अनामिका की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “भाभी, हमें माफ कर दीजिए। हम अपनी डिग्रियों और नौकरियों के अहंकार में अंधी हो गई थीं। हम सोचते थे कि सिर्फ पैसा कमाना ही सबसे बड़ी योग्यता है। पर आज आपने हमारी आँखें खोल दीं। हम कुछ घंटे भी इस घर को बिखरने से नहीं बचा पाए, और आप पिछले पच्चीस सालों से बिना किसी शिकायत के इस पूरे घर को संभाले हुए हैं। असली मायने में पढ़ी-लिखी और समझदार तो आप हैं भाभी।”
रसोई के बड़े से चूल्हे पर तांबे की पतीली में उबलती अदरक-इलायची की चाय की महक पूरे आँगन में फैल रही थी। घड़ी में सुबह के ठीक छह बजे थे। कल्याणी ने बहुत सलीके से पल्लू को कमर में खोंसा और गर्म चाय को चीनी मिट्टी के कपों में छानना शुरू किया। यह उसकी पिछले पच्चीस सालों की दिनचर्या थी। किसी अलार्म के बिना ही उसकी आँखें भोर के पाँच बजे खुल जाती थीं। पच्चीस वर्ष पहले, जब वह सोलह-सत्रह साल की अल्हड़ उम्र में इस विशाल हवेलीनुमा घर में ब्याह कर आई थी, तब उसे दुनियादारी की जरा भी समझ नहीं थी। उस जमाने में लड़कियों की शादी जल्दी कर दी जाती थी, इसलिए दसवीं के बाद उसकी पढ़ाई की किताबें बक्से में बंद हो गईं और हाथों में घर की चाबियों का गुच्छा आ गया।
कल्याणी इस संयुक्त परिवार के सबसे बड़े बेटे, राजेंद्र की पत्नी थी। ससुर जी पुराने उसूलों के सख्त इंसान थे और सास का स्वास्थ्य हमेशा नरम-गरम रहता था। बड़ी बहू के घर में कदम रखते ही सास मानो सारी गृहस्थी और अपने दोनों छोटे बेटों—अमित और सुमित—की परवरिश से निश्चिंत हो गई थीं। कल्याणी ने उस कच्ची उम्र में ही अपने दोनों देवरों को अपने बच्चों की तरह पाला-पोसा। जब सास-ससुर इस दुनिया से विदा हुए, तब कल्याणी ने पूरे परिवार को बिखरने नहीं दिया, बल्कि एक सूत्र में पिरोए रखा।
कल्याणी घर के कामकाज में इतनी निपुण थी कि जो भी उसकी कारीगरी देखता, दंग रह जाता। बैठक के सोफे पर बिछे हाथ की नक्काशीदार क्रोशिया के कवर, खिड़कियों पर लटकते खूबसूरत पर्दे और दीवारों पर सजे कशीदाकारी के फ्रेम—सब कल्याणी के हुनर का परिणाम थे। लोग कहते थे कि उसके हाथों में साक्षात अन्नपूर्णा और विश्वकर्मा दोनों का वास है। सादा दाल-चावल भी उसके हाथों से छूकर अमृत बन जाता था।
लेकिन बदलते वक्त के साथ घर की तस्वीर बदलने लगी। दोनों देवरों की शादियाँ हुईं। दोनों बहुएँ—अनामिका और वर्तिका—आधुनिक, उच्च शिक्षित और महानगर की बड़ी कंपनियों में काम करने वाली थीं। अनामिका बैंक में वरिष्ठ प्रबंधक थी और वर्तिका एक बहुराष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी में कार्यरत थी। उनके आते ही घर में नए जमाने की हवा बहने लगी। परिवार में जब भी कोई सामाजिक उत्सव होता या बाहर के मेहमान आते, तो सारी बातचीत अनामिका और वर्तिका के इर्द-गिर्द सिमट जाती। उनकी अंग्रेजी में की गई बातें, उनके कॉर्पोरेट जगत के किस्से, उनके महंगे कपड़े और उनकी जीवनशैली की प्रशंसा करते रिश्तेदार थकते नहीं थे।
वहीं दूसरी ओर, कल्याणी उसी घर के एक कोने में सादे सूती पल्लू से अपना माथा ढके, मेहमानों के लिए गर्म पकौड़े तलती या बच्चों के कपड़े संभालती नजर आती। कम पढ़ी-लिखी होने के कारण वह उनके कॉर्पोरेट दफ्तरों, शेयर बाजार या विदेश यात्राओं की बातों में हिस्सा नहीं ले पाती थी। कभी-कभार जब वह चर्चा के बीच कुछ सहज बात कह देती, तो देवरानियाँ हल्की सी उपेक्षा भरी मुस्कान के साथ नजरें फेर लेतीं, मानो कह रही हों कि ‘भाभी, आपको इन आधुनिक चीजों की क्या समझ?’
