उम्मीद की सुबह

 जानकी के भीतर अचानक एक बिजली सी कौंधी। उसने आईने में अपने चेहरे को देखा। उसकी आंखों में आंसू तो थे, पर उन आंसुओं के पीछे एक नई ज्वाला जलने लगी थी। उसने महसूस किया कि लगातार समझौता करना त्याग नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के प्रति किया जाने वाला अपराध है। अत्यधिक समझौता इंसान को भीतर से पूरी तरह खोखला और बेजान बना देता है। जब तक वह दूसरों के सहारे की उम्मीद करेगी, तब तक उसे केवल निराशा और लाचारी ही मिलेगी।

ग्वालियर के पुराने मोहल्ले की संकरी गलियों में स्थित वह पैतृक मकान कभी खुशियों से सराबोर रहता था। आंगन में लगी चंपा की महक और घर के भीतर गूंजती हंसी जैसे उस परिवार की पहचान थी। अपने माता-पिता की पहली संतान के रूप में जब जानकी ने इस दुनिया में आंखें खोलीं, तो पूरे घर में उत्सव सा माहौल था। पिता प्रभाकर जी एक सीधे-सादे और जिम्मेदार क्लर्क थे और मां यशोदा ममता की जीती-जागती मूरत। दो बरस बाद जब छोटे भाई चिन्मय का जन्म हुआ, तो मानो वह छोटा सा संसार पूर्ण हो गया। एक संपन्न और शांत गृहस्थी में दोनों भाई-बहन का बचपन पंख लगाकर उड़ रहा था। जानकी हमेशा से चुलबुली, पर भीतर से बहुत संवेदनशील लड़की थी। छोटा भाई चिन्मय तो उसकी परछाई था।

पर किसे पता था कि जिंदगी के शांत समंदर में अचानक ऐसा तूफान आएगा जो खुशियों के तिनके बिखेर देगा। जानकी जब महज ग्यारह साल की थी और चिन्मय नौ वर्ष का, तब मां यशोदा की तबीयत अचानक बिगड़ने लगी। शुरुआत में लगा कि सामान्य कमजोरी है, पर धीरे-धीरे बीमारी ने विकराल रूप ले लिया। डॉक्टरों के चक्कर, दवाओं की कड़वी गंध और घर में पसरा सन्नाटा जानकी के बचपन को असमय ही बड़ा कर गया। जिस उम्र में बच्चियां गुड़ियों से खेलती हैं, उस उम्र में जानकी रसोई में चिन्मय के लिए दूध गर्म करना और मां के माथे पर ठंडी पट्टियां रखना सीख रही थी। उसने अपनी आंखों के सामने मां को तिनका-तिनका टूटते देखा। उस कठिन दौर में जानकी ने यह भी देख लिया कि जब घर पर विपत्ति आती है, तो कैसे रिश्तेदार धीरे-धीरे दूरियां बना लेते हैं और कौन वाकई अपना होता है। एक उदास शाम, मां यशोदा हमेशा के लिए आंखें मूंदकर चली गईं।

मां के जाने के बाद घर का चूल्हा तो जैसे-तैसे जलता रहा, पर घर की आत्मा चली गई थी। प्रभाकर जी दिन-रात बच्चों को संभालने में लगे रहते। वे दफ्तर भी जाते, घर आकर दोनों बच्चों के लिए खाना भी बनाते और रात-रात भर जागकर उनका होमवर्क भी देखते। वे एक पिता होकर भी मां का साया बनने की पूरी कोशिश कर रहे थे, लेकिन एक खालीपन था जो पूरे घर में पसरा रहता था। रिश्तेदारों और समाज के लोगों ने प्रभाकर जी को घेरना शुरू कर दिया। हर कोई यही सलाह देता, “बच्चे अभी बहुत छोटे हैं प्रभाकर, तुम अकेले कब तक देखोगे? घर में एक औरत का होना जरूरी है। पुनर्विवाह कर लो, बच्चों को मां मिल जाएगी।”

