अपना पराया

 घर के इस तनाव का सबसे आसान और मूक शिकार बना माधव। सरिता को लगता था कि घर के सारे संकटों की जड़ माधव ही है। “यह दिन भर खाता है, कपड़े गंदे करता है, कभी नल खुला छोड़ देता है तो कभी बर्तन तोड़ देता है! इसके इलाज और दवाओं में हर महीने दो-तीन हज़ार स्वाहा हो जाते हैं! आखिर हम कब तक इस जिंदा लाश को अपनी छाती पर ढोते रहेंगे?” सरिता अक्सर आलोक पर बरस पड़ती थी। आलोक बेबसी से सिर पकड़कर बैठ जाता। वह अपने उस भाई को कैसे बेदखल कर देता, जिसे माँ मरते समय उसकी गोद में सौंप गई थी? माँ के अंतिम शब्द आलोक के कानों में अब भी गूँजते थे—”आलोक, माधव भले ही दुनिया के लिए बोझ हो, पर वह तेरे ही खून का टुकड़ा है। उसका ध्यान रखना बेटा।”

बरसात की नम हवाओं के बीच हवेलीनुमा पुराने मकान के बरामदे में काँच के बर्तन के टूटने की तीखी आवाज़ गूँज उठी। आवाज़ के थमते ही एक तेज़ और तल्ख चीख ने घर की दीवारों को हिला दिया। “मेरा फैसला पत्थर की लकीर है! आज शाम ढलने से पहले या तो यह पागल इस घर की दहलीज लांघेगा, या फिर मैं अपने दोनों बच्चों को लेकर हमेशा के लिए मायके चली जाऊँगी!” यह आवाज़ सरिता की थी। वह अपने दोनों हाथ कमर पर टिकाए, आँखों में अंगारे लिए दलान के बीचों-बीच खड़ी थी। उसके ठीक पीछे उसके दोनों किशोर बच्चे, आयुष और साक्षी, सिर झुकाए मगर अपनी माँ के गुस्से के मौन समर्थन में खड़े थे।

कमरे के एक अंधेरे कोने में ज़मीन पर बैठा माधव सहमा हुआ सा अपनी फटी हुई कमीज़ के छोर को उँगलियों पर लपेट रहा था। ज़मीन पर चाय का कुल्हड़ बिखर चुका था। माधव की उम्र बत्तीस साल के करीब थी, उसका शरीर किसी पहलवान की तरह सुगठित और चौड़ा था, लेकिन उसकी आँखें और मुस्कान किसी चार साल के अबोध बालक जैसी थीं। जब प्रकृति किसी इंसान की काया गढ़ती है, तो कभी-कभी उसके भीतर चेतना का संतुलन साधने में चूक कर बैठती है। माधव उसी अधूरी कारीगरी का जीवित प्रमाण था। वह बोलता तो शब्द लड़खड़ा जाते थे, लार टपकने लगती थी और भावों को समझाने के लिए वह बच्चों की तरह हाथ-पैर हिलाने लगता था।

माधव सरिता का जेठ था। सरिता का इस घर में ब्याह लगभग बीस साल पहले हुआ था। सरिता के पिता गाँव के एक साधारण पटवारी थे। चार बेटियों के भारी बोझ तले दबे पिता के लिए सरकारी बैंक में कैशियर का पद सँभालने वाले आलोक का रिश्ता किसी वरदान से कम नहीं था। आलोक सीधा-साधा, सुलझा हुआ और कमाऊ लड़का था। बस एक ही पेंच था—उसका बड़ा भाई माधव, जो जन्म से ही मानसिक रूप से अविकसित था। पिता ने सरिता के हाथ जोड़कर कहा था कि बड़े लड़के की देखरेख का कोई भारी काम नहीं है, परिवार खाते-पीते घर का है और आलोक तुम्हें राजरानी बनाकर रखेगा। सरिता ने विवशता और कर्तव्य के भँवर में फँसकर सिर झुका दिया था।

