रिश्तों की वसीयत

कृतिका अचानक सास को वहां देखकर हक्की-बक्की रह गई। वह लड़खड़ाती जुबान से बोली, “मां… मां जी, मेरा वो मतलब नहीं था। मैं तो बस यह कह रही थी कि दीदी का फायदा हो गया। आखिर उन्होंने दो साल आपकी सेवा जो की है, उसका फल तो उन्हें मिलना ही था।” “सेवा का फल?” कावेरी … Read more

अनकहे रिश्ते

देवकी जी की आँखें शून्य में ठहर गईं। जो दर्द उन्होंने सालों से अपने सीने में दबा रखा था, वह अब बाहर आने के लिए तड़प रहा था। उन्होंने गहरी सांस ली और कहा, “हाँ बेटा, तूने मुझे फिर से जीना सिखाया है। मेरा सिद्धार्थ… वह मेरा सब कुछ था। मैं तुझे सब बताऊँगी।” कबीर … Read more

मज़बूत विश्वास

“माँ जी, मैंने आपको कितनी बार मना किया है कि आप रसोई के किसी भी काम में हाथ मत लगाया कीजिए। ये बर्तन मैं खुद मांज लूंगी और रोटियां भी सेंक लूंगी। आप बस अपने कमरे में जाकर आराम कीजिए।” मेघा ने अपनी सास कमला देवी के हाथ से आटे की परात लेते हुए बहुत … Read more

कच्चे धागों का पक्का रिश्ता

नैना  ने राधिका की आँखों में देखते हुए आगे कहा, “राधिका, तुमने मुझे हमेशा अपनी बड़ी बहन माना है ना? तो आज से मेरे ये दोनों भाई, तुम्हारे भी भाई हुए। इस घर की दहलीज के अंदर अगर मैंने तुम्हें अपनी बहन मान लिया है, तो मायके से आए ये मेरे भाई आज से तुम्हारे … Read more

रिश्तों का तराज़ू

सुदीप्ति के माता-पिता ने जब अपनी बेटी की आँखों में आँसू और चेहरे पर मायूसी देखी, तो उनका दिल बैठ गया। उन्होंने विहान और उसके परिवार से बात करने की कोशिश की, ताकि रिश्ते को बचाया जा सके। लेकिन विहान के परिवार का रवैया बेहद अड़ियल था। दोनों परिवारों के बीच की बातचीत जल्द ही … Read more

 रिश्तों की डोर

 सुमित्रा जी अपने बेटे को इस कदर टूटता हुआ देख कर अंदर तक हिल गईं। उनका कलेजा फटने लगा। जिस बेटे की खुशी के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर दिया था, आज वही बेटा उनकी वजह से अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी खो रहा था। उनका अहंकार और उनकी असुरक्षा अचानक आंसुओं में … Read more

खानदान का चिराग: एक नई सुबह

 सुरभि जो अब तक खामोश थी, आज उसके सब्र का पैमाना छलक गया। वह हमेशा अपनी सास का सम्मान करती थी और उनकी कड़वी बातों को घूंट बनाकर पी जाती थी, लेकिन आज बात सिर्फ उसकी नहीं, उसकी बेटी मायरा के वजूद की थी।  सुरभि रसोई में सबके लिए अदरक वाली चाय और पोहा बना … Read more

मोहब्बत की कसौटी: चाहना और निभाना

रघुनाथ जी अपने घर के बरामदे में बैठे हुए बाहर हो रही झमाझम बारिश को देख रहे थे। उनके हाथों में चाय का प्याला था, जिससे उठती हुई भाप उनके चश्मे के शीशे को थोड़ा धुंधला कर रही थी। लेकिन उनके मन के भीतर चल रही उधेड़बुन बाहर की बारिश से कहीं ज़्यादा तेज़ थी। … Read more

वो छाँव जो कभी बोझ नहीं बनी: एक पोते का समर्पण

शहर के उस शांत और एकांत श्मशान घाट पर आज आसमान भी जैसे मातम मना रहा था। हल्की-हल्की बूंदाबांदी हो रही थी और हवा में एक अजीब सी उदासी घुली हुई थी। श्मशान के बीचों-बीच जलती हुई चिता की लपटें बारिश की बूंदों से संघर्ष कर रही थीं। चिता के ठीक सामने पच्चीस साल का … Read more

मज़बूत नींव की खुरदरी ईंट

निधि अपने माता-पिता की इकलौती और सबसे लाडली बेटी थी। उसके मायके का माहौल ऐसा था कि अगर वह सुबह के दस बजे तक भी सोती रहे, तो उसकी माँ दबे पाँव कमरे में आती और बहुत ही प्यार से उसके माथे पर हाथ फेरकर कहती, “बेटा उठ जा, चाय ठंडी हो रही है।” निधि … Read more

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