रिश्तों की नई सुबह

बच्चों की आवाज सुनते ही सुप्रिया के भीतर की सारी दीवारें, सारा गुस्सा और सारा दर्द एक झटके में ढह गया। वह जमीन पर बैठ गई और दोनों बच्चों को अपने सीने से चिपका लिया। बच्चों के रोने और सुप्रिया की सिसकियों से पूरा आँगन गूँज उठा। वह अपने बच्चों के चेहरे, माथे और हाथों को ऐसे चूम रही थी जैसे कोई बंजर जमीन पर पहली बारिश की बूँदों को समेट रहा हो।

पीछे विक्रांत खड़े थे। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। सुप्रिया के मामा और मामी भी कमरे से बाहर निकल आए थे और उनके चेहरों पर नाराजगी साफ दिख रही थी।

“एक भरा-पूरा परिवार, दो मासूम बच्चे और अचानक एक दिन माँ का घर छोड़कर हमेशा के लिए चले जाना—क्या ममता इतनी कमजोर हो सकती है या इस खामोश फैसले के पीछे कोई गहरा सच छुपा था?”

ऑफिस के काम के सिलसिले में मैं पिछले छह महीनों से जयपुर में व्यस्त थी। जब भी घर-परिवार और पुरानी सहेलियों की याद आती, मन किसी अपने से बतियाने को मचल उठता। आज अचानक मुझे अपनी कॉलेज के दिनों की सबसे करीबी सहेली सुप्रिया की याद आई। सुप्रिया और मैं कई सालों तक एक ही कमरे में हॉस्टल में रहे थे। वह हमेशा हँसमुख, शांत और दूसरों के लिए अपनी खुशियाँ कुर्बान कर देने वाली लड़की थी। करीब आठ साल पहले उसकी शादी इंदौर के एक प्रतिष्ठित और समृद्ध परिवार में विक्रांत से हुई थी। विक्रांत पेशे से एक बड़े आर्किटेक्ट थे और उनका परिवार शहर के जाने-माने खानदानों में गिना जाता था। शादी के कुछ साल बाद उनके दो प्यारे बच्चे हुए—सात साल का कबीर और पाँच साल की नन्हीं मायरा। जब भी मेरी सुप्रिया से बात होती, वह हमेशा बच्चों और परिवार की बातें करती। लेकिन पिछले चार-पाँच महीनों से न उसका कोई फोन आया था और न ही मेरे संदेशों का कोई जवाब।

शाम की चाय हाथ में लिए मैंने अपना फोन उठाया और सुप्रिया का नंबर डायल किया। घंटी बजती रही, पर किसी ने फोन नहीं उठाया। मैंने दोबारा कोशिश की। तीसरी बार घंटी बजने पर कॉल रिसीव हुआ। मेरी खुशी का ठिकाना न रहा।

“हेलो सुप्रिया! कैसी हो तुम? इतने दिनों से कोई खबर नहीं, भूल ही गई क्या अपनी इस सहेली को?” मैंने एक ही सांस में अपनी सारी शिकायतें उड़ेल दीं।

लेकिन दूसरी तरफ से सुप्रिया की चहकती हुई आवाज नहीं आई। एक भारी, गंभीर और अजनबी महिला की आवाज गूँजी, “हेलो, कौन बोल रही हैं आप?”

मैं थोड़ा ठिठकी। “जी, मैं नैना बोल रही हूँ, सुप्रिया की कॉलेज की दोस्त। क्या मेरी बात सुप्रिया से हो सकती है? यह उसी का नंबर है न?”

दूसरी तरफ कुछ पलों के लिए गहरा सन्नाटा छा गया। फिर एक ठंडी और बेरुखी से भरी आवाज आई, “मैं सुप्रिया की मामी बोल रही हूँ। अब इस नंबर पर फोन मत कीजिएगा। सुप्रिया अब कभी उस घर वापस नहीं आएगी। उसने अपने पति और ससुराल का घर हमेशा के लिए छोड़ दिया है।”

यह सुनते ही मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई। सुप्रिया और ससुराल छोड़ दिया? जो लड़की अपने परिवार को अपनी दुनिया मानती थी, जिसने अपनी नौकरी सिर्फ इसलिए छोड़ दी ताकि वह अपने सास-ससुर और बच्चों की बेहतर देखभाल कर सके, वह ससुराल छोड़ चुकी है?

मेरे मुँह से बेसाख्ता निकला, “यह आप क्या कह रही हैं मामी जी? ऐसा कैसे हो सकता है? और बच्चे? कबीर और मायरा कहाँ हैं? क्या वह उन्हें अपने साथ ले गई है?”

