दौड़ती जिंदगी और ठहरे हुए संस्कार… – संध्या त्रिपाठी

क्यों परेशान है मिसराइन जी…..

संयुक्त का हाथ पकड़ते हुए मिश्रा जी ने पूछा…

 अरे कुछ नहीं मिश्रा जी… मैं तो बस ऐसे ही…

 कुछ कुछ सोचती रहती हूं ना …

अच्छा बताइए  आप अभी क्या सोच रही थीं …मुस्कुराते हुए मिश्रा जी ने कहा …

आप हसेंगे…

 तो क्या हुआ …अच्छा तो है आप मुझे हंसने का मौका तो देंगी ..?

चलिए बातों को घुमाइए मत ,…जल्दी से बताइए क्या सोच रही थी …?

मैं भी तो देखूं हमारी मिसराइन जी की सोच कितनी ऊंची है …

छेड़ते हुए मिश्रा जी ने शरारती अंदाज में कहा..!

मैं सोच रही हूं …आजकल के पेरेंट्स को बच्चों से ज्यादा जरूरत है क्लासेस की… 

ताकि उन्हें समझ में आ सके कि आज के इस दौड़ती भागती जिंदगी में कौन सी बहुमूल्य चीज़ पीछे छूट जा रही हैं..!

आपको याद है ना मिश्रा जी ….पिछली बार जब हम बेटे बहू के पास गए थे कितनी व्यस्त दिनचर्या है उनकी ..फिर जब समय भी मिलता है तो अपने-अपने मोबाइल में लगे रहते हैं कुछ बोलने पर यही जवाब होता है यही तो समय मिलता है अब इसमें भी मोबाइल ना देखें ….

तो आप क्या चाहती हैं मिसराइन जी..

 इस बार थोड़े गंभीर हो गए थे मिश्रा जी ।

मुझे लग रहा है कि ये जो छुट्टियां बच्चों को मिली है ना …इसमें सभी अभिभावकों द्वारा बच्चों को पर्याप्त समय मिलना चाहिए.. जितनी दूसरी गतिविधियों सिखाने में रुचि रखते हैं ना उतनी ही ….

व्यवहारिक ज्ञान , पारिवारिक जिम्मेदारियां , छोटे-मोटे काम , आपस में बैठकर बातें करना   इन सब बातों पर ध्यान देना चाहिए जो बहुत जरूरी है…!

रसोई में काम करते समय बच्चों से हाथ बटाने को कहना  , घर की साफ सफाई के फायदे बताना , बिस्तर ठीक करना  , थोड़ा बहुत बागवानी भी कराना और फिर सबसे ज्यादा जरूरी है ..आपस में बातें करना , चर्चा करना… इस तरह की कितनी ऐसी जरूरी चीजें हैं जिससे  आजकल बच्चों को कोई मतलब ही नहीं होता..।

कम से कम बच्चों को अभिभावक की व्यस्तता  ,परेशानी , असमर्थता समझ में तो आनी चाहिए और उन्हें सकारात्मक सोच कर उनका सहयोग करना चाहिए..!

क्या है ना मिश्रा जी बच्चे बुद्धिमान तो हो रहे हैं …पर कहीं ना कहीं व्यवहारिक ज्ञान  , सामाजिक दायित्व , पड़ोसी धर्म ,पारिवारिक जिम्मेदारी को अनदेखा भी कर रहे हैं …

माननीय संवेदना का अभाव देखने को मिल रहा है मिश्रा जी …जो हमारे भविष्य के लिए चिंताजनक है..!

 याद रखिएगा मिश्रा जी….

” मानवीय संवेदनाओं के बिना विकास केवल तकनीकी प्रगति का ढांचा है …वास्तविक विकास तो वही है जो मानवीय मूल्य और भावनाओं की गरिमा को सर्वोपरि रखता हो ” …!

मिश्रा जी ने गर्व से अपनी पत्नी की ओर देखा ..अरे वाह , मिसराइन जी …आपने तो आज समाज की सबसे दुखती रग पर हाथ रख दिया आपकी ये सोच वाकई एक बेहतर भविष्य की नींव रख सकती है…!

(स्वरचित सर्वाधिकार सुरक्षित रचना )

✍️ संध्या त्रिपाठी

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