सरिता जी रसोई में रात के खाने की तैयारी कर रही थीं। तवे पर रोटियां सिंक रही थीं और कुकर की सीटी बजने ही वाली थी कि उनका बेटा आर्यन और बहू शिखा एक रंग-बिरंगा लिफाफा लेकर अंदर आए। आर्यन की आँखों में एक अजीब सी चमक थी और शिखा के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान। आर्यन ने वो लिफाफा अपनी माँ के हाथ में थमाते हुए कहा कि यह उनके और पापा के लिए है, उनकी पैंतीसवीं सालगिरह का एक छोटा सा तोहफा। सरिता जी ने अपने पल्लू से हाथ पोंछे और थोड़ी झिझक के साथ उस लिफाफे को खोला। अंदर से कश्मीर के दो हवाई टिकट और एक बेहद खूबसूरत रिसॉर्ट की बुकिंग की रसीद निकली। उन कागज़ों को देखते ही सरिता जी के चेहरे के भाव बदल गए। जिस चेहरे पर खुशी आनी चाहिए थी, वहाँ अचानक एक गहरी चिंता ने अपनी जगह ले ली। उन्होंने तुरंत वे टिकट वापस लिफाफे में डालते हुए बात को टालने की कोशिश की।
“अरे बेटा! यह सब क्या लेकर बैठ गए तुम दोनों? तुम लोग भी ना, पैसे बर्बाद करने की कोई न कोई वजह ढूँढ ही लेते हो। तुम्हें तो पता है कि घर के हालात कैसे हैं। बाऊजी को सुबह-शाम समय पर दवा चाहिए होती है, उनका ब्लड प्रेशर अक्सर ऊपर-नीचे होता रहता है। अम्मा के घुटनों में दर्द रहता है, उन्हें उठने-बैठने में सहारे की जरूरत होती है। और फिर तुम्हारा और शिखा का ऑफिस… तुम दोनों सुबह निकल जाते हो, शाम को थक कर आते हो। पीछे से पूरा घर कौन देखेगा? बाई भी दो दिन से छुट्टी पर है। ऐसे में मैं तुम सबको छोड़कर इतने दिनों के लिए कैसे जा सकती हूँ?” सरिता जी ने एक ही सांस में अपनी सारी चिंताएं उनके सामने रख दीं। उनके लिए अपना घर और परिवार ही उनकी दुनिया थी, जिससे बाहर निकलने का उन्होंने कभी सोचा ही नहीं था।
आर्यन ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ के कांपते हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसने बहुत ही कोमलता और गहराई से कहा, “माँ, कौन सा तुम हमेशा के लिए जा रही हो? बस पंद्रह दिन की तो बात है। यह वक्त सिर्फ तुम्हारा और पापा का है। बचपन से मैं देखता आ रहा हूँ कि तुम सुबह सबसे पहले उठती हो और रात को सबसे आखिर में सोती हो। तुमने अपनी पूरी ज़िंदगी हम सबके लिए ही तो लगा दी। क्या कभी एक पल भी अपने लिए जिया है? तुम्हें याद है, जब मैं स्कूल में था, तब तुमने अपनी पसंदीदा सिल्क की साड़ी सिर्फ इसलिए नहीं खरीदी थी क्योंकि मुझे क्रिकेट की किट चाहिए थी। तुमने और पापा ने अपनी हर ख्वाहिश को हमारी जरूरतों के आगे कुर्बान कर दिया। अब जब सब कुछ सेटल हो गया है, तो यह कुछ पल सिर्फ तुम दोनों के होने चाहिए। न कोई घर की चिंता, न बाऊजी की दवाओं की फिक्र और न हमारी जिम्मेदारियां। बस तुम, पापा और कुछ खूबसूरत यादें जो सिर्फ तुम्हारी अपनी होंगी।”
