उस मासूम बच्ची के इन भोले शब्दों ने सुभद्रा जी के संयम का बाँध तोड़ दिया। वे वहीं सोफे पर बैठ गईं और फूट-फूटकर रोने लगीं। उनके हाथ-पांव सुन्न पड़ गए थे। उन्हें लग रहा था कि यह सांसें यहीं थम जाएंगी। जिस घर में अभी-अभी हँसी की गूँज थी, वहाँ फिर से वही अंतहीन, भयावह सन्नाटा पसरने वाला था।
दोपहर की मद्धिम धूप पुराने नीम के पत्तों से छनकर बरामदे के लाल फर्श पर बिछी हुई थी। पचहत्तर साल के कैलाश बाबू अपनी नक्काशीदार आरामकुर्सी पर आंखें बंद किए लेटे हुए थे। हाथ में पड़ा अधूरा अखबार उनकी गोद में ढुलक चुका था और रेडियो पर बहुत धीमी आवाज में कोई पुराना शास्त्रीय राग बज रहा था। रसोई से कड़छी की हल्की सी आवाज आई और फिर बहत्तर वर्षीया सुभद्रा जी हाथ में हल्दी वाले दूध का गिलास थामे बाहर निकलीं। चेहरे पर समय की लकीरें और चाल में घुटनों के दर्द की मटमैली सी मजबूरी साफ झलक रही थी।
“सुनिए जी, उठिए… यह दूध पी लीजिए, ठंडा हो जाएगा तो फिर आपको गैस सताएगी,” सुभद्रा जी ने गिलास तिपाई पर रखते हुए कहा।
कैलाश बाबू ने हल्की सी जम्हाई ली और चश्मा नाक पर टिकाते हुए बोले, “सुभद्रा, दिन कितनी सुस्ती से कटता है न? लगता है घड़ी की सुइयां भी हमारे साथ बूढ़ी हो गई हैं। सुबह से शाम और शाम से रात… बस यही एक ढर्रा है।”
सुभद्रा जी कुछ बोलने ही वाली थीं कि बैठक में रखे लैंडलाइन फोन की घंटी अचानक घनघना उठी। फोन की आवाज में एक खास तरह की झनझनाहट थी, जो केवल लंबी दूरी की कॉल होने पर ही आती थी। सुभद्रा जी के हाथ से पल्लू छूटते-छूटते बचा और कैलाश बाबू अपनी सुस्ती भूलकर किसी फुर्तीले नौजवान की तरह कुर्सी से उठ खड़े हुए। दोनों लगभग एक साथ फोन की तरफ लपके, लेकिन कैलाश बाबू ने पहले ही रिसीवर उठा लिया।
“हैलो! हाँ… प्रणव! अरे बेटा…” कैलाश बाबू की आवाज में बरसों की प्यास एक पल में छलक उठी।
सुभद्रा जी अपनी सांसें रोके पति के चेहरे के बदलते भावों को पढ़ रही थीं। कैलाश बाबू के चेहरे की झुर्रियां एकाएक खिलने लगी थीं और आँखों में बिजली सी चमक कौंध गई थी।
“क्या कहा? परसों? अरे वाह! नहीं-नहीं, कोई तकलीफ नहीं होगी। तू पागल है क्या, मैं खुद गाड़ी लेकर टर्मिनल पर खड़ा रहूँगा। अरे छोड़ भी अब, सीनियर सिटीजन हूँ तो क्या खुद का काम नहीं कर सकता? तू बस आ जा… क्या? रिया भी साथ आ रही है? अरे भगवान तेरा लाख-लाख शुक्र है!”
कॉल कटते ही कैलाश बाबू ने रिसीवर रखा और सुभद्रा जी के दोनों कंधे पकड़कर बच्चों की तरह झूम उठे, “सुभद्रा, सुन रही हो? हमारा प्रणव आ रहा है! कनाडा से अपनी कंपनी के एक जरूरी प्रोजेक्ट के लिए भारत आ रहा है। और सबसे बड़ी बात, वह अपनी छह साल की बेटी, हमारी नन्ही परी रिया को भी साथ ला रहा है!”
