रिश्तों की अनकही धूप-छांव

 देवेन्द्र ने अपमान से बचने का एक ही रास्ता निकाला था—मौन। उन्होंने धीरे-धीरे बोलना ही बंद कर दिया था। वह केवल उतना ही बोलते जितना बेहद जरूरी होता। कादम्बरी का मूड देखकर ही कमरे में कदम रखते। कई बार उन्होंने हाथ जोड़कर कादम्बरी से कहा भी, “कादम्बरी, जिंदगी की शाम हो चुकी है। अब तो कम से कम जुबान पर थोड़ी मिठास ले आओ। तुम मेरा आदर मत करो, पर भरी जवानी से लेकर इस बुढ़ापे तक, सबके सामने मेरा अपमान तो मत किया करो।” पर कादम्बरी उल्टा उन पर ही बरस पड़ती, “हां, अब तो मैं ही बुरी लगूंगी! सारा दिन खटती रहूं और एक बात कह दूं तो अपमान हो गया!”

अलमारी की निचली दराज से पुराना लेदर बैग निकालते हुए देवेन्द्र के हाथ कांप रहे थे। यह वही बैग था जो उनकी सरकारी नौकरी के दिनों में टूर पर जाते समय काम आता था। आज लगभग पंद्रह साल बाद वह फिर बाहर निकला था, लेकिन इस बार किसी दफ्तर के काम से या दो-चार दिनों के सफर के लिए नहीं। आज देवेन्द्र हमेशा के लिए इस घर को, इस शहर को और अपनी अड़तालीस साल पुरानी गृहस्थी को अलविदा कहने जा रहे थे। दीवार पर टंगी घड़ी में शाम के पांच बज रहे थे। उन्होंने मन ही मन तय किया था कि रात के ठीक नौ बजे, जब पूरा परिवार खाना खाकर अपने-अपने कमरों में चला जाएगा, वह चुपचाप पिछले दरवाजे से निकल जाएंगे। किसी वृद्धाश्रम में शरण ले लेंगे, या फिर किसी तीर्थ की अनजानी गलियों में गुम हो जाएंगे। अगर सांसों का बोझ ज्यादा लगा, तो शायद जिंदगी से ही किनारा कर लेंगे, मगर अब इस चारदीवारी में उनका एक पल भी घुट-घुटकर जीना नामुमकिन था।

बाहर से देखने वाले किसी भी इंसान के लिए देवेन्द्र का घर किसी जीते-जागते स्वर्ग जैसा था। उनका बेटा आलोक शहर की एक प्रतिष्ठित कंपनी में बड़े पद पर था। बहू रश्मि संस्कारी और सुशील थी। दोनों ही अपने माता-पिता के सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। देवेन्द्र के नाती-पोते पूरे घर में चहकते रहते थे। घर में किसी चीज़ का अभाव नहीं था—न मान-सम्मान का, न धन-दौलत का। समस्या बेटे या बहू से नहीं थी, समस्या थी देवेन्द्र की बहत्तर वर्षीय पत्नी कादम्बरी से।

कादम्बरी को पूरा मोहल्ला ‘अन्नपूर्णा’ और ‘ममता की मूरत’ कहता था। घर के किसी भी सदस्य को हल्की सी छींक भी आ जाए, तो कादम्बरी का कलेजा मुंह को आ जाता था। जब बहू रश्मि अपने ऑफिस के प्रोजेक्ट्स में उलझी होती, तो कादम्बरी हंसते-हंसते पूरे घर का काम संभाल लेती। बच्चों को तो दादी के हाथ के बिना खाना ही नहीं पचता था। परिवार का कोई भी दुख कादम्बरी से देखा नहीं जाता था। वह पूरे समर्पण से परिवार की सेवा में रमी रहती थी। लेकिन देवेन्द्र के साथ उसका व्यवहार एक ऐसी पहेली बन चुका था, जिसे अड़तालीस वर्षों में भी देवेन्द्र हल नहीं कर पाए थे।

कादम्बरी की जुबान देवेन्द्र के लिए हमेशा तीखे बाण उगलती थी। बात चाहे कितनी भी छोटी हो, कादम्बरी का लहजा हमेशा तंज और डांट से भरा होता। सुबह की चाय में चीनी कम होने से लेकर अखबार के पन्ने मुड़े होने तक, हर बात पर कादम्बरी उन्हें सबके सामने इस तरह फटकार देती मानो वह कोई नासमझ अजनबी हों। देवेन्द्र जिंदगी भर एक गरिमामयी पद पर रहे थे, दफ्तर में सैकड़ों लोग उनके सामने अदब से खड़े रहते थे, लेकिन घर की दहलीज लांघते ही पत्नी की कड़वी जुबान उनके आत्मसम्मान को तार-तार कर देती थी।

बिस्तर पर बैठकर देवेन्द्र उस पुराने सूटकेस में अपने चंद कुर्ते-पायजामे समेटने लगे। चार घंटे काटना पहाड़ जैसा लग रहा था। उन्होंने आलोक और कादम्बरी से कह दिया था कि वह अपने पुराने मित्रों के साथ ऋषिकेश दर्शन के लिए जा रहे हैं और हफ्ते भर में लौटेंगे। किसी को कोई शक नहीं हुआ था। सूटकेस खुला पड़ा था और देवेन्द्र यादों के दलदल में धंसते चले गए।

