“क्या बात है मीरा? मैं देख रहा हूँ कि जब से मैं घर आया हूँ, तुम कुछ परेशान सी हो। तुम्हारी आँखों में भी एक अजीब सी उदासी है। भाई से बात हुई थी तुम्हारी, क्या रिया की शादी की तैयारियों को लेकर तुम वहाँ न जा पाने की वजह से दुखी हो? अगर ऐसी बात है तो तुम कल ही चली जाओ। मेरी ट्रिप की प्लानिंग तो मैं अकेले भी कर लूँगा।” उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में लेते हुए बहुत ही स्नेह से कहा।
उनका यह अपनापन मुझसे और नहीं सहा गया। मेरे भीतर आंसुओं का जो बाँध मैं अब तक रोके हुए थी, वह टूट गया। मैं फफक कर रो पड़ी।
दीवार पर टंगी घड़ी की सुइयां रात के आठ बजा रही थीं, लेकिन मेरे भीतर जैसे समय ठहर सा गया था। मोबाइल की स्क्रीन अब भी मेरे पसीने से भीगे हाथों में थी और कानों में मेरे बड़े भाई, सुशांत भइया की वह रुंधे गले वाली आवाज़ गूँज रही थी। “मीरा, कुछ समझ नहीं आ रहा रे… रिया की शादी सिर पर है और मेरे पास…” इसके आगे भइया कुछ बोल नहीं पाए थे, बस उनके रोने की धीमी-धीमी आवाज़ आती रही और मेरा कलेजा जैसे मुँह को आ गया।
भइया का कपड़ों का एक छोटा सा लेकिन अच्छा-खासा व्यापार था। सब कुछ ठीक चल रहा था, रिया (मेरी भतीजी) का रिश्ता भी एक बहुत अच्छे परिवार में तय हुआ था। लड़के वाले बहुत समझदार थे और उन्होंने दहेज के नाम पर एक सुई तक की मांग नहीं की थी। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। पिछले महीने भइया के गोदाम में शॉर्ट-सर्किट से ऐसी भयंकर आग लगी कि उनका सारा माल जलकर खाक हो गया। बीमा कंपनी से क्लेम मिलने में अभी महीनों लगने वाले थे और रिया की शादी में बमुश्किल बीस दिन बचे थे।
भइया ने अपनी सारी बचत आग से हुए नुकसान की भरपाई और बाज़ार के कर्जदारों को शांत करने में लगा दी थी। अब उनके पास अपनी इकलौती बेटी के हाथ पीले करने के लिए कुछ नहीं बचा था। मैं जानती थी कि सुशांत भइया कितने खुद्दार इंसान हैं। किसी के आगे हाथ फैलाना उनके स्वभाव में ही नहीं था। अगर परिस्थिति इतनी विकट न होती, तो वे अपनी जान दे देते, लेकिन कभी अपनी छोटी बहन से अपनी विवशता का रोना न रोते। आज जब उन्होंने मुझे फोन किया, तो मैं महसूस कर सकती थी कि उनका स्वाभिमान किस तरह तिल-तिल कर टूट रहा होगा।
मेरे माता-पिता का साया बचपन में ही मेरे सिर से उठ गया था। तब सुशांत भइया की उम्र ही क्या थी, मुश्किल से इक्कीस साल। लेकिन उन्होंने मुझे कभी माँ-बाप की कमी महसूस नहीं होने दी। अपनी पढ़ाई बीच में छोड़कर, उन्होंने दिन-रात मेहनत की। अपना पेट काटकर उन्होंने मुझे एक बड़े कॉलेज से एमबीए करवाया और फिर एक बहुत ही संभ्रांत परिवार में, मेरे पति अविनाश के साथ मेरा विवाह भी करवाया। मेरी शादी में उन्होंने अपनी हैसियत से बढ़कर खर्च किया था ताकि मुझे ससुराल में कभी सिर न झुकाना पड़े। आज उसी भाई की बेटी की शादी में कोई अड़चन आए, यह सोचकर ही मेरे भीतर जैसे कोई खंजर चल रहा था।
