“नहीं पापा, दफ्तर का कोई बहाना नहीं है। मैं पूरी तरह खाली हूं, लेकिन फिर भी नहीं जाऊंगा,” मयंक ने नजरें मिलाकर कहा। “पापा, सच तो यह है कि मुझे किसी ने बुलाया ही नहीं है। मौसा जी ने आपको फोन किया, प्रतीक ने आपको निमंत्रण दिया। मुझसे किसी ने एक शब्द नहीं कहा। हर बार ऐसा ही होता है। कोई भी प्रोग्राम हो, सभी आपको बुला लेते हैं, हमें तो कोई पूछता तक नहीं। क्या हमारा कोई वजूद नहीं है? आखिर हमारा भी आत्मसम्मान है। जब तक कोई हमें सम्मानपूर्वक अलग से न्योता नहीं देगा, मैं किसी भी रिश्तेदारी में नहीं जाऊंगा।”
इंदौर के एक शांत और संभ्रांत इलाके में बना ‘आनंद कुंज’ बाहर से जितना भव्य दिखता था, उसके अंदर के रिश्ते उतने ही संवेदनशील दौर से गुजर रहे थे। उस मकान में सत्यप्रकाश जी अपने बेटे मयंक, बहू शालिनी और पोते आरव के साथ रहते थे। सत्यप्रकाश जी बैंक से वरिष्ठ प्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। स्वभाव से बेहद मिलनसार, हंसमुख और पूरे खानदान की धड़कन थे। रिश्तेदारी में कोई भी छोटा-बड़ा आयोजन हो, सत्यप्रकाश जी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता था। हर कोई उनका आदर करता था। वहीं दूसरी ओर, उनका बेटा मयंक एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर था। उसने अपनी कड़ी मेहनत से करियर में एक मुकाम हासिल किया था। मयंक स्वभाव से थोड़ा शांत और स्वाभिमानी था, लेकिन पिछले कुछ समय से उसके भीतर एक अजीब सी कड़वाहट और उपेक्षा का भाव घर करता जा रहा था।
रविवार की एक दोपहर जब मयंक दफ्तर की थकान मिटाने के लिए बैठक में चाय पी रहा था, तभी सत्यप्रकाश जी मुस्कुराते हुए कमरे में दाखिल हुए। उनके हाथ में एक चमकीला लिफाफा था। उनके चेहरे पर पुरानी यादों की चमक थी।
“अरे मयंक, सुनो! तुम्हारे मौसा जी का फोन आया था जबलपुर से। उनके बड़े बेटे, यानी तुम्हारे भाई प्रतीक की शादी तय हो गई है। अगले महीने की पंद्रह तारीख को बारात जानी है। मौसा जी कह रहे थे कि मुझे चार दिन पहले ही पहुंचना होगा, सारी व्यवस्थाएं जो देखनी हैं। तुम लोग भी अपनी छुट्टियां देख लो और टिकट का इंतजाम करो।” सत्यप्रकाश जी ने उत्साह से पत्रिका मेज पर रखते हुए कहा।
मयंक ने एक फीकी मुस्कान दी और चाय का घूंट भरा। उसने कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी आंखों में एक गहरी उदासी तैर गई। यह कोई पहली बार नहीं था। पिछले महीने जब भोपाल में बुआ के बेटे का मुंडन था, तब भी बुआ ने केवल पापा को फोन करके कह दिया था कि ‘भैया, बच्चों को लेकर आ जाना।’ उससे पहले जब मामा की बेटी का गृहप्रवेश था, तब भी वही कहानी दोहराई गई थी। पूरे खानदान में हर कोई सिर्फ पिता जी को फोन करता था, उन्हीं के नाम से निमंत्रण पत्र भिजवाता था। किसी ने कभी यह जहमत नहीं उठाई कि मयंक को अलग से एक फोन करके पूछ ले या उसका हालचाल जान ले।
सत्यप्रकाश जी जब अपने कमरे में चले गए, तो मयंक की पत्नी शालिनी रसोई से बाहर आई। उसने पत्रिका की ओर देखा और फिर मयंक के उतरे हुए चेहरे को पढ़ा। शालिनी समझ रही थी कि मयंक के मन में क्या चल रहा है।
शालिनी ने धीरे से कहा, “मयंक, इस बार भी वही हुआ न? प्रतीक भैया ने आपको एक बार भी फोन नहीं किया? जबकि पिछले साल जब वे इंदौर आए थे, तो तीन दिन हमारे ही घर रुके थे। आपने उनका कितना ख्याल रखा था।”
