इतना सुनते ही इशिता की आँखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगी। कबीर ने उसे चुप नहीं कराया। उसने इशिता को रोने दिया, उसके मन के सारे गुबार को आंसुओं के रास्ते बाहर निकलने दिया। जब इशिता थोड़ी शांत हुई, तो उसने अपने दिल का एक-एक पन्ना कबीर के सामने खोल कर रख दिया। पति की बेरुखी, सास का दोहरा रवैया, माँ की बीमारी और खुद के खत्म होते वजूद की कहानी… वह सब कुछ बोलती गई और कबीर खामोशी से सुनता रहा।
पूरी बात सुनने के बाद कबीर ने एक गहरी सांस ली और कहा, “इशिता , तुमने खुद को एक ऐसे पिंजरे में कैद कर लिया है, जिसका दरवाज़ा खुला है, बस तुमने उड़ना भूल जाने का भ्रम पाल लिया है। तुम दूसरों से अपने लिए खुशी और सम्मान मांग रही हो, जबकि खुशी तुम्हारे अपने अंदर है। तुम विकास या अपनी सास को नहीं बदल सकती, लेकिन तुम खुद को तो बदल सकती हो न? याद है कॉलेज में तुम कितनी अच्छी कविताएं लिखती थीं? तुम्हारी आवाज़ में जो खनक थी, वो कहाँ गई? अपने मन के भावों को आंसुओं में मत बहाओ, उन्हें कागज़ पर उतारो।”
य उस एक इंसान के जो उसकी खामोशी को सुन सके। जानिए कैसे उसने अपनी घुटन को अपनी ताकत में बदला…
खिड़की के कांच पर फिसलती बारिश की बूंदों को देखते हुए इशिता को लगा जैसे ये बूंदें नहीं, उसके अपने आंसू हैं जो बिना आवाज़ किए बस बहते जा रहे हैं। हाथ में पकड़ी कॉफी की प्याली कब ठंडी हो गई, उसे पता ही नहीं चला। आज भी वह एक शानदार और आलीशान बंगले के अपने बड़े से बेडरूम में अकेली खड़ी थी। बाहर से देखने वालों के लिए इशिता की ज़िंदगी किसी परीकथा से कम नहीं थी। शहर के सबसे जाने-माने उद्योगपति विकास सिंघानिया की पत्नी होना कोई छोटी बात नहीं थी। उसके पास नौकर-चाकर, महंगी गाड़ियां, डिज़ाइनर कपड़े और वह सब कुछ था जिसे पाने का सपना एक आम लड़की देखती है। लेकिन इस चकाचौंध के पीछे का अंधेरा सिर्फ इशिता जानती थी।
शादी को पांच साल हो चुके थे। शुरुआत में सब कुछ किसी हसीन ख्वाब जैसा लगा था, लेकिन धीरे-धीरे हकीकत की परतें खुलने लगीं। विकास एक बेहद महत्वाकांक्षी और व्यस्त इंसान था। उसके लिए ज़िंदगी का एक ही मकसद था—पैसा और कामयाबी। उसके पास इशिता के लिए बैंक बैलेंस तो था, लेकिन वक़्त बिल्कुल नहीं था। अगर इशिता कभी उससे अपनी कोई परेशानी या मन की बात कहना चाहती, तो विकास का रटा-रटाया जवाब होता, “इशिता , तुम्हें किस बात की कमी है? जो चाहो खरीद लो, जहाँ चाहो घूम आओ। मैं ये सब मेहनत किसके लिए कर रहा हूँ? तुम्हारे और परिवार के लिए ही तो।” विकास को यह समझाना नामुमकिन था कि रिश्ते क्रेडिट कार्ड से नहीं, बल्कि साथ बैठकर दो पल बात करने से पनपते हैं। धीरे-धीरे वैचारिक दूरियां इतनी बढ़ गईं कि दोनों एक ही छत के नीचे रहते हुए भी दो अजनबियों की तरह हो गए।
इशिता सोचती थी कि शायद ससुराल के बाकी लोगों से उसे वह अपनापन मिल जाए। उसकी सास, सुमित्रा देवी, देखने में बहुत ही आधुनिक और मिलनसार महिला थीं। शुरुआत में इशिता ने उन्हें अपनी माँ की तरह समझा और अपने मन की छोटी-छोटी बातें उनसे साझा करने लगी। कभी विकास के पास वक़्त न होने की शिकायत, तो कभी अपनी कोई पुरानी याद। लेकिन इशिता को जल्द ही एक बहुत कड़वी सच्चाई का सामना करना पड़ा। सुमित्रा देवी के पेट में कोई भी बात पचती नहीं थी। इशिता जो भी उनसे एकांत में कहती, वह बात अगले दिन सुमित्रा देवी की किटी पार्टी का मुख्य विषय बन जाती। बातों में मिर्च-मसाला लगाकर जब वे दूसरों के सामने इशिता की भावनाओं का मज़ाक उड़ातीं, तो इशिता अंदर तक टूट जाती। एक दिन जब उसने सुना कि सुमित्रा देवी अपनी सहेलियों से कह रही थीं, “अरे मेरी बहू तो हमेशा रोती ही रहती है, इतना पैसा है फिर भी नखरे खत्म नहीं होते”, तो उस दिन के बाद से इशिता ने अपने होंठ हमेशा के लिए सी लिए।
