकी शादी के लिए आप लोगों ने क्या सोचा है?”

माधव ने चाय का कप रखते हुए कहा, “हाँ पल्लवी, हम भी इसी बारे में सोच रहे हैं। कोई अच्छा, पढ़ा-लिखा और संस्कारी लड़का देख रहे हैं। सौम्या खुद भी नौकरी कर रही है, तो हम चाहते हैं कि लड़के वाले भी विचारों से सुलझे हुए हों।”

पल्लवी ने थोड़ा हँसते हुए कहा, “विचारों से क्या होता है भैया! आज के जमाने में हैसियत देखी जाती है। मेरी एक दोस्त है, सुधा। उसके देवर के लिए लड़की ढूंढ रहे हैं। लड़का अमेरिका से पढ़कर आया है, दिल्ली में अपना करोड़ों का बिज़नेस संभाल रहा है। खानदान बहुत ऊँचा है। मैंने बातों-बातों में सौम्या का जिक्र किया था। वो लोग अगले महीने लखनऊ आ रहे हैं, तो मैंने सोचा कि वो सौम्या को देख लें।”

लखनऊ के गोमती नगर के एक पुराने लेकिन बेहद सलीके से सजे हुए घर में आज सुबह से ही चहल-पहल थी। घर के मुखिया, माधव बाबू, अपनी पुरानी स्कूटर को कपड़े से पोंछ रहे थे और उनकी पत्नी, रेवती, रसोई में अपनी ननद की पसंद के मालपुए और कचौड़ियां बनाने में व्यस्त थीं। माधव की इकलौती बहन, पल्लवी, आज तीन साल बाद अपने मायके आ रही थी। पल्लवी की शादी दिल्ली के एक बहुत बड़े उद्योगपति परिवार में हुई थी। जब उसकी शादी हुई थी, तब माधव ने अपनी हैसियत से बढ़कर सब कुछ किया था ताकि उसकी लाड़ली बहन को ससुराल में कोई ताना न सुनना पड़े।

माधव और रेवती की एक बेटी थी, सौम्या, जो अभी-अभी एम.ए. की पढ़ाई पूरी करके एक सरकारी स्कूल में पढ़ाने लगी थी। सौम्या बिल्कुल अपनी माँ जैसी थी—शांत, संस्कारी और सादगी पसंद। घर का माहौल हमेशा की तरह प्रेम और सौहार्द से भरा हुआ था।

दोपहर के करीब एक बड़ी सी लग्जरी कार माधव के दरवाजे पर आकर रुकी। पल्लवी अपने दो बच्चों, रोहन और शिखा, के साथ उतरी। माधव ने आगे बढ़कर अपनी बहन के सिर पर हाथ रखा, तो पल्लवी ने बड़े ही औपचारिकता से मुस्कुरा कर हाल-चाल पूछा। रेवती ने आरती की थाली से उनका स्वागत किया।

लेकिन घर के अंदर कदम रखते ही पल्लवी की आँखों में वो पुरानी मायके वाली चमक नहीं, बल्कि एक अजीब सी जांचने वाली निगाह थी। सोफे पर बैठते ही उसने सबसे पहले घर की दीवारों को देखा, फिर पुराने डिज़ाइन के पंखे को।

“भैया, आप लोग अभी तक इस पुराने घर में ही रह रहे हैं? दीवारों का रंग भी कितना डल हो गया है। दिल्ली में तो हम हर दिवाली पर पूरा इंटीरियर बदलवा देते हैं,” पल्लवी ने अपने चमचमाते हुए पर्स को मेज पर रखते हुए कहा।

माधव ने मुस्कुराते हुए बात टाल दी, “अरे पल्लवी, घर तो घरवालों से सजता है। ये वही घर है जहाँ हम दोनों बड़े हुए हैं। इसकी हर ईंट में बाबूजी की यादें हैं।”

रेवती ने जल्दी से नाश्ता लगाया। मालपुए देखकर पल्लवी के बच्चे मुँह बनाने लगे। “मॉम, ये कितना ऑयली है। हमें तो पिज्जा या पास्ता खाना था। और इस घर में इतनी गर्मी क्यों है? आपके यहाँ सेंट्रल एसी नहीं है क्या?” रोहन ने चिढ़ते हुए कहा।

