धूप के बाद की छाँव

अस्पताल के उस सफेद, नीरस कमरे में लेटे हुए देवनाथ अक्सर खिड़की के बाहर खाली आसमान को घूरते रहते थे। लीवर सिरोसिस जैसी गंभीर बीमारी ने शरीर को इस कदर खोखला कर दिया था कि करवट लेना भी एक जंग जीतने जैसा लगता था। जब इंसान के पास भविष्य के लिए कुछ खास नहीं बचता, तो वह बरबस ही अपने अतीत की गलियों में भटकने लगता है। लेकिन देवनाथ के लिए अतीत के पन्ने पलटना किसी रिसते हुए घाव पर नमक छिड़कने जैसा था। उन्हें याद नहीं आता कि आखिरी बार उन्होंने सुकून की सांस कब ली थी।

उन्हें अपना लड़कपन आज भी याद है, जब पिता के अचानक गुज़र जाने के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़नी पड़ी थी। घर की ज़िम्मेदारी और दो छोटी बहनों का बोझ उनके कमज़ोर कंधों पर आ गया था। रिश्तेदारों ने सलाह दी कि घर में एक औरत का होना ज़रूरी है जो सबको संभाल सके, और इसी दबाव में महज़ इक्कीस साल की उम्र में उनका विवाह सुमित्रा से कर दिया गया। देवनाथ ने अपनी जवानी की सारी इच्छाओं को मारकर एक छोटी सी प्राइवेट नौकरी में खुद को झोंक दिया। सुमित्रा एक बेहद समझदार और कर्मठ जीवनसाथी साबित हुई। उसने न सिर्फ बहनों को पाला, बल्कि देवनाथ के दो बच्चों—बेटी शिल्पी  और बेटे अंश—की परवरिश में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

कठिन मेहनत के बाद बहनों के हाथ पीले हुए और वे अपने-अपने घरों की हो गईं। देवनाथ को लगा कि अब शायद ज़िंदगी में थोड़ा ठहराव आएगा, लेकिन नियति को कुछ और ही मंज़ूर था। स्वार्थ की दुनिया ऐसी थी कि जिन बहनों के लिए देवनाथ ने अपना जीवन घिस दिया था, उन्होंने अपनी दुनिया बसते ही देवनाथ से किनारा कर लिया। और फिर एक दिन, बिना किसी आहट के, सुमित्रा को एक भयानक दिल का दौरा पड़ा और वह हमेशा के लिए देवनाथ को अकेला छोड़ गई। पत्नी के जाने का वह आघात देवनाथ के लिए असहनीय था, लेकिन शिल्पी  और अंश के मासूम चेहरों ने उन्हें टूटने नहीं दिया। बच्चों को एक अच्छी ज़िंदगी देने के लिए देवनाथ ने दिन-रात एक कर दिया। ज़्यादा पैसों के लिए उन्होंने दूर-दराज़ के इलाकों में ट्रांसफर लिए, खुद रूखा-सूखा खाया, लेकिन बच्चों को बड़े शहरों में पढ़ने भेजा।

वक़्त पंख लगाकर उड़ गया। शिल्पी  एक स्कूल में पढ़ाने लगी थी और अंश सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहा था। देवनाथ अपने रिटायरमेंट के करीब थे। उन्होंने सोचा था कि रिटायरमेंट के पैसों से शिल्पी  की धूमधाम से शादी करेंगे और अंश को सेटल कर देंगे। लेकिन उनके रिटायर होने से ठीक छह महीने पहले इस जानलेवा बीमारी ने उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया। अस्पताल के बिलों ने पाई-पाई निचोड़ ली। बिस्तर पर पड़े-पड़े देवनाथ को यह चिंता खाए जा रही थी कि शिल्पी  की उम्र बढ़ती जा रही है और उसके हाथ पीले कैसे होंगे। उनका शरीर और उनका बैंक अकाउंट, दोनों ही दीमक की तरह खत्म हो रहे थे।

हताशा के उन पलों में एक दिन देवनाथ ने तय किया कि वह इस तरह घुट-घुट कर नहीं जिएंगे। जो उनके बस में नहीं है, उस पर रोने से कोई फायदा नहीं। उन्होंने ठान लिया कि बिस्तर से ही फोन के ज़रिए शिल्पी  के लिए एक योग्य वर की तलाश करेंगे। उन्होंने अपना फोन उठाया ही था कि तभी दरवाज़े पर एक आहट हुई। सामने उनके पुराने विभाग के एक बड़े अधिकारी, माथुर साहब खड़े थे, जिनके अधीन देवनाथ ने सालों पहले काम किया था। माथुर साहब के साथ उनका बेटा समीर भी था।

देवनाथ हैरान रह गए। माथुर साहब ने पास आकर देवनाथ का हाथ अपने हाथों में लिया और बेहद स्नेह से बोले, “देवनाथ जी, सालों पहले जब आप मेरे यहाँ काम करते थे, तब शिल्पी  एक बार दफ्तर आई थी। उस बच्ची की सादगी और संस्कारों ने उसी दिन मेरा मन मोह लिया था। समीर अब एक बड़ा सॉफ्टवेयर इंजीनियर बन गया है। हम यहाँ शिल्पी  का हाथ अपने बेटे के लिए माँगने आए हैं।”

देवनाथ की आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। समीर ने आगे बढ़कर देवनाथ के पैर छुए और कहा, “अंकल, आप अंश के करियर की चिंता भी मत कीजिए, मेरी कंपनी में उसके लिए एक अच्छी पोज़िशन है, मैं उसे गाइड करूँगा।”

उस एक पल में देवनाथ के अतीत के सारे घाव भर गए। उन्होंने कांपते हाथों से समीर को आशीर्वाद दिया। उन्हें लगा जैसे ज़िंदगी भर के सफर के छालों पर किसी ने सुकून की ठंडी छाँव कर दी हो। वर्तमान का दर्द अब उन्हें चुभ नहीं रहा था, क्योंकि उनके सामने उनका एक बेहद सुखद और सुरक्षित भविष्य मुस्कुरा रहा था।

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