शालिनी की इस बात ने मयंक के अंदर दबे ज्वालामुखी को हवा दे दी। मयंक का चेहरा तमतमा उठा। उसने कप जोर से तश्तरी पर रखा और बोला, “हां शालिनी, बिल्कुल वही हुआ जो हमेशा होता आया है। कोई भी पारिवारिक कार्यक्रम हो, चाहे शादी हो, मुंडन हो, जन्मदिन हो या गृहप्रवेश—सभी पापा को फोन कर लेते हैं और समझ लेते हैं कि औपचारिकता पूरी हो गई। हमें तो कोई सीधे फोन तक नहीं करता। क्या हमारा अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है? आखिर हमारा भी एक आत्मसम्मान है! हम बच्चे नहीं हैं जिन्हें उंगली पकड़कर कहीं भी ले जाया जाए। अब हम इस शादी में बिल्कुल नहीं जाएंगे, जब तक कोई हमें सीधे और सम्मानपूर्वक न्योता नहीं देता।”
शालिनी ने उसे समझाने की कोशिश की, “मयंक, आपकी बात सही है कि हमें बुरा लगता है, लेकिन वो लोग पुराने ख्यालों के हैं। वे सोचते हैं कि जब घर के मुखिया को बोल दिया, तो पूरा परिवार शामिल हो गया। इसमें उनका कोई गलत इरादा नहीं होता।”
“इरादा चाहे जो भी हो शालिनी, पर यह तरीका गलत है,” मयंक ने कड़े स्वर में कहा। “हम युवा हैं, अपने पैरों पर खड़े हैं, समाज में हमारा भी एक मान-सम्मान है। अगर वो मुझे अपना भाई मानते हैं, तो क्या दो मिनट निकालकर मुझे फोन नहीं कर सकते थे? क्या मैं केवल पापा के साथ मुफ्त में जाने वाला कोई अतिरिक्त सदस्य हूं? नहीं, अब मैंने तय कर लिया है। मैं जबलपुर नहीं जाऊंगा। पापा अकेले जाना चाहें तो जाएं।”
मयंक का यह गुस्सा केवल उस एक शादी के लिए नहीं था। यह उस उपेक्षा का परिणाम था जिसे वह सालों से घूंट-घूंट कर पी रहा था। हमारे समाज में अक्सर संयुक्त या पारंपरिक परिवारों में यह मान लिया जाता है कि बुजुर्ग को कह दिया तो बात खत्म हो गई। लेकिन नई पीढ़ी जो अपनी पहचान बनाने के लिए दिन-रात संघर्ष करती है, वह केवल उपस्थिति नहीं, बल्कि अपनी पहचान की स्वीकृति भी चाहती है।
शाम को खाने की मेज पर जब बात शादी की तैयारियों की चली, तो सत्यप्रकाश जी ने कहा, “मयंक, कल सुबह ही तुम ट्रेन की टिकटें देख लेना। हम सब 12 तारीख को निकलेंगे।”
मयंक ने अपनी थाली से नजरें उठाए बिना बेहद संजीदगी से कहा, “पापा, आप अपनी टिकट करा लीजिए। मैं और शालिनी इस शादी में नहीं जा रहे हैं।”
कमरे में सन्नाटा छा गया। सत्यप्रकाश जी के हाथ का निवाला रुक गया। उन्होंने चश्मे के ऊपर से बेटे को देखा। “क्यों मयंक? क्या दफ्तर में कोई जरूरी काम है? अगर ऐसा है तो तुम शादी वाले दिन आ जाना।”
“नहीं पापा, दफ्तर का कोई बहाना नहीं है। मैं पूरी तरह खाली हूं, लेकिन फिर भी नहीं जाऊंगा,” मयंक ने नजरें मिलाकर कहा। “पापा, सच तो यह है कि मुझे किसी ने बुलाया ही नहीं है। मौसा जी ने आपको फोन किया, प्रतीक ने आपको निमंत्रण दिया। मुझसे किसी ने एक शब्द नहीं कहा। हर बार ऐसा ही होता है। कोई भी प्रोग्राम हो, सभी आपको बुला लेते हैं, हमें तो कोई पूछता तक नहीं। क्या हमारा कोई वजूद नहीं है? आखिर हमारा भी आत्मसम्मान है। जब तक कोई हमें सम्मानपूर्वक अलग से न्योता नहीं देगा, मैं किसी भी रिश्तेदारी में नहीं जाऊंगा।”