परंतु सरल और निर्मल स्वभाव की कल्याणी को कभी इस बात की चुभन नहीं हुई। उसके मन में कभी ईर्ष्या का मैल नहीं आया। वह अक्सर खुद से कहती, “क्या हुआ जो मैं दफ्तर नहीं जाती? मेरी देवरानियाँ बाहर जाकर परिवार का नाम रोशन कर रही हैं, और मैं घर को संभालकर उनका संबल बन रही हूँ। अगर सब बाहर ही चले जाएंगे, तो इस घर को कौन संभालेगा?”
घर में काम करने के लिए दो नौकर और एक रसोइया भी रखा गया था, लेकिन घर की असली व्यवस्थापक कल्याणी ही थी। किसे कब कौन सी दवा देनी है, राजेंद्र जी के दफ्तर की फाइलें कहाँ रखी हैं, नौकरों को कब कौन सा काम समझाना है और पूरे महीने का बजट कैसे संतुलित रखना है—यह सब कल्याणी की उंगलियों पर रहता था।
घर के तीनों बच्चे—कल्याणी का बेटा आरव, अनामिका की बेटी पंखुड़ी और वर्तिका का बेटा कबीर—कल्याणी के ही आंचल में पले-बढ़े थे। दोनों देवरानियों को अपने काम के सिलसिले में सुबह जल्दी निकलना और देर रात लौटना पड़ता था। उन्हें तो ठीक से यह भी मालूम नहीं होता था कि बच्चों की परीक्षा कब है या उन्हें खाने में क्या पसंद है। जब कभी बच्चे स्कूल से लौटते, तो बस्ते फेंककर सीधे कल्याणी से लिपट जाते, “बड़ी माँ, बहुत भूख लगी है!” कल्याणी तुरंत अपने हाथों से उनके मनपसंद गरमागरम व्यंजन परोसती, उनका होमवर्क करवाती और रात को उन्हें नैतिक कहानियाँ सुनाकर सुलाती। कल्याणी अपने और देवर के बच्चों में रत्ती भर भी फर्क नहीं करती थी। बच्चों के लिए ‘बड़ी माँ’ ही उनकी असली दुनिया थीं।
समय अपनी गति से बीतता गया। एक दिन घर में एक बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ। राजेंद्र जी के पैतृक व्यवसाय पर अचानक एक बड़ा कानूनी और टैक्स का नोटिस आ गया, जिसकी वजह से परिवार की प्रतिष्ठा और व्यापार दोनों दांव पर लग गए। उसी हफ्ते शहर के सबसे प्रतिष्ठित उद्योगपति और समाज के गणमान्य लोगों का एक प्रतिनिधिमंडल, व्यापार मंडल के अध्यक्ष के साथ, एक गंभीर समझौते और बातचीत के लिए उनके घर आने वाला था। पूरा परिवार तनाव में था।
अनामिका और वर्तिका दोनों ने दफ्तर से छुट्टी ले ली थी ताकि वे इस संकट में मदद कर सकें। उन्होंने तय किया कि इस महत्वपूर्ण बैठक के लिए बाहर के किसी बड़े फाइव-स्टार होटल से खान-पान और सजावट की व्यवस्था की जाएगी। बाहर की कैटरिंग को भारी-भरकम ऑर्डर दे दिया गया।
लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था। जिस दिन शाम को सात बजे मेहमान आने वाले थे, दोपहर के तीन बजे अचानक शहर में भयंकर मूसलाधार बारिश और तूफान आ गया। निचले इलाकों में पानी भर गया और सड़कें पूरी तरह जाम हो गईं। ठीक शाम के पाँच बजे होटल वाले का फोन आया कि उनके रसोइये और गाड़ियाँ पानी में फंसी हुई हैं, और वे तय समय पर खाना और व्यवस्था पहुँचाने में पूरी तरह असमर्थ हैं।