शुरुआत में प्रभाकर जी ने साफ मना कर दिया, लेकिन समाज के निरंतर दबाव और बच्चों के भविष्य की चिंता के चलते वे अंततः मान गए। शादी हुई और घर में नई मां, शैलजा का आगमन हुआ। शैलजा अपने साथ अपने पहले पति से हुए दो बड़े बेटों को भी लेकर आई थीं। वे दोनों लड़के जानकी और चिन्मय से उम्र में बड़े थे। जानकी और चिन्मय ने सोचा था कि शायद अब उन्हें दोबारा मां का आंचल मिल जाएगा, पर यह उम्मीद पहले ही हफ्ते में चकनाचूर हो गई। शैलजा का रवैया दोनों बच्चों के प्रति बेहद रूखा और उपेक्षापूर्ण था। घर में जो भी अच्छी चीज बनती या आती, उस पर पहले उनके अपने बेटों का हक होता। बात यहीं तक सीमित नहीं रही, कुछ ही महीनों में शैलजा प्रभाकर जी पर दबाव बनाने लगीं कि इन दोनों छोटे बच्चों को इनके मामा के घर भेज दिया जाए ताकि घर का खर्च कम हो और उनके बेटों के लिए जगह बने।

लेकिन प्रभाकर जी कमजोर पिता नहीं थे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कह दिया, “ये मेरे बच्चे हैं, मेरी सांसें हैं। इन्हें अपनी चौखट से दूर करने से पहले मेरी जान जाएगी।” जब उन्होंने देखा कि रोज-रोज के झगड़ों से जानकी और चिन्मय का मासूम मन आहत हो रहा है, तो प्रभाकर जी ने एक अत्यंत कड़ा और अप्रत्याशित निर्णय लिया। उन्होंने अपनी बचत से शहर के दूसरे छोर पर एक छोटा सा मकान किराए पर लिया और शैलजा तथा उनके बेटों को पूरा खर्च देकर वहां रहने का प्रबंध कर दिया। वे खुद जानकी और चिन्मय के साथ अपने पुराने घर में ही रहे।

अब प्रभाकर जी ही जानकी और चिन्मय के सब कुछ थे। दिन बीतते गए। चिन्मय बड़ा होकर एक होनहार इंजीनियर बन गया और एक अच्छी बहुराष्ट्रीय कंपनी में उसकी नौकरी लग गई। प्रभाकर जी की उम्र भी ढलने लगी थी। अब घर में जानकी के विवाह की चिंताएं सिर उठाने लगी थीं। जानकी का स्वभाव शांत, सेवाभावी और गृहकार्य में अत्यंत निपुण था, लेकिन किशोरावस्था से ही उसका शरीर कुछ भारी और वजन अधिक था। उस समय के समाज में एक लड़की की योग्यता उसके संस्कारों और बुद्धि से ज्यादा उसके शारीरिक बनावट से तौली जाती थी।

रिश्ते तो बहुत आते, पर लड़के वाले जानकी को देखकर मुंह बना लेते या फिर सीधे-साधे कह देते कि लड़की का वजन बहुत ज्यादा है। हर बार जब कोई रिश्ता टूटता, तो जानकी का आत्मसम्मान भीतर तक तिलमिला उठता। पिता की आंखों में बढ़ती चिंता और भाई के चेहरे पर छाई उदासी जानकी से देखी नहीं जाती थी। चिन्मय भी अब विवाह योग्य हो रहा था और वह अपनी दीदी के हाथ पीले हुए बिना अपनी शादी के बारे में सोचना भी नहीं चाहता था। जानकी को लगा कि अगर उसने अब कदम नहीं उठाया, तो उसके कारण उसके भाई का जीवन भी ठहर जाएगा।

