प्रतिष्ठा का मुखौटा

दीनदयाल जी अपनी बात पूरी कर पाते, उससे पहले ही शेखर सेठ ने उनकी बात काटते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “दीनदयाल जी! बात पाँच-सात लाख रुपये के खर्च की नहीं है, बात हमारी ‘हैसियत’ की है। बुआ जी के ससुराल वालों, हमारे पूरे खानदान और शहर के रसूखदार लोगों को पता तो चलना चाहिए कि शेखर सेठ के घर का आयोजन कैसा होता है। अगर मैं वहाँ कोई साधारण सा टेंट लगवा दूँगा, तो लोग क्या कहेंगे? समाज में मेरी हैसियत और मेरी ऊँची पसंद का सवाल है। मरने वाले के सम्मान में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”

शहर के सबसे पॉश इलाके में स्थित ‘दीनदयाल फर्नीचर एंड डेकोरेटर्स’ के बड़े से वातानुकूलित शोरूम में आज सुबह-सुबह ही चहल-पहल थी। शोरूम के मालिक, दीनदयाल जी अपने गल्ले पर बैठे हिसाब-किताब देख रहे थे कि तभी शहर के जाने-माने और रईस उद्योगपति, शेखर सेठ की शानदार गाड़ी शोरूम के बाहर आकर रुकी। शेखर सेठ को अपनी दुकान में आता देख दीनदयाल जी तुरंत अपनी कुर्सी से उठ खड़े हुए और हाथ जोड़कर उनका स्वागत किया।

“आइए, आइए शेखर बाबू! आज सुबह-सुबह इस गरीब के शोरूम में कैसे कदम पड़े? कहिए, क्या सेवा करूँ आपकी?” दीनदयाल जी ने अत्यंत आदर सत्कार के साथ उन्हें सोफे पर बिठाते हुए कहा और अपने नौकर को तुरंत दो स्पेशल चाय लाने का इशारा किया।

शेखर सेठ इस शोरूम के बहुत पुराने और खास ग्राहक थे। दीनदयाल जी अच्छी तरह जानते थे कि शेखर सेठ जब भी कुछ खरीदते हैं, तो पैसे की परवाह नहीं करते। उनकी पसंद हमेशा सबसे उम्दा और महँगी होती है। इसलिए दीनदयाल जी ने अपने कर्मचारियों को शोरूम के सबसे बेहतरीन और विदेशी डिज़ाइन वाले फर्नीचर के कैटलॉग लाने का निर्देश दे दिया।

शेखर सेठ ने सोफे पर आराम से टेक लगाते हुए कहा, “दीनदयाल जी, मुझे एक अच्छा सा गद्दा (मैट्रेस) चाहिए। कोई बेहतरीन क्वालिटी का गद्दा दिखाइए।”

यह सुनकर दीनदयाल जी के चेहरे पर चमक आ गई। उन्होंने तुरंत अपने कर्मचारियों से कहकर शोरूम के सबसे महँगे, ऑर्थोपेडिक और मेमोरी फोम वाले गद्दों का ढेर लगवा दिया। “ये देखिए शेखर बाबू, यह एकदम नया इंपोर्टेड गद्दा है। इस पर सोने वाले को ऐसा महसूस होता है जैसे वह रुई के बादलों पर सो रहा हो। शरीर के हर जोड़ को आराम मिलता है। इसकी कीमत पच्चीस हज़ार रुपये है, लेकिन आपके लिए सिर्फ बाइस हज़ार,” दीनदयाल जी ने गद्दे की खूबियाँ गिनाते हुए कहा।

शेखर सेठ ने उन महँगे गद्दों की तरफ एक सरसरी निगाह डाली और फिर मुँह बनाते हुए कहा, “अरे दीनदयाल जी, इतना भारी और महँगा गद्दा नहीं चाहिए। कोई बहुत ही साधारण, हल्का और सस्ता सा गद्दा दिखाइए। वो जो सादी रुई या कोयर वाले आते हैं ना, बस वैसा ही कुछ।”

दीनदयाल जी को अपने कानों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने हैरानी से पूछा, “सस्ता गद्दा? और वो भी आपके लिए? शेखर बाबू, आप मज़ाक तो नहीं कर रहे? आपके महल जैसे घर में ऐसा मामूली गद्दा भला कहाँ शोभा देगा?”