इतना सुनना था कि सुभद्रा जी के चेहरे पर जैसे किसी ने खुशियों के हजार रंग बिखेर दिए हों। उस शांत, सूने और नीरस घर में एकाएक बहार लौट आई थी। पिछले तीन सालों से जिस घर में केवल दवाइयों की पर्चियों और पुराने अलबमों के सहारे दिन कट रहे थे, वहाँ आज जिंदगी दोबारा सांस लेने लगी थी।
प्रणव सात समंदर पार टोरंटो में एक बड़ी टेलीकॉम कंपनी में सीनियर कंसल्टेंट था। उसकी पत्नी, अंकिता, बैंक में उच्च पद पर थी और काम के सिलसिले में उसे अमेरिका में रहना था, इसलिए प्रणव अपनी नन्हीं बेटी रिया को साथ लेकर आया था। प्रणव का काम मुख्य रूप से गुरुग्राम और नोएडा के क्लाइंट्स के साथ था, लेकिन उसने चार दिन माता-पिता के पुराने शहर वाले घर में बिताने का फैसला किया था।
अगले दिन सुबह से ही घर की कायापलट शुरू हो गई। सुभद्रा जी के घुटनों का दर्द न जाने कहाँ गायब हो गया था। वे पूरे घर में चकरघिन्नी की तरह घूम रही थीं। पुराने गद्दों को धूप में डाला गया, प्रणव के बचपन के पसंदीदा कमरे की खिड़कियाँ खोली गईं और ताजी हवा को अंदर आने दिया गया। सुभद्रा जी ने अलमारियों से वे क्रॉकरी सेट बाहर निकाले जिन्हें केवल बहुत खास मेहमानों के लिए सहेज कर रखा जाता था। बेसन के लड्डू, गुजिया और मठरी बनाने की तैयारी शुरू हो गई। कैलाश बाबू ने भी माली को बुलाकर पूरे बगीचे की छंटाई करवा दी।
तीसरे दिन तड़के सुबह पाँच बजे ही दोनों पति-पत्नी पूरी तरह तैयार थे। फ्लाइट का समय सुबह दस बजे था, लेकिन कैलाश बाबू किसी भी सूरत में देर नहीं करना चाहते थे। उन्होंने अपने पुराने ड्राइवर को फोन करके सात बजे ही गाड़ी लगवा ली।
“सुभद्रा, जल्दी करो! दिल्ली का ट्रैफिक तुम्हें नहीं पता, कहीं देर हो गई तो बच्चा परेशान हो जाएगा,” कैलाश बाबू उतावले हो रहे थे।
सुभद्रा जी ने अपने हाथों से बने डिब्बे कार की डिक्की में रखवाए और मुस्कुराते हुए बोलीं, “आप तो ऐसे घबरा रहे हैं जैसे पहली बार स्टेशन जा रहे हों। अभी बहुत वक्त है।”
हवाई अड्डे के अराइवल लाउंज में खड़े होकर जब कांच की दीवारों के पार प्रणव ट्रॉली खींचते हुए दिखा, और उसके पीछे गुड़िया जैसी सजी नन्हीं रिया अपनी छोटी सी गुलाबी ट्रॉली लिए चलती नजर आई, तो सुभद्रा जी के कलेजे में एक हूक सी उठी। आँखों से बहते आंसुओं ने दृष्टि धुंधली कर दी।
जैसे ही प्रणव बाहर आया, उसने झुककर अपने माता-पिता के चरण स्पर्श किए। कैलाश बाबू ने उसे सीने से भींच लिया, मानो अपनी पूरी दुनिया को बाहों में भर लिया हो। तभी रिया ने तुतलाती आवाज में कहा, “दादी… दादू…”
सुभद्रा जी ने झुककर उस नन्ही कली को अपनी गोद में उठा लिया। उस कोमल स्पर्श ने बरसों की तन्हाई और अकेलेपन के सारे जख्मों पर मरहम लगा दिया।
गाड़ी जब घर पहुँची, तो उस चार दिन के प्रवास ने उस बूढ़े आशियाने को किसी उत्सव के पंडाल में बदल दिया। प्रणव की व्यस्तता का यह आलम था कि उसका फोन लगातार बजता रहता था। वह दिन भर अपने लैपटॉप पर बैठता, बीच-बीच में क्लाइंट्स से मिलने कभी दिल्ली, कभी नोएडा और कभी फरीदाबाद भागता। लेकिन सुभद्रा जी हर वक्त उसकी परछाईं बनकर उसके पीछे लगी रहतीं।
