साँसों की वसीयत

माधव, जो उम्र के इस पड़ाव पर आकर थोड़े और भावुक हो गए थे, एक बच्चे की तरह जिद पर अड़ जाते। जैसे कोई छोटा बच्चा अपनी मनमानी करता है, वैसे ही वे सुलोचना को समझाते हुए कहते, “सुलोचना, मेरी बात समझने की कोशिश करो। तुमने जिंदगी भर मुझे सिर्फ खुशियाँ दी हैं। तुमने मुझे … Read more

नया आँगन, वही ममता

 राधिका जब भी मायके जाने के लिए तैयार होती, तो उसकी आँखों में एक अलग ही चमक होती थी। सुमित्रा जी खुद उसके लिए मिठाइयाँ और शगुन के कपड़े पैक करवातीं। “जा बेटा, कुछ दिन अपनी माँ के लाड़-प्यार में जी ले। यहाँ तो ज़िम्मेदारियाँ ही ज़िम्मेदारियाँ हैं,” सुमित्रा जी हँसते हुए कहतीं। और जब … Read more

error: Content is protected !!