शेखर सेठ ने थोड़ा गंभीर होते हुए जवाब दिया, “मज़ाक नहीं कर रहा दीनदयाल जी। दरअसल, यह गद्दा मुझे अपने लिए नहीं चाहिए। मेरी बड़ी बुआ जी, सुमित्रा देवी हैं ना, उनके लिए भिजवाना है। बुआ जी के घुटनों और कमर में बहुत दर्द रहता है। उन्होंने कई बार मुझसे कहा कि बेटा शेखर, तेरी पसंद बहुत अच्छी है, मुझे सोने के लिए कोई एक अच्छा सा आरामदायक गद्दा भिजवा दे। पुरानी चारपाई पर उनकी कमर अकड़ जाती है। अब आप ही बताइए, बुढ़ापे में शरीर वैसे ही लकड़ी हो जाता है, उन्हें इन विदेशी और महँगे गद्दों की क्या समझ? बेकार में पैसे बर्बाद करने से क्या फायदा?”

दीनदयाल जी अवाक रह गए। उन्होंने चुपचाप महँगे गद्दों को किनारे करवाया और गोदाम से कुछ बहुत ही साधारण, सख्त और सस्ते रुई वाले गद्दे निकलवा कर सामने रख दिए।

शेखर सेठ ने उनमें से भी सबसे सस्ता, मात्र बारह सौ रुपये का एक गद्दा पसंद किया। उन्होंने तुरंत पैसे चुकाए और गद्दे को पैक करवाकर उसी शाम अपनी बुआ सुमित्रा देवी के घर भिजवा दिया।

बुआ सुमित्रा देवी गद्दा पाकर बहुत खुश हुईं। उनके मन में अपने भतीजे शेखर के लिए बहुत प्यार था। हालाँकि उनके अपने बेटे भी उनका ख्याल रखते थे, लेकिन शेखर पर उनका एक अलग ही हक था। वह अक्सर शेखर की कामयाबी पर गर्व करती थीं। लेकिन दुर्भाग्य से, वह सस्ता और सख्त गद्दा उनके बीमार शरीर को कोई आराम नहीं दे सका। जोड़ों के दर्द से कराहती बुआ उस गद्दे पर बमुश्किल पंद्रह-बीस दिन ही सो पाई होंगी। एक रात उनके सीने में अचानक तेज़ दर्द उठा और अस्पताल ले जाने से पहले ही, रात के लगभग डेढ़ बजे, सुमित्रा देवी इस नश्वर संसार को छोड़कर हमेशा के लिए विदा हो गईं।

इस खबर से पूरे परिवार में शोक की लहर दौड़ गई। बुआ जी की अंतिम यात्रा और आगे के कर्मकांड के लिए तैयारियाँ शुरू हो गईं। अगले दिन सुबह-सुबह शेखर सेठ एक बार फिर उसी ‘दीनदयाल फर्नीचर एंड डेकोरेटर्स’ के मालिक के पास पहुँचे। दीनदयाल जी का शहर में एक बहुत बड़ा टेंट हाउस और इवेंट मैनेजमेंट का कारोबार भी था, जो खास तौर पर बड़े घरों के आयोजनों और श्रद्धांजलि सभाओं (शोक सभा) की व्यवस्था करता था।

शेखर को अपनी दुकान पर खड़ा देख दीनदयाल जी ने गहरा शोक जताते हुए कहा, “शेखर बाबू, सुमित्रा बुआ जी के निधन का सुनकर बहुत दुःख हुआ। बेचारी अभी कुछ दिन पहले ही तो आपके हाथ का भेजा हुआ गद्दा इस्तेमाल करने लगी थीं। ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दे। कहिए, मैं इस मुश्किल घड़ी में आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?”