मामी की आवाज में तल्खी और बढ़ गई, “नहीं, बच्चे अपने पिता के पास हैं। वह सब कुछ वहीं छोड़ आई है। अब वह अपने रास्ते है और वे अपने। आप दोबारा यहाँ फोन करके पुरानी बातें मत कुरेदिए।” इतना कहकर उन्होंने खट से फोन काट दिया।

फोन कट चुका था, लेकिन मेरे कानों में मामी के शब्द हथौड़े की तरह गूँज रहे थे। एक माँ अपने सात और पाँच साल के कलेजे के टुकड़ों को छोड़कर कैसे जा सकती है? सुप्रिया जैसी ममतामयी औरत कभी इतनी निष्ठुर नहीं हो सकती थी। मेरा दिल यह मानने को तैयार ही नहीं था। कहीं कुछ बहुत गलत हुआ था, कोई ऐसी बात थी जो छुपाई जा रही थी। मैंने उसी वक्त तय किया कि मुझे सच जानना ही होगा। इंदौर यहाँ से ज्यादा दूर नहीं था। मैंने तुरंत अगले दिन की सुबह की बस का टिकट बुक कराया।

अगली दोपहर तक मैं इंदौर पहुँच चुकी थी। ऑटो लेकर मैं सीधे विक्रांत के बंगले ‘शांति निकेतन’ के सामने उतरी। कभी यह घर रोशनी और हँसी से भरा रहता था, लेकिन आज बाहर से ही अजीब सी वीरानी टपक रही थी। बगीचे के फूल मुरझाए हुए थे और मुख्य दरवाजे पर एक अजीब सी खामोशी पसरी थी। मैंने हिम्मत जुटाकर घंटी बजाई।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला। सामने विक्रांत खड़े थे। उनके बिखरे बाल, गहरी धँसी हुई आँखें और दाढ़ी बढ़ी हुई थी। आठ साल पहले शादी में देखा गया वह ऊर्जावान और हँसमुख युवक कहीं खो चुका था।

“विक्रांत जी… नमस्ते। मैं नैना, सुप्रिया की दोस्त,” मैंने हिचकिचाते हुए कहा।

विक्रांत ने मुझे पहचाना और उनके चेहरे पर एक दर्द भरी मुस्कान उभर आई। “अरे नैना… आओ, अंदर आ जाओ।”

घर के अंदर का नजारा और भी हृदयविदारक था। ड्राइंग रूम में सामान अस्त-व्यस्त पड़ा था। सोफे के कोने पर स्कूल बैग और खिलौने बिखरे थे। तभी अंदर के कमरे से मायरा रोती हुई बाहर आई, “पापा, मेरी फ्रॉक का बटन टूट गया… दादी को बुखार है, वो नहीं लगा पा रहीं।” पीछे-पीछे कबीर भी सिर झुकाए चला आ रहा था। दोनों बच्चों के चेहरों पर वह मासूम चमक नहीं थी, बल्कि एक गहरा डर और अकेलापन साफ झलक रहा था।

विक्रांत ने मायरा को गोद में उठाया और दिलासा देने लगे, लेकिन उनकी अपनी आँखें नम थीं। मैंने मायरा को अपने पास बुलाया, उसे प्यार किया और विक्रांत से सीधे सवाल किया, “विक्रांत जी, यह सब क्या है? सुप्रिया कहाँ है? मुझे उसकी मामी ने फोन पर बताया कि वह घर छोड़ चुकी है। मुझे यकीन नहीं हो रहा कि सुप्रिया ऐसा कर सकती है।”

विक्रांत सोफे पर बैठ गए और उन्होंने अपना सिर दोनों हाथों में थाम लिया। एक लंबा सन्नाटा छा गया। फिर भारी आवाज में उन्होंने बोलना शुरू किया, “नैना, जो कुछ भी हुआ, उसके लिए अगर कोई जिम्मेदार है, तो सिर्फ और सिर्फ मैं हूँ। मैंने अपनी झूठी प्राथमिकताओं, काम के घमंड और गलतफहमियों में अपनी ही गृहस्थी को आग लगा दी।”

विक्रांत की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्होंने बताया कि पिछले दो सालों में उनके बिजनेस में भारी नुकसान हुआ था। उस तनाव और गुस्से को वे घर पर निकालने लगे थे। सुप्रिया दिन-रात घर, बीमार सास-ससुर और बच्चों की देखभाल में खटती रहती, लेकिन विक्रांत की तरफ से उसे केवल ताने और उपेक्षा मिलती। विक्रांत को लगता था कि केवल बाहर जाकर पैसा कमाना ही सबसे बड़ा काम है, घर संभालने वाली औरत का कोई मोल नहीं होता।

बात सिर्फ यहीं तक नहीं रुकी थी। विक्रांत की एक दूर की रिश्तेदार महिला ने उनके कान भरने शुरू कर दिए थे कि सुप्रिया घर पर ध्यान नहीं देती और मायके में पैसे भेजती है। बिना सच जाने, बिना अपनी पत्नी पर भरोसा किए, विक्रांत ने तीन महीने पहले एक दिन सबके सामने सुप्रिया पर लांछन लगा दिए और गुस्से में कह दिया, “अगर तुम्हें यहाँ घुटन होती है, तो तुम यह घर छोड़कर जा सकती हो!”