अपने मायके से भी उसे कोई खास सहारा नहीं मिल सकता था। इशिता की माँ पिछले कुछ सालों से अल्जाइमर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही थीं। उनकी याददाश्त इतनी कमज़ोर हो चुकी थी कि वे कई बार इशिता को भी नहीं पहचान पाती थीं। ऐसे में अपनी बीमार माँ को अपने ससुराल के दुखड़े सुनाकर वह उन्हें और परेशान नहीं करना चाहती थी। पिताजी का साया तो बचपन में ही उठ चुका था। इस तरह इशिता चारों तरफ से अपनों के बीच होते हुए भी नितांत अकेली पड़ गई थी।
इंसान का मन भी एक अजीब चीज़ है। अगर इसमें उठने वाले भावों को बाहर निकलने का रास्ता न मिले, तो वे अंदर ही अंदर ज़हर बनने लगते हैं। इशिता के साथ भी यही हुआ। किसी से कुछ न कह पाने की घुटन, पति की बेरुखी और सास के तानों ने उसे मानसिक और शारीरिक रूप से बीमार कर दिया। उसे रात-रात भर नींद नहीं आती, हर वक्त एक अजीब सी बेचैनी घेरे रहती। धीरे-धीरे वह डिप्रेशन का शिकार होने लगी। माइग्रेन और ब्लड प्रेशर जैसी बीमारियां उसके शरीर में घर करने लगीं। डॉक्टर ने साफ़ कह दिया था कि उसकी ये सारी बीमारियां किसी शारीरिक कमी से नहीं, बल्कि गहरे मानसिक तनाव की वजह से हैं। इशिता को अब डर लगने लगा था। उसे लगने लगा था कि अगर ऐसे ही चलता रहा, तो वह पूरी तरह से अपना वजूद खो देगी। वह एक ज़िंदा लाश बनकर नहीं जीना चाहती थी।
इसी उदासी और एकांत के पलों में, जब वह अपनी पुरानी डायरी पलट रही थी, तो एक सूखा हुआ गुलाब का फूल नीचे गिरा। उस फूल को देखते ही इशिता के चेहरे पर बरसों बाद एक सच्ची मुस्कान तैर गई। यह फूल उसे कॉलेज के दिनों में उसके सबसे अच्छे दोस्त और सहपाठी, कबीर ने दिया था। कबीर सिर्फ एक दोस्त नहीं था, वह इशिता की ज़िंदगी का वह आईना था जिसमें वह खुद को सबसे साफ रूप में देख सकती थी। कॉलेज के वो दिन कितने अलग थे। इशिता एक चुलबुली, बेबाक और खुशमिज़ाज लड़की हुआ करती थी। कबीर और इशिता कॉलेज की हर डिबेट प्रतियोगिता में साथ हिस्सा लेते थे। कबीर हमेशा कहता था, “इशिता , तुम्हारे शब्दों में जादू है, तुम अपनी आवाज़ को कभी दबने मत देना।”
जब भी इशिता किसी बात से परेशान होती, कबीर बस उसकी आँखों में देखकर समझ जाता था कि कुछ गड़बड़ है। दोनों कैंटीन में घंटों बैठकर बातें करते। कबीर उसकी हर बचकानी, हर गंभीर बात को बिना जज किए सुनता था। लेकिन कॉलेज खत्म होने के बाद, ज़िंदगी की भागदौड़ और फिर इशिता की शादी की वजह से दोनों के बीच का संपर्क धीरे-धीरे टूट गया। इशिता ने ससुराल की दुनिया में खुद को इस कदर ढालने की कोशिश की कि वह कबीर जैसे सच्चे दोस्त को भी पीछे छोड़ आई थी।
आज जब वह अपनी ज़िंदगी के सबसे अंधेरे मोड़ पर खड़ी थी, तो उसे कबीर की बहुत याद आई। उसे लगा जैसे उसका मन चीख-चीख कर कह रहा हो कि उसे किसी ऐसे इंसान की ज़रूरत है जो उसे ‘विकास सिंघानिया की पत्नी’ या ‘सुमित्रा देवी की बहू’ के रूप में नहीं, बल्कि सिर्फ ‘इशिता ‘ के रूप में सुने।
काफी हिम्मत जुटाने के बाद, इशिता ने फेसबुक पर कबीर का नाम सर्च किया। किस्मत से वह मिल भी गया। इशिता के हाथ कांप रहे थे, लेकिन उसने कबीर को एक मैसेज भेज दिया—”कैसे हो कबीर? क्या मुझे भूल गए?”
