पसीने से लिखी तकदीर

बेटी की बातें सुनकर सावित्री का दिल छलनी हो गया। एक माँ के लिए अपने जीते-जी बच्चे के भविष्य पर ऐसा कुठाराघात सहना बहुत मुश्किल था। उसे लगा कि बाहर जाकर उन ढोंगी बाबा को खूब खरी-खोटी सुनाए, लेकिन घर की मर्यादा और सास के डर से वह खून का घूंट पीकर रह गई। उसने अपने आँसू पोंछे, चूल्हे की आग धीमी की और नैना को अपने सीने से लगा लिया।

“मेरी बहादुर बेटी,” सावित्री ने नैना का माथा चूमते हुए कहा, “तुझे पता है भगवान ने हाथों की लकीरें उँगलियों के नीचे क्यों दी हैं? ताकि हम उन्हें अपनी मुट्ठी में बंद कर सकें। किस्मत हाथों की लकीरों में नहीं, हमारे माथे के पसीने में होती है। स्वामी जी को भविष्य नहीं पता। तू जब दिन-रात एक करके मेहनत करेगी और अपनी किताबों से सच्ची दोस्ती कर लेगी, तो यह लकीरें खुद-ब-खुद बदल जाएंगी। जो लोग हाथों की लकीरों पर भरोसा करते हैं, वो कमजोर होते हैं। तू मेरी शेरनी है, तू अपनी किस्मत खुद बनाएगी।”

बनारस के पुराने मोहल्ले में स्थित पंडित रमाकांत जी की पुरानी हवेली में आज सुबह से ही गजब की चहल-पहल थी। घर के दालान से लेकर रसोई घर तक हर जगह बस काम ही काम बिखरा पड़ा था। दस साल की नन्ही नैना अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से यह सब अचरज से देख रही थी। हवेली के आँगन में गेंदे के फूलों की लड़ियां सजाई जा रही थीं और रसोई से शुद्ध देसी घी में बन रही जलेबियों और हलवे की सोंधी खुशबू पूरे घर में महक रही थी। नैना की माँ, सावित्री, सुबह चार बजे से ही चूल्हे के सामने बैठी तरह-तरह के पकवान बनाने में जुटी हुई थी। पसीने से उसका चेहरा भीग चुका था, लेकिन साँस लेने की भी फुर्सत नहीं थी।

नैना अपनी दादी, कौशल्या देवी के पास दौड़कर गई, जो मसनद के सहारे बैठी नौकरों को निर्देश दे रही थीं। “दादी, आज घर में कौन सा त्योहार है? माँ सुबह से इतना सारा खाना क्यों बना रही है?”

कौशल्या देवी ने अपने चश्मे को नाक पर टिकाते हुए कहा, “अरी ओ नैना, तू बीच में मत घूम। आज कोई त्योहार नहीं है, बल्कि काशी से परम पूज्य स्वामी ब्रह्मानंद जी हमारे घर पधार रहे हैं। वे बहुत बड़े त्रिकालदर्शी हैं। जा, तू भी जाकर नहा-धो ले और साफ कपड़े पहन ले।”

नैना अपना सिर हिलाकर नहाने के लिए दौड़ पड़ी। घर में तैयारियां जोरों पर थीं। दोपहर होते-होते स्वामी ब्रह्मानंद जी अपने शिष्यों के साथ हवेली में पधारे। पूरे घर ने उनके चरण स्पर्श किए। घर के पुरुष, नैना के पिता माधव जी, हाथ जोड़े खड़े थे। पूजा-पाठ का भव्य आयोजन हुआ और उसके बाद स्वामी जी को छप्पन भोग परोसे गए।

भोजन के उपरांत स्वामी जी दालान में बिछे एक विशाल तख्त पर विश्राम करने के लिए बैठे। कौशल्या देवी हाथ में मोरपंख का पंखा लेकर उन्हें हवा करने लगीं। माहौल थोड़ा शांत हुआ तो कौशल्या देवी ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, आपकी कृपा से घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं है। व्यापार भी अच्छा चल रहा है। बस मन में एक ही टीस है… माधव की शादी को बारह साल हो गए, लेकिन आँगन में अभी तक कुलदीपक नहीं खेला। एक पोते का मुँह देख लूँ तो शांति से प्राण त्यागूँ।”

उसी समय नैना खेलते हुए वहाँ आ गई। कौशल्या देवी ने उसे पास बुलाया और स्वामी जी से कहा, “महाराज, जरा इस लड़की के हाथों की रेखाएं तो देखिए। इसका भविष्य कैसा है? इसके भाग्य में क्या लिखा है?”

