अपनापन के आँसू
लाल सुर्ख लहंगे में लिपटी, सोलह श्रृंगार किए मीरा जब गाड़ी से उतरी, तो उसके कदमों में एक अजीब सी झिझक थी। पायल की झंकार के साथ उसके दिल की धड़कनें भी तेज़ हो रही थीं। अपनी नम आँखों में मायके से विदाई का दुख और इस नई दुनिया को लेकर अनगिनत उम्मीदें लिए वह अपने पति विक्रम के साथ उस विशाल लोहे के दरवाज़े के सामने खड़ी थी। विक्रम ने हल्के से उसका हाथ दबाया, मानो बिना कुछ कहे उसे ढांढस बंधा रहा हो। तभी भीतर से एक भारी और रोबदार आवाज़ आई, “अरे मालती, जल्दी से आरती की थाल लेकर आ, बहू और बेटे को द्वार पर खड़ा नहीं रखते।” यह आवाज़ विक्रम की दादी, रुक्मिणी देवी की थी, जिनके कड़क अनुशासन के किस्से मीरा ने विक्रम से बहुत सुन रखे थे।
मीरा के मन का डर और भी गहरा हो गया। दादी सा के पैर छूते हुए उसके हाथ हल्के से कांप रहे थे। रस्मों-रिवाज़ों का लंबा सिलसिला शुरू हुआ। घर में रिश्तेदारों की भीड़, हंसी-मज़ाक और अजनबी चेहरों के बीच मीरा बार-बार खुद को समेटने की कोशिश कर रही थी। हर कोई उसे परखती नज़रों से देख रहा था। रात होते-होते वह थकान और एक अनजाने तनाव से चूर हो चुकी थी। विक्रम बहुत ही समझदार और सुलझा हुआ इंसान था, उसने मीरा की स्थिति भांप ली और उसे आराम करने के लिए कहा। लेकिन मीरा की आँखों से नींद कोसों दूर थी। वह रात भर यही सोचती रही कि क्या वह कभी इस परिवार की उम्मीदों पर खरी उतर पाएगी? क्या यह घर कभी उसे अपनी बेटी की तरह अपना पाएगा?
अगली सुबह, सूरज की पहली किरण के साथ ही मीरा उठ गई। आज उसकी ‘पहली रसोई’ की रस्म थी, जहां उसे पूरे परिवार के लिए कुछ मीठा बनाना था। स्नान के बाद, मीरा ने अपनी अटैची खोली और कल के भारी भरकम लाल लहंगे के बाद कुछ सौम्य पहनने के विचार से एक बेहद खूबसूरत हरे रंग की फ्लोरल साड़ी निकाली। उस हरे रंग की साड़ी में वह न केवल शालीन लग रही थी, बल्कि उसके चेहरे की मासूमियत भी उभर कर सामने आ रही थी। बालों में गजरा और माथे पर लाल बिंदी लगाए जब वह रसोई में पहुंची, तो वहां का सन्नाटा उसे और भी डरा रहा था।
उसने तय किया कि वह खीर बनाएगी, बिल्कुल वैसी ही जैसी उसकी माँ बनाती थी। दूध उबलने लगा, मेवों की खुशबू से रसोई महक उठी। मीरा पूरी तन्मयता से खीर चला रही थी कि तभी अचानक उसके हाथ से फिसल कर एक स्टील की कटोरी ज़मीन पर गिर पड़ी। उस शांत सुबह में कटोरी गिरने की आवाज़ किसी धमाके से कम नहीं थी। मीरा का दिल धक से रह गया। उसने पलट कर देखा तो दरवाज़े पर दादी सा, रुक्मिणी देवी खड़ी थीं। उनका चेहरा गंभीर था और आँखों में एक अजीब सा भाव था। मीरा के हाथ से चम्मच छूटते-छूटते बचा। उसे लगा कि अब उसके जीवन की पहली डांट पड़ने वाली है। सुबह-सुबह अपशकुन करने के लिए उसे ताने सुनने पड़ेंगे।
दादी सा धीरे-धीरे चलते हुए उसके करीब आईं। चूल्हे पर पक रही खीर की सुगंध ली और फिर मीरा की तरफ देखा। मीरा की आँखें डर से झुकी हुई थीं और उसकी पलकों पर आंसू तैर रहे थे।
