शहर के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार सेठ रघुनाथ दास की हवेली में आज सुबह से जो शहनाइयाँ गूँज रही थीं, वे अब हृदय विदारक चीखों में तब्दील हो चुकी थीं। पूरा घर सफेद चादरों से ढँक गया था और हवेली के विशाल प्रांगण में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा था, जिसे केवल औरतों के रोने की आवाज़ें ही चीर रही थीं। कुछ ही घंटों में सेठ रघुनाथ के इकलौते और लाडले बेटे रोहन की सगाई होने वाली थी। पूरे शहर के नामी-गिरामी लोग इस जश्न में शामिल होने के लिए बुलाये गए थे। फूलों की सजावट अभी भी दीवारों पर ताज़ा थी, लेकिन जिस घर में डोली आने की तैयारियाँ हो रही थीं, वहाँ से अब अर्थी उठने वाली थी।
रोहन, जो विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त करके लौटा था, अपनी सगाई का सूट लेने शहर की तरफ निकला था, लेकिन उसकी कार एक भयानक हादसे का शिकार हो गई। अस्पताल पहुँचने से पहले ही उसने दम तोड़ दिया।
हवेली के बाहर और भीतर सांत्वना देने वालों की भीड़ लगी थी। जो भी आता, बस यही कहता कि विधाता का यह कैसा कठोर न्याय है।
“हे भगवान! ऐसा कहर तो दुश्मनों पर भी न टूटे। सेठ रघुनाथ जी कितने पुण्यात्मा इंसान हैं। हर साल गरीबों की बेटियों की शादी करवाते हैं, शहर के सबसे बड़े अनाथालय का पूरा खर्च उठाते हैं। उनका बेटा रोहन तो साक्षात श्रवण कुमार था। उस हीरे जैसे बच्चे के साथ ईश्वर ने ऐसा क्यों किया?” भीड़ में बैठे एक बुजुर्ग ने लंबी आह भरते हुए कहा।
उनके पास बैठे दूसरे सज्जन ने सहमति में सिर हिलाते हुए कहा, “बिल्कुल सही कह रहे हैं आप। रघुनाथ जी का तो किसी ने कभी एक पैसे का बुरा नहीं किया होगा। ऐसे धर्म-कर्म वाले इंसान के इकलौते चिराग को बुझाकर ऊपरवाले ने साबित कर दिया कि अच्छे लोगों की ही परीक्षा सबसे कठिन होती है। देखिए तो ज़रा, बेटे के गम में रघुनाथ जी की क्या हालत हो गई है, जैसे उनके शरीर से प्राण ही निकल गए हों। पथराई हुई आँखों से बस ज़मीन को ताक रहे हैं।”
बाहर बैठे लोग रघुनाथ दास की शराफत, उनके धर्म-कर्म और उनके ऊपर टूटे इस अनुचित प्राकृतिक न्याय पर चर्चा कर रहे थे। लेकिन अंदर, हवेली के एक बड़े से कमरे में, जहाँ रोहन का पार्थिव शरीर रखा था, रघुनाथ की मनःस्थिति कुछ और ही थी।
बाहर वालों को लग रहा था कि एक पिता अपने जवान बेटे की मौत के सदमे से सुन्न पड़ गया है, लेकिन रघुनाथ का सुन्नपन केवल दुख का नहीं था; वह एक ऐसे खौफ और आत्मग्लानि का था, जिसने अठाईस साल बाद उसके सीने को फाड़कर बाहर आने का रास्ता खोज लिया था।
रघुनाथ की आँखें रोहन के शांत चेहरे पर टिकी थीं, लेकिन उसके दिमाग के पर्दे पर कोई और ही दृश्य चल रहा था। लोगों की सांत्वना के शब्द उसके कानों तक पहुँच ही नहीं रहे थे। उसके कानों में तो बस एक ही आवाज़ गूँज रही थी—एक बूढ़े, बेबस पिता की वो चीख, जो अठाईस साल पहले इसी हवेली के दरवाज़े पर गूँजी थी।