स्वामी जी ने नैना के छोटे-छोटे हाथों को अपने हाथ में लिया। कुछ देर तक वे उसकी हथेलियों की लकीरों को घूरते रहे, उनके माथे पर चिंता की लकीरें उभर आईं। फिर उन्होंने अपनी आँखें बंद कीं और कुछ मंत्र बुदबुदाए। एक गहरी साँस छोड़ते हुए वे बोले, “कौशल्या बहन, सच कहूँ तो इस कन्या के भाग्य के सितारे बहुत ही कमजोर हैं। इसके हाथों में विद्या की रेखा टूटी हुई है और भाग्य रेखा तो ना के बराबर है। यह पढ़ाई-लिखाई में कुछ खास नहीं कर पाएगी। बहुत अड़चनें आएंगी। इसका जीवन बस चूल्हे-चौके तक ही सीमित रहेगा और कम उम्र में ही इसका विवाह किसी साधारण से परिवार में हो जाएगा। इसकी किस्मत में बहुत संघर्ष लिखा है।”

यह सुनकर कौशल्या देवी का चेहरा उतर गया। लेकिन तभी स्वामी जी के चेहरे पर एक मुस्कान आ गई और वे बोले, “परंतु निराश मत होइए। मेरे ज्ञान के अनुसार, इस कन्या के भाग्य के अंधकार को मिटाने के लिए आपके घर में जल्द ही एक सूर्य का उदय होने वाला है। अगले ही साल तुम्हारे घर में एक पुत्र का जन्म होगा। वह राजयोग लेकर पैदा होगा। उसके जन्म लेते ही माधव का व्यापार दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करेगा। वह लड़का बहुत कुशाग्र बुद्धि का होगा और तुम्हारे खानदान का नाम पूरे शहर में रोशन करेगा।”

यह सुनकर कौशल्या देवी की आँखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने तुरंत अपने गले से सोने की चेन उतारकर स्वामी जी के चरणों में रख दी। “महाराज, आपने तो मेरे मन की मुराद पूरी कर दी। अगर मेरे घर कुलदीपक आ गया, तो मैं आपको सोने से तौल दूँगी।”

इन सारी बातों को नन्ही नैना चुपचाप सुन रही थी। उसे ‘राजयोग’ या ‘कुलदीपक’ का मतलब तो नहीं पता था, लेकिन इतना समझ आ गया था कि स्वामी जी ने उसके बारे में कुछ बहुत बुरा कहा है। वह रोती हुई रसोई में अपनी माँ के पास भागी।

“माँ! यह किस्मत क्या होती है?” नैना ने सुबकते हुए पूछा।

सावित्री ने चौंककर अपनी बेटी को देखा, “क्या हुआ मेरी बच्ची? तू रो क्यों रही है? और यह किस्मत की बात कहाँ से आ गई?”

“माँ, दादी के स्वामी जी कह रहे थे कि मेरी किस्मत बहुत खराब है। मैं पढ़-लिख नहीं पाऊंगी और मेरी शादी जल्दी हो जाएगी। माँ, मैं शादी नहीं करूंगी, मुझे तो बहुत पढ़ना है! क्या सच में मेरे हाथों में कुछ नहीं लिखा?”

बेटी की बातें सुनकर सावित्री का दिल छलनी हो गया। एक माँ के लिए अपने जीते-जी बच्चे के भविष्य पर ऐसा कुठाराघात सहना बहुत मुश्किल था। उसे लगा कि बाहर जाकर उन ढोंगी बाबा को खूब खरी-खोटी सुनाए, लेकिन घर की मर्यादा और सास के डर से वह खून का घूंट पीकर रह गई। उसने अपने आँसू पोंछे, चूल्हे की आग धीमी की और नैना को अपने सीने से लगा लिया।