तभी इंदौर के एक परिवार से जानकी के लिए रिश्ता आया। लड़का, सुमित, एक छोटे से निजी दफ्तर में काम करता था। स्वभाव से बेहद खामोश, उदासीन और देखने में भी ऐसा जिसके साथ जानकी का कोई मानसिक सामंजस्य नहीं बैठता था। जब जानकी से उसकी राय पूछी गई, तो उसका मन भीतर से चीख उठा कि यह रिश्ता उसके लिए सही नहीं है। लेकिन चारों तरफ से समाज और रिश्तेदारों का दबाव था, “उम्र निकली जा रही है, शरीर भी ऐसा है, अब जो मिल रहा है उसी में हां कर दो। ज्यादा नखरे करोगी तो कुंवारी बैठी रहोगी और छोटे भाई की शादी भी रुकेगी।”

जानकी ने अपने सपनों, अपनी पसंद और अपनी आत्मा का गला घोंट दिया। उसने केवल अपने पिता की ढलती उम्र और भाई के भविष्य के लिए सिर झुका दिया और कह दिया, “जैसी आप सबकी मर्जी।” यह उसकी जिंदगी का पहला सबसे बड़ा और घातक समझौता था।

जानकी की विदाई के एक साल बाद, चिन्मय का विवाह एक मध्यमवर्गीय परिवार की लड़की, वंदना से तय हुआ। प्रभाकर जी और चिन्मय ने अपनी अच्छी कमाई और समाज में प्रतिष्ठा के अनुरूप विवाह में दिल खोलकर खर्च किया। पूरे धूमधाम से बारात गई और वंदना का गृह प्रवेश हुआ। जानकी बहुत खुश थी कि अब उसका प्यारा भाई एक सुखी दांपत्य जीवन जिएगा। दोनों ने बिना मां के जो अभाव झेला था, जानकी को लगता था कि अब चिन्मय के जीवन में वह कमी पूरी हो जाएगी।

लेकिन नियति के पास इस परिवार के लिए कुछ और ही योजनाएं थीं। शादी के कुछ ही हफ्तों के भीतर वंदना का असली स्वभाव सामने आने लगा। वह अत्यंत महत्वाकांक्षी, आत्मकेंद्रित और एकाकी स्वभाव की थी। उसे ससुराल का कोई भी रिश्ता पसंद नहीं था। बुजुर्ग ससुर की सेवा करना तो दूर, उसने उनसे सीधे मुंह बात करना भी बंद कर दिया। धीरे-धीरे उसने चिन्मय के कान भरने शुरू कर दिए। वह बात-बात पर मायके जाने और कानूनी कार्रवाई की धमकियां देने लगी। चिन्मय, जो स्वभाव से बहुत सीधा और शांतिप्रिय था, रोज-रोज के क्लेश से डरने लगा। उसने अपनी वैवाहिक शांति की खातिर वंदना की हर गलत बात के आगे घुटने टेकने शुरू कर दिए। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि वंदना ने चिन्मय को जानकी से किसी भी प्रकार का संपर्क रखने से सख्त मना कर दिया।

जानकी जब कभी त्योहारों पर भाई को फोन करती, तो चिन्मय दबी जुबान में बात करता या फिर फोन काट देता। जानकी समझ गई थी कि उसका भाई वंदना के दबाव में घुट रहा है। जिस बहन ने मां बनकर भाई को उंगली पकड़कर चलना सिखाया था, आज वही भाई एक अजनबी की तरह हो गया था। पर जानकी ने कभी कोई शिकायत नहीं की। वह सोचती, “मेरा भाई अपने परिवार के साथ रहे, बस खुश रहे। हमने बचपन में बहुत दुख देखे हैं, अब अगर वह समझौता करके भी सुखी है, तो मैं दूर से ही उसकी सलामती की दुआ करूंगी।”