सत्यप्रकाश जी ने बेटे की आंखों में देखा। वहां गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के पीछे गहरा दर्द और आहत स्वाभिमान छिपा था। एक पिता होने के नाते वे समझ गए कि उनका बेटा किसी जिद में नहीं, बल्कि उपेक्षा की टीस में जल रहा है। उस रात सत्यप्रकाश जी ने मयंक पर चिल्लाने या उसे संस्कार सिखाने की कोशिश नहीं की। उन्होंने केवल इतना कहा, “ठीक है बेटा, जैसा तुम्हें सही लगे।”
अगले दो हफ्तों तक घर में इस विषय पर कोई बात नहीं हुई। मयंक अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहा, लेकिन उसके मन में एक बेचैनी थी। वह बार-बार अपना फोन देखता था कि शायद प्रतीक का कोई फोन या संदेश आ जाए, लेकिन फोन शांत रहा। मयंक का दिल और अधिक कठोर होता गया। उसे लगा कि उसके न आने से सच में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता।
शादी से ठीक पांच दिन पहले सत्यप्रकाश जी ने मयंक को अपने कमरे में बुलाया। मयंक कमरे में गया तो देखा कि सत्यप्रकाश जी एक पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहे थे। कमरे में धूप की हल्की किरणें खिड़की से आ रही थीं।
“बैठो मयंक,” सत्यप्रकाश जी ने शांत स्वर में कहा।
मयंक सामने कुर्सी पर बैठ गया। सत्यप्रकाश जी ने डायरी बंद की और बोले, “बेटा, तुम्हारी बात पर मैंने बहुत सोचा। तुम गलत नहीं हो। हर इंसान चाहता है कि उसे व्यक्तिगत रूप से महत्व दिया जाए, उसका मान रखा जाए। तुमने अपने बलबूते पर जिंदगी में जो मुकाम हासिल किया है, उस पर मुझे गर्व है और तुम्हारा आत्मसम्मान होना स्वाभाविक है।”
पिता के मुंह से यह सुनकर मयंक थोड़ा सहज हुआ।
सत्यप्रकाश जी ने आगे कहा, “लेकिन मयंक, क्या तुमने कभी इस बात के दूसरे पहलू को देखने की कोशिश की? आज मैं तुम्हें कुछ बातें बताना चाहता हूं, एक पिता के रूप में नहीं, बल्कि इस परिवार की सबसे पुरानी कड़ी के रूप में।”
सत्यप्रकाश जी ने एक गहरी सांस ली और खिड़की की ओर देखते हुए कहा, “जब कोई रिश्तेदार मुझे फोन करता है और कहता है कि ‘सत्यप्रकाश भाई साहब, आपको पूरे परिवार के साथ आना है’, तो जानते हो मुझे क्या महसूस होता है? मुझे गर्व महसूस होता है कि मेरे परिवार की पहचान एक इकाई के रूप में है। हमारे समाज की यह पुरानी परंपरा कोई उपेक्षा नहीं, बल्कि सम्मान का सर्वोच्च रूप थी। जब घर के बड़े को न्योता दिया जाता है, तो इसका अर्थ यह होता है कि उस घर की नींव को नमन किया गया है। इसका मतलब यह नहीं होता कि बच्चे बेगाने हैं, बल्कि इसका मतलब यह होता है कि परिवार इतना एकजुट है कि मुखिया को कहना पूरे घर को कहने के बराबर है।”
मयंक खामोशी से सुनता रहा।
सत्यप्रकाश जी ने मयंक के कंधे पर हाथ रखा, “बेटा, आत्मसम्मान और अहंकार के बीच एक बहुत पतली लकीर होती है। जब तुम यह कहते हो कि ‘मुझे अलग से फोन क्यों नहीं किया’, तो कभी तुमने सोचा कि क्या तुमने कभी प्रतीक को बिना किसी काम के फोन करके पूछा कि भाई तुम्हारी शादी की तैयारियां कैसी चल रही हैं? क्या तुम्हें किसी मदद की जरूरत है? मौसा जी उम्रदराज हैं, प्रतीक पर शादी का पूरा बोझ है। वो खरीदारी, कैटरिंग, मेहमानों की लिस्ट में दिन-रात एक किए हुए है। वह यह सोचकर निश्चिंत था कि ‘बड़े पापा’ को बोल दिया है, तो मयंक तो मेरा अपना भाई है, वो तो आएगा ही। जो अपने होते हैं, क्या उन्हें भी औपचारिक न्योते की दरकार होती है?”