जवानी का नशा, पैसे की हवस और सत्ता का अहंकार इंसान को अंधा कर देता है। अठाईस साल पहले रघुनाथ दास ऐसा ही अंधा और क्रूर इंसान था। उसे शहर के बाहरी इलाके में अपना एक नया कारखाना लगाना था, जिसके लिए उसे एक ज़मीन के टुकड़े की सख्त ज़रूरत थी। वह ज़मीन एक गरीब और ईमानदार किसान, माधवराम की थी। माधवराम का उस ज़मीन के अलावा और कोई सहारा नहीं था। उसका एक अठारह साल का बेटा था, बिरजू, जो पढ़ने में बहुत होशियार था और शहर के कॉलेज में पढ़ता था। माधवराम का सपना था कि उसका बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा और उनकी गरीबी दूर करेगा।
रघुनाथ ने माधवराम को मुँहमांगी कीमत देनी चाही, लेकिन उस ज़मीन से माधवराम की पुश्तैनी यादें जुड़ी थीं। उसने साफ इंकार कर दिया। अहंकार में चूर रघुनाथ को यह बर्दाश्त नहीं हुआ कि एक दो कौड़ी का किसान उसकी मर्जी के खिलाफ खड़ा हो। उसने अपने रसूख, पुलिस और गुंडों का इस्तेमाल किया। जब डराने-धमकाने से बात नहीं बनी, तो रघुनाथ ने एक खौफनाक साजिश रची।
उसने शहर के एक बड़े चोरी और हत्या के झूठे मामले में माधवराम के बेटे बिरजू को फँसवा दिया। पुलिस रघुनाथ की जेब में थी। बिरजू को रातों-रात घर से उठा लिया गया। पुलिस स्टेशन में उस मासूम लड़के को थर्ड डिग्री टॉर्चर दिया गया। रघुनाथ ने माधवराम के सामने शर्त रखी कि अगर वह ज़मीन के कागज़ात पर अंगूठा लगा दे, तो वह बिरजू को छुड़वा लेगा।
बेबस पिता ने अपने बेटे की जान बचाने के लिए ज़मीन रघुनाथ के नाम कर दी। लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंज़ूर था। पुलिस की अमानवीय यातनाओं और झूठे कलंक की शर्मिंदगी को बिरजू बर्दाश्त नहीं कर पाया। जिस रात माधवराम ज़मीन के कागज़ सौंपकर सुबह अपने बेटे को घर ले जाने की आस में बैठा था, उसी रात लॉकअप में बिरजू ने अपनी शर्ट का फंदा बनाकर फाँसी लगा ली।
जब यह खबर माधवराम को मिली, तो वह टूट गया। जिस बेटे के लिए उसने अपनी पुश्तैनी ज़मीन लुटा दी, वही बेटा दुनिया छोड़ गया। पुलिस ने मामले को रफा-दफा कर दिया और रघुनाथ के खिलाफ कोई सबूत नहीं मिला। शहर के बड़े-बड़े लोगों ने रघुनाथ की तरफदारी की।
अंतिम संस्कार के बाद, माधवराम अपने बेटे की अस्थियों की मटकी सीने से लगाए, नंगे पैर, फटे हाल में इसी हवेली के दरवाज़े पर आया था। रघुनाथ उस दिन अपने नए कारखाने का जश्न मना रहा था। रघुनाथ के गार्ड्स ने माधवराम को धक्के मारकर बाहर निकालना चाहा, लेकिन उस दिन उस बूढ़े पिता की आँखों में जो ज्वाला थी, उसे देखकर गार्ड भी एक पल के लिए पीछे हट गए थे।
माधवराम ने हवेली के मुख्य द्वार पर खड़े होकर, आसमान की तरफ हाथ उठाकर पूरी ताकत से कहा था—
“रघुनाथ! तूने पैसों के गुरूर में मेरे बुढ़ापे की लाठी तोड़ दी। मेरे बेगुनाह बच्चे की बलि चढ़ाकर तूने जो महल खड़ा किया है, याद रखना, इस महल की नींव में मेरे बिरजू का खून है। आज तू अपनी दौलत और ताकत के नशे में चूर होकर मेरे न्याय को कुचल रहा है। पुलिस और अदालत खरीद ली तूने, लेकिन ऊपरवाले की अदालत में ना कोई गवाह चलता है, ना कोई रसूख! कुदरत का तराज़ू जब हिलेगा, तो तू खून के आँसू रोएगा। जा, मैं तुझे श्राप देता हूँ कि जिस दिन तू अपनी जिंदगी के सबसे बड़े सुख के शिखर पर होगा, जिस दिन तुझे अपनी औलाद पर सबसे ज़्यादा नाज़ होगा, उसी दिन तेरा गुरूर टूटेगा। एक बेटे के खून का हिसाब… एक बेटे की जान से ही होगा! मेरे बिरजू की मौत का कर्ज़, तेरी औलाद चुकाएगी!”