“क्या बनाया है बहू?” दादी सा की आवाज़ में हमेशा जैसी कड़क नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी नरमी थी।
“जी… खीर,” मीरा ने रुंधे हुए गले से जवाब दिया।
दादी सा ने पास रखी एक छोटी कटोरी उठाई और इशारा किया। मीरा ने कांपते हाथों से थोड़ी सी खीर उसमें डाल दी। दादी सा ने खीर का एक चम्मच चखा और फिर अपनी आँखें बंद कर लीं। रसोई में सुई गिरने जैसी शांति थी। कुछ पलों बाद जब दादी सा ने आँखें खोलीं, तो उनकी बूढ़ी और झुर्रियों वाली आँखों से एक आंसू बहकर उनके गाल पर आ गिरा। मीरा यह देखकर घबरा गई।
“दादी सा, क्या कुछ गलती हो गई? मीठा कम है क्या?” मीरा ने घबराते हुए पूछा।
दादी सा ने अपना सिर हिलाया और कटोरी एक तरफ रखकर मीरा के सिर पर अपना कांपता हुआ हाथ रख दिया। “नहीं बेटी, गलती कोई नहीं हुई। आज पैंतालीस साल बाद मुझे मेरी माँ के हाथ की खीर का स्वाद याद आ गया। मेरी माँ बिल्कुल ऐसी ही खीर बनाती थी, जिसमें इलायची से ज़्यादा उसकी ममता की खुशबू होती थी।”
मीरा अवाक रह गई। दादी सा ने आगे कहा, “मैं जानती हूँ कल से तुम्हारे मन में कितना डर है। मुझे भी लोग कड़क और सख्त मिज़ाज कहते हैं। लेकिन जब मैं इस घर में ब्याह कर आई थी, तो मेरी उम्र तुमसे भी कम थी। मेरे मन में भी बिल्कुल यही डर था जो आज तुम्हारी आँखों में है। नया घर, नए लोग… सब कुछ कितना पराया लगता है ना? इंसान खुद को एक पिंजरे में बंद पंछी समझने लगता है।”
मीरा ने धीरे से सिर उठाकर दादी सा को देखा। आज वह घर की रोबदार मुखिया नहीं, बल्कि एक साधारण सी औरत लग रही थीं, जिसने जीवन के कई वसंत और पतझड़ देखे थे।
“लेकिन बेटी,” दादी सा ने मीरा के आंसू पोंछते हुए कहा, “एक बात याद रखना, मकान ईंट और पत्थर से बनता है, लेकिन उसे घर एक औरत ही बनाती है। तुम यहाँ सिर्फ विक्रम की पत्नी बनकर नहीं आई हो, तुम इस घर की आत्मा बनने आई हो। अगर तुम डर-डर कर जियोगी, तो यह घर कभी तुम्हारा नहीं हो पाएगा। इसे अपना मायका समझो। यहाँ अधिकार से रहो। जो रूठे उसे मनाओ, और जो डांटे तो अपनी बात रखो।”
यह कहते हुए दादी सा ने अपनी कलाई से एक पुश्तैनी सोने का कंगन निकाला और मीरा को पहना दिया। “यह मेरी सास ने मुझे मेरी पहली रसोई पर दिया था और कहा था कि यह घर की चाबियों से ज़्यादा कीमती है, क्योंकि यह विश्वास का कंगन है। आज से यह तुम्हारा है।”
मीरा अब खुद को रोक नहीं पाई और दादी सा के गले लगकर फूट-फूट कर रोने लगी। लेकिन ये आंसू डर या विदाई के नहीं थे; ये एक नए घर में अपनी पहचान और अपनापन पा लेने के आंसू थे। उस हरे रंग की साड़ी में सजी मीरा को अब वह रसोई, वह घर और वे लोग अजनबी नहीं लग रहे थे। विक्रम जो चुपचाप दरवाज़े के पीछे से यह सब देख रहा था, उसकी आँखों में भी सुकून के आंसू थे। उस दिन के बाद, उस आंगन में मीरा की हंसी की खनक बिल्कुल वैसी ही गूंजने लगी, जैसी उसके मायके में गूंजती थी।
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लेखिका : वैभवी दुबे