रक्षाबंधन का त्यौहार नज़दीक था, इसलिए कुंती अपनी भतीजी की शादी की तारीख पक्की होने की खुशी में अपने मायके, यानी अपने भाई के घर आई हुई थी। यहाँ आए उसे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन इन तीन दिनों में उसने इस घर में जो कुछ देखा, वह उसकी अपनी सोच और जीवनशैली से बिल्कुल उलट था।
कुंती की भाभी, देवकी, बरामदे में आराम से बैठी मटर छील रही थीं और उनकी दोनों बहुएं, श्रेया और अंजलि, रसोई में काम करते हुए ठहाके लगा रही थीं।
कुंती बड़े गौर से देख रही थी कि देवकी की दोनों बहुएं आपस में सगी बहनों की तरह काम बांट लेती थीं। थोड़ी ही देर में श्रेया दो कप चाय और गर्मागर्म पकौड़े लेकर बाहर आई। उसने मुस्कराते हुए एक प्लेट कुंती को दी और दूसरी देवकी के पास रखकर वहीं ज़मीन पर बैठ गई और देवकी के साथ मटर छीलने में मदद करने लगी।
“माँ जी, आज शाम को खाने में क्या बना लें? अंजलि कह रही थी कि बुआ जी (कुंती) को कटहल बहुत पसंद है, तो वही बना लें?” श्रेया ने बड़े अपनेपन से पूछा।
देवकी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तुम दोनों को जो ठीक लगे और जो बनाने में आसानी हो, वही बना लो। रसोई अब तुम्हारी है, मुझसे पूछने की क्या ज़रूरत है? तुम दोनों के हाथ के स्वाद पर तो मैं वैसे भी फिदा हूँ।”
श्रेया खुश होकर अंदर चली गई। कुंती यह सब देखकर अवाक थी। उसके मन में विचारों का एक बवंडर उठ खड़ा हुआ। उसने अपनी भाभी देवकी से कहा, “भाभी, आप सच में बहुत खुशनसीब हैं। मैं देख रही हूँ कि आपकी दोनों बहुएं कितने प्रेम से सारा घर संभाल रही हैं। हर समय चेहरे पर मुस्कान रहती है
और आपके आगे-पीछे घूमती रहती हैं। लेकिन आपने भी इन्हें बहुत छूट दे रखी है। खाने का फैसला हो या घर का कोई और काम, आप सीधा कह देती हैं कि जो मन हो कर लो। हमारे घर में तो ऐसा नहीं चलता।”
कुंती को अपना घर याद आ गया। उसके घर में भी दो बहुएं थीं, लेकिन वहाँ का माहौल किसी छावनी से कम नहीं था। कुंती का मानना था कि अगर बहुओं पर हुक्म न चलाया जाए, तो वे सिर पर चढ़ जाती हैं। अगर उसकी बहुएं बिना उससे पूछे दाल में तड़का भी लगा दें, तो कुंती आसमान सिर पर उठा लेती थी। जब से बहुएं घर में आई थीं, कुंती ने रसोई में झांकना तक बंद कर दिया था। उसका मानना था कि सास बनने के बाद काम करना शान के खिलाफ है।
अभी पिछले ही महीने जब घर में होली का बड़ा कार्यक्रम था, कुंती सुबह से ही भारी सिल्क की साड़ी पहनकर और जेवर लादकर मेहमानों के बीच महारानी की तरह बैठ गई थी। दोनों बहुएं सुबह से लेकर रात तक रसोई में पिसती रहीं, मेहमानों को नाश्ता परोसती रहीं, लेकिन कुंती ने एक बार भी उठकर उनकी मदद करना या उनका हाल पूछना ज़रूरी नहीं समझा। नतीजा यह था कि कुंती की बहुएं उससे कटकर रहती थीं। उनके चेहरों पर हमेशा एक तनाव और थकावट दिखती थी। वे कुंती से बात करने से कतराती थीं और घर में हर वक्त एक अनकही घुटन महसूस होती थी।