लेकिन मेरी भी अपनी सीमाएँ थीं। मैं एक गृहिणी थी और घर का सारा आर्थिक जिम्मा मेरे पति अविनाश के कंधों पर था। अविनाश एक बहुत ही सुलझे हुए, लेकिन अपने उसूलों के पक्के इंसान थे। उन्हें जीवन में हर चीज़ एक योजना के तहत ही पसंद थी। उनका एक कड़ा नियम था कि वे कभी भविष्य की सुरक्षा के लिए जोड़े गए पैसों से कोई समझौता नहीं करते थे। पिछले चार सालों से वे हमारे लिए एक बहुत ही खास फंड जमा कर रहे थे। हमारी शादी की पाँचवीं सालगिरह अगले महीने थी और उनका सपना था कि वे मुझे स्विट्ज़रलैंड लेकर जाएँ। इसके लिए उन्होंने अपनी कई छोटी-छोटी इच्छाओं को मारा था, एक-एक पैसा जोड़ा था और महीनों से वे इस ट्रिप की प्लानिंग कर रहे थे। उनका मानना था कि जीवन में एक बार अगर कोई लक्ष्य तय कर लिया, तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए।
मैं रसोई में खड़ी इन्हीं विचारों में उलझी थी कि अचानक दरवाज़े की घंटी बजी। मैंने जल्दी से अपने आँसू पोंछे, चेहरे पर पानी के छींटे मारे और जाकर दरवाज़ा खोला। सामने अविनाश खड़े थे, उनके चेहरे पर हमेशा की तरह एक संतोषजनक और आत्मविश्वासी मुस्कान थी। उनके हाथ में कुछ ब्रोशर थे।
“मीरा! देखो मैं क्या लाया हूँ,” उन्होंने अंदर आते ही उत्साह से कहा। “मैंने ट्रेवल एजेंट से बात कर ली है। उसने हमें झ्यूरिख में वो लेक-फेसिंग होटल दे दिया है जो मुझे बहुत पसंद था। बस कल सुबह मैं एडवांस पेमेंट कर दूँगा और हमारी बुकिंग पक्की हो जाएगी।”
उनकी आँखों में जो चमक थी, उसे देखकर मेरे होंठ सिल गए। मैं कैसे उनसे कहती कि जिस सपने को वे पिछले चार साल से सींच रहे हैं, उसे मुझे तोड़ना पड़ेगा? मैंने किसी तरह खुद को सामान्य दिखाने की कोशिश की और उनके हाथ से ब्रोशर लेते हुए कहा, “यह तो बहुत अच्छी बात है। आप हाथ-मुँह धो लीजिए, मैं खाना लगाती हूँ।”
मैंने डाइनिंग टेबल पर खाना परोसा। अविनाश खाना खाते हुए लगातार ट्रिप की बातें कर रहे थे—वहाँ का मौसम, वहाँ की जगहें, हमारी पैकिंग। मैं सिर्फ ‘हाँ’ और ‘हूँ’ में जवाब दे रही थी। मेरा मन बार-बार भइया के उस रुंधे हुए स्वर की तरफ भाग रहा था। रिया ने बचपन में मेरी उंगली पकड़कर चलना सीखा था। वह मेरे लिए मेरी बेटी जैसी ही थी। क्या मैं उसकी शादी में सिर्फ एक मूक दर्शक बनकर खड़ी रहूँगी?
अचानक अविनाश की आवाज़ ने मेरी तंद्रा भंग की।
“मीरा? तुम यहाँ हो भी या नहीं?” अविनाश ने खाना छोड़कर मुझे बहुत ध्यान से देखा। उनकी पारखी नज़रों से मेरा उतरा हुआ चेहरा छिप नहीं सका।
“क्या बात है मीरा? मैं देख रहा हूँ कि जब से मैं घर आया हूँ, तुम कुछ परेशान सी हो। तुम्हारी आँखों में भी एक अजीब सी उदासी है। भाई से बात हुई थी तुम्हारी, क्या रिया की शादी की तैयारियों को लेकर तुम वहाँ न जा पाने की वजह से दुखी हो? अगर ऐसी बात है तो तुम कल ही चली जाओ। मेरी ट्रिप की प्लानिंग तो मैं अकेले भी कर लूँगा।” उन्होंने मेरा हाथ अपने हाथों में लेते हुए बहुत ही स्नेह से कहा।
उनका यह अपनापन मुझसे और नहीं सहा गया। मेरे भीतर आंसुओं का जो बाँध मैं अब तक रोके हुए थी, वह टूट गया। मैं फफक कर रो पड़ी।
“अरे… अरे… क्या हुआ? तुम ऐसे रो क्यों रही हो?” अविनाश घबरा गए। वे तुरंत अपनी कुर्सी से उठे और मेरे पास आकर मेरे कंधे पर हाथ रख दिया। “शांत हो जाओ मीरा, और मुझे बताओ कि आखिर बात क्या है? किसने कुछ कहा है तुम्हें?”