उस दिन सुप्रिया के सब्र का बाँध टूट गया था। जिस औरत ने अपनी पूरी जवानी उस घर को सींचने में लगा दी, उसके आत्मसम्मान की सरेआम धज्जियाँ उड़ा दी गई थीं। वह बिना एक पैसा लिए, केवल अपने पहने हुए कपड़ों में उस घर से निकल गई। उसने बच्चों को साथ ले जाने की कोशिश की थी, लेकिन विक्रांत के परिवार ने कानूनी और सामाजिक धौंस दिखाकर बच्चों को उससे छीन लिया था।

“नैना, उसके जाने के बाद मुझे समझ आया कि एक घर केवल ईंट-पत्थरों और पैसों से नहीं चलता, वह उस औरत की रूह से चलता है जो उसे सँभालती है,” विक्रांत रोते हुए बोले, “मेरी माँ बीमार पड़ गईं, बच्चों का रो-रोकर बुरा हाल है। मैंने उसे वापस लाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसके मायके वालों ने मुझे दरवाजे से ही भगा दिया। सुप्रिया ने मुझसे बात करने से साफ इनकार कर दिया है। वह टूट चुकी है नैना, और उसे तोड़ने वाला कोई और नहीं, मैं हूँ।”

सारी बात सुनकर मेरा कलेजा मुँह को आ गया। गलती किसकी थी और सजा कौन भुगत रहा था—वे दो मासूम बच्चे और एक स्वाभिमानी माँ। मुझे समझ आ गया कि सुप्रिया पत्थरों की नहीं बनी थी; वह अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए भागी थी, ममता की कमी के कारण नहीं।

मैंने विक्रांत से कहा, “विक्रांत जी, पछतावे के आँसू बहाने से बिगड़े हुए रिश्ते नहीं सुधरते। अगर आपको सच में अपनी गलती का अहसास है, तो आपको अपने अहम् को पूरी तरह मिटाना होगा। सुप्रिया कोई वस्तु नहीं है जिसे जब चाहा दुत्कार दिया और जब जरूरत पड़ी तो वापस बुला लिया। वह एक इंसान है, जिसे प्यार और सबसे बढ़कर सम्मान चाहिए।”

मैंने तुरंत सुप्रिया के मायके जाने का फैसला किया। उसका मायका शहर से कुछ ही दूरी पर एक छोटे कस्बे में था। मैंने विक्रांत से कहा कि वे बच्चों को लेकर मेरे साथ चलें। शुरुआत में विक्रांत हिचकिचाए, लेकिन बच्चों की हालत देखकर उन्होंने हिम्मत जुटाई।

दो घंटे के सफर के बाद हम सुप्रिया के मायके के सामने खड़े थे। एक साधारण सा मकान। मैंने बाहर ही विक्रांत और बच्चों को रुकने को कहा और खुद अंदर गई।

आँगन में सुप्रिया बैठी थी। सूती साड़ी, चेहरे पर गहरा पीलापन और आँखों में अथाह उदासी। मुझे देखते ही वह चौंक गई और दौड़कर मेरे गले लग गई। हम दोनों कई मिनटों तक बिना कुछ बोले सिर्फ रोते रहे।

“तू यहाँ कैसे नैना?” उसने सिसकते हुए पूछा।

“मैं अपनी उस सहेली को ढूँढने आई हूँ जो कभी किसी के आगे झुकना नहीं जानती थी, लेकिन जिसने आज अपने ही बच्चों से मुँह मोड़ लिया,” मैंने जानबूझकर कड़े शब्दों का इस्तेमाल किया।

सुप्रिया तड़प उठी, “नहीं नैना! ऐसा मत कह। एक पल ऐसा नहीं बीतता जब मुझे कबीर और मायरा की याद न आती हो। मेरी छाती फटती है उनके लिए। लेकिन मैं क्या करती? जहाँ मेरी कोई कद्र नहीं थी, जहाँ मेरी निष्ठा पर सवाल उठाए गए, वहाँ मैं घुट-घुट कर मर जाती। क्या एक औरत का अपना कोई वजूद नहीं होता? क्या सिर्फ समझौते करना ही हमारी नियति है?”

“तेरा दर्द मैं समझती हूँ सुप्रिया,” मैंने प्यार से उसका हाथ थामा, “तेरा आत्मसम्मान सबसे ऊपर है और तूने जो किया, अपनी मर्यादा बचाने के लिए किया। लेकिन क्या तूने उन बच्चों के बारे में सोचा जो हर रात तकिए में मुँह छिपाकर अपनी माँ के आँचल के लिए रोते हैं? और जिसने अपनी गलती का अहसास कर लिया हो, क्या उसे सुधरने का एक मौका भी नहीं मिलना चाहिए?”