रेवती को थोड़ा संकोच हुआ, पर उसने प्यार से कहा, “बेटा, तुम्हारे कमरे में हमने नया कूलर लगवा दिया है, उसमें तुम्हें बिल्कुल गर्मी नहीं लगेगी। और शाम को तुम्हारे लिए पास्ता भी बना दूंगी।”

पल्लवी ने अपने बच्चों को टोकने के बजाय रेवती से कहा, “भाभी, बच्चे तो वही कहेंगे न जो वो देखते हैं। हमारे घर में तो बाथरूम में भी एसी लगा है। खैर, मुझे आपसे और भैया से कुछ जरूरी बात करनी है।”

शाम को चाय के समय जब पूरा परिवार एक साथ बैठा, तो पल्लवी ने अपना असली मुद्दा उठाया। “भैया, सौम्या अब बड़ी हो गई है। उसकी शादी के लिए आप लोगों ने क्या सोचा है?”

माधव ने चाय का कप रखते हुए कहा, “हाँ पल्लवी, हम भी इसी बारे में सोच रहे हैं। कोई अच्छा, पढ़ा-लिखा और संस्कारी लड़का देख रहे हैं। सौम्या खुद भी नौकरी कर रही है, तो हम चाहते हैं कि लड़के वाले भी विचारों से सुलझे हुए हों।”

पल्लवी ने थोड़ा हँसते हुए कहा, “विचारों से क्या होता है भैया! आज के जमाने में हैसियत देखी जाती है। मेरी एक दोस्त है, सुधा। उसके देवर के लिए लड़की ढूंढ रहे हैं। लड़का अमेरिका से पढ़कर आया है, दिल्ली में अपना करोड़ों का बिज़नेस संभाल रहा है। खानदान बहुत ऊँचा है। मैंने बातों-बातों में सौम्या का जिक्र किया था। वो लोग अगले महीने लखनऊ आ रहे हैं, तो मैंने सोचा कि वो सौम्या को देख लें।”

रेवती और माधव के चेहरों पर खुशी की लहर दौड़ गई। हर माँ-बाप चाहते हैं कि उनकी बेटी एक अच्छे और संपन्न परिवार में जाए। रेवती ने गदगद होते हुए कहा, “ये तो बहुत अच्छी बात है पल्लवी। सौम्या के लिए अगर इतना अच्छा रिश्ता तुम्हारी तरफ से आता है, तो हमें और क्या चाहिए।”

पल्लवी ने अचानक अपना स्वर गंभीर कर लिया। “हाँ भाभी, लेकिन एक शर्त है। शर्त क्या, एक तरह से जरूरत कह लीजिए।”

“कैसी जरूरत?” माधव ने हैरानी से पूछा।

“देखिए भैया, वो लोग बहुत हाई-क्लास हैं। जब वो लोग आपको और सौम्या को देखने आएँगे, तो मैं नहीं चाहती कि मेरी कोई बेइज्जती हो। आपको इस घर का रेनोवेशन करवाना पड़ेगा। कम से कम ड्रॉइंग रूम में दो स्प्लिट एसी लगवाने होंगे। ये पुराने सोफे हटाकर नए लेदर वाले सोफे लाने होंगे। और हाँ, जब वो लोग आएं तो ये पुरानी खटारा स्कूटर दरवाजे पर नहीं दिखनी चाहिए। आप एक अच्छी सी कार फाइनेंस करवा लीजिए। आखिर उन्हें भी तो लगे कि वो किसी अच्छे परिवार से रिश्ता जोड़ रहे हैं।”

कमरे में सन्नाटा छा गया। रेवती और माधव अवाक रह गए। सौम्या, जो पास ही बैठी एक किताब पढ़ रही थी, उसने भी अपनी नज़रें उठा लीं।

माधव का गला रुँध गया। उसने धीरे से कहा, “पल्लवी, तुम जानती हो कि मेरी स्टेशनरी की दुकान से इतना मुनाफा नहीं होता कि मैं अचानक से घर का रेनोवेशन करा लूँ और कार फाइनेंस करा लूँ। और फिर, सौम्या की शादी के लिए भी तो पैसे जोड़ने हैं।”

