एक नई सुबह की उम्मीद

शाम के साढ़े छह बज रहे थे। छह साल की मिस्टी अपनी छोटी सी गुड़िया लिए दरवाज़े की चौखट पर टकटकी लगाए बैठी थी। उसके पिता, सिद्धार्थ, पिछले एक महीने से अपने किसी ज़रूरी प्रोजेक्ट के सिलसिले में दूसरे शहर गए हुए थे और आज लौट रहे थे। मिस्टी ने पूरे घर को अपने छोटे-छोटे … Read more

कन्यादान

मास्टर दीनानाथ की बड़ी बेटी सुरभि की हल्दी थी। दीनानाथ जी पेशे से एक ईमानदार शिक्षक थे और जीवन भर की पूंजी लगाकर उन्होंने अपनी दोनों बेटियों, सुरभि और नव्या को उच्च शिक्षा दिलाई थी। सुरभि एक जानी-मानी आर्किटेक्ट थी, और नव्या अभी वकालत की पढ़ाई कर रही थी। दीनानाथ जी का हमेशा से यह … Read more

मुझे माफ कर दो नीरजा

फोन की घंटी बजी तो सुलोचना जी ने जल्दी से गैस की आंच धीमी की और पल्लू से हाथ पोंछते हुए फोन उठाया। स्क्रीन पर लंदन का नंबर चमक रहा था। सुलोचना जी के चेहरे पर एकाएक एक मीठी सी मुस्कान तैर गई। “हैलो विकास बेटा, जीते रहो! कैसे हो तुम? आज चार महीने बाद … Read more

अपनापन के आँसू

अपनापन के आँसू  लाल सुर्ख लहंगे में लिपटी, सोलह श्रृंगार किए मीरा जब गाड़ी से उतरी, तो उसके कदमों में एक अजीब सी झिझक थी। पायल की झंकार के साथ उसके दिल की धड़कनें भी तेज़ हो रही थीं। अपनी नम आँखों में मायके से विदाई का दुख और इस नई दुनिया को लेकर अनगिनत … Read more

आँखों पर बंधी पट्टी

“अगर तुम्हें इस घर की छत के नीचे रहना है, तो मेरी माँ के साथ कदम से कदम मिलाकर रसोई संभालनी होगी। तुम बाहर जाकर महारानी की तरह कुर्सी तोड़ो और मेरी बूढ़ी माँ यहाँ चूल्हे के आगे अपनी हड्डियाँ गलाए, यह तमाशा अब इस घर में और नहीं चलेगा!” विकास की दहाड़ से ड्रॉइंग … Read more

अब से अपने स्वाभिमान के साथ जीऊँगी

रसोई के एक कोने में खड़ी मीरा की आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। गैस पर चाय उबल रही थी और उसकी ज़िंदगी भी इसी तरह अंदर ही अंदर खौल रही थी। उसने जल्दी से पल्लू से अपनी आँखें पोंछीं क्योंकि बाहर से उसकी सास, सुमित्रा देवी की तेज़ आवाज़ आ … Read more

कश्मीर का सफर

सरिता जी रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थीं। तवे पर रोटियां सिंक रही थीं और कुकर की सीटी बजने ही वाली थी कि उनका बेटा आर्यन और बहू शिखा एक रंग-बिरंगा लिफाफा लेकर अंदर आए। आर्यन की आँखों में एक अजीब सी चमक थी और शिखा के चेहरे पर एक प्यारी … Read more

अनुपमा का आत्मसम्मान

मेघा ने व्यंग्यात्मक हंसी हंसते हुए कहा, “ओहो! कितनी भोली बन रही है। जैसे मुझे कुछ पता ही नहीं। अरे, नौकरानी तो बाहर आंगन में थी। माँ पूजा घर में थीं और मैं सो रही थी। तो फिर गहने किसने उड़ाए? तू ही तो पूरे घर में नागिन की तरह घूम रही थी।” दीवाली का … Read more

गहरे घाव

निशा जब भी आईने के सामने खड़ी होती थी, तो उसे अपनी आँखों की गहराई में एक अजीब सी खामोशी नज़र आती थी। लाल रंग की खूबसूरत बनारसी साड़ी, माथे पर सजी चमकती बिंदी और कलाइयों में खनकती चूड़ियाँ—आज वह पूरी तरह से एक सजी-धजी और खुशहाल पत्नी लग रही थी। लेकिन इस खुशी के … Read more

आत्मसम्मान माँ का

पैंसठ वर्षीया सावित्री देवी के हाथों में चाय का कप हल्का-हल्का कांप रहा था। सुबह के सात बजे थे और रसोई से उनकी बहू तान्या की कर्कश आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी। “पता नहीं इस घर में दूध की नदियां बहती हैं क्या! सुबह उठते ही सबको दो-दो बार चाय चाहिए। बैठे-बैठे मुफ्त … Read more

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