ससुराल आने पर सरिता को एक भरा-पूरा परिवार मिला था। ससुर विश्वनाथ जी सिंचाई विभाग से सेवानिवृत्त एक सम्मानित व्यक्ति थे। सास कल्याणी देवी ममता की मूरत थीं। घर में दो ननदें थीं—अमृता और विनीता। शुरुआती सालों में जीवन किसी शांत नदी की तरह बहता रहा। विश्वनाथ जी की पेंशन और आलोक की पगार से घर का खर्च आसानी से चल जाता था। समय बीतने के साथ सरिता ने दो बच्चों को जन्म दिया। संयुक्त परिवार में बच्चों का लालन-पालन हँसी-खुशी हो गया। कुछ ही सालों में विश्वनाथ जी ने अपनी जमा-पूँजी और पेंशन का बड़ा हिस्सा लगाकर बड़ी बेटी अमृता का ब्याह एक अच्छे घराने में कर दिया।

परंतु सुख के बादल सदा एक जगह नहीं ठहरते। एक मनहूस दोपहर को विश्वनाथ जी खेत से लौटते समय गिर पड़े और पक्षाघात के भीषण हमले ने उनके प्राण हर लिए। घर का मजबूत खंभा ढह चुका था। परिवार इस सदमे से उबरा भी नहीं था कि छोटी बेटी विनीता के भविष्य का प्रश्न मुँह बाए खड़ा हो गया। विनीता पढ़ने में कुशाग्र थी। पिता के निधन के बाद उसने दिन-रात एक करके प्रतियोगी परीक्षा पास की और उसे डाक विभाग में क्लर्क की नौकरी मिल गई। नौकरी मिलने से घर की आर्थिक गाड़ी फिर से पटरी पर लौटने लगी थी, मगर नियति को कुछ और ही मंजूर था।

विनीता की नौकरी के दो साल बाद ही सास कल्याणी देवी भी अपने पति के वियोग में बीमार रहने लगीं और एक दिन चुपचाप इस संसार से विदा हो गईं। अब घर में केवल आलोक, सरिता, उनके दो बच्चे, अविवाहित ननद विनीता और मंदबुद्धि माधव रह गए थे। कल्याणी देवी के जाने के बाद विनीता का मन घर में नहीं लगता था। सरिता अक्सर तानों और तीखे व्यवहार से यह जताने लगी थी कि विनीता अब पराई अमानत है और उसे अपने रास्ते देखना चाहिए। विनीता समझदार थी; उसने घर में कोई क्लेश खड़ा करने के बजाय अपने ही विभाग के एक साथी से सादगी से विवाह कर लिया और दूसरे शहर में जाकर बस गई। उसने जाते समय आलोक से साफ कह दिया कि वह अपने हिस्से की कोई ज़मीन या पैसा नहीं चाहती, बस घर में शांति बनी रहे।

विनीता के चले जाने से घर पर होने वाला उसका आर्थिक सहयोग पूरी तरह बंद हो गया। उधर आयुष और साक्षी अब कॉलेज और कोचिंग की दहलीज पर थे। उनकी फीस, किताबों के खर्च, घर के राशन का बिल और शहर की बढ़ती महंगाई ने आलोक की पगार को नाकाफी बना दिया था। आलोक सुबह से देर रात तक बैंक में खटता, शाम को छोटे-मोटे ऑडिट का काम पकड़ता, मगर महीने के आखिरी दस दिन आते-आते उसकी जेब खाली हो जाती थी। इस आर्थिक तंगी ने घर के वातावरण को जहरीला बना दिया था। सरिता का स्वभाव जो पहले कभी शांत हुआ करता था, अब चिड़चिड़ा और उग्र हो चुका था।

घर के इस तनाव का सबसे आसान और मूक शिकार बना माधव। सरिता को लगता था कि घर के सारे संकटों की जड़ माधव ही है। “यह दिन भर खाता है, कपड़े गंदे करता है, कभी नल खुला छोड़ देता है तो कभी बर्तन तोड़ देता है! इसके इलाज और दवाओं में हर महीने दो-तीन हज़ार स्वाहा हो जाते हैं! आखिर हम कब तक इस जिंदा लाश को अपनी छाती पर ढोते रहेंगे?” सरिता अक्सर आलोक पर बरस पड़ती थी। आलोक बेबसी से सिर पकड़कर बैठ जाता। वह अपने उस भाई को कैसे बेदखल कर देता, जिसे माँ मरते समय उसकी गोद में सौंप गई थी? माँ के अंतिम शब्द आलोक के कानों में अब भी गूँजते थे—”आलोक, माधव भले ही दुनिया के लिए बोझ हो, पर वह तेरे ही खून का टुकड़ा है। उसका ध्यान रखना बेटा।”