पर जानकी की अपनी जिंदगी भी किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं थी। सुमित का व्यवहार जानकी के प्रति हमेशा उदासीन रहा। वे दोनों एक छत के नीचे दो अजनबियों की तरह रहते थे। शादी के कुछ वर्षों बाद उनके दो बच्चे हुए—एक बेटा अनिकेत और एक बेटी स्नेहा। जानकी ने अपना पूरा अस्तित्व उन बच्चों की परवरिश में झोंक दिया। वह अपने आंसुओं को पीकर दिन-रात पति और बच्चों की सेवा करती रही।

लेकिन दुखों का पहाड़ अभी टूटना बाकी था। अचानक सुमित की तबीयत खराब रहने लगी। जांच में पता चला कि उनके गुर्दे पूरी तरह खराब हो चुके हैं। जानकी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसने अपने सारे जेवर, बची-खुची बचत सब सुमित के इलाज में लगा दी। वह अकेले दिन-रात अस्पताल के गलियारों में दौड़ती रही। न तो मायके से कोई सहारा था और न ही ससुराल के दूर के रिश्तेदार आगे आए। जानकी ने अनथक प्रयास किए, पर एक मनहूस रात डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा, “माफ कीजिएगा, हम आपके पति को नहीं बचा सके।”

उस पल जानकी के ऊपर मानो आकाश ही फट पड़ा। उसके सामने उसका उजड़ा हुआ संसार था और पीछे खड़े थे दस और सात साल के दो अबोध बच्चे, जो अपने पिता के पार्थिव शरीर को देखकर सहमे हुए थे। जानकी के पास रोने के लिए भी कोई कंधा नहीं था। जब सुमित का अंतिम संस्कार होना था, तब जानकी ने भारी मन से चिन्मय को खबर भिजवाई। पिता प्रभाकर जी अब अस्सी वर्ष के हो चुके थे और पक्षाघात के कारण बिस्तर से उठने में भी असमर्थ थे। चिन्मय आया, पर उसकी आंखों में अपने बहनोई के जाने के दुख से ज्यादा अपनी पत्नी वंदना का खौफ साफ नजर आ रहा था। वह श्मशान घाट पर आया, उसने अंतिम विदाई दी और अपनी रोती-बिलखती बहन के सिर पर हाथ रखकर ढांढस बंधाने का साहस भी नहीं जुटा पाया। वह श्मशान से ही चुपचाप गाड़ी में बैठकर निकल गया ताकि घर पर कोई नया बखेड़ा न खड़ा हो।

उस श्मशान की ठंडी राख के सामने खड़े होकर जानकी को ऐसा लगा जैसे वह इस दुनिया में बिल्कुल अकेली है। उसके पास एक संपन्न भाई था, जिसके पास गाड़ी, बंगला, धन-दौलत सब कुछ था, लेकिन अपनी सगी बहन के आंसुओं को पोंछने की हिम्मत नहीं थी। चिन्मय आज भी जब कभी शहर में किसी चौराहे पर जानकी को दिख जाता, तो वह नजरें चुरा लेता था। वह अपनी मजबूरी के पिंजरे में ऐसा कैद था कि सुकून के लिए तरसता था, पर खुलकर अपनी बहन से बात भी नहीं कर सकता था। जानकी यह सब देखकर भी चुप रही। उसने सोचा, “अगर मैं अपनी बेबसी का रोना रोऊंगी, तो भाई के घर में आग लगेगी। वह जैसा भी है, अपने परिवार के साथ है।”

लेकिन उस श्मशान की तपती दोपहर में, अपने दोनों अनाथ बच्चों का हाथ थामे जब जानकी अपने सूने घर लौटी, तो कमरे के सन्नाटे ने उससे सवाल पूछा। दीवार पर लगी घड़ी की टिक-टिक जैसे उसके भीतर गूंज रही थी: “क्या यही जीवन है? क्या पूरी जिंदगी केवल समझौतों की बलि चढ़ाने के लिए मिली थी? बचपन में मां खोने का समझौता, फिर सौतेली मां की उपेक्षा सहने का समझौता, फिर बिना पसंद के बेमेल शादी करने का समझौता, फिर भाई की बेरुखी देखकर चुप रहने का समझौता… और अब इस लाचारी में घुट-घुट कर जीने का समझौता?”

