सिंदूर की राख से जन्मी ‘माँ’

 माँ की आवाज में एक ऐसा खौफनाक ठहराव था जो किसी भी इंसान की रूह कंपा दे। उसने आगे कहा, “कान खोलकर सुन लो। तुम्हारी पत्नी कल्याणी आज इसी फर्श पर तुम्हारे इन जूतों के नीचे मर चुकी है।

अब जो तुम्हारे सामने खड़ी है, वो सिर्फ और सिर्फ इस लड़के की ‘माँ’ है। और एक माँ अपने बच्चे को बचाने के लिए यमराज से भी लड़ सकती है, तुम तो फिर भी सिर्फ एक शराबी कीड़े हो। आज के बाद अगर तुमने मुझ पर या मेरे बेटे पर हाथ उठाने की कोशिश भी की, तो कसम भवानी की, इसी घर में तुम्हारी चिता जला दूंगी और मुझे कोई पछतावा नहीं होगा!”

शाम ढलते ही जब आस-पड़ोस के घरों में दीये जलते, पूजा की घंटियां बजतीं और बच्चों के पढ़ने या हंसने की आवाजें आतीं, तब हमारे घर में एक अजीब सा खौफनाक सन्नाटा पसर जाता था। मेरे लिए शाम का मतलब कभी खेल-कूद या सुकून नहीं रहा। मेरे लिए शाम का मतलब था— डर, दहशत और वो अनजाना खौफ जो मुख्य दरवाजे की कुंडी बजने के साथ ही मेरी नसों में दौड़ जाता था। मेरे पिता, जिनका नाम तो ‘रमाकांत’ था,

लेकिन मेरे लिए वो सिर्फ एक खौफ का दूसरा नाम थे। मेरी स्मृतियों के कैनवास पर पिता की कोई भी ऐसी तस्वीर नहीं है जिसमें उन्होंने मुझे प्यार से पुचकारा हो, या मेरे लिए बाजार से कोई खिलौना लाए हों। मेरी यादों में बस खून जैसी लाल आंखें, लड़खड़ाते कदम, शराब की असहनीय बदबू और गालियों से सना हुआ एक ऐसा इंसान है, जिसने हमारे घर को नर्क बना दिया था।

मेरी माँ, कल्याणी, नाम की तरह ही बहुत सीधी और सहनशील थी। उनकी दुनिया घर की चारदीवारी, मेरी किताबों और पिताजी की दी हुई अनगिनत पीड़ाओं के बीच सिमटी हुई थी।

सुबह से लेकर रात तक वह कोल्हू के बैल की तरह काम करती। दूसरों के कपड़े सिलकर जो थोड़े बहुत पैसे वह जोड़ती, उसी से मेरे स्कूल की फीस जाती और घर में चूल्हा जलता। पिताजी तो बस नाम के मुखिया थे। उनका काम सिर्फ इतना था कि दिन भर कहीं जुआ खेलना, शराब पीना और रात को आकर माँ की हड्डियों पर अपना गुस्सा उतारना।

जब भी वह नशे में धुत होकर घर लौटते, तो बात-बेबात पर माँ को पीटना शुरू कर देते। कभी खाना ठंडा होने के नाम पर, तो कभी नमक कम होने के नाम पर। माँ चीखती नहीं थी, वह बस सिसकती थी। वह अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा लेती ताकि उनके चेहरे पर चोट के निशान न दिखें, क्योंकि अगले दिन उन्हें उसी मोहल्ले में कपड़े देने भी जाना होता था।

मैं उस वक्त बहुत छोटा था, कमरे के एक कोने में दुबक कर अपने कानों पर हाथ रख लेता था। मेरा खून खौलता था, मन करता था कि दौड़कर जाऊं और उस इंसान को धक्के मारकर घर से निकाल दूं जो मेरी माँ को इतनी बेरहमी से मार रहा है। लेकिन मेरे अंदर इतनी हिम्मत नहीं थी। मैं बस एक बेबस दर्शक की तरह अपनी माँ को पिटते हुए देखता रहता।

कई बार जब मैं माँ के घावों पर हल्दी का लेप लगाता, तो रोते हुए उनसे पूछता, “माँ, तुम यह सब क्यों सहती हो? हम यह घर छोड़कर चले क्यों नहीं जाते? क्यों नहीं तुम उन्हें जवाब देतीं?”

