पारिवारिक अदालत के बाहर आज एक अजीब सी तपिश थी। धूप से ज्यादा गर्मी सुमित्रा देवी के चेहरे की चमक में थी। वो अदालत की सीढ़ियां ऐसे उतर रही थीं जैसे कोई बहुत बड़ा युद्ध जीतकर आई हों। उनकी चाल में एक गुरूर था, आंखों में एक विजयी चमक और होंठों पर एक ऐसी मुस्कान जो किसी का घर उजड़ने के बाद ही कुछ लोगों के चेहरों पर आती है। आखिर आज उनका मकसद पूरा हो गया था। उनके इकलौते बेटे राघव और उसकी पत्नी मीरा का तलाक आज कानूनी रूप से मंजूर हो गया था।
“अरे निवेदिता, अपने भाई से कहो जल्दी गाड़ी में आकर बैठे। अब वहां खड़ा-खड़ा क्या शक्ल देख रहा है उसकी?” सुमित्रा देवी ने अपनी बेटी निवेदिता से कहा जो बिल्कुल अपनी मां के नक्शेकदम पर चलती थी।
राघव अदालत के विशाल गेट के पास बुत बनकर खड़ा था। उसकी नजरें दूर जाती हुई एक कैब पर टिकी थीं, जिसमें उसकी छह साल की बेटी पीहू और उसकी अब पूर्व पत्नी मीरा बैठ रही थीं। कैब का दरवाजा बंद होने से पहले पीहू ने एक बार मुड़कर अपने पिता की तरफ देखा था और अपना छोटा सा हाथ हिलाया था। राघव का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में लेकर जोर से भींच दिया हो। उसकी आंखें डबडबा गईं, लेकिन आंसुओं को उसने पलकों की दहलीज पार नहीं करने दी। मीरा ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसकी उस बेरुखी में कोई नफरत नहीं थी, बल्कि एक ऐसी थकान थी जो सालों तक घुट-घुट कर जीने के बाद आती है।
“राघव! क्या कर रहा है वहां? चल बैठ गाड़ी में। आज तो जश्न का दिन है। उस मनहूस औरत से हमेशा के लिए छुटकारा मिल गया। अब तू देखना, मैं तेरे लिए ऐसी लड़की लाऊंगी जो हमारे खानदान के रुतबे के बराबर होगी। ये भिखारियों की बेटी ने तो हमारा जीना मुहाल कर रखा था।” सुमित्रा देवी ने कार का शीशा नीचे करते हुए तेज आवाज में कहा।
राघव बिना कोई जवाब दिए भारी कदमों से चलकर आया और गाड़ी की पिछली सीट पर चुपचाप बैठ गया। निवेदिता आगे अपनी मां के साथ बैठ गई। गाड़ी स्टार्ट हुई और अदालत पीछे छूट गई, लेकिन राघव का पूरा वजूद जैसे उसी अदालत के गलियारे में कहीं खो गया था।
“तू ऐसे मुंह क्यों लटकाए बैठा है भैया? तुझे तो खुश होना चाहिए। कैसा जीना हराम कर रखा था उस मीरा ने। ना ढंग से बात करना आता था, ना हमारे स्टैंडर्ड के कपड़े पहनना। और तो और, मां के सामने जुबान भी लड़ाने लगी थी। अच्छा हुआ पीछा छूटा। अब वो अपनी उस मनहूस बेटी को लेकर धक्के खाएगी तब उसे हमारी अहमियत समझ आएगी,” निवेदिता ने अपनी मां की हां में हां मिलाते हुए कहा।
सुमित्रा देवी ने मुस्कुराते हुए ड्राइवर से कहा, “रामू, जरा एफएम चला दे। आज बहुत खुशी का दिन है।”
