रिश्तों के बंद दरवाज़े 

सावित्री देवी के झुर्रियों वाले हाथों में एक अजीब सी फुर्ती थी। पिछले पंद्रह दिनों से उनके पैरों में जैसे पहिए लगे हुए थे। मौका ही कुछ ऐसा था—उनकी सगी छोटी बहन सुमित्रा के इकलौते पोते, रोहन की शादी थी। शादी जयपुर के एक बड़े और आलीशान रिसॉर्ट में तय हुई थी, जिसे आजकल के बच्चे ‘डेस्टिनेशन वेडिंग’ कहते हैं। सावित्री देवी ने अपने सूटकेस में अपनी सबसे अच्छी बनारसी साड़ियां सहेज कर रख ली थीं। साड़ियों के साथ-साथ उनके बैग में घर के बने बेसन के लड्डू, मठरी और आम का अचार भी था। उन्हें याद था कि सुमित्रा को उनके हाथ की मठरियां कितनी पसंद थीं। पैंसठ साल की सावित्री देवी के मन में एक ही तस्वीर घूम रही थी—सारे भाई-बहन, बुआ, मौसी, चाचा-ताऊ सालों बाद एक छत के नीचे होंगे। खूब गपशप होगी, रात-रात भर जगकर ढोलक की थाप पर बन्ना-बन्नी के गीत गाए जाएंगे, एक ही बड़े से कमरे में फर्श पर गद्दे बिछाकर सब साथ सोएंगे और सुबह-सुबह चाय की चुस्कियों के साथ पुरानी यादें ताज़ा की जाएंगी। यही तो होता था शादियों में, जहाँ मीलों दूर रहने वाले रिश्तेदार भी एक धागे में बंध जाते थे।

जब सावित्री देवी अपने बेटे और बहू के साथ जयपुर के उस फाइव-स्टार रिसॉर्ट में पहुँचीं, तो वहाँ का नजारा किसी फिल्मी सेट से कम नहीं था। रिसॉर्ट के मुख्य द्वार पर राजस्थानी साफा पहने कुछ अनजान लोग खड़े थे जो हर मेहमान का स्वागत फूलों की बारिश और ड्रिंक्स के साथ कर रहे थे। सावित्री देवी की आँखें दरवाजे पर सुमित्रा या परिवार के किसी सदस्य को खोज रही थीं। पुराने समय में तो दरवाजे पर बहनें और भाभियां खड़ी होती थीं जो गले मिलकर, रोकर या हँसकर स्वागत करती थीं। यहाँ सब कुछ बहुत भव्य था, पर बहुत मशीनी। रिसेप्शन पर उनके बेटे ने कार्ड दिखाया और होटल के एक कर्मचारी ने उन्हें उनके कमरे तक छोड़ दिया—कमरा नंबर 304। कमरा बेहद आलीशान था, मखमली बिस्तर, बड़ी सी टीवी और कांच की खिड़कियों से दिखता शानदार नज़ारा। लेकिन सावित्री देवी का मन वहाँ नहीं लगा। उन्होंने अपना बैग रखा और बहू से कहा, “मैं जरा सुमित्रा और बाकी लोगों से मिल आती हूँ। पता नहीं कहाँ हैं सब, कोई दिखा ही नहीं।”

तभी उनके बेटे ने मोबाइल देखते हुए कहा, “माँ, अभी कोई नहीं मिलेगा। वॉट्सऐप ग्रुप पर मैसेज आया है कि सब लोग अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे हैं। शाम को चार बजे ‘पूल साइड’ पर मेहंदी का फंक्शन है, तब वहीं सबसे मुलाकात होगी। आप भी तब तक सो जाइए।” सावित्री देवी को यह सुनकर बड़ा अजीब लगा। शादी वाले घर में आराम? और वो भी दिन के उजाले में? उनके जमाने में तो शादी वाले घर में महीनों पहले से नींद हराम हो जाती थी। काम इतना होता था कि कोई बैठ ही नहीं पाता था। लेकिन यहाँ तो कोई काम था ही नहीं। सब कुछ ‘इवेंट मैनेजर’ नाम के किसी आदमी और उसकी टीम के हवाले था।

