एक अनकहा रिश्ता: जब दोस्त बनी भाभी

 भैया ने मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा, “क्योंकि मुझे तुम्हारी पसंद पर और तुम्हारी भाभी की समझदारी पर पूरा भरोसा था। लेकिन मैं इंतजार कर रहा था कि सिद्धार्थ अपने पैरों पर खड़ा हो जाए, ताकि मैं ताऊजी और पिताजी के सामने उसका पक्ष मजबूती से रख सकूं। तुम्हारी भाभी ने … Read more

दहलीज का स्वाभिमान

 “यह घर जितना आपके बेटे का है, कानूनन और नैतिक रूप से उतना ही मेरा भी है,” अनिका ने बहुत ठंडे लेकिन अडिग स्वर में कहा। “और रही बात मेरी माँ की, तो अपनी जुबान से मेरी माँ का नाम लेने की हिम्मत दोबारा मत कीजिएगा। मेरी माँ ने मुझे झुकना नहीं, सच के लिए … Read more

रूह के रिश्ते

बैकुंठ बाबू की आवाज़ में एक पिता का अधिकार और एक संत का आशीर्वाद गूंज उठा, “अनन्या बेटा, ईश्वर ने शायद उस स्वार्थी निशांत को हमारी ज़िंदगी से इसीलिए दूर किया था ताकि वह तुम्हारे जीवन में सिद्धार्थ जैसे फरिश्ते को भेज सके। जिस इंसान ने बिना किसी लालच के, सिर्फ हमारी तड़प देखकर हमें … Read more

संस्कारों की पूँजी

रोहन की एक-एक बात मेरे कानों में अमृत की तरह घुल रही थी। मेरा गला भर आया। एक मध्यमवर्गीय माँ के लिए इससे बड़ा दिन और क्या हो सकता है कि जिस बेटे की उँगली पकड़कर उसने चलना सिखाया था, आज वही बेटा उसका संबल बनकर खड़ा था और कह रहा था कि ‘माँ, अब … Read more

आँगन की छाँव

 आंचल की आँखों से झर-झर आँसू बहने लगे। उसने थाली को पास की मेज पर रखा और झुककर प्रमिला के पैर छूने लगी। प्रमिला ने तुरंत उसे ऊपर उठाया और अपने गले से लगा लिया। इस बार दोनों के आंसुओं में कोई दर्द नहीं था, बल्कि एक ऐसा पवित्र संतोष था जो शब्दों की सीमाओं … Read more

विश्वास का सिंदूर

 कबीर की बात सुनकर आंगन में खड़ी सभी स्त्रियों की आँखें भर आईं। कल्याणी जी आगे बढ़ीं और उन्होंने अवनी के सिर पर हाथ रखते हुए कहा कि बहू, कबीर सच कह रहा है। शास्त्रों में ‘आपद्धर्म’ का विधान है। जब शरीर साथ न दे, तो भावना ही सबसे बड़ी पूजा बन जाती है। तूने … Read more

रिश्तों की उलझन

 सुमित्रा जी ने नीलिमा को गले से लगा लिया और ममता भरे स्वर में कहा, “बहू, तू हमारी बेटी जैसी है। नए घर में आकर खुद को ढालना आसान नहीं होता, हम तेरी परेशानी समझते हैं। इस घर पर जितना सौरभ का हक है, उतना ही तेरा भी है। तेरे माता-पिता हमारे समधी हैं, उनका … Read more

दहलीज की धूप

 “नहीं देवांश, मुझे आज अपनी बात पूरी करने दीजिए,” अवनि ने हाथ उठाकर बहुत शांति से अपने पति को रोका। फिर वह दीनानाथ जी की आँखों में आँखें डालकर बोली, “बाबूजी, आपने मुझे हमेशा बेटी कहा, लेकिन मुझे कभी उस बेटी जैसा अधिकार नहीं दिया जो आपकी विरासत को आगे बढ़ा सके। आपने मुझे एक … Read more

सात फेरों से परे एक नई सुबह

अनिमेष ने ऋचा  के आंसुओं को पोंछा और बड़े संयम से कहा, “ऋचा , पलायन किसी समस्या का समाधान नहीं है। नौकरी छोड़ना तुम्हारी मेहनत और तुम्हारी पहचान का अपमान होगा। मां गलत नहीं हैं, बस उनका दृष्टिकोण उस युग में गढ़ा गया है जहां औरतें केवल चारदीवारी में रहती थीं। हमें उनसे लड़कर नहीं, … Read more

रिश्तों की अनकही धूप-छांव

 देवेन्द्र ने अपमान से बचने का एक ही रास्ता निकाला था—मौन। उन्होंने धीरे-धीरे बोलना ही बंद कर दिया था। वह केवल उतना ही बोलते जितना बेहद जरूरी होता। कादम्बरी का मूड देखकर ही कमरे में कदम रखते। कई बार उन्होंने हाथ जोड़कर कादम्बरी से कहा भी, “कादम्बरी, जिंदगी की शाम हो चुकी है। अब तो … Read more

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