सुप्रिया ने हैरानी से मेरी तरफ देखा। उसी पल मैंने दरवाजे की तरफ इशारा किया।

दरवाजे से सबसे पहले मायरा दौड़ी, “मम्मा!” और उसके पीछे कबीर चिल्लाया, “माँ!”

बच्चों की आवाज सुनते ही सुप्रिया के भीतर की सारी दीवारें, सारा गुस्सा और सारा दर्द एक झटके में ढह गया। वह जमीन पर बैठ गई और दोनों बच्चों को अपने सीने से चिपका लिया। बच्चों के रोने और सुप्रिया की सिसकियों से पूरा आँगन गूँज उठा। वह अपने बच्चों के चेहरे, माथे और हाथों को ऐसे चूम रही थी जैसे कोई बंजर जमीन पर पहली बारिश की बूँदों को समेट रहा हो।

पीछे विक्रांत खड़े थे। उनकी आँखों से लगातार आँसू बह रहे थे। सुप्रिया के मामा और मामी भी कमरे से बाहर निकल आए थे और उनके चेहरों पर नाराजगी साफ दिख रही थी।

विक्रांत आगे बढ़े और उन्होंने किसी की परवाह किए बिना, भरी दोपहरी में सबके सामने सुप्रिया के कदमों में झुककर हाथ जोड़ दिए।

“सुप्रिया… मुझे माफ कर दो,” विक्रांत की आवाज काँप रही थी, “मैं एक अच्छा पति नहीं बन पाया, मैंने तुम्हारे त्याग को नहीं समझा। मैंने अपने अहंकार में उस रिश्ते को रौंद दिया जो मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी ताकत था। तुम जो सजा दोगी मुझे मंजूर है, लेकिन इन बच्चों को इनकी माँ से और इस घर को उसकी जान से मत छीनो। मैं तुमसे यह नहीं कहता कि तुम मेरी खातिर लौटो, लेकिन मुझे एक मौका दो ताकि मैं तुम्हें वह सम्मान और प्यार दे सकूँ जिसकी तुम हमेशा से हकदार थीं।”

एक पुरुष को इस तरह अपनी गलतियों को स्वीकारते और सच्चे मन से प्रायश्चित करते देखना आसान नहीं होता। सुप्रिया के मामा-मामी भी अवाक रह गए।

सुप्रिया ने विक्रांत की तरफ देखा। उसकी आँखों में सालों का जमा दर्द पिघल रहा था। उसने विक्रांत का हाथ पकड़कर उन्हें उठाया और रुँधे गले से कहा, “मुझे कोई ऐशो-आराम या धन-दौलत नहीं चाहिए थी विक्रांत, मुझे सिर्फ आपका थोड़ा सा वक्त, भरोसा और सम्मान चाहिए था।”

“मैं वादा करता हूँ सुप्रिया, अब से हमारी गृहस्थी बराबरी, भरोसे और सम्मान की नींव पर चलेगी। तुम्हारा स्थान मेरे जीवन में सबसे ऊँचा है और हमेशा रहेगा,” विक्रांत ने नम आँखों से कहा।

कबीर और मायरा ने दोनों के हाथ पकड़कर एक-दूसरे से मिला दिए। नन्हें कबीर ने कहा, “पापा, अब मम्मा को कभी डांटना मत… हम सब साथ रहेंगे न?”

इस मासूम सवाल ने वहाँ मौजूद हर शख्स की आँखें भिगो दीं। रिश्तों की जो डोर गलतफहमियों और अहंकार की आंधी में टूटने की कगार पर पहुँच गई थी, वह सच्चे अहसास, माफी और बच्चों के निश्छल प्रेम से फिर से जुड़ गई थी। सुप्रिया ने बच्चों को संभाला और एक नई शुरुआत के लिए अपना हाथ विक्रांत के हाथ में सौंप दिया।

शाम ढलते-ढलते जब मैं बस स्टैंड की तरफ लौटने लगी, तो मैंने देखा कि गाड़ी में बैठे चारों चेहरे मुस्कुरा रहे थे। एक बिखरा हुआ परिवार फिर से एक हो चुका था—न किसी के दबाव में, बल्कि दिल से किए गए पश्चाताप और सच्चे प्यार के बल पर।

क्या आपको लगता है कि रिश्तों में अक्सर गलतफहमियाँ और अहंकार ही सबसे बड़ी दरार बनते हैं, और यदि समय रहते अपनी गलती का अहसास कर लिया जाए तो किसी भी टूटते परिवार को बचाया जा सकता है? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें जरूर बताएं।

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