लेकिन समय के साथ आलोक का धीरज भी टूटने लगा था। आर्थिक तंगहाली इंसान की संवेदनाओं को सोख लेती है। बच्चों के भविष्य का डर और पत्नी के रोज़-रोज़ के झगड़ों ने उसे भीतर से तोड़ दिया था। आज सुबह जब माधव के हाथ से सरिता की माँ के द्वारा दी गई पुरानी चीनी मिट्टी की केतली छूटी, तो सरिता के सब्र का बाँध पूरी तरह टूट गया। उसने पूरे मोहल्ले को सिर पर उठा लिया।

“आलोक! मेरी बात कान खोलकर सुन लो,” सरिता आँगन में रोते और चिल्लाते हुए बोली, “तुम्हारे इस भाई के कारण मेरे बच्चों के सपने कुचले जा रहे हैं। आयुष को इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल की फीस भरनी है, साक्षी के मेडिकल कोचिंग के पैसे अटके पड़े हैं। और यहाँ एक निकम्मा इंसान दिन-रात बैठकर हमारी रोटियाँ तोड़ रहा है! मैंने शहर के बाहरी इलाके में बने उस सरकारी पागलखाने का पता कर लिया है। आज ही इसे वहाँ छोड़कर आओ, नहीं तो मैं जहर खा लूँगी!”

आलोक बरामदे की सीढ़ी पर अपना सिर दोनों हाथों में थामे बैठा था। उसकी आँखों से बेबसी के आँसू टपक रहे थे। उसने कांपती आवाज़ में कहा, “सरिता, थोड़ा धीरज धरो। पागलखाना नहीं, वह कोई आवारा जानवर नहीं है। मैं किसी आश्रम में बात करूँगा, थोड़ा समय दो मुझे।”

“कोई समय नहीं मिलेगा!” सरिता ने माधव की बाँह झटके से पकड़ी और उसे घसीटते हुए मुख्य दरवाजे की ओर ले जाने लगी। माधव डर के मारे कांपने लगा। उसकी आँखों से मोटे-मोटे आँसू बहने लगे। वह लड़खड़ाती आवाज़ में रोते हुए कह रहा था, “ब… भाभी… ना मारो… माधव अच्छा बच्चा… माधव रोटी नहीं खाएगा… ना फेंको…”

माधव की यह गुहार सरिता के गुस्से की दीवार से टकराकर लौट रही थी। आयुष और साक्षी भी अपनी माँ के समर्थन में खड़े होकर अपने ताऊ को एक अनचाही मुसीबत की तरह देख रहे थे। आलोक बेबस होकर उठ खड़ा हुआ और भारी मन से बोला, “छोड़ो उसका हाथ सरिता… मैं खुद उसे ले जाता हूँ। अगर हमारे परिवार का यही भाग्य है, तो यही सही।”

माधव को आभास हो गया था कि उसे हमेशा के लिए इस घर से निकाला जा रहा है। उसने अचानक सरिता की पकड़ से अपना हाथ छुड़ाया। वह भागा नहीं, बल्कि लड़खड़ाते कदमों से घर के पिछले हिस्से में बने उस पुराने, धूल-धूसरित स्टोर रूम की तरफ दौड़ा, जहाँ पुराने संदूक और टूटी-फूटी खाटें रखी रहती थीं।

“देखा! नाटक देख रहे हो इसका! अब यह कमरे में छिप रहा है ताकि इसे कोई बाहर न निकाल सके!” सरिता पैर पटकते हुए उसके पीछे भागी। आलोक और दोनों बच्चे भी स्टोर रूम की तरफ लपके।

माधव कमरे के एक कोने में रखे लोहे के भारी, जंग लगे बक्से के पीछे झुका हुआ था। उसके हाथ धूल से सन चुके थे। वह अपनी पूरी ताकत से उस भारी बक्से के पीछे कुछ टटोल रहा था। जब सरिता कमरे में घुसी और उसका हाथ पकड़कर खींचने लगी, तो माधव ने ज़मीन पर रखी एक पुरानी, दीमक लगी लकड़ी की पटिया को उखाड़ दिया। उस पटिया के नीचे एक गहरा गड्ढा था, जिसमें प्लास्टिक की कई परतों में लिपटा हुआ एक भारी सा थैला रखा था।