गाड़ी में गाने बजने लगे, सुमित्रा और निवेदिता आने वाले कल की योजनाएं बनाने लगीं, लेकिन राघव के कानों में सिर्फ एक सन्नाटा गूंज रहा था। वो सन्नाटा जो उसके और मीरा के बीच पिछले दो सालों से पसरा हुआ था।
घर पहुंचते ही सुमित्रा देवी ने एक गहरी सांस ली, जैसे बरसों बाद उन्हें अपने ही घर में खुली हवा मिली हो। “अरे सरला ओ सरला!” उन्होंने घर की पुरानी नौकरानी को आवाज लगाई। “आज रात को खाने में केसर वाली खीर और छोले-भटूरे बनने चाहिए। आज मेरे घर से राहु-केतु का साया हमेशा के लिए टल गया है। आज मेरे कलेजे को जो ठंडक मिली है ना, वो मैं ही जानती हूं।”
राघव बिना किसी की तरफ देखे सीधा अपने कमरे की तरफ चल दिया। “मां, मैं थक गया हूं। मुझे आराम करना है। मुझे खाने के लिए मत उठाना,” उसने बेजान आवाज में कहा और कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
सुमित्रा देवी ने निवेदिता की तरफ देखकर कंधे उचकाए, “कोई बात नहीं, अभी थोड़ा सदमे में है। इतने सालों की आदत जो है। कल तक सब ठीक हो जाएगा। तू अपनी मौसी को फोन लगा, उसने जो उस बड़े बिल्डर की बेटी का जिक्र किया था, मैं कल ही राघव के लिए वहां बात चलाऊंगी।”
इधर, अपने कमरे के सन्नाटे में राघव फूट-फूट कर रो पड़ा। उसने अलमारी खोली और किताबों के पीछे छिपाई हुई एक तस्वीर निकाली। यह तस्वीर पीहू के पहले जन्मदिन की थी। इसमें राघव, मीरा और पीहू खिलखिला कर हंस रहे थे। तस्वीर पर हाथ फेरते हुए राघव की उंगलियां कांपने लगीं। अतीत के पन्ने उसकी आंखों के सामने एक-एक करके खुलने लगे।
मीरा एक बहुत ही सुलझी हुई, पढ़ी-लिखी और स्वाभिमानी लड़की थी। जब राघव से उसकी शादी हुई थी, तो उसने इस घर को अपना बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। लेकिन सुमित्रा देवी को शुरू से ही मीरा से चिढ़ थी क्योंकि मीरा उनके रसूखदार मायके वाले घमंड को चुनौती देती थी। मीरा मध्यमवर्गीय परिवार से थी, जहां रिश्तों की कद्र पैसों से ज्यादा होती थी। सुमित्रा देवी हर बात में मीरा के मायके को नीचा दिखातीं। उसके लाए हुए तोहफों का मजाक उड़ातीं। निवेदिता जब भी ससुराल से आती, मीरा की जिंदगी और नर्क बन जाती। दोनों मां-बेटी मिलकर मीरा को मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थीं।
“तुम्हारे बाप ने दिया ही क्या है जो तुम इतना सिर उठाकर चलती हो?” यह ताना मीरा के लिए रोज की बात हो गई थी।
राघव सब देखता था। वह मीरा से बहुत प्यार करता था, लेकिन अपनी मां के सामने उसकी जुबान नहीं खुलती थी। बचपन से ही उसके दिमाग में यह बात कूट-कूट कर भर दी गई थी कि मां भगवान होती है और मां के खिलाफ एक शब्द बोलना भी पाप है। यही ‘श्रवण कुमार’ बनने की चाहत उसके वैवाहिक जीवन को दीमक की तरह चाट गई।