“मेरी बहादुर बेटी,” सावित्री ने नैना का माथा चूमते हुए कहा, “तुझे पता है भगवान ने हाथों की लकीरें उँगलियों के नीचे क्यों दी हैं? ताकि हम उन्हें अपनी मुट्ठी में बंद कर सकें। किस्मत हाथों की लकीरों में नहीं, हमारे माथे के पसीने में होती है। स्वामी जी को भविष्य नहीं पता। तू जब दिन-रात एक करके मेहनत करेगी और अपनी किताबों से सच्ची दोस्ती कर लेगी, तो यह लकीरें खुद-ब-खुद बदल जाएंगी। जो लोग हाथों की लकीरों पर भरोसा करते हैं, वो कमजोर होते हैं। तू मेरी शेरनी है, तू अपनी किस्मत खुद बनाएगी।”

माँ के इन शब्दों ने नन्ही नैना के मन में एक बीज बो दिया—एक ऐसा बीज जिसे उसके दृढ़ संकल्प और मेहनत ने सींचना शुरू कर दिया।

स्वामी जी की भविष्यवाणी के ठीक ग्यारह महीने बाद सावित्री ने एक बेटे को जन्म दिया, जिसका नाम रखा गया चिराग। चिराग के पैदा होते ही हवेली में जश्न का माहौल बन गया। कौशल्या देवी तो खुशी से पागल हो गई थीं। उन्होंने पूरे मोहल्ले में मिठाइयां बंटवाईं। इत्तेफाक से उसी साल माधव जी को व्यापार में एक बहुत बड़ा सरकारी टेंडर मिल गया, जिससे घर में पैसों की बरसात होने लगी। कौशल्या देवी का विश्वास स्वामी जी की बातों पर सौ प्रतिशत पक्का हो गया। “मेरा चिराग तो साक्षात लक्ष्मी और कुबेर लेकर आया है, राजयोग है मेरे पोते का!” वे दिन भर यही रटती रहतीं।

समय अपनी गति से आगे बढ़ने लगा। घर की पूरी व्यवस्था चिराग के इर्द-गिर्द घूमने लगी। चिराग को सोने का निवाला खिलाया जाता। उसके लिए सबसे महंगे खिलौने, सबसे अच्छे कपड़े और ब्रांडेड चीजें आने लगीं। कौशल्या देवी दिन में दस बार उसकी नजर उतारतीं। इस लाड़-प्यार और अंधविश्वास के बीच नैना जैसे कहीं खो सी गई। दादी का सारा ध्यान सिर्फ चिराग पर था। नैना के लिए साल में एक बार कपड़े आते, वह भी बहुत साधारण।

एक दिन नैना उदास होकर अपनी माँ से बोली, “माँ, दादी अब मुझसे बिल्कुल प्यार नहीं करतीं। जब से चिराग आया है, वे मुझे डांटती ही रहती हैं। क्या मैं इतनी बुरी हूँ?”

सावित्री ने आँखों में आंसू छुपाते हुए उसे गले लगाया, “पगली, दादी तुझसे भी प्यार करती हैं। चिराग अभी छोटा है ना, इसलिए उसे ज्यादा ध्यान की जरूरत है। तू बस अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे। तेरा सबसे बड़ा हथियार तेरी किताबें हैं।”

नैना ने अपनी माँ की बात को गांठ बांध लिया। वह अपना सारा समय पढ़ाई में लगाने लगी। घर के एक छोटे से कोने में, एक साधारण सी टेबल पर बैठकर वह रात-रात भर पढ़ती। स्कूल में हमेशा प्रथम आती, लेकिन दादी कभी उसकी मार्कशीट देखकर खुश नहीं होतीं, बस एक ही जवाब मिलता— “लड़कियों को इतना पढ़ाकर क्या करना है, आखिर में तो रोटियां ही बेलनी हैं।”

दूसरी तरफ चिराग बड़ा हो रहा था। जरूरत से ज्यादा लाड़-प्यार, हर मांग का तुरंत पूरा होना और बिना मांगे ही सब कुछ मिल जाने से चिराग बेहद जिद्दी और बिगड़ैल हो गया था। जब वह स्कूल जाने लायक हुआ, तो उसे शहर के सबसे महंगे इंटरनेशनल स्कूल में डाला गया। लेकिन पढ़ाई में उसका बिल्कुल मन नहीं लगता था। स्कूल से रोज शिकायतें आतीं—कभी किसी बच्चे को पीटने की, कभी क्लास बंक करने की, तो कभी टीचर से बदतमीजी करने की।