मैंने हिचकियाँ लेते हुए उन्हें सुशांत भइया के साथ हुई सारी बात बता दी। मैंने उन्हें बताया कि कैसे आग की वजह से भइया का सब कुछ तबाह हो गया है और वे रिया की शादी के लिए कितने लाचार और बेबस हो गए हैं। “अविनाश, भइया ने कभी मेरे सामने किसी चीज़ का ज़िक्र नहीं किया, पर आज वे फोन पर बच्चों की तरह रो रहे थे। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ… मैं उनकी कोई मदद नहीं कर सकती और यह बात मुझे अंदर ही अंदर खाए जा रही है,” कहते-कहते मैंने अपना चेहरा दोनों हाथों में छुपा लिया।
अविनाश कुछ देर तक बिल्कुल शांत खड़े रहे। कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। मुझे लगा कि शायद वे यह सोच रहे होंगे कि अब मुझे समझाएं कि इसमें हम कुछ नहीं कर सकते, क्योंकि उनके उसूलों के हिसाब से उनके पास भी तो इस समय कोई अतिरिक्त फंड नहीं था। ट्रिप का पैसा तो उन्होंने एक खास मकसद के लिए ही रखा था और वे कभी अपनी जमापूंजी को दूसरी जगह खर्च करने के सख्त खिलाफ थे।
लेकिन अगले ही पल, अविनाश ने जो किया, उसने मुझे निशब्द कर दिया। उन्होंने धीरे से मेरे हाथों को मेरे चेहरे से हटाया, मेरी आँखों में देखा और बहुत ही शांत और दृढ़ स्वर में कहा, “तुम पागल हो जो इतनी सी बात के लिए इतना परेशान हो रही हो और अकेले ही अंदर ही अंदर घुट रही हो? मैं हूँ न।”
“पर आप क्या करेंगे?” मैंने अचरज से पूछा।
“मेरे पास स्विट्ज़रलैंड ट्रिप के लिए जो सात लाख रुपये जमा हैं, वो कल सुबह ही सुशांत भइया के अकाउंट में ट्रांसफर हो जाएंगे। तुम अभी भइया को फोन करो और उनसे कहो कि उन्हें किसी भी बात की चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। रिया की शादी उसी धूमधाम से होगी, जैसा उन्होंने सपना देखा था।”
मैं अवाक रह गई। मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
“पर… पर आपका ट्रिप? आपकी चार साल की प्लानिंग? आपके वो कड़े उसूल कि आप कभी अपने लक्ष्य के लिए जोड़े पैसों को नहीं छेड़ते? आपने तो कहा था कि आप इस सालगिरह को सबसे खास बनाना चाहते हैं…” मेरे शब्द लड़खड़ा रहे थे। मेरे आँसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे, पर ये आँसू अब दुःख के नहीं, बल्कि कृतज्ञता के थे।
अविनाश मुस्कुराए। उन्होंने अपनी उँगलियों से मेरे आँसू पोंछे और बहुत ही कोमलता से कहा, “मीरा, उसूल इंसान की भलाई के लिए बनाए जाते हैं, इंसानों को तकलीफ देने के लिए नहीं। मेरे उसूल अपनी जगह हैं, लेकिन तुम्हारी खुशी से बढ़कर मेरा कोई उसूल नहीं है। सुशांत भइया ने तब तुम्हारा साथ दिया था, जब इस दुनिया में तुम्हारा कोई नहीं था। उन्होंने अपनी जवानी, अपने सपने तुम्हारे लिए कुर्बान कर दिए। आज अगर उन पर कोई मुसीबत आई है, तो यह मेरा भी फर्ज़ है कि मैं एक बेटे की तरह उनके साथ खड़ा रहूँ।”
वे थोड़ा रुके और फिर मेरे माथे को चूमते हुए बोले, “रही बात स्विट्ज़रलैंड की, तो पहाड़ और बर्फ वहीं रहेंगे। हम अगले साल, या उसके अगले साल चले जाएंगे। लेकिन अगर आज सुशांत भइया का आत्मसम्मान टूट गया, अगर आज रिया की आँखों में अपनी शादी को लेकर कोई उदासी आ गई, तो क्या हम कभी भी खुश रह पाएंगे? दुनिया की कोई भी ट्रिप, कोई भी वादियां मुझे वो सुकून नहीं दे सकतीं, जो इस वक्त तुम्हारी इस मुस्कान में है।”
उनके इन शब्दों ने जैसे मेरे भीतर की सारी पीड़ा को हर लिया। मुझे लगा जैसे मेरे सामने साक्षात कोई फरिश्ता खड़ा है। मैंने कसकर उन्हें गले लगा लिया। आज मुझे एहसास हुआ कि एक सच्चा जीवनसाथी वो नहीं होता जो सिर्फ सुख में आपके सपने पूरे करे, बल्कि वो होता है जो आपके परिवार के दुःख को अपना दुःख समझे और आपके लिए अपनी सबसे प्यारी चीज़ भी खुशी-खुशी न्योछावर कर दे।
उस रात जब मैंने सुशांत भइया को फोन करके अविनाश के फैसले के बारे में बताया, तो फोन के उस पार से भइया के रोने की आवाज़ तो आ रही थी, पर उसमें अब बेबसी नहीं, बल्कि एक असीम सुकून और दुआओं की गूँज थी।
रिया की शादी बहुत ही धूमधाम से संपन्न हुई। मंडप में जब भइया ने रिया का कन्यादान किया, तो उनकी आँखें बार-बार कृतज्ञता से अविनाश को ही खोज रही थीं। और मैं? मैं बस अविनाश को देख रही थी और मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दे रही थी कि उन्होंने मुझे दुनिया का सबसे बेहतरीन इंसान जीवनसाथी के रूप में दिया है।
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