उस दिन रघुनाथ ने ठहाका मारकर माधवराम को पागल करार दिया था और गार्ड्स से कहकर उसे बाहर फिंकवा दिया था। कुछ महीनों बाद खबर आई कि माधवराम ने भी किसी ट्रेन के आगे कटकर जान दे दी। समय बीतता गया। रघुनाथ ने बेशुमार दौलत कमाई, शादी की, और रोहन के रूप में उसे एक चाँद सा बेटा मिला।
रोहन के जन्म के बाद रघुनाथ ने अपने पापों का प्रायश्चित करने की कोशिश की। उसने दान-पुण्य शुरू किए, मंदिर बनवाए, गरीबों की मदद की। शहर उसे एक देवता मानने लगा था। उसे लगा कि शायद उसके पुण्यों से वह पुराना श्राप धुल गया है। उसे लगा कि ईश्वर ने उसे माफ कर दिया है।
लेकिन आज, रोहन की सफेद चादर में लिपटी लाश को देखकर उसे समझ आ गया था कि कुदरत माफ नहीं करती, वह बस सही वक्त का इंतज़ार करती है।
हवेली के कमरे में अचानक रघुनाथ को एक भ्रम हुआ। उसे लगा कि रोहन के सिरहाने वह बूढ़ा माधवराम खड़ा है। उसके हाथ में वही अस्थियों की मटकी है और उसकी आँखों में वही धधकती हुई आग।
माधवराम की आकृति रघुनाथ की ओर देखकर मुस्कुराई और उसके कानों में एक फुसफुसाहट गूँजी, “एक बेटे के खून का हिसाब… एक बेटे की जान से। मेरा कर्ज़ चुकता हुआ, रघुनाथ!”
रघुनाथ की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसका पूरा शरीर काँपने लगा। उसके सीने में ऐसा दर्द उठा जैसे किसी ने खंजर घोंप दिया हो। वह अचानक ज़मीन से उठा और पागलों की तरह हवा में हाथ पैर मारने लगा।
“नहीं! नहीं माधव! मेरे बेटे को छोड़ दे! मुझे मार डाल… मेरी जान ले ले! मैंने तेरी ज़मीन हथियाई थी, मुझे सज़ा दे! रोहन का कोई कसूर नहीं था! मुझे माफ कर दे माधव… मुझे माफ कर दे!”
रघुनाथ ज़मीन पर घुटनों के बल गिरकर किसी अदृश्य शक्ति के सामने हाथ जोड़कर गिड़गिड़ाने लगा। वह फूट-फूट कर रो रहा था और बार-बार हवा में किसी से माफी मांग रहा था।
वहाँ मौजूद रिश्तेदार और शहर के लोग अवाक रह गए। सबने जल्दी से रघुनाथ को पकड़ लिया।
“संभालिए अपने आप को रघुनाथ जी! सदमे ने इनका दिमागी संतुलन बिगाड़ दिया है। बेचारे, इकलौते बेटे की मौत को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। डॉक्टर को बुलाओ कोई!” एक रिश्तेदार ने चीखते हुए कहा।
बाहर बैठे लोग जो थोड़ी देर पहले रघुनाथ के पुण्यों की चर्चा कर रहे थे, अब उनकी इस हालत पर और भी ज़्यादा तरस खाने लगे। “कैसा अभागा पिता है, दुख ने बेचारे की सुध-बुध ही छीन ली है,” लोग फुसफुसाने लगे।
लेकिन उस कमरे में, उस भीड़ के बीच, केवल रघुनाथ जानता था कि वह सदमे से पागल नहीं हुआ है, बल्कि अठाईस साल पुराने एक सच का सामना कर रहा है। वह सच्चाई जिसे उसने दान-पुण्य के ढेरों पर्दों के पीछे छिपाने की कोशिश की थी, आज वो पूरी नग्नता और भयानकता के साथ उसके सामने खड़ी थी। कर्मों का बहीखाता एकदम सटीक निकला था। ब्याज सहित कर्ज़ वसूल कर लिया गया था, और रघुनाथ के पास अब जिंदगी भर पल-पल मरने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा था।
प्रिय पाठकों,
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