अनुपस्थित

आज एक हफ्ते से ज्यादा हो गया, जगदीश बाबू सुबह की सैर पर नहीं आ रहे हैं. शायद बीमार हो गये हों. अब बुढापे में बीमार होना कौन बडी बात है. सर्दी के प्रकोप को इस उमर में झेलना आसान भी नहीं है. इस साल लगता है सर्दी सारे रिकार्ड तोड कर रहेगी.आठ बजे के बाद थोडी-थोडी धूप जैसे डरते-डरते निकलती है. हाड कंपाने वाली सर्दी पड रही है, पर यह रिटायर्ड लोगों का दल खूब कपडे पहन कर पार्क में घूमने निकलता है. इसी बहाने थोडा समय व्यतीत हो जाता है, सुख-दुख की बातें हो जाती हैं.इस ग्रुप मे छह लोग हैं. लगभग हमउम्र ही हौंगे. सभी की उम्र यही कोई साठ-सत्तर के बीच होगी. पार्क के चार-छह चक्कर लगाकर सभी गोल घेरा बना कर बैठ जाते हैं .कुछ समय प्राणायाम करते हैं फिर गप्पों का सिलसिला चल निकलता है.

             जगदीश बाबू इस महफिल की जान हैं. इन दिनों उनके न आने से महफिल की रौनक कुछ कम जान पडती है.खूब जिंदादिल हैं. हर समस्या का हल चुटकियों में निकाल देते हैं.सभी उनके मुरीद हैं.दुख की परछाईं जैसे उन्हैं छूकर भी नहीं निकली है. विधुर हैं, पत्नि को गुजरे चार वर्ष हो गये, पर हालात से बहुत जल्दी समझौता कर लिया. बेटा-बहू के पास रहते हैं, दो पोता-पोती हैं. आराम से रिटायर्ड जीवन बीत रहा है..दूसरे रेवतीशरण हैं. जंगल महकमे से रिटायर हुए थे, सुनाने के लिये उनके पास ढेरों किस्से हैं पर समय का अभाव है. हमेशा जल्दी में रहते हैं सबसे पहले महफिल से वे ही भागते हैं.दरअसल उनकी पत्नि गठिया रोग से पीडित हैं.घुटनों के दर्द से लाचार है, सर्दियों में यह रोग बढ भी जाता है. प्रत्येक काम के लिये पति पर आश्रित हैं. हालांकि उनकी मजबूरी सब समझते हैं पर मजाक किये बिना नहीं मानते हैं

             तीसरे सदस्य रामस्वरूप हैं. सबसे ज्याद सुखी वे अपने-आपको ही मानते हैं. जीवन में उनका मूलमंत्र रहा—“जोरू न जाता ,अल्लाह मिंया से नाता “ यानी शादी-ब्याह कुछ किया नहीं.दुनिया में अकेले ही रहे. जबतक परिवार का महत्व समझ आया बहुत देर हो चुकी थी. जवानी तो निकल गई, पर बुढापा अकेले कैसे काटें ? मजबूरन एक दूर के रिश्ते के भतीजे को साथ रहने के लिये बुला लिया है. समय पर दाना-पानी मिल जाता है. नगर निगम से रिटायर हुए थे, पैंशन मिलती है. आधी बहू के हाथ पर रख देते हैं. माया की चमक-दमक भरमाये रहती है. तीज-त्यौहार सभी के लिये उपहार वगैरह लाते रहते हैं. वर्ष में दो बार मंहगाई- भत्ता बढता है. बैंक-बैलेंस भी बढ जाता है .अपना खुद का कुछ खास खर्चा नहीं है.इस परिवार के साथ अच्छी खासी जिंदगी बीत रही थी पर कोई भी सुख स्थाई नहीं होता उनकी खुशी को भी आजकल ग्रहण लग गया है.बहुत परेशान रहते हैं सबके बीच अपनी व्यथा कह कर हल्के हो जाते हैं.चलिये देखते हैं उनके दुख का कारण क्या है?