शेखर सेठ ने एक गहरी साँस ली और अत्यंत गंभीर स्वर में कहा, “दीनदयाल जी, बुआ जी की श्रद्धांजलि सभा और तेरहवीं का आयोजन करना है। मुझे आपके टेंट हाउस का सबसे बेहतरीन और वीआईपी सेटअप चाहिए। पूरा पंडाल वातानुकूलित होना चाहिए। बैठने के लिए गद्देदार सोफे हों, ज़मीन पर मखमली कालीन बिछा हो, और सजावट के लिए बाहर से सफेद लिली और गुलाब के फूल मँगवाए जाएँ। शहर के सभी बड़े अधिकारी, नेता और व्यापारी शोक सभा में आएँगे। खाने की व्यवस्था में कोई कमी नहीं होनी चाहिए, एक हज़ार लोगों का वीआईपी भोजन बनेगा।”

दीनदयाल जी यह सब सुनकर अंदर ही अंदर सन्न रह गए। उन्हें याद आ गया कि कैसे कुछ दिन पहले यही शेखर सेठ अपनी उसी बुआ के लिए पच्चीस हज़ार का आरामदायक गद्दा लेने में कतरा रहे थे और मात्र बारह सौ रुपये का सस्ता गद्दा लेकर गए थे।

दीनदयाल जी से रहा नहीं गया, उन्होंने हिचकिचाते हुए पूछ ही लिया, “शेखर बाबू, क्षमा कीजिएगा… पर वो क्या है ना कि श्रद्धांजलि सभा का यह पूरा वीआईपी सेटअप बहुत महँगा पड़ेगा। इसका खर्च कम से कम पाँच-सात लाख रुपये तक आ जाएगा। जब बुआ जी जीवित थीं, तब तो आपने उनके आराम के लिए…”

दीनदयाल जी अपनी बात पूरी कर पाते, उससे पहले ही शेखर सेठ ने उनकी बात काटते हुए तल्ख लहज़े में कहा, “दीनदयाल जी! बात पाँच-सात लाख रुपये के खर्च की नहीं है, बात हमारी ‘हैसियत’ की है। बुआ जी के ससुराल वालों, हमारे पूरे खानदान और शहर के रसूखदार लोगों को पता तो चलना चाहिए कि शेखर सेठ के घर का आयोजन कैसा होता है। अगर मैं वहाँ कोई साधारण सा टेंट लगवा दूँगा, तो लोग क्या कहेंगे? समाज में मेरी हैसियत और मेरी ऊँची पसंद का सवाल है। मरने वाले के सम्मान में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए।”

यह सुनकर दीनदयाल जी खामोश हो गए। उन्होंने सिर हिलाकर हामी भर दी, लेकिन उनके दिमाग में विचारों का एक बवंडर चल रहा था।

सच ही कहा गया है, यह दुनिया मुर्दों को पूजने में कोई कसर नहीं छोड़ती, लेकिन जीवित इंसान की तकलीफों को अनदेखा कर देती है। जिस इंसान को जीते जी अपनों के थोड़े से सहारे, थोड़े से आराम और अपनेपन की ज़रूरत होती है, तब यह समाज और ये तथाकथित हैसियत वाले लोग पैसे का हिसाब लगाने लगते हैं। लेकिन उसी इंसान के मर जाने के बाद, समाज में अपना रुतबा और झूठी शान दिखाने के लिए लाखों रुपये पानी की तरह बहा दिए जाते हैं।

अगर जीते जी किसी इंसान को वो सुख, वो आराम और वो सम्मान दे दिया जाए, तो शायद उसे मरने के बाद किसी महँगे पंडाल या दिखावटी आँसुओं की ज़रूरत ही ना पड़े। मरने वाले को कंधा देने के लिए तो हज़ारों लोग सिर्फ पुण्य कमाने की होड़ में आगे आ जाते हैं, लेकिन काश! वही कंधा, वही सहारा इंसान को जीते जी मिल जाए, तो इस दुनिया में कोई भी बुजुर्ग या लाचार इंसान कभी घुट-घुट कर ना मरे। प्रतिष्ठा का असली मुखौटा वही है जो हम समाज को दिखाते हैं, जबकि रिश्तों की सच्चाई उन चार दीवारों के बीच होती है जहाँ इंसान अपनी आख़िरी साँस तक अपनों की एक झलक और एक सुखद स्पर्श के लिए तरसता रह जाता है।

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 #प्रतिष्ठा का मुखौटा

मूल लेखक : विनय मिश्रा

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