यह खबर सुनते ही हवेली में कोहराम मच गया। अनामिका घबराकर सिर पकड़कर बैठ गई, “हे भगवान! अब क्या होगा? शहर के इतने बड़े लोग आ रहे हैं, हमारे पास केवल दो घंटे हैं। बाजार से भी कुछ मंगाना मुमकिन नहीं है। हमारी तो समाज में नाक कट जाएगी!” वर्तिका भी परेशान होकर फोन मिलाती रही, लेकिन कहीं से कोई मदद नहीं मिल रही थी। दोनों देवर और राजेंद्र जी चिंता में डूब गए। घर की प्रतिष्ठा धूल में मिलती दिख रही थी।
कल्याणी, जो अब तक खामोशी से सब देख रही थी, आगे बढ़ी। उसने अत्यंत शांत और आत्मविश्वास भरे स्वर में कहा, “आप सब परेशान मत होइए। जब तक घर का चूल्हा सलामत है, इस चौखट से कोई भूखा या असंतुष्ट नहीं लौटेगा। आप लोग बैठक की व्यवस्था संभालिए, रसोई का जिम्मा मुझ पर छोड़ दीजिए।”
अनामिका ने अविश्वास से देखा, “भाभी, इतने कम समय में बीस-पच्चीस खास मेहमानों का खाना? वह भी पारंपरिक और राजसी? यह आपसे अकेले कैसे होगा?”
कल्याणी ने केवल एक कोमल मुस्कान दी और रसोई की ओर बढ़ गई। उसने घर के दोनों नौकरों को तुरंत काम पर लगाया। कल्याणी के हाथ बिजली की तेजी से चलने लगे। एक तरफ उसने बासमती चावल का सुगंधित पुलाव चढ़ाया, दूसरी तरफ घर के ताजे दूध से तुरंत पनीर फाड़कर शाही अंदाज में मखमली पनीर की सब्जी तैयार की। दाल मखनी धीमी आंच पर महकने लगी, और साथ में राजस्थानी गट्टे और कुरकुरी पूड़ियों की तैयारी होने लगी। उसने अपनी खास सूझबूझ से रसोई में रखे काजू और मेवों से केवल आधे घंटे में गरमागरम शाही हलवा बनाकर तैयार कर दिया।
इतना ही नहीं, उसने बच्चों की मदद से बैठक के सोफों पर अपने हाथ से काढ़े हुए रेशमी कवर बिछाए, ताजे फूलों के गुलदस्ते सजाए और पीतल के बर्तनों में हल्की खुशबूदार अगरबत्ती जलाकर माहौल को किसी शाही हवेली जैसा बना दिया।
शाम के सात बजे जब मुख्य अतिथि और व्यापारी संघ के अध्यक्ष सपरिवार घर पहुँचे, तो बाहर के तूफान के विपरीत घर के भीतर का शांत, भव्य और सुरुचिपूर्ण माहौल देखकर वे मुग्ध हो गए। जब भोजन परोसा गया, तो खाने का पहला निवाला मुँह में लेते ही व्यापार मंडल के सबसे बुजुर्ग अध्यक्ष के चेहरे पर असीम तृप्ति छा गई।
अध्यक्ष महोदय ने हाथ जोड़कर राजेंद्र जी से कहा, “राजेंद्र भाई, आज के इस दौर में लोग होटलों का बासी और मिलावटी खाना खिलाकर औपचारिकता निभाते हैं। लेकिन आज बरसों बाद ऐसा लगा जैसे किसी माँ और अन्नपूर्णा के हाथ का बना सात्विक, स्वादिष्ट और प्रेम से भरा भोजन नसीब हुआ है। सच कहूँ तो इस स्वाद और सत्कार ने हमारा दिल जीत लिया।”
उन्होंने पूछा, “किस शेफ ने यह अद्भुत भोजन तैयार किया है?”