जानकी के भीतर अचानक एक बिजली सी कौंधी। उसने आईने में अपने चेहरे को देखा। उसकी आंखों में आंसू तो थे, पर उन आंसुओं के पीछे एक नई ज्वाला जलने लगी थी। उसने महसूस किया कि लगातार समझौता करना त्याग नहीं, बल्कि अपनी आत्मा के प्रति किया जाने वाला अपराध है। अत्यधिक समझौता इंसान को भीतर से पूरी तरह खोखला और बेजान बना देता है। जब तक वह दूसरों के सहारे की उम्मीद करेगी, तब तक उसे केवल निराशा और लाचारी ही मिलेगी।

उसने मुड़कर देखा, उसके दोनों बच्चे भूख और डर से दुबके हुए बैठे थे। जानकी ने अपने आंसुओं को अपनी हथेलियों से पोंछा। उसने अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा किया। उसके भीतर की अबला स्त्री उस पल मर गई और एक आत्मनिर्भर, साहसी मां का जन्म हुआ। उसने तय कर लिया कि अब वह किसी के सामने हाथ नहीं फैलाएगी, न मायके की तरफ देखेगी और न ही अपनी किस्मत को कोसेगी। वह अपने दम पर खड़ी होगी और अपने बच्चों को एक स्वाभिमानी जीवन देगी।

जानकी के पास गृह विज्ञान की डिग्री थी और उसका हाथ पारंपरिक पकवान, मसाले और अचार बनाने में बहुत कुशल था। अगले ही दिन से उसने अपनी बची हुई अंतिम पूंजी से घर पर ही शुद्ध और स्वादिष्ट नाश्ते और घर का बना टिफिन तैयार करने का काम शुरू किया। शुरुआत बहुत कठिन थी। पड़ोसियों ने बातें बनाईं, रिश्तेदारों ने पीठ पीछे ताने मारे कि ‘विधवा होते ही धंधा शुरू कर दिया।’ पर जानकी ने अपने कान बंद कर लिए। वह सुबह चार बजे उठती, बच्चों को तैयार करके स्कूल भेजती, फिर घंटों चूल्हे के सामने पसीना बहाकर साफ-सुथरा भोजन तैयार करती। उसने स्थानीय दफ्तरों, बैंकों और कोचिंग संस्थानों में जाकर खुद बात की और टिफिन पहुंचाना शुरू किया।

उसका स्वाद, शुद्धता और ईमानदारी जल्द ही रंग लाने लगी। लोगों को उसका खाना पसंद आने लगा। छह महीने के भीतर ही टिफिन की मांग इतनी बढ़ गई कि जानकी ने अपने साथ मोहल्ले की दो जरूरतमंद और बेसहारा महिलाओं को भी काम पर रख लिया। धीरे-धीरे उसने ‘अन्नपूर्णा गृह उद्योग’ नाम से एक छोटा सा स्वयं सहायता समूह पंजीकृत कराया। उसने जैविक मसालों और पारंपरिक आचारों का उत्पादन भी शुरू किया।

तीन वर्ष बीत गए। जानकी की मेहनत और लगन ने चमत्कार कर दिखाया था। उसका छोटा सा टिफिन सेवा का काम अब शहर के एक जाने-माने कैटरिंग और फूड ब्रांड में बदल चुका था। उसने अपने दम पर एक छोटा मगर खूबसूरत मकान खरीद लिया था। अनिकेत अब एक अच्छे स्कूल में पढ़ाई के साथ-साथ राज्य स्तर पर तैराकी में मेडल जीत रहा था और स्नेहा अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आती थी। जानकी के चेहरे पर अब समझौतों की लाचारी वाली शिकन नहीं थी, बल्कि आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का एक ऐसा तेज था जिसे देखकर लोग अब उसका आदर करते थे।