“बेटा, थोड़ा बादाम का हलवा खा ले… सुबह से कुछ नहीं खाया।”
“प्रणव, यह काढ़ा पी ले, बाहर बहुत प्रदूषण है।”
“बेटा, कपड़े बदल ले, मैं प्रेस कर देती हूँ।”
प्रणव कई बार झुंझलाकर कहता, “माँ, आप आराम क्यों नहीं करतीं? मैं कोई छोटा बच्चा नहीं हूँ, सब कर लूँगा।” लेकिन सुभद्रा जी बस मुस्कुरा देतीं। मातृत्व की यह सेवा ही तो उनकी सबसे बड़ी पूंजी थी।
दूसरी तरफ, नन्हीं रिया ने कैलाश बाबू की पूरी दिनचर्या ही बदल डाली थी। जो कैलाश बाबू पिछले दो सालों से अपने कमरे से बाहर नहीं निकलते थे, वे अब रिया को अपनी पीठ पर बिठाकर ‘घोड़ा-घोड़ा’ खेल रहे थे। रिया उनके सफेद बालों में अपनी छोटी-छोटी क्लिप्स लगा देती और कैलाश बाबू आईने में देखकर ठहाके लगाते। वे रिया को पार्क ले जाते, उसे तितलियां दिखाते और रामायण व पंचतंत्र की कहानियाँ सुनाते। रिया अपनी अधूरी हिंदी और अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर जब बोलती, तो कैलाश बाबू का रोम-रोम खिल उठता। घर के हर कोने में खिलौने बिखरे थे, दीवारों पर रिया की बनाई आड़ी-तिरछी लकीरें थीं, लेकिन उस अव्यवस्था में जो जीवन था, वह बरसों के सलीके से सजे सन्नाटे से हजार गुना बेहतर था।
लेकिन वक्त बहुत बेरहम होता है; खुशियों के पल रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाते हैं। चार दिन कैसे हवा के झोंके की तरह उड़ गए, किसी को पता ही नहीं चला।
चौथे दिन की शाम आ गई। रात के ग्यारह बजे प्रणव और रिया की टोरंटो के लिए वापसी की फ्लाइट थी। शाम के छह बजे से ही घर का माहौल फिर से भारी होने लगा था।
सुभद्रा जी ने रिया के लिए उसके मनपसंद नमकीन, मठरी और हाथ के बने अचार के कई डिब्बे पैक कर दिए थे। उन्होंने प्रणव के सभी गर्म कपड़े सलीके से बैग में जमाए। लेकिन जैसे-जैसे घड़ी की सुइयां आगे बढ़ रही थीं, सुभद्रा जी के हाथ कांपने लगे थे। उनके पैर भारी हो रहे थे, मानो जमीन ने उन्हें जकड़ लिया हो। उनका दिल डूबने लगा था। वे बार-बार कमरे में जाकर अपनी साड़ी के पल्लू से आँखें पोंछतीं ताकि प्रणव को उनका रोना न दिखे।
रिया अपनी नई फ्रॉक पहनकर तैयार थी। उसने आकर अपनी दादी का हाथ पकड़ा, “दादी, आप भी हमारे साथ एरोप्लेन में चलो ना! मेरे टॉयज वहीं हैं, हम साथ खेलेंगे।”
उस मासूम बच्ची के इन भोले शब्दों ने सुभद्रा जी के संयम का बाँध तोड़ दिया। वे वहीं सोफे पर बैठ गईं और फूट-फूटकर रोने लगीं। उनके हाथ-पांव सुन्न पड़ गए थे। उन्हें लग रहा था कि यह सांसें यहीं थम जाएंगी। जिस घर में अभी-अभी हँसी की गूँज थी, वहाँ फिर से वही अंतहीन, भयावह सन्नाटा पसरने वाला था।
प्रणव ने अपनी माँ को रोते देखा तो उसका भी गला भर आया। वह माँ के पास घुटनों के बल बैठ गया और उनका हाथ अपने माथे से लगा लिया, “माँ, मुझे माफ कर दीजिए। मेरी नौकरी, मेरी जिम्मेदारियाँ… मैं चाहकर भी यहाँ रुक नहीं सकता। मुझे वापस जाना ही होगा माँ।”
घर में एक अत्यंत मार्मिक और भारी सन्नाटा छा गया था। तभी कैलाश बाबू आगे बढ़े। उन्होंने बहुत धीमे से सुभद्रा जी के कांधे पर हाथ रखा। कैलाश बाबू की आँखों में भी नमी थी, लेकिन उनके चेहरे पर एक असीम परिपक्वता, ठहराव और जीवन का गहरा बोध झलक रहा था।