मैसेज भेजने के दस मिनट बाद ही इशिता का फोन बज उठा। स्क्रीन पर कबीर का नाम चमक रहा था। इशिता ने धड़कते दिल से फोन उठाया। दूसरी तरफ से वही पुरानी, जानी-पहचानी और गर्मजोशी से भरी आवाज़ आई, “भूल तो तुम गई थी मैडम! मैं तो आज भी उसी कैंटीन वाले कबीर की तरह तुम्हारा इंतज़ार कर रहा था।”
इतना सुनते ही इशिता की आँखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वह फूट-फूट कर रोने लगी। कबीर ने उसे चुप नहीं कराया। उसने इशिता को रोने दिया, उसके मन के सारे गुबार को आंसुओं के रास्ते बाहर निकलने दिया। जब इशिता थोड़ी शांत हुई, तो उसने अपने दिल का एक-एक पन्ना कबीर के सामने खोल कर रख दिया। पति की बेरुखी, सास का दोहरा रवैया, माँ की बीमारी और खुद के खत्म होते वजूद की कहानी… वह सब कुछ बोलती गई और कबीर खामोशी से सुनता रहा।
पूरी बात सुनने के बाद कबीर ने एक गहरी सांस ली और कहा, “इशिता , तुमने खुद को एक ऐसे पिंजरे में कैद कर लिया है, जिसका दरवाज़ा खुला है, बस तुमने उड़ना भूल जाने का भ्रम पाल लिया है। तुम दूसरों से अपने लिए खुशी और सम्मान मांग रही हो, जबकि खुशी तुम्हारे अपने अंदर है। तुम विकास या अपनी सास को नहीं बदल सकती, लेकिन तुम खुद को तो बदल सकती हो न? याद है कॉलेज में तुम कितनी अच्छी कविताएं लिखती थीं? तुम्हारी आवाज़ में जो खनक थी, वो कहाँ गई? अपने मन के भावों को आंसुओं में मत बहाओ, उन्हें कागज़ पर उतारो।”
कबीर की उन बातों ने इशिता के अंदर जैसे एक नई जान फूंक दी। उसने महसूस किया कि जिससे मन मिलता है, उससे अपनी बातें साझा करने पर कितना सुकून मिलता है। कबीर ने उसे कोई झूठी तसल्ली नहीं दी थी, बल्कि उसे उसकी खोई हुई ताकत याद दिलाई थी। हर इंसान की ज़िंदगी में एक ऐसा शख्स ज़रूर होना चाहिए जो उसे बिना किसी शर्त के सुने और समझे। इशिता के लिए कबीर वही शख्स था।
उस दिन के बाद से इशिता की ज़िंदगी में एक सकारात्मक बदलाव आना शुरू हो गया। उसने रोज़ कबीर से बात करनी शुरू नहीं की, लेकिन जब भी उसका मन बहुत भारी होता, वह कबीर को फोन कर लेती। कबीर की बातों ने उसे एक नई दिशा दी। इशिता ने फिर से लिखना शुरू किया। उसने अपने मन की कुंठा, अपने दर्द और अपने अनुभवों को शब्दों में पिरोकर एक ब्लॉग लिखना शुरू किया, जिसका नाम उसने रखा—’खामोशी के पार’।
हैरानी की बात यह थी कि उसके ब्लॉग को बहुत जल्द लोगों का प्यार मिलने लगा। हज़ारों ऐसी औरतें, जो उसी की तरह किसी न किसी घुटन का शिकार थीं, इशिता के शब्दों में अपना अक्स देखने लगीं। लोग उसे मैसेज करते, उसकी हिम्मत की दाद देते। इशिता ने ऑनलाइन एक कम्युनिटी बना ली जहाँ महिलाएं अपनी मानसिक समस्याओं पर खुलकर बात कर सकती थीं।
इस नए काम ने इशिता को इतना आत्मविश्वास दिया कि अब उसे विकास की बेरुखी या सास के तानों से कोई फर्क नहीं पड़ता था। वह अब उनके तानों का जवाब मुस्कुराहट से देती। जब विकास ने देखा कि इशिता अब उसके पैसों या उसके वक़्त के लिए मोहताज नहीं है, बल्कि वह खुद में एक मुकम्मल और खुशहाल इंसान बन गई है, तो उसका नज़रिया भी बदलने लगा। उसे पहली बार इशिता में एक स्वतंत्र और मज़बूत औरत नज़र आई, जिसका सम्मान करने के लिए वह खुद अंदर से प्रेरित हुआ।
इशिता ने समझ लिया था कि समझौते करना गलत नहीं है, लेकिन समझौते की आड़ में खुद को खो देना सबसे बड़ा गुनाह है। आज भी कबीर उसका सबसे अच्छा दोस्त है, जो चाय की प्याली के साथ उसकी ज़िंदगी के फलसफे सुनता है। लेकिन अब इशिता सिर्फ अपना दुखड़ा नहीं रोती, बल्कि वह कबीर के साथ अपनी नई कविताओं और अपनी कम्युनिटी की औरतों की सफलता की कहानियाँ साझा करती है। उसने जान लिया था कि सही इंसान से मन की बात कहने पर सिर्फ दर्द ही कम नहीं होता, बल्कि ज़िंदगी जीने का एक नया हौसला भी मिलता है।
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