एक दिन, जब जानकी अपने नए केंद्र के उद्घाटन की तैयारी कर रही थी, तभी दरवाजे पर एक साया आकर रुका। जानकी ने सिर उठाकर देखा। सामने चिन्मय खड़ा था। उसके बाल असमय सफेद हो चुके थे, आंखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और चेहरा किसी हारे हुए इंसान की तरह मुरझाया हुआ था। वह अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था, बस चौखट पर खड़ा होकर अपनी उस बहन को देख रहा था जिसे उसने श्मशान में बेसहारा छोड़ दिया था।

जानकी आगे बढ़ी। उसके मन में न कोई नफरत थी, न कोई कड़वाहट। उसने शांत स्वर में कहा, “अंदर आओ चिन्मय।”

चिन्मय की आंखों से आंसू बह निकले। वह जानकी के पैरों में झुकने लगा, पर जानकी ने उसे थाम लिया। चिन्मय फफक-फफक कर रो पड़ा, “दीदी, मुझे माफ कर दो। मैं एक कायर भाई निकला। मैंने अपनी जिंदगी को बचाने के लिए तुम्हें और पिताजी को छोड़ दिया। पर आज मेरे पास सब कुछ होकर भी कुछ नहीं है। वंदना की मांगें कभी खत्म नहीं हुईं, घर में रोज का नरक है। मैं हर दिन घुटता हूं। पर आज जब मैंने शहर में तुम्हारे स्वाभिमान और सफलता की चर्चा सुनी, तो मैं खुद को रोक नहीं पाया। मुझे लगा था कि तुम टूट चुकी होगी, पर तुमने साबित कर दिया कि तुम मां यशोदा की सच्ची बेटी हो।”

जानकी ने अपने भाई के कंधे पर हाथ रखा और बेहद गरिमा और प्रेम से कहा, “चिन्मय, मैंने तुम्हें कभी दोषी नहीं माना। मैंने उस दिन समझ लिया था कि हर इंसान अपनी लड़ाई खुद लड़ता है। अगर उस दिन तुम मुझे सहारा दे देते, तो शायद मैं आज भी किसी पर निर्भर होती और समझौतों के बोझ तले दबकर मर जाती। तुम्हारी मजबूरी ने मुझे मेरी असली ताकत से मिलवाया। मैं खुश हूं कि मैंने समझौता करना छोड़ दिया और संघर्ष का रास्ता चुना। तुम मेरे भाई हो और हमेशा रहोगे, पर याद रखना, किसी भी रिश्ते को बचाने के लिए इतना मत झुको कि तुम्हारी अपनी रीढ़ ही टूट जाए।”

चिन्मय ने सिर झुका लिया। उसे अपनी बहन में आज केवल एक बड़ी बहन नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा नजर आ रही थी। जानकी ने उसे मिठाई खिलाई और दोनों बच्चों से मिलवाया। उस दिन शाम को जब चिन्मय विदा हुआ, तो जानकी ने चंपा के पेड़ को देखा। हवा में वही पुरानी खुशबू थी, लेकिन इस बार वह खुशबू किसी के दिए हुए उपहार की नहीं थी, बल्कि उसके अपने संघर्षों से महकते स्वाभिमान की थी। जानकी ने साबित कर दिया था कि औरत समझौते की मूरत हो सकती है, पर जब वह अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ी होती है, तो वह अपने भाग्य की विधाता खुद बन जाती है।

जीवन में समझौते करना रिश्तों को बचा सकता है, लेकिन क्या इतना झुक जाना सही है कि इंसान का अपना वजूद ही खत्म हो जाए? क्या हर स्त्री को विषम परिस्थितियों में किसी सहारे की तलाश करने के बजाय अपनी क्षमताओं पर विश्वास करके आगे नहीं बढ़ना चाहिए? इस संवेदनशील मुद्दे पर आपकी क्या राय है? अपनी राय हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर लिखकर बताएं।

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