             रामस्वरूप जी की सगी बहिन कल्याणी दुख का कारण बनी हुई हैं.अच्छी खासी गांव में रह रहीं थी कि पति की मृत्यु के साल बीतते ही भाई की गृहस्थी देखने आ धमकी. शांतिपूर्वक रहती तो कोई समस्या नहीं थी,घर में किसी बुजुर्ग का रहना सुकून ही देता है. पर वे तो कलह-प्रिय हैं. बडी बहिन हैं तो कुछ कहते भी नहीं बनता है.शुरु से गांव में रही हैं सो शहर के तौर-तरीके जानती नहीं हैं आये दिन किसी न किसी बात पर बखेडा खडा कर देती हैं. घर की शांति भंग हो गई है.उन्हैं बस बहाना चाहिये होता है. जब वे यहां से लौट कर घर पहुंचते हैं ,घर में महाभारत मचा होता है. भतीजा गुस्से में नाश्ता छोडकर जा चुका होता है. बहू सिसकियां भर रही होती है. अब ऐसे माहौल में उनके गले से भी कौर नहीं उतरता है, निशांत बाबू पूछ बैठते हैं.—“कोई तो वजह कलह की होती होगी,बहू को समझायें कि उनके अनुसार चलने की कोशिश करे, बुजुर्गों को बदलना बहुत मुश्किल है तो वही थोडा बहुत एडजस्ट करे “.हताश रामस्वरूप जी का उत्तर आता है “ क्या आपको लगता है, ऐसी कोशिश नहीं हुई होगी ?” दरअसल वह छुआछूत बहुत मानती हैं. सुबह से उनकी निगाह बहू के कार्य-कलाप पर लगी रहती है. कब हाथ नहीं धोये गये, कब बिना हाथ धोये क्या छू लिया गया ? गांव में अपनी बहू का जीना हराम किया हुआ था,अब यहां आकर भी वही .आप सबके बीच आकर थोडी देर को भूल जाता हूं.मन हरवक्त उसी समस्या का निदान  ढूंढने में उलझा रहता है. कभी सोचा नहीं था कि जिंदगी में इस तरह की समस्यायें भी आती हैं” बात पूरी करके चुप बैठ गये

               तभी महेश बोल पडे—“जनाब दुनिया में कोई ऐसी समस्या नहीं है ,जिसका हल न निकले “अच्छा, चलिये आप ही बतलाइये इनकी समस्या का क्या हल है ?  आपकी बहिन पूजा-पाठ तो करती हौंगी ? क्यों नही, बल्कि जरूरत से ज्यादा ही..बस आपकी समस्या का हो गया समाधान .थोडी जेब ढीली करनी पडेगी. मतलब कैसे ? आप उनके बेटे को पत्र लिख कर बुलाइये ,फिर उनके साथ बनारस या हरिद्वार जहां जाना चाहें, तीर्थ करने के लिये भेज दें .खर्चा आपको उठाना होगा.फिर उसे समझा दें कि वापसी में उन्हैं साथ में गांव ले जाये.हो गई आपकी समस्या चुटकियों में हल. सभी ने इसका अनुमोदन किया.बात रामस्वरूप जी को जम गई. हंसते हुए बोले—“लगता है आपकी तरकीब काम कर जायेगी,”चहकते हुए महेश” बोले—“फिर तो हम सबकी मिठाई पक्की हां,हां पर काम पूरा होने के बाद. सभी ठठा कर हंस पडे .आज बहुत दिनों बाद रामस्वरूप भी खुश नजर आये. .

