खुशियां बांटने से बढ़ती हैं – मोहिनी मिश्रा

दीवाली के त्योहार की सुबह थी। सूरज ने अभी तक अपनी किरणें नहीं बिखेरी थीं, लेकिन निर्मला जी की सुबह हमेशा की तरह अलार्म बजने से पहले ही हो चुकी थी। भोर के चार बज रहे थे। घर में गहरी शांति थी, सिर्फ रसोई से बर्तनों की हल्की खनक और बेसन भूनने की सोंधी महक आ रही थी।

निर्मला जी की उम्र अब पचपन के पार हो चुकी थी। कमर और घुटनों का दर्द अब उनका स्थायी साथी बन चुका था, लेकिन त्योहारों के दिन ये बीमारियां भी जैसे उनसे हार मान लेती थीं। उन्हें आज ढेर सारा काम निपटाना था—गुझिया बनानी थी, मठरी तलनी थी और मेहमानों के लिए नमकीन का इंतजाम करना था। वे चुपचाप एक मोढ़े पर बैठकर कद्दूकस से नारियल घिस रही थीं।

तभी रसोई के दरवाजे पर आहट हुई। निर्मला जी ने मुड़कर देखा तो उनकी नई नवेली बहू, अदिति खड़ी थी। उसने अपने बालों का जूड़ा बनाया हुआ था और चेहरे पर नींद के हल्के निशान थे।

“अरे अदिति बेटा, तुम इतनी सुबह क्यों उठ गई? अभी तो उजाला भी नहीं हुआ है। जाओ, जाकर सो जाओ। आज तो तुम्हारी छुट्टी का दिन है,” निर्मला जी ने अपने दर्द को छिपाते हुए एक हल्की सी मुस्कान के साथ कहा।

अदिति तुरंत आगे बढ़ी और निर्मला जी के हाथ से कद्दूकस लेते हुए बोली, “यह क्या माँ जी! आप इतनी सुबह-सुबह अकेले काम में लग गईं? घर में त्योहार है, काम बहुत है, तो क्या सारा बोझ आप ही उठाएंगी? आप किनारे बैठिए, मैं अभी बस मुंह धोकर आती हूं, फिर हम दोनों मिलकर सब निपटा लेंगे।”

निर्मला जी कुछ कह पातीं, उससे पहले ही अदिति फुर्ती से गई और वापस आकर उनके बगल में बैठ गई। उसने कद्दूकस करना शुरू कर दिया और साथ ही दूसरी गैस पर दोनों के लिए अदरक वाली चाय भी चढ़ा दी। निर्मला जी अवाक रह गईं। उनके हाथ रुक गए और आंखें डबडबा गईं। उनकी नजरें अदिति के चेहरे पर टिक गईं, जो पूरी लगन से काम कर रही थी।

निर्मला जी को इस घर में ब्याह कर आए पूरे तीस साल हो चुके थे। इन तीस सालों में यह पहला मौका था जब किसी ने उनके हाथ से काम छीनकर कहा हो कि “आप बैठिए, मैं करती हूं।” अदिति की इस छोटी सी बात ने निर्मला जी को उनके अतीत के पन्नों में धकेल दिया।

उन्हें याद आ गया अपना वो समय, जब वे नई-नई इस घर में बहू बनकर आई थीं। उनके सपनों की उड़ान बहुत ऊंची थी, लेकिन ससुराल की दहलीज पार करते ही जिम्मेदारियों की ऐसी बेड़ियां पड़ीं कि वे खुद को ही भूल गईं। हर त्योहार, हर व्रत, हर उत्सव पर सबकी फरमाइशें पूरी करते-करते निर्मला जी कब एक ‘इंसान’ से ‘मशीन’ बन गईं, उन्हें खुद भी पता नहीं चला।

सबसे ज्यादा पीड़ा तो उन्हें तब होती थी जब वे काम के बोझ तले दब जाती थीं और उनके पति, प्रकाश जी, आराम से अखबार पढ़ते या टीवी देखते रहते थे। निर्मला जी को आज भी वह दिन याद था जब पंद्रह साल पहले दीवाली के ही दिन उनकी तबीयत बहुत खराब थी। बुखार से शरीर तप रहा था, लेकिन रसोई में काम का अंबार लगा था। उन्होंने हिम्मत करके प्रकाश जी से कहा था, “सुनिए, आज मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। क्या आप मेहमानों के आने से पहले थोड़ा सब्जियों को काटने में या बच्चों को तैयार करने में मेरी मदद कर देंगे?”