पिता माधव जी कई बार चिराग को सुधारने के लिए उस पर सख्ती करने की कोशिश करते, लेकिन कौशल्या देवी ढाल बनकर खड़ी हो जातीं। “मेरे राजयोग वाले पोते को हाथ मत लगाना! लड़के तो बचपन में शैतानी करते ही हैं, बड़ा होकर अपने आप सुधर जाएगा। मेरा चिराग तो खानदान का नाम रोशन करेगा।” दादी के इस अंध समर्थन ने चिराग के हौसले इतने बढ़ा दिए कि वह पढ़ाई-लिखाई छोड़कर गलत लड़कों की संगत में बैठ गया।

वर्ष बीतते गए। नैना ने अपनी स्कूली पढ़ाई बहुत शानदार अंकों से पूरी की और दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश लिया। इसके बाद उसने अपनी असली मंजिल तय की—उसे भारतीय प्रशासनिक सेवा (UPSC) की परीक्षा पास करके आईएएस अफसर बनना था। इसके लिए उसने खुद को एक कमरे में कैद कर लिया। दिन के अठारह-अठारह घंटे वह किताबों में डूबी रहती। उसकी आँखों के नीचे काले घेरे आ गए थे, उंगलियों पर पेन पकड़ने से निशान पड़ गए थे।

वहीं दूसरी ओर, चिराग अब उन्नीस साल का हो चुका था, लेकिन उसने बामुश्किल 12वीं की परीक्षा पास की थी। पढ़ाई छोड़कर वह दिन भर अपने दोस्तों के साथ महंगी बाइकों पर शहर में आवारागर्दी करता रहता। उसने घर से पैसे चुराने भी शुरू कर दिए थे। माधव जी बहुत परेशान रहने लगे थे। एक दिन तो हद ही हो गई। चिराग ने नशे की हालत में शहर के एक रसूखदार नेता के बेटे से सरेआम मारपीट कर ली और उसे बुरी तरह घायल कर दिया।

रात को हवेली के बाहर पुलिस की जीप आकर रुकी। इंस्पेक्टर ने माधव जी को बताया कि उनके बेटे पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज हुआ है और अगर रातों-रात लाखों रुपये देकर मामला नहीं सुलझाया गया, तो चिराग को जेल की हवा खानी पड़ेगी। उस रात हवेली में कोहराम मच गया। माधव जी ने अपना सिर पकड़ लिया, सावित्री रो रही थी। कौशल्या देवी जो कल तक अपने पोते के राजयोग की कसमें खाती थीं, आज जमीन पर बैठी पछाड़ें खा रही थीं। जिस पोते के लिए उन्होंने सारी उम्र अपनी पोती को तिरस्कृत किया, उसी पोते ने आज उनकी इज्जत सरेआम नीलाम कर दी थी। लाखों रुपये देकर और बहुत हाथ-पैर जोड़कर माधव जी ने अपने बेटे को जेल जाने से बचाया, लेकिन उनकी आत्मा टूट चुकी थी।

ठीक उसी रात, एक और तूफान आया, लेकिन यह तूफान बर्बादी का नहीं, बल्कि सफलता का था।

रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। घर में मातम जैसा सन्नाटा पसरा था, तभी नैना का फोन बजा। वह दिल्ली से बोल रही थी। फोन सावित्री ने उठाया।

“माँ…” उधर से नैना की रुंधी हुई और कांपती हुई आवाज आई।

“क्या हुआ बेटा? तू ठीक तो है?” सावित्री घबरा गई।

“माँ, आज यूपीएससी का फाइनल रिजल्ट आ गया है…” नैना फूट-फूट कर रोने लगी। “माँ… मैंने परीक्षा पास कर ली है। मेरी पूरे भारत में तीसरी रैंक आई है माँ! मैं आईएएस अफसर बन गई हूँ।”

यह सुनते ही सावित्री के हाथ से फोन छूट गया। उसने जोर-जोर से रोना शुरू कर दिया। माधव जी घबराकर दौड़े आए। जब सावित्री ने उन्हें यह खबर दी, तो माधव जी भी अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख पाए और फूट-फूट कर रो पड़े। जो इज्जत उनके बेटे ने आज मिट्टी में मिला दी थी, उसी इज्जत को उनकी बेटी ने आज आसमान के सबसे ऊंचे शिखर पर पहुंचा दिया था।