           निशांत बाबू अभी-अभी रिटायर हुए हैं,अभी जोश कायम है.उर्जा से भरपूर. इस जीवन का भरपूर आनन्द लेना चाहते हैं. उनके दिमाग में बडी-बडी योजनायें चलती रहती हैं ,जिनपर सबसे चर्चा करते रहते हैं. साथ ही चाहते हैं कि बाकी सभी लोग सहयोग करें, पर अन्य सदस्यों में उत्साह की कमी है. बहुत कर चुके, अब बची-खुची जिंदगी आराम से बिताना चाहते हैं, अब उम्र के इस पडाव पर आकर कौन झंझटों में पडे.? बारिश के दिनों में पार्क में वृक्षारोपण किया जाये ,इस बात से सब सहमत हैं पर  पौधों के संरक्षण की जिम्मेदारी पर बगलें झांकने लगते हैं. योजनायें बनती हैं, ध्वस्त होती हैं.,माली रखने की बात भी होती है. ये लोग अपनी जेब हल्की करने को तैयार हैं,पर घर-घर जाकर चंदा एकत्रित करना किसी के वश का नहीं है. यह काम तो नई पीढी को संभालना चाहिये पर इन कामों के लिये उनके पास फुर्सत कहां है ? फिर बहस का मुद्दा नई पीढी बन जाती है.जितने लोग हैं सबके भिन्न-भिन्न विचार हैं.निष्कर्ष यह निकलता है कि आज की पीढी आत्मकेन्द्रित ,स्वार्थी है.गिरता हुआ नैतिक स्तर बदलते हुए जीवन मूल्य इन सबके लिये उत्तरदाई हैं. निशांत बाबू की ओर से एक प्रस्ताव और आता है—“क्यों न हम सभी झुग्गी-झोपडी के बच्चों को पढाने का दायित्व उठायें,एक भी बच्चे को साक्षर किया तो जीवन की उपलब्धि मानी जायेगी “.पर यह योजना क्रियान्वित होने से पहले ही दम तोड देती है. अब छोटे बच्चों के साथ सिर खपाने में किसी की रुचि नहीं दिखती है.

                विभिन्न परिवेश से आये ग्रुप के सभी सदस्य किसी न किसी स्तर पर आपस में जुडे हुए हैं .इनमें से महेश जी एक तरह से अस्थाई सदस्य हैं. दरअसल वे कानपुर में रहते हैं.कुछ दिनों के लिये बेटे के पास आये हैं. सुबह पास के पार्क में घूमने के लिये आये तो हमउम्र लोगों को देख कदम खुदबखुद इधर बढ गये. मितभाषी हैं. सबके बीच होने वाली चर्चाओं से असम्पृक्त बैठे रहते हैं.उनकी एक आदत सबका ध्यान अपनी ओर खींचती है. जितनी देर बैठेंगे उंगलियां चटकाते रहेंगे या दूर जाकर मोबाइल पर बात करते रहेंगे.ग्रुप में उनका होना न होना ज्यादा मायने नहीं रखता है फिर भी उनका व्यक्तित्व चुम्बकीय है. जब भी बोलते हैं गूढ बात बोलते हैं.उनकी बातों में आध्यात्मिक चिंतन का सार होता है, जीवन के अनुभवों का निचोड झलकता है.उनकी बाते सुनने वाले को बांध रखने की क्षमता रखती हैं.