रात के समय जब सब सो गए, तो कुंती देवकी के कमरे में गई। बातों-बातों में कुंती ने अपने मन की उलझन सामने रख दी। “भाभी, एक बात पूछूं? आपने अपनी बहुओं पर कौन सा जादू कर रखा है? वे न तो आपस में लड़ती हैं और न ही आपकी कोई बात टालती हैं। मेरे घर में तो बहुएं मुझसे बात करने तक से कतराती हैं। मैं हर चीज़ पर नज़र रखती हूँ, फिर भी मुझे वह सम्मान नहीं मिलता जो मैं यहाँ देख रही हूँ।”
देवकी ने अपनी किताब बंद की और कुंती के हाथ को अपने हाथों में लेकर बहुत ही शांत स्वर में बोली, “कुंती, जादू मैंने नहीं किया, बस मैंने रिश्तों को मुट्ठी में कैद करने की कोशिश नहीं की। जब हम रेत को मुट्ठी में कसकर पकड़ते हैं, तो वह उंगलियों के बीच से फिसल जाती है, लेकिन अगर हथेली खुली रखें, तो रेत वहीं टिकी रहती है। बहुएं भी इसी तरह होती हैं।”
देवकी ने एक गहरी सांस ली और आगे कहा, “जब एक लड़की अपना घर, अपने माँ-बाप छोड़कर हमारे घर आती है, तो वह बहुत डरी हुई होती है। अगर हम आते ही उस पर हुक्म चलाने लगें और उसे यह जताएं कि वह यहाँ सिर्फ काम करने आई है, तो वह कभी इस घर को अपना नहीं मान पाएगी। मैंने अपनी बहुओं को रसोई की चाबी नहीं, बल्कि इस घर का अधिकार दिया है। जब मैंने उनसे कहा कि ‘तुम्हें जो सही लगे वो करो’, तो मैंने दरअसल उन पर अपना भरोसा जताया। और जब किसी पर भरोसा किया जाता है, तो वह इंसान कभी उस भरोसे को टूटने नहीं देता।”
कुंती ध्यान से सुन रही थी।
“और रही बात काम की,” देवकी मुस्कुराई, “तो सास बनने का मतलब रिटायरमेंट लेना या आराम फरमाना नहीं होता। अगर मैं बैठे-बैठे सब्ज़ी काट देती हूँ या उनके काम में थोड़ा हाथ बंटा देती हूँ, तो मेरी इज़्ज़त कम नहीं हो जाती। बल्कि उन्हें यह एहसास होता है कि मैं उनकी ‘बॉस’ नहीं, उनकी माँ हूँ। जब हम उनके शरीर की थकान और मन की उलझन समझेंगे, तभी तो वे हमें दिल से सम्मान देंगी। तुमने हुक्म चलाकर बहुओं के शरीर पर तो काबू पा लिया कुंती, लेकिन उनका दिल हार गई।”
देवकी की बातें कुंती के दिल पर हथौड़े की तरह लगीं। उसे अचानक अपनी गलतियों का एहसास होने लगा। उसे समझ आ गया कि सम्मान मांगा नहीं जाता, कमाया जाता है। जो बहुएं सुबह से रात तक उसके घर की सेवा कर रही थीं, कुंती ने कभी उन्हें प्यार के दो बोल नहीं बोले। सिर्फ गलतियां निकालीं और अपना रौब झाड़ा।
उस रात कुंती सो नहीं पाई। उसने तय कर लिया था कि जब वह अपने घर वापस लौटेगी, तो एक कड़क सास बनकर नहीं, बल्कि एक माँ बनकर लौटेगी। वह अब रसोई में जाकर अपनी बहुओं के साथ न सिर्फ काम साझा करेगी, बल्कि उनके साथ बैठकर चाय भी पिएगी और हंसेगी।
अगले दिन जब कुंती विदा ले रही थी, तो उसकी आंखों में एक नई चमक थी। उसने देवकी को गले लगाया और धीरे से कहा, “भाभी, मैं यहाँ सिर्फ त्यौहार मनाने नहीं आई थी, बल्कि एक बहुत बड़ा सबक सीखने आई थी। मेरे घर का उजड़ता हुआ चमन अब फिर से खिलेगा, यह मेरा वादा है।”
देवकी की दोनों बहुओं ने जब कुंती के पैर छुए, तो कुंती ने पहली बार उन्हें सिर्फ रस्मी आशीर्वाद नहीं दिया, बल्कि प्यार से उनके माथे चूमे। कुंती जान चुकी थी कि रिश्तों की डोर को जितना ढीला छोड़ा जाए, वो उतनी ही मज़बूती से बंध जाती है।
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लेखिका : मीना सहाय