अतीत का कर्ज

शहर के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार सेठ रघुनाथ दास की हवेली में आज सुबह से जो शहनाइयाँ गूँज रही थीं, वे अब हृदय विदारक चीखों में तब्दील हो चुकी थीं। पूरा घर सफेद चादरों से ढँक गया था और हवेली के विशाल प्रांगण में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल औरतों के … Read more

 रिश्तों के बंद दरवाज़े 

सावित्री देवी के झुर्रियों वाले हाथों में एक अजीब सी फुर्ती थी। पिछले पंद्रह दिनों से उनके पैरों में जैसे पहिए लगे हुए थे। मौका ही कुछ ऐसा था—उनकी सगी छोटी बहन सुमित्रा के इकलौते पोते, रोहन की शादी थी। शादी जयपुर के एक बड़े और आलीशान रिसॉर्ट में तय हुई थी, जिसे आजकल के … Read more

वो अनकही लकीर

 उनके गालों पर एक आँसू लुढ़क आया था। यह आँसू इस बात का नहीं था कि उन्हें खाने के लिए फल नहीं मिले। दर्द की चुभन उन फलों की कमी की नहीं थी। पीड़ा तो इस बात की थी कि वह घर, जिसे उन्होंने अपनी जवानी के खून-पसीने से सींचा था, आज उसी घर में … Read more

 रिश्तों की गर्माहट

  कल रात ही राधिका की ननद, काव्या, अपने पति और दो छोटे बच्चों के साथ मायके आई थी। घर में मेहमानों के आने से रौनक तो बहुत थी, लेकिन काम भी दोगुना हो गया था। रात को सबको खाना खिलाते, बच्चों को सुलाते और रसोई समेटते-समेटते राधिका को रात के दो बज गए थे। और … Read more

मायके की दौलत का गुरूर

शहर के जाने-माने उद्योगपति सेठ दीनदयाल के आलीशान ड्रॉइंग रूम में उनकी इकलौती बेटी काव्या के रिश्ते की बात चल रही थी। काव्या अपने कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी होकर सब सुन रही थी। तभी उसके चाचा, कैलाश ने एक गहरी मुस्कान के साथ दीनदयाल जी से कहा, “हाँ भैया, लड़के के माता-पिता भी … Read more

पत्नी का सम्मान

काव्या इकलौती संतान थी। बचपन से ही उसे अपना कमरा, अपनी किताबें, अपने कपड़े और अपनी हर एक चीज़ को बेहद सहेज कर रखने की आदत थी। उसकी डिक्शनरी में ‘शेयरिंग’ यानी चीज़ें साझा करने का कोई खास महत्व नहीं था। उसकी शादी सुमित से हुई, जो एक बहुत बड़े और खुशहाल संयुक्त परिवार का … Read more

त्योहारों की असली मिठास

लगातार तीसरा साल था जब निहारिका और उसके पति सार्थक ने दिवाली पर अपने घर, लखनऊ न जाने का फैसला किया था। कारण हर बार की तरह इस बार भी बहुत ‘प्रैक्टिकल’ थे—सार्थक का एक जरूरी प्रोजेक्ट डेडलाइन पर था, निहारिका को ऑफिस से सिर्फ दो दिन की छुट्टी मिली थी, और दोनों ने अगले … Read more

मुझे माफ़ कर दो 

राघव और काव्या की सगाई हुए अभी मुश्किल से तीन महीने ही बीते थे। यह वह समय था जब दो अजनबी एक-दूसरे की आदतों, पसंद और नापसंद को समझने की कोशिश कर रहे थे। दोनों परिवारों की रजामंदी से यह रिश्ता तय हुआ था, इसलिए शुरू से ही उन दोनों को मिलने-जुलने की पूरी आज़ादी … Read more

तस्वीर

रघुनाथ जी एक सप्ताह के बाद अपने छोटे भाई के घर से तीर्थयात्रा पूरी करके वापस लौटे थे। शहर के सबसे पॉश इलाके में बना उनका यह आलीशान दो मंजिला घर, उनकी ज़िंदगी भर की खून-पसीने की कमाई का जीता-जागता सबूत था। हाल ही में उनके बेटे मोहित और बहू शिखा ने घर के निचले … Read more

 समझ की उम्र

रसोई से आती बर्तनों की खटपट के बीच मीरा की दबी हुई सिसकियाँ भी जैसे उस घर की दीवारों का हिस्सा बन चुकी थीं। मीरा, जो पिछले आठ सालों से इस घर की बहू थी, आज भी खुद को एक अजनबी ही महसूस करती थी। उसका पति, विकास, शहर के एक बड़े दफ़्तर में काम … Read more

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