जब मीरा रोते हुए राघव से कहती, “राघव, प्लीज मां जी को समझाइए ना। मैं उन्हें कुछ नहीं कहती, फिर भी वो मुझे इतना क्यों कोसती हैं? मैं इंसान हूं, मुझे भी दर्द होता है।”
तो राघव हमेशा एक ही जवाब देता, “मीरा, वो मां हैं। बुजुर्ग हैं। तुम उनकी बातों का बुरा मत माना करो। मैं हूं ना तुम्हारे साथ। प्लीज थोड़ा एडजस्ट कर लो।”
लेकिन ‘एडजस्ट’ करने की भी एक सीमा होती है। जब पीहू पैदा हुई, तो सुमित्रा देवी का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया क्योंकि उन्हें पोता चाहिए था। उन्होंने पीहू को कभी प्यार से गोद में नहीं लिया। यहीं से मीरा के सब्र का बांध टूट गया। उसने राघव से साफ कह दिया था कि वह अपने लिए सब सह सकती है, लेकिन अपनी बेटी का तिरस्कार नहीं सह सकती।
तलाक मीरा ने नहीं, हालात ने मांगा था। और सबसे बड़ी सच्चाई यह थी जो सुमित्रा देवी नहीं जानती थीं—यह तलाक मीरा की जिद नहीं थी, यह राघव का मीरा को दिया गया आखिरी तोहफा था। जब राघव को समझ आ गया कि वह अपनी मां को कभी नहीं बदल सकता और उसके कायरपन की वजह से मीरा घुट-घुट कर मर रही है, तो उसने खुद मीरा से कहा था कि वह उसे आजाद कर देगा। अदालत में जब मीरा ने अपनी बच्ची की कस्टडी मांगी और कोई गुजारा भत्ता लेने से इंकार कर दिया, तो राघव ने बिना कोई सवाल किए हर कागज पर दस्तखत कर दिए थे। वह अपनी पत्नी की नजरों में और नहीं गिरना चाहता था।
दरवाजे पर हुई तेज दस्तक ने राघव को वर्तमान में ला पटका।
“राघव! दरवाजा खोल बेटा,” सुमित्रा देवी की उत्साहित आवाज आई।
राघव ने जल्दी से आंसू पोंछे, तस्वीर को वापस अलमारी में छिपाया और दरवाजा खोला। सामने सुमित्रा देवी खड़ी थीं, उनके हाथ में एक तस्वीर थी और चेहरे पर वही गुरूर भरी मुस्कान। पीछे निवेदिता भी खड़ी थी जिसके हाथ में खीर की कटोरी थी।
“देख बेटा, तेरी मौसी ने तस्वीर भेज भी दी। शहर के सबसे बड़े ज्वेलर की बेटी है शिखा। इकलौती वारिस है। रंग-रूप में तो उस मीरा से हजार गुना अच्छी है। मैंने मौसी से कह दिया है कि बात पक्की कर ले। अगले महीने ही सगाई कर देंगे। अब तू अपनी नई जिंदगी की शुरुआत कर। ले, निवेदिता के हाथ से थोड़ी खीर खा ले,” सुमित्रा देवी ने तस्वीर राघव की तरफ बढ़ाते हुए कहा।
राघव ने वह तस्वीर अपने हाथ में ली। उसने तस्वीर को देखा, फिर अपनी मां को और फिर निवेदिता को। अचानक राघव के चेहरे का भाव बदलने लगा। जो बेटा आज तक अपनी मां के सामने नजरें उठाकर बात नहीं कर सका था, आज उसकी आंखों में एक ऐसी ज्वाला थी जिसे देखकर सुमित्रा देवी एक कदम पीछे हट गईं।
राघव ने बहुत ही शांत, लेकिन ठंडी आवाज में कहा, “आपको लगता है कि आप जीत गईं मां?”
