“पापा, बस बहुत हो गया! मैं अब इस घर में एक पल भी और नहीं रह सकती। रोहन और उसके परिवार की पिछड़ी हुई सोच के साथ मेरा दम घुटता है। अगर आप कल सुबह तक यहाँ नहीं आए, तो मैं अकेले ही डिवोर्स के पेपर फाइल कर दूँगी।” काव्या ने बिना कोई जवाब सुने फोन काट दिया और उसे सोफे पर पटक दिया। कमरे में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया, जिसे सिर्फ बाहर गिरती बारिश की बूँदें तोड़ रही थीं।
फोन के दूसरी तरफ, दिल्ली के एक शांत मोहल्ले में काव्या के पिता, दिनकर जी, फोन हाथ में लिए सुन्न खड़े थे। रात के ग्यारह बज रहे थे। उनकी पत्नी सुमति जी घबराई हुई रसोई से बाहर आईं। “क्या हुआ जी? काव्या इतनी रात को क्यों फोन कर रही थी? क्या कह रही थी वो?” सुमति जी के माथे पर चिंता की लकीरें उभर आई थीं।
दिनकर जी ने एक गहरी साँस ली और बोले, “कह रही है कि उसे रोहन से तलाक चाहिए। वह अब उसके साथ नहीं रहना चाहती।”
यह सुनते ही सुमति जी का पारा सातवें आसमान पर पहुँच गया। “मैंने तो पहले ही कहा था कि यह शादी मत करो! मेरी फूल सी बच्ची, इतनी बड़ी आईटी कंपनी में डायरेक्टर है, लाखों का पैकेज है उसका। और वो रोहन? एक मामूली बैंक मैनेजर। मेरी बेटी ने उसे और उसके परिवार को पाल रखा है और वो लोग उस पर ही हुक्म चलाते हैं। आजकल तलाक कोई बड़ी बात नहीं है जी। मेरी बेटी खुद अपने पैरों पर खड़ी है, उसे किसी आदमी के टुकड़ों पर पलने की जरूरत नहीं है। हम कल सुबह ही जाएँगे और उसे वहाँ से ले आएँगे।”
सुमति जी बिना पूरी बात जाने, केवल अपनी बेटी के पक्ष में खड़ी थीं। उन्हें इस बात का गुमान था कि उनकी बेटी आर्थिक रूप से इतनी मज़बूत है कि उसे किसी रिश्ते को निभाने की कोई मजबूरी नहीं है। लेकिन दिनकर जी एक सुलझे हुए इंसान थे। वे जानते थे कि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। काव्या उनकी इकलौती बेटी ज़रूर थी, लेकिन वे उसकी कमियों से भी वाकिफ थे।
अगली सुबह, दिनकर जी और सुमति जी काव्या के घर पहुँचे। घर का नज़ारा किसी युद्ध के मैदान जैसा था। हॉल में काव्या के दो बड़े सूटकेस पैक होकर रखे थे। रोहन के माता-पिता, विलाप करते हुए एक कोने में बैठे थे, और रोहन सोफे पर सिर झुकाए खामोश था। उसकी आँखों के नीचे पड़े काले घेरे बता रहे थे कि वह पूरी रात नहीं सोया था। काव्या अपने डिजाइनर सूट में तैयार खड़ी थी, मानो वह किसी ऑफिस की मीटिंग में जाने वाली हो।
सुमति जी जैसे ही घर में दाखिल हुईं, उन्होंने सीधे रोहन की माँ को सुनाना शुरू कर दिया, “क्या कमी रह गई थी मेरी बच्ची में जो आप लोगों ने उसे इतना रुलाया? शादी से पहले ही उसने साफ कह दिया था कि वह अपने करियर से कोई समझौता नहीं करेगी। मेरी बेटी कोई नौकरानी नहीं है जो आपके घर के बर्तन मांजती फिरे। वो एक इंडिपेंडेंट लड़की है!”