माधव ने उस थैले को दोनों हाथों से सीने से चिपका लिया। उसके चेहरे पर एक अजीब सा संतोष और घबराहट दोनों थी। उसने मुड़कर देखा कि सब लोग उसे गुस्से से घूर रहे हैं। माधव घुटनों के बल चलता हुआ आलोक के कदमों के पास आया। उसने अपनी कमीज़ से उस मैले थैले की धूल पोंछी और कांपते हाथों से उसे आलोक की गोद में रख दिया।

फिर वह लड़खड़ाती ज़ुबान में, अपनी छाती पीटते हुए टूटे-फूटे शब्दों में बोला, “भा… भाई… रो मत… बाबूजी… बाबूजी दिए थे… बोले थे… जब आलोक… बहुत रोए… तब देना… माधव बुरा नहीं है… भाई को पैसा… बच्चों को पढ़ाई… माधव को मत भगाओ…”

कमरे में एक भयावह सन्नाटा पसर गया। आलोक ने कांपते हाथों से उस प्लास्टिक के थैले की परतों को खोला। उसके भीतर कपड़े की एक पुरानी थैली थी, और उस थैली के अंदर भारतीय स्टेट बैंक की एक पुरानी पासबुक, किसान विकास पत्र के कई प्रमाण पत्र, और कुछ पुराने सोने के सिक्के रखे हुए थे। उन कागजातों के साथ एक पीला पड़ चुका पत्र भी था।

आलोक ने उस पत्र को खोला। वह उसके पिता स्वर्गीय विश्वनाथ जी की कांपती लिखावट में लिखा गया एक वसीयतनामा था। पत्र में लिखा था:

“मेरे प्यारे आलोक, जब तू यह पत्र पढ़ रहा होगा, शायद मैं इस दुनिया में नहीं रहूँगा। मैं जानता हूँ कि दुनियादारी और जिम्मेदारियों का बोझ इंसान को कभी-कभी बहुत कठोर बना देता है। मैंने अपनी सेवा-निवृत्ति के पैसों का एक हिस्सा विनीता और अमृता के विवाह के लिए सुरक्षित किया था, और दूसरा हिस्सा मैंने बहुत पहले माधव के नाम से फिक्स डिपॉजिट और किसान विकास पत्रों में जमा कर दिया था ताकि मेरे न रहने पर वह किसी पर बोझ न बने। पर मुझे यह भी डर था कि कहीं मेरे जाने के बाद कोई चालाक रिश्तेदार या परिस्थिति इस पैसे को माधव से छीन न ले। इसलिए मैंने माधव को इस गुप्त जगह के बारे में सिखाया था और उससे कहा था कि यह उसका सबसे बड़ा खजाना है, और यह उसे तब अपने छोटे भाई को सौंपना है जब घर पर कोई बहुत बड़ा संकट आए और आलोक रोने लगे। माधव दिमाग से कमजोर ज़रूर है, पर उसका दिल किसी देवता की तरह पवित्र है। वह इस घर का रक्षक है, बोझ नहीं। मेरे इस बच्चे को संभालना आलोक, यह तुम्हारे परिवार की ढाल है।”

आलोक ने जब पासबुक और किसान विकास पत्रों की परिपक्वता राशि (मैच्योरिटी वैल्यू) देखी, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। ब्याज जुड़ते-जुड़ते वह रकम इतनी बड़ी हो चुकी थी कि उससे आयुष की इंजीनियरिंग, साक्षी की मेडिकल की पढ़ाई, और घर का सारा कर्ज़ चुकता होने के बाद भी एक बहुत बड़ी राशि बच जाती थी।

आलोक फूट-फूट कर रो पड़ा। वह ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गया और उसने माधव को अपनी छाती से कसकर भींच लिया। “भैया! मुझे माफ कर दो! मैं पापी हूँ… मैं अंधा हो गया था भैया!” आलोक के आँसू माधव के कंधों को भिगो रहे थे।

माधव, जो अब तक सहमा हुआ था, अपने छोटे भाई की पीठ को अपने भारी हाथों से थपथपाने लगा। वह बच्चे की तरह हँसते हुए बोला, “आलू… रोता नहीं… माधव है ना… आलू अच्छा बच्चा…”