शाम को जब सावित्री देवी मेहंदी के कार्यक्रम में पहुँचीं, तो वहाँ का नजारा देखकर वह ठगी सी रह गईं। चारों तरफ हरे और पीले रंग की भव्य सजावट थी। हर कोई डिज़ाइनर कपड़ों में सजा-धजा था। सुमित्रा भी दूर एक सोफे पर बैठी थी, जिसके आस-पास मेकअप आर्टिस्ट खड़े थे। सावित्री देवी खुशी से सुमित्रा की तरफ बढ़ीं और उसे गले लगाना चाहा। सुमित्रा मुस्कुराई जरूर, पर झट से बोली, “अरे जीजी, आराम से! अभी-अभी मेकअप सेट हुआ है, खराब हो जाएगा। तुम बताओ, सफर कैसा रहा?” सावित्री देवी के हाथ वहीं ठिठक गए। जिस बहन से वह पाँच साल बाद मिल रही थीं, उसके लिए गले मिलने से ज्यादा अपना मेकअप अहम था। सावित्री देवी ने अपना मन मसोस कर कहा, “मैं तो ठीक हूँ। सोचा था बैठकर खूब बातें करेंगे।” सुमित्रा ने एक लंबी सांस ली और बोली, “कहाँ जीजी! ये बच्चे तो साँस भी नहीं लेने देते। अभी ये इवेंट है, इसके बाद संगीत की रिहर्सल है। आप बैठो, मैं फोटोग्राफर को पोज दे दूँ जरा।”

वहाँ एक बड़ा सा स्टेज बना था जहाँ एक डीजे बहुत तेज आवाज में गाने बजा रहा था। कान फाड़ देने वाले उस संगीत में दो लोग आपस में बात भी नहीं कर पा रहे थे। सावित्री देवी ने अपनी चचेरी बहनों और भाभियों को देखा। सब मौजूद थीं, पर सबके हाथ में मोबाइल थे। कोई सेल्फी ले रहा था तो कोई वीडियो बना रहा था। जब सावित्री देवी ने पास जाकर पुरानी बातें छेड़नी चाहीं, तो तेज आवाज के कारण किसी को कुछ सुनाई नहीं दिया। सबने बस मुस्कुराकर सिर हिला दिया और फिर से अपने-अपने कमरों की तरफ चले गए, क्योंकि अगले फंक्शन के लिए कपड़े जो बदलने थे।

रात को संगीत का कार्यक्रम था। सावित्री देवी को लगा कि शायद अब ढोलक निकलेगी, घर की औरतें इकट्ठी होंगी और लोकगीत गाए जाएंगे। लेकिन वहाँ तो जैसे कोई अवार्ड शो चल रहा था। एक एंकर माइक पर चीख-चीख कर सबको बुला रहा था और परिवार के लोग ऐसे नाच रहे थे जैसे उन्होंने महीनों किसी डांस टीचर से ट्रेनिंग ली हो। कोई भी अपने मन से, खुशी से नहीं नाच रहा था, सब बस रटे-रटाए स्टेप्स कर रहे थे ताकि वीडियो अच्छा बने। सावित्री देवी चुपचाप एक कोने में बैठी यह सब देखती रहीं। उनके अंदर का वो उत्साह, जो वो घर से लेकर चली थीं, अब धीरे-धीरे बुझने लगा था।