उन्होंने अत्यंत कोमल और सधे हुए स्वर में कहा, “सुभद्रा, अपने आंसुओं को रोको। यह रोने का वक्त नहीं, ईश्वर का आभार जताने का समय है। सोचो, जहाँ इस उम्र में कई बुजुर्ग अपने बच्चों का चेहरा देखने के लिए सालों-साल तरस जाते हैं, जिनके बच्चे मुड़कर भी नहीं देखते, वहाँ हमारा बेटा सात समंदर पार से सिर्फ हमसे मिलने, हमें अपनी बिटिया से मिलाने खिंचा चला आया। उसने अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच हमारे लिए यह चार दिन निकाले।”
कैलाश बाबू ने एक गहरी, सुकून भरी सांस ली और आगे बोले, “सुभद्रा, बच्चे जब बड़े हो जाते हैं, तो उनके अपने पंख निकल आते हैं और उनका अपना आकाश बन जाता है। हम पेड़ की जड़ें हैं, और जड़ें कभी डालियों से शिकायत नहीं करतीं। यह हमारी गृहस्थी के आंगन में आए चार दिन के पाहुन हैं। ये चार दिन के पाहुन अगर साल-दो साल में भी हमारे सूने आँगन में आकर खुशियों की बूँदें छिड़क जाएं, तो यही हमारे बुढ़ापे की सबसे बड़ी दौलत है। हमें इन्हीं चार दिनों की यादों की रोशनी में अपनी बाकी बची जिंदगी को रोशन रखना है। रोकर इन्हें विदा मत करो, इन्हें अपनी दुआएं देकर हँसते हुए विदा करो ताकि अगली बार ये और ज्यादा खुशी से लौटें।”
कैलाश बाबू के इन संजीदा और गहरे शब्दों ने सुभद्रा जी के भीतर के अंधकार को चीर दिया। उन्हें अहसास हुआ कि उनके पति कितनी बड़ी सच्चाई कह रहे थे। प्रेम बाँधने का नाम नहीं, बल्कि पंख देने और उनकी उड़ान पर गर्व करने का नाम है।
सुभद्रा जी ने तुरंत अपने आँसू पोंछे, अपने चेहरे पर एक ममतामयी मुस्कान लाई और उठकर खड़ी हो गईं। उन्होंने नन्ही रिया का माथा चूमा, उसके हाथ में एक चांदी का सिक्का और मिठाई का टुकड़ा थमाया। फिर उन्होंने प्रणव की पीठ थपथपाई और कहा, “जाओ मेरे लाल, अपना और अपने परिवार का खूब ध्यान रखना। जब भी वक्त मिले, अपने इस पुराने घोंसले की तरफ उड़ आना। तुम्हारे बापू और तुम्हारी माँ हमेशा तुम्हारा इंतज़ार करेंगे।”
हवाई अड्डे के गेट पर जब प्रणव और रिया ने अंतिम बार हाथ हिलाकर अलविदा कहा, तो कैलाश बाबू और सुभद्रा जी ने एक-दूसरे का हाथ कसकर थाम लिया। उनकी आँखों में अब विरह का संताप नहीं, बल्कि अपने संस्कारों के फलने-फूलने का अपार संतोष था। घर लौटते समय कार की खिड़की से बाहर देखते हुए दोनों के मन में यह विश्वास गहरा था कि प्यार दूरियों से कभी कम नहीं होता, और रिश्तों की गर्माहट मीलों के फासले से भी दिलों को जिंदा रखती है।
पाठकों के लिए विचारणीय प्रश्न:
आज के आधुनिक युग में जब युवा अपनी आजीविका और भविष्य के लिए देश-विदेश में बसने को विवश हैं, तो क्या माता-पिता को उनके इस विस्तार को सहजता से स्वीकार कर लेना चाहिए? क्या चंद दिनों की यह आत्मीय मुलाकातें भी जीवन को नई ऊर्जा देने के लिए पर्याप्त नहीं हैं? अपने अनमोल विचार नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।
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