पिता के इन शब्दों ने मयंक के दिल पर एक जोरदार दस्तक दी।
सत्यप्रकाश जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, अधिकार वहीं जताया जाता है जहां अपने होते हैं। अगर प्रतीक तुम्हें औपचारिक रूप से मिन्नतें करके बुलाता, तो वो औपचारिकता होती, अपनापन नहीं। उसने यह हक समझा कि मयंक तो उसका अपना खून है, उसे किसी कार्ड या अलग फोन की क्या जरूरत? हमने जिंदगी भर रिश्तों को सींचा है मयंक। अगर मैं भी तुम्हारे दादाजी के जमाने में यह सोचता कि फूफा जी ने मुझे अलग से क्यों नहीं पूछा, तो आज यह पूरा कुनबा बिखर चुका होता। मान मांगने से नहीं मिलता बेटा, मान रिश्ते निभाने से मिलता है। तुमने सम्मान की दीवार इतनी ऊंची कर ली कि उसमें से अपनेपन की खुशबू आना ही बंद हो गई।”
सत्यप्रकाश जी की बातें मयंक के अंतरमन को झकझोर रही थीं। उसे अपनी गलती का अहसास होने लगा था। उसने पिछले कई महीनों से किसी भी चचेरे या ममेरे भाई-बहन को फोन नहीं किया था। वह हमेशा इसी इंतजार में रहता था कि सामने वाला पहले संपर्क करे। उसने रिश्तों में ‘अधिकार’ की जगह ‘अहंकार’ को जगह दे दी थी।
सत्यप्रकाश जी उठे और अपनी अलमारी से एक नया कुर्ता-पायजामा निकालकर मयंक के हाथ में रख दिया। “यह मैंने तुम्हारे लिए लिया था। सोचा था बारात में मेरा बेटा मेरे साथ चलेगा तो मेरा सीना चौड़ा हो जाएगा। बाकी फैसला तुम्हारा है। अगर तुम्हारा आत्मसम्मान तुम्हें अपने भाई की खुशियों में शामिल होने से रोकता है, तो तुम मत जाओ। मैं किसी पर दबाव नहीं बनाऊंगा।”
सत्यप्रकाश जी कमरे से बाहर चले गए। मयंक उस कुर्ते को हाथ में लिए देर तक शून्य में ताकता रहा। उसकी आंखों से पश्चाताप के दो बूंद आंसू कुर्ते पर गिर पड़े। उसे समझ आ गया कि जिसे वह ‘आत्मसम्मान’ समझ रहा था, वह दरअसल उसका अनजाना ‘अहंकार’ था। रिश्तों में जहां प्रेम और अपनापन होता है, वहां औपचारिकताओं के कोई मायने नहीं होते। प्रतीक ने उसे पराया नहीं समझा था, बल्कि इतना अपना समझा था कि औपचारिकता निभाने की जरूरत ही नहीं समझी।
मयंक ने तुरंत अपना फोन निकाला। उसने बिना किसी झिझक के प्रतीक का नंबर मिलाया। दूसरी तरफ से तीसरी घंटी पर ही फोन उठा लिया गया। पृष्ठभूमि में शादी के ढोल-नगाड़ों और शोर की आवाज आ रही थी।
“अरे मयंक भैया! प्रणाम!” प्रतीक की हांफती हुई लेकिन बेहद खुश आवाज आई। “भैया, मैं आपको याद ही कर रहा था। सच बताऊं, पिछले पंद्रह दिनों से सिर उठाने की फुर्सत नहीं मिली। अभी शेरवानी की फिटिंग के लिए आया था तो आपकी याद आई कि भैया से पूछूं कि वो कब आ रहे हैं। बड़े पापा ने बताया था कि आप लोग 12 को आ रहे हैं। भैया, मुझे स्टेशनरी और संगीत के लिए आपकी बहुत जरूरत है, प्लीज जल्दी आ जाइएगा। आपके बिना तो शादी का मजा ही नहीं आएगा।”