पल्लवी ने मुँह बनाते हुए कहा, “भैया, आप हमेशा ऐसे ही छोटी सोच रखते हैं। अगर आप सौम्या की शादी सुधा के देवर से कर देंगे, तो जीवन भर के लिए आपकी भी लॉटरी लग जाएगी। थोड़े पैसे खर्च करने में क्या हर्ज है? वरना क्या आप अपनी बेटी को भी किसी क्लर्क या छोटे-मोटे व्यापारी के घर में पूरी उम्र चूल्हा फूंकने के लिए भेज देंगे? आज के ज़माने में दिखावा बहुत जरूरी है। इंसान की औकात उसके रहन-सहन से तय होती है।”

रेवती, जो अब तक चुप थी, उसने बड़े ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “पल्लवी, हमें अपनी हैसियत और औकात दोनों पता है। अगर उन लोगों को सौम्या पसंद आएगी, तो वो उसके संस्कारों, उसकी शिक्षा और उसके स्वभाव के कारण आनी चाहिए, न कि हमारे उधार मांगे हुए सोफों और एसी के कारण। अगर उन्हें दिखावा ही चाहिए, तो हमारा घर उनके लिए सही जगह नहीं है।”

पल्लवी को अपनी भाभी से ऐसे जवाब की उम्मीद नहीं थी। उसका अहंकार जाग उठा। “भाभी, आप मुझे दुनियादारी मत सिखाइए। मैं उस समाज में उठती-बैठती हूँ जहाँ लोग ब्रांड्स से पहचाने जाते हैं। मैं तो आपके और सौम्या के भले के लिए कह रही थी। अगर आप लोग ऐसे ही रहे, तो सौम्या को जिंदगी भर इसी मिडिल क्लास गरीबी में सड़ना पड़ेगा।”

“बस पल्लवी, बहुत हो गया!” अचानक माधव की तेज आवाज गूंजी।

माधव हमेशा से अपनी बहन के सामने शांत रहता था, लेकिन आज बहन के अहंकार ने उसके भीतर के स्वाभिमान को झकझोर दिया था।

“तुम मुझे दुनियादारी सिखा रही हो? तुम मुझे मिडिल क्लास गरीबी का ताना मार रही हो?” माधव की आँखों में एक अजीब सी पीड़ा थी। “तुम्हें पता है पल्लवी, जब तुम्हारी शादी तय हुई थी, तो तुम्हारे ससुर ने भी ऐसा ही एक ‘छोटा सा’ इशारा किया था। उन्हें भी बारात के स्वागत के लिए एक फाइव-स्टार होटल चाहिए था और दहेज़ में एक लक्ज़री कार।”

पल्लवी हैरान रह गई, “भैया, आप ये क्या कह रहे हैं? मेरे ससुराल वालों ने तो कभी कोई मांग नहीं की थी। मेरी शादी तो बहुत शान से हुई थी।”

“हाँ, शान से हुई थी, क्योंकि उस शान की कीमत मैंने चुकाई थी!” माधव की आँखों से आँसू छलक पड़े। रेवती ने आगे बढ़कर माधव का हाथ पकड़ लिया, मानो उसे शांत करने की कोशिश कर रही हो, लेकिन आज माधव रुकने वाला नहीं था।

“तुम्हें क्या लगा पल्लवी, वो फाइव-स्टार होटल, वो कार, वो लाखों के जेवर कहाँ से आए थे? बाबूजी के जाने के बाद हमारे पास जो पुश्तैनी जमीन थी, वो मैंने तुम्हारी शादी से ठीक दो महीने पहले बेच दी थी। और जो पैसे कम पड़े, उसके लिए मैंने बाजार से भारी ब्याज पर कर्ज लिया था। तुम्हारी वो ‘हाई-क्लास’ शादी का कर्ज मैं पिछले पंद्रह सालों से चुका रहा हूँ। रेवती ने कभी अपने लिए एक नई साड़ी तक नहीं मांगी ताकि मैं तुम्हारी शादी का कर्ज उतार सकूँ। इस घर की दीवारें इसलिए बदरंग हैं क्योंकि हर बार जब मैं घर को रंगने के लिए पैसे जोड़ता, मुझे वो पैसा बैंक की किश्त में देना पड़ता।”

पल्लवी बुत बनकर खड़ी रह गई। उसके पैरों तले जमीन खिसक गई थी। उसे इस बात का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था। उसे हमेशा लगता था कि उसके भाई ने अपनी हैसियत से किया था और वो अब एक अमीर खानदान की बहू है।

माधव ने एक गहरी साँस ली और कहा, “तुम्हारी शादी में मैंने जो किया, उसका मुझे कोई पछतावा नहीं है। तुम मेरी बहन हो, और मैं तुम्हारे लिए अपनी जान भी दे सकता हूँ। लेकिन पल्लवी, उस कर्ज ने मुझे एक बात सिखा दी है—रिश्ते वो नहीं होते जो पैसों के दम पर खरीदे जाएं। मैं अपनी बेटी की शादी ऐसे परिवार में कभी नहीं करूँगा जहाँ उसे या उसके मायके को उनके बैंक बैलेंस से तौला जाए। मैं सौम्या का विवाह वहीं करूँगा जहाँ लड़का पढ़ा-लिखा और समझदार हो, जहाँ वो एक इंसान की कीमत समझे, न कि उसके घर के एसी की। मैं नहीं चाहता कि मेरी बेटी भी कल को किसी अमीर घर में जाकर दौलत के नशे में अंधी हो जाए और अपनों का ही अपमान करे।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया था। केवल कूलर के चलने की आवाज आ रही थी। पल्लवी का सारा अहंकार, उसका सारा गुरूर, माधव के उन आंसुओं और सच्चाई के सामने चकनाचूर हो गया था।

उसे अचानक अपनी भाभी रेवती की तरफ देखकर शर्म आने लगी। वही भाभी, जिसने उसे अपनी सगी बहन से बढ़कर प्यार किया, जिसने कभी उसे यह अहसास नहीं होने दिया कि पल्लवी की शादी के कारण उसने अपने जीवन की कितनी इच्छाओं का गला घोंट दिया था। और वो पल्लवी, जो उसी भाभी के घर को, उनके रहन-सहन को नीचा दिखा रही थी।

पल्लवी रोते हुए माधव के पैरों में गिर पड़ी। “मुझे माफ कर दीजिए भैया… मुझे माफ कर दीजिए। मैं सच में दौलत के नशे में अंधी हो गई थी। मुझे पता ही नहीं था कि मेरे उस एक दिन के दिखावे के लिए आपने और भाभी ने अपनी पूरी जिंदगी गिरवी रख दी थी। मैं कितनी मूर्ख थी जो उन लोगों को अपना मानती रही जो केवल पैसों से प्यार करते हैं, और आप लोगों का अपमान किया जो सच में मुझसे प्यार करते हैं।”

रेवती ने तुरंत पल्लवी को उठाया और गले लगा लिया। “पगली, अपनों से कभी माफी मांगी जाती है क्या? तू तो हमारी जान है। हमें बस यही दुख हुआ कि तू रिश्तों से ज्यादा चीजों को अहमियत देने लगी थी।”

सौम्या भी अपनी बुआ के पास आई और उनके आंसू पोंछते हुए बोली, “बुआ, मुझे किसी बड़े खानदान में नहीं जाना। मुझे एक ऐसा ही घर चाहिए जैसा मेरा मायका है, जहाँ प्यार हो, समझदारी हो और एक-दूसरे के लिए इज्जत हो।”

उस दिन के बाद पल्लवी पूरी तरह से बदल गई। उसकी छुट्टियों के बाकी दिन एसी और लेदर सोफे की फरमाइशों में नहीं, बल्कि बचपन की यादों, छत पर बैठकर खाने और भाभी के साथ रसोई में हाथ बंटाने में गुजरे। उसके बच्चे भी धीरे-धीरे उस घर की सादगी और खुलेपन का आनंद लेने लगे।

महीनों बाद, सौम्या का विवाह एक बहुत ही सुलझे हुए और सादगी पसंद परिवार में हुआ। लड़का एक सरकारी बैंक में अधिकारी था। उस शादी में कोई दिखावा नहीं था, कोई कर्ज नहीं था। लेकिन उस शादी में जो खुशी और सुकून था, वो पल्लवी की करोड़ों की शादी में भी नहीं था। पल्लवी ने खुद आगे बढ़कर शादी की सारी जिम्मेदारियां संभालीं, और इस बार, एक अमीर ननद की तरह नहीं, बल्कि एक प्यार करने वाली बहन और बुआ की तरह। उसने सीख लिया था कि रिश्तों की असली गर्माहट कूलर या एसी से नहीं, बल्कि दिलों के सच्चे प्यार से आती है।

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