माँ हमेशा मेरे आंसुओं को अपने खुरदरे हाथों से पोंछ देती और एक फीकी सी मुस्कान के साथ कहती, “तू अभी बहुत छोटा है अविनाश। दुनियादारी नहीं समझता। औरत की किस्मत में जो लिखा होता है, उसे काटना ही पड़ता है। तू इन बातों पर ध्यान मत दे, बस अपनी पढ़ाई पर मन लगा। बड़ा होकर बड़ा अफसर बनना, फिर मेरी सारी तकलीफें खत्म हो जाएंगी।” उसका यह जवाब मुझे कभी संतुष्ट नहीं करता। मुझे समझ नहीं आता था कि एक औरत इतनी कमजोर कैसे हो सकती है कि कोई उसे रोज मवेशियों की तरह पीटे और वह उफ तक न करे। मुझे पिताजी से नफरत थी, लेकिन कहीं न कहीं माँ की इस कायरता पर मुझे गुस्सा भी आता था।

समय बीतता गया। मैं दसवीं कक्षा में पहुँच गया था। बोर्ड की परीक्षाएं नजदीक थीं। माँ ने मेरी पढ़ाई के लिए अपनी नींदें हराम कर दी थीं। वह रात-रात भर जागकर सिलाई करती ताकि मेरे लिए नई किताबें और परीक्षा की फीस का इंतजाम कर सके। उसने एक छोटी सी मिट्टी की गुल्लक में पाई-पाई जोड़कर एक हजार रुपये इकट्ठे किए थे, जो अगले दिन मुझे स्कूल में जमा करने थे।

उस रात आसमान में काले बादल छाए हुए थे और रुक-रुक कर बारिश हो रही थी। मैं अपनी किताबों में सिर गड़ाए पढ़ रहा था और माँ पास ही बैठी एक फटी हुई कमीज पर पैबंद लगा रही थी। तभी दरवाजे पर जोर से लात पड़ने की आवाज हुई। आवाज इतनी तेज थी कि लगा दरवाजा अभी चौखट से उखड़ जाएगा। माँ का चेहरा पीला पड़ गया। वह कांपते हाथों से उठी और जाकर दरवाजा खोला।

पिताजी आज कुछ ज्यादा ही नशे में थे। उनके कपड़े कीचड़ में सने हुए थे और मुंह से गालियों की ऐसी बौछार हो रही थी जिसे सुनकर कोई भी कान बंद कर ले। अंदर आते ही उन्होंने घर का सामान इधर-उधर फेंकना शुरू कर दिया।

“कहाँ हैं पैसे? निकाल वो पैसे जो तूने छिपा कर रखे हैं!” पिताजी ने दहाड़ते हुए कहा।

माँ उनके पैरों में गिर पड़ी और गिड़गिड़ाने लगी, “घर में एक फूटी कौड़ी नहीं है। जो राशन था, वो भी कल खत्म हो गया। भगवान के लिए आज सो जाइए, सुबह बात करेंगे।”

लेकिन पिताजी पर तो जैसे कोई भूत सवार था। उनकी नजर उस अलमारी पर गई जहां माँ ने मेरी गुल्लक छिपा रखी थी। उन्होंने सीधे जाकर अलमारी का दरवाजा खींचा और गुल्लक निकाल ली।

“नहीं! उसे मत तोड़िए!” माँ चीख उठी। “ये पैसे अविनाश की परीक्षा की फीस के लिए हैं। अगर कल पैसे जमा नहीं हुए तो उसका साल बर्बाद हो जाएगा। मैं आपके हाथ जोड़ती हूँ, इन्हें छोड़ दीजिए।” माँ ने पिताजी के पैर पकड़ लिए, लेकिन उन्होंने एक जोरदार लात माँ की छाती पर मारी। माँ दूर जाकर गिरी और उनका सिर दीवार से टकरा गया।

यह देखकर मेरे अंदर का सालों पुराना डर अचानक से किसी ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। मैं अपनी जगह से उठा और मैंने जाकर पिताजी का हाथ पकड़ लिया। “मत मारो मेरी माँ को! और ये पैसे वापस रखो!” मैं पूरी ताकत से चिल्लाया।

पिताजी ने एक पल के लिए मुझे हैरत से देखा। जिस बेटे ने आज तक उनकी नजरों से नजरें नहीं मिलाई थीं, वह आज उनका हाथ पकड़ कर खड़ा था। उनका अहंकार इस बगावत को बर्दाश्त नहीं कर सका। उन्होंने गुल्लक को जमीन पर दे मारा। गुल्लक के टुकड़े-टुकड़े हो गए और सिक्के-नोट फर्श पर बिखर गए। इसके बाद उन्होंने मेरी गर्दन पकड़ी और मुझे हवा में उठा लिया। उनके हाथ की पकड़ इतनी मजबूत थी कि मेरी सांसें रुकने लगीं। उन्होंने मुझे जमीन पर पटका और अपने भारी जूतों से मुझे मारने लगे। दर्द से मेरी चीख निकल गई।

तभी मैंने जो देखा, वह मेरी कल्पना से भी परे था। जिस माँ ने अपनी पूरी जिंदगी में कभी आवाज तक ऊंची नहीं की थी, जो हमेशा मार खाकर भगवान के आगे हाथ जोड़कर रोती रहती थी, वो अचानक एक झटके में खड़ी हो गई। उसके सिर से खून बह रहा था, लेकिन उसकी आंखों में आज खौफ नहीं, बल्कि साक्षात मौत नाच रही थी।

पास ही कपड़े प्रेस करने वाली लोहे की भारी इस्तरी (प्रेस) रखी हुई थी। माँ ने एक झपट्टे में उस भारी इस्तरी को उठाया और बिना एक सेकंड गँवाए, पूरी ताकत से उसे पिताजी के कंधे और पीठ के हिस्से पर दे मारा। वार इतना जोरदार था कि पिताजी के मुंह से एक भयानक चीख निकली और वो एक कटे हुए पेड़ की तरह धड़ाम से फर्श पर गिर पड़े।

कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। सिर्फ बाहर बरस रही बारिश की आवाज और पिताजी के कराहने की आवाज आ रही थी। वो दर्द से तड़प रहे थे और आश्चर्यचकित नजरों से माँ को देख रहे थे। उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था कि जिस गाय को वो रोज डंडे से हांकते थे, उसने आज शेरनी बनकर उन पर वार किया है।

मैं भी जमीन पर पड़ा, सहमा हुआ अपनी माँ को देख रहा था। माँ का सीना तेजी से ऊपर-नीचे हो रहा था। उसके हाथ अभी भी कांप रहे थे, लेकिन वह पीछे नहीं हटी। वह पिताजी के पास गई, उसकी आंखें अंगारे की तरह दहक रही थीं।

पिताजी ने कराहते हुए कुछ गालियां बकने की कोशिश की, लेकिन माँ ने अपनी उंगली उनकी आंखों के सामने तानते हुए ऐसी दहाड़ लगाई कि कमरे की दीवारें भी कांप उठीं।

“खबरदार! अगर एक लफ्ज भी और निकाला मुंह से। मैंने अपनी पूरी जवानी तुम्हारी इस मार-पीट और गालियों को सहते हुए निकाल दी, क्योंकि मुझे लगता था कि तुम मेरे पति हो, मेरा सिंदूर हो। तुमने मुझे खून के आंसू रुलाए, मैंने सहा। तुमने मुझे जानवरों की तरह पीटा, मैंने सहा। लेकिन आज… आज तुमने मेरे बेटे पर हाथ उठाया है! उसके भविष्य को कुचलने की कोशिश की है!”

माँ की आवाज में एक ऐसा खौफनाक ठहराव था जो किसी भी इंसान की रूह कंपा दे। उसने आगे कहा, “कान खोलकर सुन लो। तुम्हारी पत्नी कल्याणी आज इसी फर्श पर तुम्हारे इन जूतों के नीचे मर चुकी है। अब जो तुम्हारे सामने खड़ी है, वो सिर्फ और सिर्फ इस लड़के की ‘माँ’ है। और एक माँ अपने बच्चे को बचाने के लिए यमराज से भी लड़ सकती है, तुम तो फिर भी सिर्फ एक शराबी कीड़े हो। आज के बाद अगर तुमने मुझ पर या मेरे बेटे पर हाथ उठाने की कोशिश भी की, तो कसम भवानी की, इसी घर में तुम्हारी चिता जला दूंगी और मुझे कोई पछतावा नहीं होगा!”

पिताजी की आंखों में पहली बार मैंने खौफ देखा। वो दर्द से कराहते हुए चुपचाप एक कोने में खिसक गए। उनके अंदर का वो क्रूर भेड़िया आज एक ‘माँ’ के रौद्र रूप के आगे दुम दबा चुका था।

माँ ने इस्तरी किनारे रखी और फर्श पर बिखरे हुए पैसों को समेटने लगी। उसने खून से सने अपने हाथों से वो पैसे उठाए, उन्हें साफ किया और मेरे पास आई। उसने मुझे जमीन से उठाया, मेरे आंसुओं को पोछा और वो पैसे मेरे हाथ में रख दिए।

“जा अविनाश, अपनी किताबों के पास जा,” उसने अत्यंत शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। “तुझे बहुत पढ़ना है। अब तुझे किसी से डरने की जरूरत नहीं है। इस आदमी का साया अब कभी तेरी जिंदगी पर नहीं पड़ेगा। मैंने अपनी जिंदगी एक कायर औरत की तरह जी ली, लेकिन तेरी माँ कभी कायर नहीं मरेगी।”

मैं अवाक खड़ा बस अपनी माँ को देख रहा था। मैं हमेशा सोचता था कि माँ मुझसे कहेगी कि तू अभी बच्चा है, चुप रह। लेकिन आज उसने मुझे बच्चा नहीं समझा था। आज उसने मुझे उस सच्चाई से रूबरू करा दिया था कि दुनिया की सबसे बड़ी ताकत किसी मर्द की बांहों में नहीं, बल्कि एक औरत के मातृत्व में छिपती है। उस रात के बाद पिताजी ने कभी शराब पीकर घर में हंगामा करने की जुर्रत नहीं की। उस रात सचमुच एक पत्नी मर गई थी और एक अपराजेय माँ का जन्म हुआ था।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या एक औरत को अपने स्वाभिमान और अपने बच्चों की रक्षा के लिए तभी खड़ा होना चाहिए जब पानी सिर से ऊपर चला जाए, या उसे शुरुआत से ही गलत का विरोध करना चाहिए? क्या समाज सिर्फ उसी औरत को ‘आदर्श’ मानता है जो चुपचाप सब सहती रहे? आप इस कहानी और कल्याणी के कदम के बारे में क्या सोचते हैं, कमेंट करके जरूर बताएँ।

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