सबसे ज्यादा पीड़ा उन्हें इस बात की हो रही थी कि किसी के पास किसी के लिए समय नहीं था। शादी के इस तीन दिन के ‘पैकेज’ में सब कुछ टाइमटेबल के हिसाब से चल रहा था। नाश्ता सुबह 8 से 10, लंच 1 से 3, और इवेंट्स का अपना समय। जैसे ही कोई कार्यक्रम खत्म होता, सब लोग अपने-अपने कमरों में गायब हो जाते। इस ‘प्राइवेसी’ के नाम पर हर परिवार एक अलग डिब्बे में बंद था। कोई किसी के कमरे में नहीं जाता था। सावित्री देवी को वो पुराने दिन याद आने लगे जब घर का सबसे बड़ा कमरा सब मेहमानों के लिए खोल दिया जाता था। पच्चीस-तीस लोग एक साथ सोते थे। रज़ाई छिनने पर झगड़े होते थे, आधी रात को उठकर चाय बनती थी, बुआ और मौसियों की पुरानी कहानियाँ और भूत-प्रेत के किस्से सुनकर बच्चे डरा करते थे। उसमें जो आत्मीयता थी, जो प्यार था, वो इस फाइव-स्टार रिसॉर्ट के बंद दरवाजों के पीछे कहीं घुट कर रह गया था। यहाँ तो सगे भाई-बहन भी एक-दूसरे के कमरे में जाने से पहले फोन करके पूछते थे, “फ्री हो? आ जाएं क्या?”

शादी की मुख्य रात भी कुछ ऐसी ही रही। न कोई मंडप की पारंपरिक सजावट थी और न ही पंडित जी के मंत्रों में वो शांति। सब कुछ बस कैमरों के लिए हो रहा था। जयमाला के वक्त आसमान से फूल गिरे और पीछे से आतिशबाज़ी हुई। देखने में सब कुछ किसी परीकथा जैसा लग रहा था, लेकिन उसमें वो असली गर्माहट गायब थी जो घर के आंगन में होने वाली शादियों में होती है। खाने के नाम पर दुनिया भर के व्यंजन थे—चाइनीज, इटैलियन, मैक्सिकन। पर सावित्री देवी का मन उस पूड़ी, कद्दू की सब्जी और हलवाई की ताज़ा बनी जलेबियों को तरस रहा था, जिसमें घर के बड़े-बुजुर्गों का स्वाद और मनुहार शामिल होती थी। यहाँ तो वेटर प्लेट थमा रहे थे और लोग खड़े-खड़े बस खाना निगल रहे थे।

विदाई के वक्त भी कोई खास रोना-धोना नहीं हुआ। सब अपनी-अपनी गाड़ियों की चाबियां खोज रहे थे और वापसी की फ्लाइट का समय चेक कर रहे थे। सावित्री देवी अपने सूटकेस में रखा वो मठरी और लड्डुओं का डिब्बा वापस बाँध रही थीं। उन्होंने सुमित्रा को देना चाहा था, लेकिन सुमित्रा की बहू ने यह कहकर मना कर दिया था कि “मासी जी, आजकल बच्चे डाइट पर रहते हैं, इतना घी-तेल कोई नहीं खाता। आप ले जाइए, रास्ते में काम आएगा।” वो डिब्बा सिर्फ एक खाने की चीज़ नहीं थी, उसमें सावित्री देवी का प्यार, उनकी मेहनत और उनके हिस्से की वो यादें थीं जिन्हें कोई लेना ही नहीं चाहता था।

जब सावित्री देवी रिसॉर्ट से बाहर निकलकर वापस घर जाने के लिए टैक्सी में बैठीं, तो उन्होंने एक बार पलट कर उस आलीशान इमारत को देखा। शादी बहुत शानदार हुई थी, लाखों-करोड़ों रुपये पानी की तरह बहाए गए थे, तस्वीरें भी मैगज़ीन में छपने लायक आई होंगी। लेकिन सावित्री देवी के हिस्से में कोई यादगार पल नहीं आया था। वो जिस परिवार से मिलने, उनके साथ हँसने-रोने और यादें बनाने आई थीं, वो परिवार तो उन आलीशान कमरों के बंद दरवाजों और मोबाइल की स्क्रीन्स के पीछे ही कहीं छुप गया था। दिखावे के इस भव्य मंच पर, ‘शादी’ नाम का नाटक तो बहुत खूब खेला गया, लेकिन ‘रिश्तों’ का वो पुराना और सच्चा त्यौहार हमेशा के लिए कहीं पीछे छूट गया था।

क्या आपने भी कभी ऐसी किसी शादी में शिरकत की है जहाँ सजावट और दिखावा तो बहुत था, लेकिन अपनों का प्यार और अपनापन कहीं खो गया था? अपने अनुभव कमेंट में जरूर शेयर करें।

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