अनामिका और वर्तिका की नज़रें शर्म से झुक गईं। वे दोनों जो खुद को बहुत आधुनिक और सक्षम समझती थीं, आज उस अनपढ़ समझी जाने वाली भाभी के सामने खुद को बेहद बौना महसूस कर रही थीं।
राजेंद्र जी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। उन्होंने नम आँखों से कल्याणी की ओर इशारा करते हुए कहा, “अध्यक्ष जी, यह हमारी बड़ी बहू कल्याणी है। यह हमारे घर की सिर्फ बहू नहीं, इस पूरे परिवार की धड़कन और असली अन्नपूर्णा है।”
अतिथि महोदय ने उठकर कल्याणी के सिर पर हाथ रखा और कहा, “धन्य हैं आप बेटी! जिस घर में आपके जैसी संस्कारी, धैर्यवान और कुशल गृहलक्ष्मी हो, उस घर पर कभी कोई विपत्ति टिक ही नहीं सकती। आज आपकी इस आत्मीयता ने हमारे मन के सारे गिले-शिकवे दूर कर दिए।” समझौते के कागजात पर उसी रात खुशी-खुशी हस्ताक्षर हो गए और परिवार पर आया वह भीषण संकट हमेशा के लिए टल गया।
मेहमानों के जाने के बाद रात के सन्नाटे में पूरा परिवार बैठक में इकट्ठा हुआ। अनामिका और वर्तिका अपनी भावनाओं को रोक नहीं पाईं। दोनों ने आगे बढ़कर कल्याणी के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए।
अनामिका की आँखों से पश्चाताप के आँसू बह निकले। उसने रुंधे गले से कहा, “भाभी, हमें माफ कर दीजिए। हम अपनी डिग्रियों और नौकरियों के अहंकार में अंधी हो गई थीं। हम सोचते थे कि सिर्फ पैसा कमाना ही सबसे बड़ी योग्यता है। पर आज आपने हमारी आँखें खोल दीं। हम कुछ घंटे भी इस घर को बिखरने से नहीं बचा पाए, और आप पिछले पच्चीस सालों से बिना किसी शिकायत के इस पूरे घर को संभाले हुए हैं। असली मायने में पढ़ी-लिखी और समझदार तो आप हैं भाभी।”
वर्तिका ने कल्याणी को गले लगाते हुए कहा, “हाँ भाभी, हमारे बच्चों को संस्कार, इस घर को व्यवस्था और हमारे जीवन को सुकून आपकी वजह से ही मिला है। आज अगर आप न होतीं, तो पूरा परिवार समाज में शर्मिंदा हो जाता। आप ही इस घर की असली रीढ़ हैं।”
घर के तीनों बच्चे भी दौड़कर कल्याणी से लिपट गए। आरव ने कहा, “हमारी बड़ी माँ दुनिया की सबसे बेस्ट माँ हैं!”
कल्याणी की आँखों से बरसों के दबे हुए भाव खुशी के आँसुओं के रूप में छलक पड़े। उसने दोनों देवरानियों को अपने सीने से लगा लिया और वात्सल्य भरे स्वर में कहा, “पगली हो तुम दोनों! परिवार में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। तुम दोनों घर की बाहर की ढाल हो, तो मैं भीतर की नींव हूँ। जब नींव और दीवारें एक साथ मिलकर खड़ी होती हैं, तभी तो कोई मकान सुंदर और अटूट घर बनता है।”
उस रात हवेली की हवाओं में एक नया सवेरा घुला हुआ था। घर की उस अनपढ़ समझी जाने वाली बड़ी बहू ने अपनी सहनशीलता, निस्वार्थ सेवा और हुनर से न केवल परिवार की प्रतिष्ठा बचाई थी, बल्कि रिश्तों के बीच की उस अदृश्य दीवार को भी हमेशा के लिए गिरा दिया था। अब उस घर में हर किसी के दिल में कल्याणी के लिए केवल सम्मान नहीं, बल्कि अगाध श्रद्धा थी।
पाठकों के लिए विचारणीय प्रश्न:
क्या आधुनिक समाज में किसी गृहिणी के योगदान को केवल इसलिए कम आंका जाना चाहिए क्योंकि वह धनोपार्जन नहीं करती? क्या घर संभालने, बच्चों को संस्कार देने और परिवार को जोड़े रखने की योग्यता किसी कॉर्पोरेट नौकरी से कम है? अपने अनमोल विचार और राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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