रोहन की माँ, सरिता जी, हाथ जोड़कर रोने लगीं। “समधिन जी, हमने कभी उसे काम करने के लिए नहीं कहा। हमने तो उसे हमेशा अपनी बेटी माना है…”
“रहने दीजिए अपनी ये मीठी बातें!” काव्या बीच में ही चीख पड़ी। “पापा, ये लोग हर छोटी बात पर मुझे ताने मारते हैं। कल मेरी एक बहुत ज़रूरी ग्लोबल कॉन्फ्रेंस कॉल थी, और इन्हें अपनी 35वीं सालगिरह की पार्टी में मेरा शामिल होना ज़रूरी लग रहा था! जब मैंने मना किया, तो रोहन ने मुझ पर चिल्लाना शुरू कर दिया। ये लोग मेरी सफलता से जलते हैं। ये चाहते हैं कि मैं भी टिपिकल बहुओं की तरह इनके आगे-पीछे घूमती रहूँ।”
कमरे में तनाव चरम पर था। रोहन ने धीरे से सिर उठाया। उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, बल्कि एक गहरी थकावट थी। “अंकल, आंटी,” रोहन ने दिनकर जी की तरफ देखते हुए कहा, “मैंने या मेरे माता-पिता ने कभी काव्या की नौकरी या उसकी सफलता को अपने अहंकार के आड़े नहीं आने दिया। हम दोनों की शादी को तीन साल हो गए हैं। इन तीन सालों में काव्या ने घर के किचन में कदम तक नहीं रखा, हमें कोई ऐतराज़ नहीं हुआ। माँ सुबह पाँच बजे उठकर इसका टिफिन बनाती हैं। मैं अपनी शिफ्ट ऐसे एडजस्ट करता हूँ ताकि इसे ऑफिस ड्रॉप कर सकूँ। लेकिन… क्या एक घर सिर्फ पैसों से चलता है?”
रोहन की आवाज़ भारी हो गई। “काव्या ने इस घर को एक होटल समझ लिया है। वो यहाँ सिर्फ सोने आती है। महीने के तीस दिन, हम एक साथ बैठकर खाना नहीं खाते। मेरे माता-पिता जब बीमार होते हैं, तो यह पलटकर पूछती तक नहीं कि उन्हें डॉक्टर के पास ले जाना है या नहीं। कल मेरे माता-पिता की 35वीं सालगिरह थी। मैंने कोई बड़ी पार्टी नहीं रखी थी। बस घर पर एक छोटी सी पूजा और डिनर था। मैंने काव्या से सिर्फ एक घंटे का समय माँगा था। लेकिन इसने कहा कि ‘ये मिडिल क्लास ड्रामे मेरे बस के नहीं हैं।’ अंकल, जो इंसान आपके माता-पिता के अस्तित्व को ही ‘ड्रामा’ कहे, उसके साथ कोई कैसे रह सकता है?”
यह सुनकर सुमति जी एक पल के लिए सकपका गईं, लेकिन फिर भी अपनी बेटी के बचाव में उतरीं, “तो क्या हुआ? ऑफिस का काम ज़रूरी होता है। रोहन, तुम उसकी पोजीशन और उसके स्ट्रेस को नहीं समझते।”
“बस करो सुमति!” अचानक दिनकर जी की तेज़ आवाज़ से पूरा हॉल गूँज उठा। उन्होंने अभी तक एक शब्द नहीं कहा था। वे धीरे-धीरे चलकर काव्या के सामने आए। काव्या को लगा कि उसके पिता अब रोहन को डाँटेंगे, लेकिन दिनकर जी की आँखों में गुस्सा और निराशा दोनों थे।
“बेटा,” दिनकर जी ने गंभीर आवाज़ में कहा, “मैंने तुम्हें पढ़ाया-लिखाया ताकि तुम एक समझदार और आत्मनिर्भर इंसान बन सको। लेकिन मुझे आज एहसास हो रहा है कि मैंने तुम्हें सिर्फ साक्षर बनाया है, शिक्षित नहीं। तुम्हारी डिग्रियों ने तुम्हें अहंकार दिया है, संस्कार नहीं।”
काव्या चौंक गई। “पापा, आप क्या कह रहे हैं? आप मेरा साथ देने के बजाय…”
“मैं सच का साथ दे रहा हूँ, काव्या,” दिनकर जी ने उसकी बात काटते हुए कहा। “तुम्हें लगता है कि तुम इस घर में सबसे ज़्यादा कमाती हो, इसलिए तुम्हें हर रिश्ते को पैरों तले रौंदने का अधिकार मिल गया है? तुम्हें अपनी ‘इंडिपेंडेंस’ पर बहुत घमंड है ना? तो सुनो। आत्मनिर्भरता का मतलब यह नहीं होता कि तुम दूसरों की भावनाओं को अहमियत देना छोड़ दो। जब तुम अपनी कंपनी में अपनी टीम के साथ काम करती हो, तो क्या वहाँ भी तुम ऐसा ही व्यवहार करती हो? नहीं ना! क्योंकि वहाँ तुम्हें अपनी नौकरी जाने का डर होता है। लेकिन यहाँ? यहाँ तुम्हें पता है कि ये परिवार तुमसे प्यार करता है, इसलिए तुम इन्हें ‘टेकन फॉर ग्रांटेड’ ले रही हो।”