प्रतीक के इन सरल, निष्कपट और प्रेम भरे शब्दों को सुनकर मयंक का गला रुंध गया। वह कुछ पल बोल ही नहीं पाया। जिस भाई से वह नाराज बैठा था, वह तो उसके आने के भरोसे पर ही आधी जिम्मेदारियों से बेफिक्र था।
मयंक ने अपनी आवाज को संभालते हुए कहा, “प्रतीक… मेरे भाई! तू चिंता मत कर। मैं 12 को नहीं, 11 की रात को ही पहुंच रहा हूं। और सुन, संगीत की पूरी तैयारी मेरी जिम्मेदारी है। तू बस अपनी शादी की खुशियां मना, बाकी सब तेरा बड़ा भाई संभाल लेगा।”
फोन कटने के बाद मयंक के दिल का सारा बोझ उतर चुका था। उसने कमरे से बाहर आकर शालिनी को देखा, जो मुस्कुरा रही थी। उसने शालिनी से कहा, “पैकिंग शुरू करो शालिनी, हमें जबलपुर जाना है। हमारे अपने भाई की शादी है।”
जब 11 तारीख की रात को सत्यप्रकाश जी और मयंक जबलपुर स्टेशन पर उतरे, तो सामने मौसा जी और प्रतीक दोनों फूलमालाएं लिए खड़े थे। प्रतीक दौड़कर आया और उसने मयंक के पैर छू लिए, फिर उसे कसकर गले लगा लिया। मौसा जी ने सत्यप्रकाश जी के गले लगते हुए कहा, “भाई साहब, आपके आते ही ऐसा लगा जैसे मेरे सिर पर साक्षात भगवान का हाथ आ गया। अब मुझे कोई चिंता नहीं।”
उस शादी में मयंक ने सबसे आगे रहकर हर जिम्मेदारी संभाली। उसने बारात की अगवानी से लेकर मेहमानों के स्वागत तक का हर काम इतने उत्साह से किया कि हर कोई उसकी तारीफ कर रहा था। रिश्तेदार कह रहे थे, “सत्यप्रकाश जी का बेटा बिल्कुल उन्हीं के पदचिह्नों पर चल रहा है, कितना संस्कारी और मिलनसार है।”
उस रात संगीत के कार्यक्रम में जब मयंक ने प्रतीक के साथ मंच पर डांस किया, तो कोने में खड़े सत्यप्रकाश जी की आंखों में गर्व के आंसू थे। मयंक ने दूर से अपने पिता को देखा और हाथ जोड़कर सिर झुका दिया।
मयंक को जिंदगी का सबसे बड़ा सबक मिल चुका था। उसने जान लिया था कि परिवार में जब तक बुजुर्गों की छत्रछाया है, तब तक उनकी मान-प्रतिष्ठा ही पूरे परिवार का मान होती है। रिश्तों को अगर औपचारिकताओं और तराजुओं में तौला जाने लगे, तो वे व्यापार बन जाते हैं, परिवार नहीं। सम्मान न्योते के शब्दों में नहीं, बल्कि उन रिश्तों की गहराई में होता है जो बिना कहे समझे जाते हैं।
क्या आपने भी कभी अपने परिवार या रिश्तेदारों में ऐसा महसूस किया है कि आपको अलग से तवज्जो नहीं दी गई? क्या आपको लगता है कि अपनों के बीच औपचारिक निमंत्रण से ज्यादा अपनापन मायने रखता है? अपनी राय और अनुभव नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद