रिश्तों की छांव

 न्वी के माता-पिता को इस पूरी घटना का पता चला, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। वे अपनी बेटी के पास दौड़े चले आए। अपनी नासमझी और बच्चों को वक्त न दे पाने के अपराध-बोध से उनका सिर शर्म से झुक गया था। बृजमोहन जी और उषा जी ने न केवल तन्वी को संभाला, … Read more

अपनों का घर  

 ज्योति ने भी अनन्या के आँसू पोंछते हुए कहा, “आज के बाद इस घर में कोई भी अपना काम खुद करेगा। तुम इस घर की कोई कठपुतली या नौकरानी नहीं हो, बल्कि इस परिवार की सबसे प्यारी बेटी हो। हमारा हाथ बंटाने के लिए तुम्हारा बहुत शुक्रिया, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम तुम्हारी … Read more

झुकने का अर्थ हारना नहीं होता

“मुझे माफ़ कर दो, मृणाल,” विक्रम की आवाज़ भारी थी और आँखों के कोरों पर नमी चमक रही थी, “आज तुम माफ़ी नहीं माँगोगी, आज तुम्हें झुकने की कोई ज़रूरत नहीं है। मैं अंधा हो गया था अपने इस भ्रम में कि घर का बड़ा होने का मतलब कभी ग़लत न होना होता है। तुमने … Read more

बरगद की ठंडी छाँव

मेघा की आँखों से झर-झर आँसू बह निकले। उसने बाबूजी के झुर्रियों भरे हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और सिसकते हुए बोली, “मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी! मैं अंधी हो गई थी। अपनी गृहस्थी और नौकरी के घमंड में मुझे कभी आपकी कीमत समझ ही नहीं आई। आप इस घर के वो बरगद … Read more

सादगी का इम्तिहान

निधि ने जैसे ही अपनी सासू माँ को देखा, वह अपने आंसुओं पर काबू नहीं रख सकी और उनसे लिपटकर बच्चों की तरह फूट-फूट कर रोने लगी, “मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिए! मैंने सब खराब कर दिया। मुझे कुछ नहीं आता मम्मी जी… मैंने शादी से पहले कुकिंग क्लास में केक, पास्ता और कोफ्ते … Read more

संस्कारों का आईना

 कृतिका का चेहरा शर्म और गुस्से से एकदम लाल पड़ गया। उसे लगा जैसे किसी ने भरी महफ़िल में उसके ऊपर खौलता हुआ पानी डाल दिया हो। वह यह बर्दाश्त ही नहीं कर पाई कि जिन लोगों के सामने वह खुद को सबसे सभ्य दिखाने की कोशिश कर रही थी, उन्हीं के सामने उसके अपने … Read more

रिश्तों की दहलीज पर पिसता मर्द

 सार्थक ने अपनी बाइक को घर के आंगन में खड़ा किया और एक गहरी सांस भरी। हाथ में लैपटॉप का बैग और दूसरे हाथ में सब्ज़ियों का थैला लिए जब उसने मुख्य दरवाजे की घंटी बजाई, तो उसके कदमों में वह चंचलता नहीं थी जो किसी इंसान के अपने घर लौटने पर होती है। बल्कि … Read more

मायके का मोह – डॉ आभा माहेश्वरी

सावन की पहली बारिश हो रही थी। आँगन में रखे तुलसी के चौरे से मिट्टी की सौंधी सुगंध उठ रही थी। खिड़की के पास बैठी सुमन बारिश की बूँदों को निहार रही थी, लेकिन उसकी आँखों में बादलों से भी अधिक नमी थी। आज सुबह ही मायके से माँ का फोन आया था— “बेटी, इस … Read more

अनकहे फासले  

अवनि के दिल का बोझ जैसे अचानक आधा हो गया। उसने उसी दिन ऑफिस में एक लंबी छुट्टी की अर्जी डाली। घर लौटकर उसने किसी हिल स्टेशन के एक एकांत कॉटेज की बुकिंग की। शाम को जब कुणाल कमरे में आया, तो अवनि ने कोई बहस नहीं की, न ही कोई औपचारिकता दिखाई। वह चुपचाप … Read more

अनकहा दर्द  

 विमलेश जी जो कभी रसोई की तरफ झांकते तक नहीं थे, वे खुद शारदा के लिए दलिया बनाकर कटोरी में ठंडा कर रहे थे। बहू नताशा शारदा के पैरों को दबा रही थी और बड़े प्यार से पूछ रही थी, “माँ जी, दोपहर में मौसमी का जूस निकाल दूं?” मयंक दफ्तर जाने से पहले अपनी … Read more

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