शहर के एक पुराने और शांत मोहल्ले में मास्टर शिवनारायण जी का मकान किसी समय अपनी रौनक के लिए जाना जाता था। मास्टर जी इलाके के सबसे सख्त और उसूलों वाले व्यक्ति माने जाते थे। उनका एक ही नियम था—जो उन्होंने कह दिया, वही पत्थर की लकीर है। इसी झूठे गुरूर के चलते आज से सात साल पहले उन्होंने अपनी इकलौती बेटी, काव्या के लिए अपने घर के दरवाज़े हमेशा के लिए बंद कर दिए थे। काव्या का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने पिता की पसंद के अमीर लड़के को ठुकरा कर, एक साधारण से नौकरीपेशा युवा, प्रतीक से प्रेम विवाह कर लिया था। मास्टर जी ने उस दिन ऐलान कर दिया था कि काव्या उनके लिए मर चुकी है। उनका सारा अभिमान उनके बेटे, वैभव पर टिका था जिसे उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी लगाकर विदेश भेजा था।
लेकिन वक्त की लाठी जब पड़ती है, तो बड़े-बड़े अहंकार टूट कर मिट्टी में मिल जाते हैं। वैभव विदेश जाकर वहीं बस गया और उसने अपनी विदेशी पत्नी के साथ मिलकर अपने माता-पिता से सारे रिश्ते तोड़ लिए। पिछले एक साल से मास्टर जी लकवे का शिकार होकर बिस्तर पर पड़े थे। उनकी पत्नी, सुभद्रा देवी, अपने बूढ़े और कमज़ोर शरीर के साथ उनकी सेवा करते-करते आधी हो गई थीं। पैसों की तंगी और बेटे के धोखे ने मास्टर जी को अंदर से पूरी तरह खोखला कर दिया था। उन्हें अपनी उस गलती का पल-पल आभास होता था जो उन्होंने अपनी बेटी के साथ की थी, लेकिन अब किस मुँह से वे काव्या को बुलाते? उनके पास पश्चाताप के आंसुओं के सिवा कुछ नहीं बचा था।
एक दोपहर, मोहल्ले की उस संकरी और शांत गली में एक लंबी सी सफेद गाड़ी आकर रुकी। ऐसी गाड़ी इस मोहल्ले में कम ही नज़र आती थी, इसलिए कौतूहल से आस-पड़ोस के लोग अपनी छतों और दरवाज़ों पर जमा हो गए। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और उसमें से काव्या उतरी। सात सालों बाद अपनी जन्मभूमि पर कदम रखते ही काव्या की आँखें छलक पड़ीं। उसके पीछे उसका पति, प्रतीक भी बाहर आया। मोहल्ले के लोग काव्या को देखकर हैरान भी थे और खुश भी।
आंगन में तुलसी को जल दे रही सुभद्रा देवी ने जब गाड़ी रुकने की आवाज़ सुनी, तो वे धीरे-धीरे लाठी टेकते हुए बाहर आईं। सामने काव्या और दामाद को खड़े देखकर सुभद्रा देवी के हाथ से जल का लोटा छूटकर ज़मीन पर गिर गया। उन्हें एक पल के लिए अपनी सूखी हुई आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। एक माँ का हृदय, जो सालों से अपनी लाडली की एक झलक पाने के लिए तरस रहा था, आज खुशी से चीख उठा।
“मेरी बच्ची…!” सुभद्रा देवी दौड़ती हुई गईं और काव्या को अपने सीने से लगा लिया।
काव्या भी अपनी माँ के गले लगकर ऐसे फूट-फूट कर रोई जैसे बरसों का रुका हुआ कोई बांध टूट गया हो। माँ-बेटी के इस मिलन और करुणा के इस अथाह वेग को देखकर छतों पर खड़े पड़ोसियों की आँखें भी नम हो गईं। सुभद्रा देवी भागकर अंदर गईं और पूजा घर से आरती की थाल ले आईं। यह पहली बार था जब उनकी बेटी और दामाद शादी के बाद घर आए थे। सुभद्रा देवी ने रोते हुए दोनों की आरती उतारी और उन्हें अंदर ले गईं।
