खामोश बुनियाद

“अरे रूचि, खुशकिस्मत तो ये हैं कि इन्हें मेरे जैसा पति मिला,” विक्रांत ने एक व्यंग्यात्मक हँसी हँसते हुए कहा, “वर्ना सोचो, किसी और से शादी होती तो आज भी किसी दो कमरों के फ्लैट में बर्तन मांज रही होतीं। ये तो मेरा विजन है, मेरी मेहनत है, जो आज ये महारानियों की तरह इस … Read more

धूप, चाय और वो पुरानी बेंच

रघुनाथ जी के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने चाय का कप लिया और बेंच पर बैठ गए। “हम्म… सूजन आ गई है। मैंने कल ही कहा था कि डॉक्टर के पास चलते हैं, लेकिन मेरी सुनती कहाँ है वो।” मीरा ने हिम्मत जुटाते हुए कहा, “बाबूजी, अगर आप बुरा ना मानें तो … Read more

अदृश्य रक्षक: बंद दरवाजों का दर्द

 “भाभी, मुझे पता है आज आपको अपने भैया की बहुत याद आ रही होगी। लेकिन आप उदास मत होइए, समर भैया हैं ना, वो भी तो आपके भाई जैसे ही…” विशाखा अपने शब्द पूरे भी नहीं कर पाई थी कि उसे लगा उसने कुछ गलत कह दिया। लेकिन काव्या ने बहुत ही शांत स्वर में … Read more

नई सुबह की दस्तक

सुबह के आठ बज रहे थे, लेकिन मास्टर रघुनाथ जी के भीतर जैसे कोई तूफ़ान उबल रहा था। उनकी पत्नी सुमित्रा ने मेज़ पर चाय का प्याला रखते हुए कहा, “चाय ठंडी हो रही है, इसे तो पी लीजिए। सुबह से उस कागज़ में सिर खपाए बैठे हैं, जैसे आज ही कोई बड़ा किला फतह … Read more

ये कैसा बंधन – सुदर्शन सचदेवा

“कुछ रिश्तों के नाम नहीं होते, फिर भी वे उम्रभर साथ चलते हैं… और कुछ रिश्ते नाम के होकर भी मन से बहुत दूर होते हैं।” खिड़की के पास बैठी अनन्या बाहर हो रही बारिश को न जाने कितनी देर से देख रही थी। बारिश की हर बूँद जैसे उसके भीतर दबे किसी पुराने सवाल … Read more

पहली बारिश और वो अजनबी सा अपनापन

  कमरे के अंदर बैठी स्नेहा अपने कपड़ों को सूटकेस में सहेज रही थी, लेकिन उसकी नज़रें बार-बार खिड़की के बाहर गिरती बारिश की बूंदों पर जा टिकती थीं। उसकी शादी को अभी महज़ चार महीने ही हुए थे। शादी के बाद यह उसका पहला सावन था और मायके जाने की खुशी उसके चेहरे पर साफ … Read more

स्मृतियों की वसीयत

  वैदेही की आंखें आंसुओं से सूज चुकी थीं और उसका सिर अपनी छाती तक झुका हुआ था। सामने बाबूजी क्रोध से कांप रहे थे। “तूने सोच भी कैसे लिया कि इस घर की बेटी उस साधारण से मास्टर के बेटे के साथ अपना जीवन बिताएगी? हमारी और उनके परिवार की जो पीढ़ियों पुरानी खटास है, … Read more

आँगन की वो गौरैया

यह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरा बाल-मन इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मौसी मुझे छोड़कर हमेशा के लिए कहीं और रहने जा रही हैं। अगर शादी का मतलब बिछड़ना होता है, तो फिर शादी करनी ही क्यों? मैं दौड़कर मौसी के पास जाना चाहता था, उन्हें … Read more

ज़िंदगी का असली सुकून

अचानक काव्या के मन का सारा मलाल, सारा गुस्सा और सारी मायूसी एक झटके में कहीं बह गई। उसे लगा जैसे किसी ने उसके तपते हुए मन पर सुकून की ठंडी फुहार डाल दी हो। जिस नौकरी को वह कुछ घंटों पहले एक बोझ समझ रही थी, आज उसी ने उसे वो खुशी दी थी … Read more

अपनों के आँसू

सुमित के ये शब्द मेरे कानों में सीसे की तरह पिघल कर गिर रहे थे। मैं कुछ जवाब देने ही वाला था कि तभी फ्लैट की घंटी बजी। सुमित ने उठकर दरवाज़ा खोला। मैं भी उसके पीछे-पीछे हॉल में आ गया। शिखा भी किचन से बाहर आ गई थी। दरवाज़े पर जो शख्स खड़ा था, … Read more

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