रिश्तों की बुनियाद

  “पापा, बस बहुत हो गया! मैं अब इस घर में एक पल भी और नहीं रह सकती। रोहन और उसके परिवार की पिछड़ी हुई सोच के साथ मेरा दम घुटता है। अगर आप कल सुबह तक यहाँ नहीं आए, तो मैं अकेले ही डिवोर्स के पेपर फाइल कर दूँगी।” काव्या ने बिना कोई जवाब सुने … Read more

मायके की देहरी और ससुराल का मान

सविता देवी का बंगला शहर के पॉश इलाके में स्थित था। घर की दीवारों पर सजी महंगी पेंटिंग्स और दहलीज़ पर रखी पीतल की मूर्तियाँ इस बात की गवाह थीं कि यह परिवार संपन्नता में जी रहा है। सविता देवी के दो बेटे थे—अभिषेक और रचित। अभिषेक की पत्नी रिद्धिमा एक रईस घराने से थी, … Read more

**ममता का मोल: एक अनसुना दर्द**

 साठ वर्षीय सुलोचना जी अपने दोनों हाथों में ताजी सब्जियों, फलों और कुछ घरेलू सामानों से भरे भारी थैले पकड़े, अपनी सोसायटी के मुख्य गेट से अंदर दाखिल हो रही थीं। उम्र के इस पड़ाव पर घुटनों में गठिया का दर्द अक्सर उन्हें परेशान करता था, लेकिन आज उनके चेहरे पर एक अजीब सी ऊर्जा … Read more

एक पिता का प्रायश्चित: जब न्याय ने ली रिश्तों की जगह

“हाँ, मैंने गलती की। मैं धन बटोरने में अंधा हो गया था। मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है।” रघुनाथ जी का गला रुंध गया। “लेकिन सबसे बड़ा पाप जो हमने किया है, वह विक्रम को बिगाड़ना नहीं है। वह पाप है इस मासूम लड़की मीरा की जिंदगी बर्बाद करना। याद है तुम्हें? जब विक्रम … Read more

आँगन की वो गौरैया

यह सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मेरा बाल-मन इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि मौसी मुझे छोड़कर हमेशा के लिए कहीं और रहने जा रही हैं। अगर शादी का मतलब बिछड़ना होता है, तो फिर शादी करनी ही क्यों? मैं दौड़कर मौसी के पास जाना चाहता था, उन्हें … Read more

मायके की दहलीज

“मम्मी, वो जो बनारसी सिल्क की साड़ी आपने दिखाई थी, वही भिजवाना मेरे लिए। और हाँ, काजू-बादाम, पिस्ता के साथ वो इंपोर्टेड चॉकलेट्स का बड़ा वाला पैक भी रख देना। मेरी जेठानी के मायके से बहुत भारी सामान आया है इस बार दिवाली पर। उनके रिश्तेदारों के सामने मेरा इम्प्रेशन डाउन नहीं होना चाहिए। आपको … Read more

माँ का घर

“माँ, मुझे माफ़ कर दो। मैं तुम्हें यहाँ छोड़कर नहीं गया था। मुझे पता ही नहीं था… सुमन ने कहा तुम बुआ के घर…” रवि बच्चों की तरह फफक पड़ा। गायत्री देवी ने रवि का हाथ अपने हाथ में लिया। “मैं जानती हूँ बेटा… मैं जानती हूँ तू ऐसा नहीं कर सकता। बहू ने… बहू … Read more

रिश्तों का आइना

अंजलि की आंखों से अब आंसुओं की धार बह निकली। ये आंसू दर्द के नहीं, बल्कि पछतावे के थे। उसे अपनी सोच पर, अपने उस शक पर घिन आने लगी जो उसने आभासी दुनिया के उस कचरे को देखकर अपने मन में पाला था। जो परिवार उसके लिए अपनी जान छिड़कता है, जो सासू मां … Read more

अदृश्य डोर: एक माँ की वापसी

 यह सुनते ही देवकी की आत्मा सिहर उठी। वह जोर से “कबीर!” चिल्लाते हुए नींद से जाग गई। वह हांफ रही थी और उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था। बाहर बारिश रुक चुकी थी और सुबह की पहली किरण कबीर के कमरे की खिड़की से अंदर आ रही थी। देवकी वहीं बैठी रही … Read more

ससुराल की देहरी और मायके का आँगन: एक अनकही सच्चाई

अलार्म की तीखी आवाज़ ने काव्या की नींद तोड़ दी। उसने फोन की स्क्रीन पर समय देखा—सुबह के साढ़े पाँच बज रहे थे। नवंबर की हल्की ठंड में रजाई से बाहर निकलने का बिल्कुल मन नहीं था, लेकिन रसोई की जिम्मेदारियां उसे पुकार रही थीं। काव्या की शादी को अभी महज़ आठ महीने ही हुए … Read more

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