प्रकाश जी ने अखबार से नजरें हटाए बिना, एक बेहद ठंडे और रुखे स्वर में जवाब दिया था, “निर्मला, रसोई और घर का काम औरतों का होता है। मैं ऑफिस में कमाकर लाता हूं, वही मेरा काम है। तुम औरतों की आदत होती है त्योहारों पर काम का रोना रोने की। जैसे-तैसे मैनेज करो, मुझसे ये सब नहीं होगा।”

उस दिन निर्मला जी के अंदर कुछ टूट गया था। उन्होंने अपने आंसू पोंछे और जलते हुए शरीर के साथ ही सारा काम निपटाया था। उस दिन के बाद से उन्होंने कभी किसी से मदद नहीं मांगी। उन्होंने मान लिया था कि एक औरत का नसीब अकेले खटना और खामोशी से सहना ही है। उनकी जिंदगी बस ‘सबकी खुशियों’ के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गई थी, जिसमें उनकी अपनी खुशी का कोई कोना नहीं बचा था।

“माँ जी… ओ माँ जी, चाय उबल गई है, कहां खो गईं आप?” अदिति की मीठी आवाज ने निर्मला जी को उनकी कड़वी यादों से बाहर निकाला।

निर्मला जी ने जल्दी से अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी डबडबाई आंखें पोंछीं। “कुछ नहीं बेटा, बस ऐसे ही कुछ पुरानी बातें याद आ गईं।”

अदिति ने चाय का कप उनके हाथ में दिया और प्यार से बोली, “मुझे पता है माँ जी, आप क्या सोच रही हैं। आपने अपनी पूरी जिंदगी इस घर को अकेले ही अपने कंधों पर उठाया है। लेकिन अब मैं आ गई हूं ना। अब आपको अकेले कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।”

इतना कहकर अदिति उठी और सीधे अपने बेडरूम की तरफ गई। निर्मला जी हैरान थीं कि वह कहां जा रही है। कुछ ही मिनटों में अदिति वापस आई, और उसके पीछे-पीछे निर्मला जी का बेटा, सुमित भी आंखें मलता हुआ रसोई में आ गया।

सुमित ने आते ही कहा, “मम्मी, आप और अदिति बस मुझे बताइए कि क्या करना है। मैं आटा गूंद देता हूं और तब तक ये जो नमकीन बन गई है, उसे डिब्बों में पैक कर देता हूं।”

निर्मला जी की आंखें फटी की फटी रह गईं। उनका बेटा, जिसने आज तक पानी का गिलास खुद उठकर नहीं पिया था, आज रसोई में काम करने के लिए खड़ा था।

अदिति ने मुस्कुराते हुए निर्मला जी की ओर देखा और कहा, “माँ जी, जब घर हम सबका है, त्योहार हम सबका है, और खुशियां हम सबकी हैं, तो फिर काम और थकान सिर्फ आपकी अकेले की क्यों? खुशियां बांटने से बढ़ती हैं और काम बांटने से थकान कम होती है।”

निर्मला जी के सब्र का बांध टूट गया। उनकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। लेकिन आज ये आंसू दुख या बेबसी के नहीं थे, बल्कि ये आंसू उस सुकून के थे जिसके लिए वे तीस सालों से तरस रही थीं। उन्होंने अदिति को अपने गले से लगा लिया।

सुमित ने मुस्कुराते हुए अपनी मां के आंसू पोंछे और कहा, “मम्मी, अदिति सही कह रही है। पापा ने जो भी किया, वह उनका समय था, लेकिन अब इस घर में चीजें वैसे नहीं चलेंगी। हम सब मिलकर काम करेंगे, ताकि त्योहार का असली आनंद आप भी ले सकें।”

उस सुबह रसोई में सिर्फ पकवान ही नहीं पक रहे थे, बल्कि एक नए रिश्ते की, एक नई सोच की बुनियाद रखी जा रही थी। निर्मला जी को महसूस हुआ कि आज उनके घर में सिर्फ एक बहू नहीं आई है, बल्कि एक ऐसा बदलाव आया है जिसने उनके बरसों के अकेलेपन को हमेशा के लिए खत्म कर दिया है। भोर का सूरज अब निकल चुका था, और निर्मला जी की जिंदगी में भी एक नई, सुकून भरी सुबह की शुरुआत हो चुकी थी।

क्या आपने भी अपनी माँ या सास को यूं ही अकेले जिम्मेदारियों का बोझ उठाते देखा है? क्या घर के कामों में हाथ बंटाना सिर्फ औरतों की जिम्मेदारी है?

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लेखिका : मोहिनी मिश्रा 

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