कौशल्या देवी वहीं कोने में बैठी सब सुन रही थीं। उनके कानों में बरसों पहले कहे गए स्वामी जी के शब्द गूंजने लगे— ‘लड़की की किस्मत खराब है, यह कुछ नहीं कर पाएगी… लड़का राजयोग लेकर पैदा होगा।’ आज उन्हें समझ आ रहा था कि अंधविश्वास की पट्टी ने उन्हें कितना अंधा कर दिया था।

कुछ दिनों बाद नैना बनारस लौटी। शहर भर के लोग उसका स्वागत करने स्टेशन पर पहुंचे थे। ढोल-नगाड़ों के साथ उसे हवेली तक लाया गया। मोहल्ले के एक बड़े मैदान में उसके सम्मान के लिए एक समारोह का आयोजन किया गया था। मंच पर शहर के बड़े-बड़े अधिकारी, विधायक और खुद माधव जी का परिवार बैठा था।

नैना को जब मंच पर बोलने के लिए बुलाया गया, तो पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। नैना उठी, लेकिन माइक की तरफ जाने से पहले वह सीधे अपनी दादी कौशल्या देवी के पास गई। उसने दादी का हाथ पकड़ा और उन्हें अपने साथ मंच के बीचों-बीच ले आई।

पूरा पंडाल शांत था। नैना ने माइक पकड़ा और एक गहरी साँस लेते हुए कहा—

“आज मैं जो कुछ भी हूँ, वह सिर्फ और सिर्फ अपनी माँ के विश्वास और मेरी दादी की वजह से हूँ। आप लोग हैरान होंगे कि मैं दादी का नाम क्यों ले रही हूँ। आज से पंद्रह साल पहले, जब मैं बहुत छोटी थी, तब इसी शहर के एक बहुत बड़े और सिद्ध माने जाने वाले स्वामी जी ने मेरे हाथों की लकीरें देखकर दादी से कहा था कि मेरे भाग्य में विद्या नहीं है, मेरी किस्मत खराब है और मैं जीवन में कुछ नहीं कर पाऊंगी। उन्होंने मेरे भाई के लिए राजयोग की भविष्यवाणी की थी।”

नैना की आवाज में एक अजीब सा ठहराव था, “उस दिन मैं बहुत रोई थी। मुझे लगा था कि मेरी जिंदगी खत्म हो गई है। लेकिन मेरी माँ ने मुझसे एक बात कही थी, कि किस्मत हाथों की लकीरों में नहीं, माथे के पसीने में होती है। उसी दिन मैंने दृढ़ निश्चय कर लिया था कि मैं इन भविष्यवाणियों को गलत साबित करूंगी। मैं अपनी किस्मत अपनी कलम से लिखूंगी। अगर उस दिन वो बाबा मेरी किस्मत को खराब न बताते, तो शायद मेरे अंदर इतनी आग पैदा ही नहीं होती। हाथों की लकीरें अक्सर धोखा दे जाती हैं, क्योंकि तकदीर तो उनकी भी होती है जिनके हाथ नहीं होते।”

नैना ने दादी की तरफ देखा जिनकी आँखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। नैना ने अपने गले से सम्मान में मिला हुआ सोने का मेडल उतारा और दादी के गले में पहना दिया।

“दादी, राजयोग किसी के पैदा होने से नहीं मिलता, राजयोग तो इंसान की मेहनत, उसकी नीयत और उसके कर्मों से बनता है।”

कौशल्या देवी ने रोते हुए अपनी पोती को सीने से लगा लिया। आज पहली बार उन्होंने अपनी पोती को सच्चे मन से अपनाया था। उन्हें अपनी सोच पर शर्मिंदगी थी, लेकिन अपनी पोती पर असीम गर्व। पूरे मैदान में एक बार फिर तालियों की गूंज उठ खड़ी हुई, जो रूढ़िवादी सोच और झूठी भविष्यवाणियों के मुंह पर एक करारा तमाचा थी।

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#पसीने से लिखी तकदीर

लेखिका : गरिमा चौधरी

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