         इकबाल साहब की बात किये बिना तो बात नहीं बनेगी. शायराना मिजाज के शख्स हैं. शायरी का खजाना भी उन्हैं कहा जा सकता है हर मौके पर कोई न कोई शेर जड देते हैं.पान के बहुत शौकीन नफासत वाले काली शेरवानी,सफेद चूडीदार पाजामा, पतली छडी लिये खूब फबते हैं. पान की डिब्बी हमेशा साथ में रहती है. बडे कायदे से सबके सामने पहले पान पेश करते हैं, फिर बडी अदा से गिलौरी मुंह में दबा लेते हैं.सभी लोग हाथ जोडकर विनम्रता से इंकार कर देते हैं. अब सुबह-सुबह कौन पान खाये ? एक दिन बातों ही बातों में महबूबा का जिक्र कर बैठे, जो कभी उनकी नहीं हो सकी .डोली में बैठकर पराई हो गई.इनके हिस्से में बस विरह के नगमे छोड गई. निकाह इन्हौंने भी किया पर बेगम को महबूबा का दर्जा नहीं दे सके.चार लडकियों को दुनिया में लाने के बाद वह भी अल्लाह को प्यारी हो गई. खालाजान की मदद से लडकियों को बडा किया ,दूसरे निकाह की जहमत नहीं उठाई. अब लडकियों के लिये रिश्ते आ रहे हैं .आजकल जमाना खराब है. धोखा-फरेब कदम-कदम पर हैं बिन मां की बच्चियां हैं. फूंक-फूंक कर कदम रख रहे हैं, फिर जो अल्लाह को मंजूर.सबके बीच कुछ देर हंसी-मजाक से  जिंदगी की तल्खियों को भुला देते हैं,पर यह भी जानते हैं समस्याओं का हल उन्हैं ही निकालना होगा.

            कहने को तो सभी अलग-अलग परिवेश से आये हैं,अलग समस्यायें हैं पर एक चीज जो सबको जोडे है वह है परदुख कातरता. उम्र के जिस मोड पर सब पहुंच चुके हैं ,जीवन के अनुभवों ने खूब समृद्ध किया है.अपने विषय में कम दूसरों के विषय में ज्यादा सोचते हैं. वक्त बिताना सबकी साझी समस्या है.सबके बीच बैठकर जो मनोबल बढता है वही कठिनाइयों से निबटने का हौसला बन जाता है.बात शुरु हुई थी जगदीश बाबू की अनुपस्थिति से. सभी उनके लिये समान रूप से चिंतित हैं. अंत में तय हुआ ,निशांत बाबू का घर उसी तरफ है सो आते-जाते किसी समय खोज-खबर लेते आयेंगे.

               आज पार्क में निशांत बाबू सबसे पहले आ पहुंचे है बेचैन से चक्कर लगा रहे हैं.एक-एक कर लोगों का आना शुरु हो गया है.इकबाल साहब ने अपने चिरपरिचित अंदाज में पान आगे बढाते हुए कहा—अरे मियां, क्या खबर लाये जगदीश बाबू की ,सब ठीक-ठाक तो है न.” “अब वे जहां पहुंच गये हैं, वहां से उनकी खबर कोई नहीं ला सकता.” क्या मतलब? सब एक साथ बोल पडे. हां, मैं ठीक कह रहा हूं, कल वापसी में उनके घर गया था.घर के बाहर अजब सा सन्नाटा पसरा था,सहमते हुए कालबैल बजाई.किसी बाई ने दरवाजा खोला.सामने ही मेज पर जगदीश बाबू की हार चढी तस्वीर रखी थी.मेरा ह्रदय धक से रह गया .एक चलता-फिरता  जिंदादिल इंसान तस्वीर में कैद होकर रह गया.पूछने पर उसी बाई ने बतलाया—“रात को अचानक दिल का दौरा पडा, दो दिन अस्पताल में भर्ती रहे. पर डाक्टर की सब कोशिशों को व्यर्थ करता पंछी पिंजरा तोडकर उड गया.” कहकर निशांत बाबू चुप हो गये. पांचों के बीच सन्नाटा फैल गया. सभी एक ही बात सोच रहे थे. यह जीवन कितना क्षणभंगुर है, सब जानते हैं पर फिर भी इस सत्य से आंखें मूंदे रहते हैं. वे पांचों अब भी रोज मिलते हैं ,बातों का केन्द्र-बिन्दु जगदीश बाबू ही होते हैं जो अनुपस्थित होकर भी उपस्थित रहते हैं पर मन में हरवक्त एक प्रश्न घूमता रहता है—“अगली बार कौन “?   

कॉपी राइट

सुबोध चतुर्वेदी

error: Content is protected !!