घर के अंदर का नज़ारा देखकर काव्या का दिल बैठ गया। जिस घर में कभी खुशियों की किलकारियां गूंजती थीं, वहाँ आज दवाइयों की गंध और एक भयानक उदासी पसरी हुई थी। काव्या दौड़कर अपने पिता के कमरे में गई। बिस्तर पर एक जीर्ण-शीर्ण, हड्डियों का ढांचा मात्र काया पड़ी थी। एक समय में अपने रौब और अनुशासन से पूरे मोहल्ले को डराने वाले मास्टर शिवनारायण जी को इस तरह असहाय और बेबस देखकर काव्या बिलख उठी। वह दौड़कर उनके पैरों के पास बैठ गई और फूट-फूट कर रोने लगी।
आवाज़ सुनकर मास्टर जी ने बड़ी मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं। सामने अपनी ठुकराई हुई बेटी को देखकर उनके आंसुओं की धार बह निकली। उन्हें अपनी सारी गलतियों और अपने अहंकार पर घिन आने लगी। उन्होंने कुछ बोलने की कोशिश की, लेकिन लकवे के कारण उनके मुँह से सिर्फ अस्पष्ट ध्वनियां ही निकलीं। प्रतीक को सामने खड़ा देखकर मास्टर जी ने अपना एक कांपता हुआ हाथ आशीर्वाद के रूप में ऊपर उठा दिया। उनके आंसुओं में माफ़ी और प्रायश्चित दोनों शामिल थे।
प्रतीक ने आगे बढ़कर मास्टर जी के उस कांपते हुए हाथ को अपने दोनों हाथों में थाम लिया और बहुत ही कोमलता से कहा, “बाबूजी, अब आपको बिल्कुल भी चिंता करने की ज़रूरत नहीं है। आपके सारे कष्ट अब हमारे हैं। हम आपको शहर के सबसे बड़े अस्पताल में ले जाएंगे और आपका पूरा इलाज करवाएंगे।”
प्रतीक की बात सुनकर सुभद्रा देवी ने अपने आँसू पोंछे और झिझकते हुए बोलीं, “लेकिन बेटा… बेटी और दामाद से इस तरह पैसे लेना, उनका सहारा लेना… समाज क्या कहेगा दामाद जी? यह उचित नहीं होगा।”
प्रतीक मुस्कुराया और उसने सुभद्रा देवी के कंधे पर हाथ रखते हुए बहुत ही शांत और स्पष्ट स्वर में कहा, “माँ, आप मुझे दामाद क्यों मान रही हैं? क्या वैभव और मुझमें कोई अंतर है? अगर वैभव आज यह ज़िम्मेदारी उठाता, तो क्या समाज कुछ कहता? नहीं ना! तो फिर एक बेटी और दामाद को यह हक़ क्यों नहीं है? आज से आप लोग इस पुराने घर में नहीं, बल्कि हमारे साथ शहर में रहेंगे। जब तक बाबूजी पूरी तरह से अपने पैरों पर चलने नहीं लगते, काव्या रोज़ अपने हाथों से उनका ख्याल रखेगी।”
अपने दामाद के मुख से ऐसे निश्छल, परिपक्व और प्रेम भरे शब्द सुनकर सुभद्रा देवी के आंसुओं की झड़ी लग गई। उनके सारे संकोच और समाज के डर उसी पल बह गए। काव्या ने अपनी माँ को गले लगा लिया।
प्रतीक ने माहौल को थोड़ा हल्का करने के लिए मुस्कुराते हुए कहा, “और हाँ माँ, अब इस घर में एक बार भी आप रोएंगी नहीं। आपके रोने के दिन खत्म हुए। आप तो बस अब अपने नाती-नातिन को खिलाने और उन्हें लोरियां सुनाने की तैयारी कीजिए, क्योंकि हम उन्हें आपके ही पास छोड़ने वाले हैं।”
प्रतीक की यह बात सुनकर उस उदास और शांत कमरे में सालों बाद एक हल्की सी मुस्कान फैल गई। मास्टर जी के चेहरे पर भी एक सुकून भरी चमक आ गई थी। आज इस परिवार के दिलों में जमी हुई सालों की धूल, गलतफहमियां और अहंकार पूरी तरह से धुल गए थे। एक बेटी ने अपने निस्वार्थ प्रेम से साबित कर दिया था कि रिश्ते खून या समाज के नियमों से नहीं, बल्कि दिल की सच्चाई से निभाए जाते हैं।
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