सुमित्रा देवी चौंकी, “क्या मतलब? जीत ही तो है। उस चुड़ैल ने तो…”
“बस!” राघव की आवाज इतनी तेज थी कि निवेदिता के हाथ से खीर की कटोरी छूटकर फर्श पर गिर गई। कांच के टुकड़े और खीर पूरे फर्श पर फैल गए।
“एक शब्द और नहीं मां। बहुत सुन लिया मैंने। आज तक मैं इसलिए चुप था क्योंकि मैं आपको भगवान मानता था। लेकिन आप भगवान नहीं, एक ऐसी औरत हैं जिसे किसी दूसरे की खुशी बर्दाश्त नहीं होती। आपको मीरा से नफरत नहीं थी, आपको इस बात से नफरत थी कि मैं उससे प्यार क्यों करता हूं। आप मेरा घर नहीं बसाना चाहती थीं, आप सिर्फ मुझ पर अपनी मालकियत साबित करना चाहती थीं।”
“राघव! दिमाग खराब हो गया है तेरा? ये क्या बकवास कर रहा है तू अपनी मां से?” निवेदिता चिल्लाई।
राघव ने निवेदिता की तरफ एक तीखी नजर डाली, “तू चुप रह निवेदिता। तेरा अपना घर बसा हुआ है ना? तो तू यहां आकर मेरा घर क्यों जला रही थी? तुझे अपनी भाभी में हजार कमियां दिखती थीं, कभी अपने गिरेबान में झांक कर देखा है?”
सुमित्रा देवी कांपने लगी थीं। उनका वो आज्ञाकारी बेटा आज बगावत कर रहा था। “बेटा, वो औरत तेरे लायक नहीं थी। मैं तेरे भले के लिए…”
“मेरे भले के लिए?” राघव हंस पड़ा, लेकिन उस हंसी में सिर्फ दर्द था। “मेरा भला इसमें था कि मेरी बीवी और मेरी बेटी मेरे साथ रहते। आपको लगता है ना कि अदालत में आपने उसे हरा दिया? नहीं मां, उसने आपको बहुत पहले हरा दिया था। उसने आपसे एक रुपया नहीं मांगा। वो अपने स्वाभिमान के साथ गई है। और आपको पता है तलाक के पेपर्स पर दस्तखत किसने पहले किए थे? मैंने! क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मेरी वजह से, और आपकी इस घुटन भरी नफरत की वजह से वो अपनी जिंदगी बर्बाद कर दे। मैंने अपनी मोहब्बत को आजाद किया है मां, क्योंकि मैं इतना कायर था कि अपनी पत्नी को उसके हक का सम्मान नहीं दिला सका।”
यह कहते हुए राघव ने अपने हाथ में पकड़ी हुई नई लड़की की तस्वीर के बीच से दो टुकड़े कर दिए और उन्हें हवा में उड़ा दिया।
“कान खोलकर सुन लीजिए मां, और आप भी निवेदिता। इस घर में अब कभी कोई औरत मेरी पत्नी बनकर नहीं आएगी। आपने मेरा घर तोड़ा है ना? अब आप इस आलीशान मकान में अपने इस अहंकार के साथ अकेले रहिए। मैं सिर्फ इस घर का एक जिंदा कर्ज चुकाने वाला मशीन बनकर रहूंगा, लेकिन आपका बेटा राघव आज उसी अदालत के बाहर मर चुका है।”
राघव ने उन दोनों को बाहर धकेला और जोर से अपने कमरे का दरवाजा बंद कर लिया। अंदर से कुंडी लगने की आवाज सुमित्रा देवी के कानों में किसी हथौड़े की तरह लगी। फर्श पर बिखरी हुई केसरिया खीर अब उन्हें खून की तरह लाल और भयानक लग रही थी।
उनकी सारी जीत, सारा अहंकार उस बंद दरवाजे के सामने घुटने टेक चुका था। उन्हें अब समझ में आ रहा था कि उन्होंने अपनी झूठी शान के लिए अपनी बहू को नहीं, बल्कि अपने ही बेटे को घर से निकाल दिया था—भले ही वह उसी घर के एक कमरे में मौजूद था। हवेली नुमा वह घर अब सुमित्रा देवी को एक कब्रिस्तान लग रहा था, जहां उनकी जीत की खुशी मातम में बदल चुकी थी।
क्या आपको लगता है कि समाज में आज भी कई परिवार सिर्फ अपने अहंकार और ‘स्टेटस’ के नाम पर अपने बच्चों का भविष्य और उनकी खुशियां तबाह कर देते हैं? क्या माता-पिता का सम्मान करने का मतलब हमेशा पत्नी के साथ होने वाले अन्याय पर चुप रहना है? अपने विचार हमें नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।
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