सरिता के पैरों तले से मानो ज़मीन खिसक गई थी। उसके हाथ कांप रहे थे। जिस इंसान को वह पिछले बीस सालों से एक निकम्मा, फूहड़ और बोझ समझकर घर से बाहर फेंकने पर तुली थी, वही इंसान आज उसके बच्चों के भविष्य का तारणहार बनकर सामने खड़ा था। उसने देखा कि माधव के कपड़ों पर धूल थी, चेहरे पर कालिख थी, लेकिन उसकी आँखों में अपने परिवार के लिए केवल और केवल निस्वार्थ प्रेम था। वह धन का लालच नहीं जानता था, उसने कभी उन पैसों का एक सिक्का भी अपने लिए नहीं माँगा था, उसने बस अपने पिता के वचनों को अपने सीने से लगाकर रखा था।

सरिता का अहंकार, उसका गुस्सा और उसकी सारी कड़वाहट आंसुओं के सैलाब में बह गई। आत्मग्लानि के भारी बोझ तले वह ज़मीन पर बैठ गई। उसने आगे बढ़कर माधव के धूल भरे पैर पकड़ लिए।

“भैया… मुझे क्षमा कर दीजिए! मैंने आपको इंसान भी नहीं समझा… मुझे नरक में भी जगह नहीं मिलेगी भैया!” सरिता हिचकियों के बीच रोने लगी।

माधव घबरा गया। उसने तुरंत अपने पैर पीछे खींचने की कोशिश की और सरिता के सिर पर अपना हाथ रख दिया। वह अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में बोला, “भाभी… रो मत… माधव चाय नहीं गिराएगा… माधव अच्छा है… भाभी रोटी देगी ना?”

माधव का यह मासूम सवाल सरिता के कलेजे को चीर गया। आयुष और साक्षी भी दौड़कर आए और अपने ताऊ के गले लग गए। दोनों बच्चों की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह रहे थे। जिस ताऊ को वे अपने दोस्तों से छिपाते थे, आज उसी ताऊ ने उनके भविष्य की नींव को टूटने से बचा लिया था।

उस दिन हवेली के उस पुराने आँगन ने एक नया सवेरा देखा। घर से माधव नहीं निकला, बल्कि घर से वह कड़वाहट, वह संकीर्णता और वह स्वार्थ हमेशा के लिए बाहर निकल गया जिसने इस परिवार को जकड़ रखा था। आलोक और सरिता ने उसी दिन फैसला किया कि माधव के नाम की संपत्ति का उपयोग केवल बच्चों की उच्च शिक्षा और माधव की बेहतर से बेहतर चिकित्सा और सुख-सुविधाओं के लिए किया जाएगा।

महीनों बाद, आज जब भी कोई अतिथि उस घर में कदम रखता है, तो उसे दलान में माधव एक आरामदायक कुर्सी पर बैठा मुस्कुराता हुआ मिलता है। सरिता खुद अपने हाथों से उसके लिए नाश्ता और चाय लाती है, और आयुष जब भी कॉलेज से लौटता है, सबसे पहले अपने ताऊ के पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेता है। ईश्वर ने माधव को भले ही अधूरा दिमाग दिया था, पर उसके सीने में एक ऐसा दिल धड़काया था जो केवल देना जानता था, लेना नहीं। परिवार ईंट-पत्थरों या दिमागी चतुराई से नहीं चलते, परिवार तो निस्वार्थ प्रेम, त्याग और एक-दूसरे के प्रति समर्पण की डोर से बंधे रहते हैं।

जीवन में कई बार हम अपने ही परिवार के उन सदस्यों को बोझ समझने की भूल कर बैठते हैं जो शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ होते हैं। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि एक निस्वार्थ और निष्कपट मन की कीमत किसी भी सांसारिक चतुरता से कहीं अधिक होती है? क्या आपके जीवन में भी कभी ऐसा पल आया है जब किसी उपेक्षित व्यक्ति ने आपके संकट के समय देवदूत बनकर आपकी रक्षा की हो? अपने विचार नीचे टिप्पणी (कमेंट) बॉक्स में हमारे साथ ज़रूर साझा करें।

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 लेखिका : शशि चोपड़ा

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