दिनकर जी की बातें तीर की तरह काव्या के दिल में चुभ रही थीं। सुमति जी भी अब सिर झुकाए खड़ी थीं।
दिनकर जी ने आगे कहा, “तुम कह रही हो कि ये लोग तुम्हारी सफलता से जलते हैं? बेटा, जब तुम पिछले साल टाइफाइड से पंद्रह दिन तक बिस्तर पर थीं, तब तुम्हारी ये ‘मिडिल क्लास’ सास ही रात-रात भर जागकर तुम्हारे सिरहाने बैठी थी। तुम्हारे वो कॉरपोरेट क्लाइंट्स तुम्हें दवाई देने नहीं आए थे। रोहन ने अपना प्रमोशन सिर्फ इसलिए ठुकरा दिया ताकि वो शहर से बाहर न जाए और तुम्हें यहाँ अपने करियर पर फोकस करने का मौका मिले। और तुम क्या कर रही हो? उनके प्यार और उनके त्याग को उनकी कमजोरी समझ रही हो।”
हॉल में पिन-ड्रॉप साइलेंस था। रोहन की माँ अपने आँसू पोंछ रही थीं। दिनकर जी ने काव्या के कंधे पर हाथ रखा, “शादी एक पार्टनरशिप है, बेटा। और कोई भी पार्टनरशिप सिर्फ चेकबुक से नहीं चलती, वो सम्मान से चलती है। जिस दिन इंसान के दिमाग में यह बात आ जाए कि ‘मैं इससे ज़्यादा कमाता हूँ, इसलिए मैं इससे बड़ा हूँ’, उसी दिन वो रिश्ता अंदर से मर जाता है। तुम्हारी उच्च शिक्षा ने अगर तुम्हें झुकना नहीं सिखाया, लोगों को जोड़ना नहीं सिखाया, तो तुम्हारी वो डिग्रियां रद्दी के कागज़ से ज़्यादा कुछ नहीं हैं।”
काव्या के होंठ काँप रहे थे। उसके पिता ने आज तक उसे इतनी कठोर बातें नहीं कही थीं। अचानक उसकी आँखों के सामने पिछले तीन सालों की फिल्म चल पड़ी। उसे याद आया कि कैसे रोहन ने कभी उसकी लेट नाइट मीटिंग्स पर सवाल नहीं उठाया। कैसे उसकी सास ने कभी उसे बहू नहीं, बल्कि बेटी की तरह रखा। और बदले में उसने क्या दिया? सिर्फ अहंकार, झिड़कियाँ और पैसों का गुरूर।
सुमति जी भी अब सच्चाई समझ चुकी थीं। वे रोहन के माता-पिता के पास गईं और हाथ जोड़कर बोलीं, “मुझे माफ़ कर दीजिए समधन जी। अपनी बेटी के प्यार में मैं अंधी हो गई थी। मैंने उसे गलत सपोर्ट किया, जिसका नतीजा यह हुआ कि वो रिश्तों की कद्र करना भूल गई।”
काव्या का अहंकार अब आंसुओं में बहने लगा था। वह टूट कर सोफे पर बैठ गई और अपने चेहरे को हाथों से छिपाकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे पहली बार अपनी गलती की गहराई का एहसास हुआ था। उसकी ‘आधुनिकता’ और ‘स्वतंत्रता’ के नाम पर उसने खुद ही अपने घर में आग लगा दी थी।
रोहन, जो अब तक चुप था, धीरे से उठा और काव्या के पास गया। उसने काव्या के सिर पर हाथ रखा। काव्या ने तुरंत रोहन का हाथ पकड़ लिया और रोते हुए बोली, “मुझे माफ़ कर दो रोहन। मुझे सच में नहीं पता चला कि कब मेरी सफलता मेरे दिमाग पर हावी हो गई। मैंने तुम्हें और मम्मी-पापा को बहुत दुख दिया है। प्लीज… मुझे एक आखिरी मौका दे दो। मैं सब ठीक कर दूँगी।”
रोहन की आँखों में भी नमी आ गई थी। उसने काव्या को उठाया और गले से लगा लिया। घर के बड़े-बुजुर्गों की आँखों में राहत के आँसू थे। एक घर जो कुछ पलों पहले टूटने की कगार पर था, वह एक पिता की सही समय पर दी गई सीख और एक बेटी के आत्म-मंथन से बच गया था। दिनकर जी ने सही मायनों में अपनी बेटी का घर बसा दिया था।
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लेखिका : गरिमा चौधरी