शिखा ने भी आर्यन की बात में हामी भरते हुए कहा, “मम्मी जी, आप हमेशा कहती हैं ना कि बेटियां घर का ख्याल बहुत अच्छे से रखती हैं। तो क्या आप अपनी इस बेटी पर पंद्रह दिन के लिए घर की जिम्मेदारी नहीं छोड़ सकतीं? मैं और आर्यन मिलकर सब संभाल लेंगे। आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। बाऊजी की दवा, अम्मा की मालिश, ऑफिस के साथ-साथ घर का काम, सब कुछ ठीक वैसे ही होगा जैसे आप करती हैं। आप बस अपने और पापा के कपड़ों की पैकिंग शुरू कीजिए।”
तभी पीछे से रमेश जी भी वहां आ गए। उन्होंने बच्चों की सारी बातें सुन ली थीं। रमेश जी के चेहरे पर एक शांत और संतुष्ट भाव था। उन्होंने सरिता जी के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “सरिता, बच्चे बिल्कुल सही कह रहे हैं। याद करो, शादी के बाद जब हमने पहली बार कहीं दूर घूमने जाने का सोचा था, तब आर्यन पैदा होने वाला था। हमने सोचा कि अगले साल जाएंगे। फिर आर्यन की पढ़ाई, स्कूल की फीस, घर बनवाने का कर्ज, फिर बाऊजी की बीमारी और फिर शिखा का इस घर में आना… ज़िम्मेदारियों की इस चक्की में हमारे अपने लिए वक्त ही कहाँ बचा? हमने तो एक-दूसरे को ठीक से फुर्सत में बैठकर देखा तक नहीं। ज़िंदगी के इस सफर में तुम एक बेहतरीन माँ और एक आदर्श बहू बनीं, लेकिन एक पत्नी के तौर पर मैंने तुम्हें वो वक्त कभी दिया ही नहीं जिसकी तुम हकदार थीं। अब जब बच्चे खुद हमें वो फुर्सत दे रहे हैं, तो मान जाओ ना। चलो, कुछ दिन सिर्फ रमेश और सरिता बनकर जीते हैं।”
सरिता जी की आँखें भर आईं। उनके जेहन में वो सारे पुराने दिन किसी फिल्म की रील की तरह घूमने लगे। कैसे उन्होंने अपनी कई इच्छाओं का गला सिर्फ इसलिए घोंट दिया था क्योंकि घर में किसी और चीज़ की जरूरत ज्यादा थी। आज जब उनका बेटा और पति उन्हें वो खुशी देना चाह रहे थे जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, तो उनका मन भर आया। उन्हें हमेशा लगता था कि उनके बिना घर रुक जाएगा, लेकिन आज उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने बच्चों को इतना काबिल बना दिया है कि वे अब अपनी माँ को भी संभाल सकते हैं। सरिता जी ने एक नज़र आर्यन को देखा, फिर शिखा को और अंत में अपने पति रमेश जी को। रमेश जी की आँखों में एक अजीब सी आस थी—वही आस जो पैंतीस साल पहले उनके चेहरे पर होती थी।
सरिता जी समझ गईं कि यह सिर्फ एक सफर नहीं था, बल्कि वो खोए हुए पल थे जिन्हें वे दोनों वापस जीना चाहते थे। उन्होंने अपनी छलकती आँखों को पोंछते हुए हार मान ली और प्यार से डांटते हुए कहा, “तुम लोग मुझे कभी अपनी बात पर अड़े नहीं रहने देते। ठीक है, जाऊंगी मैं। लेकिन शिखा, अम्मा को गर्म पानी से ही नहलाना और बाऊजी की शुगर वाली गोली रात को खाने के बाद देना मत भूलना।” यह सुनते ही आर्यन और शिखा जोर से हंस पड़े। आर्यन ने अपनी माँ को कसकर गले से लगा लिया। घर के उस छोटे से कमरे में एक बहुत बड़ी खुशी ने दस्तक दे दी थी। ज़िम्मेदारियों के उस मजबूत दरख्त से अब फुर्सत, सुकून और प्रेम के कुछ नए पत्ते फूट रहे थे। यह सिर्फ कश्मीर का सफर नहीं था, यह सरिता जी की अपनी ज़िंदगी की ओर पहली उड़ान थी।
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