उनका विवाह 1978 की सर्दियों में हुआ था। कादम्बरी जब दुल्हन बनकर आई थी, तो देवेन्द्र के माता-पिता की खुशी का ठिकाना न था। कादम्बरी बहुत छोटी उम्र में ही अनाथ हो गई थी, मौसी के घर पली-बढ़ी थी। ससुराल आकर उसने सास-ससुर को इतना मान दिया कि वे अपनी सगी बेटी को भी भूल गए। कादम्बरी की सेवा भावना में कभी कोई खोट नहीं रहा। लेकिन शादी के शुरुआती दिनों से ही उसकी यह आदत देवेन्द्र को चुभने लगी थी। देवेन्द्र ने अगर जरा सा भी प्यार से कुछ कहा, तो वह झिड़क देती। कोई सलाह दी, तो अपमानित कर देती। जवानी के दिनों में जब भी कादम्बरी ऐसा करती, देवेन्द्र भी गुस्से में आगबबूला हो जाते, दोनों के बीच भयंकर झगड़े होते। देवेन्द्र गुस्से में घर से निकल जाते, देर रात लौटते। दो-चार दिन बातचीत बंद रहती, फिर सब सामान्य हो जाता। लेकिन कुछ दिन बीतते ही कादम्बरी की वही कड़वाहट दोबारा लौट आती।

देवेन्द्र को जिंदगी भर यही लगता रहा कि कादम्बरी शायद उनसे प्रेम नहीं करती। शायद यह विवाह उसकी मर्जी के खिलाफ हुआ था, या फिर वह देवेन्द्र की शख्सियत से कभी खुश नहीं रही।

उन्हें याद आया वह मनहूस साल, जब देवेन्द्र को दिल का गंभीर दौरा पड़ा था। डॉक्टरों ने कह दिया था कि अगले अड़तालीस घंटे बेहद नाजुक हैं। उस वक्त कादम्बरी का जो रूप देवेन्द्र ने देखा था, उसने उनके सारे संदेह मिटा दिए थे। वह पागलों की तरह आईसीयू के बाहर फर्श पर बैठकर रोती रही थी। उसने अन्न-जल त्याग दिया था। जब देवेन्द्र को प्राइवेट वार्ड में शिफ्ट किया गया, तो कादम्बरी ने किसी को भी उनकी सेवा नहीं करने दी। न बेटे को, न बहू को। लगातार दस दिनों तक वह अस्पताल की उस सख्त कुर्सी पर बैठी रही। देवेन्द्र की दवा, स्पंजिंग, खान-पान—सब उसने अपने हाथों से किया। एक रात जब देवेन्द्र की आंख खुली, तो देखा कि कादम्बरी उनके पैरों को अपने सीने से चिपकाए, वहीं सिर रखकर सो रही थी। उसके चेहरे पर फैली थकान और आंखों के नीचे के काले घेरे चीख-चीख कर कह रहे थे कि देवेन्द्र की जान में ही उसकी जान बसती है। देवेन्द्र ने रुंधे गले से उसके सिर पर हाथ फेरा था। उस पल लगा था कि दुनिया का सारा प्रेम इस औरत के दिल में सिमट आया है।

लेकिन अस्पताल से घर लौटते ही, मुश्किल से एक महीना बीता होगा कि कादम्बरी का पुराना रूप फिर लौट आया। वही चिड़चिड़ापन, वही तीखे बोल, वही अपमानजनक लहजा।

जीवन अपनी रफ्तार से कटता रहा। शादी की पच्चीसवीं सालगिरह आई, फिर चालीसवीं बीती। बच्चे बड़े हुए, आलोक का विवाह हुआ, पोते-पोतियों की किलकारियों से आंगन गूंज उठा। लेकिन देवेन्द्र और कादम्बरी के बीच का यह अनकहा तनाव कभी कम नहीं हुआ। रिटायरमेंट के बाद तो स्थिति और विकट हो गई। पहले देवेन्द्र दिन का बड़ा हिस्सा दफ्तर में बिता लेते थे, तो टकराव कम होता था। अब चौबीसों घंटे एक ही छत के नीचे रहना पड़ता था।

देवेन्द्र ने अपमान से बचने का एक ही रास्ता निकाला था—मौन। उन्होंने धीरे-धीरे बोलना ही बंद कर दिया था। वह केवल उतना ही बोलते जितना बेहद जरूरी होता। कादम्बरी का मूड देखकर ही कमरे में कदम रखते। कई बार उन्होंने हाथ जोड़कर कादम्बरी से कहा भी, “कादम्बरी, जिंदगी की शाम हो चुकी है। अब तो कम से कम जुबान पर थोड़ी मिठास ले आओ। तुम मेरा आदर मत करो, पर भरी जवानी से लेकर इस बुढ़ापे तक, सबके सामने मेरा अपमान तो मत किया करो।” पर कादम्बरी उल्टा उन पर ही बरस पड़ती, “हां, अब तो मैं ही बुरी लगूंगी! सारा दिन खटती रहूं और एक बात कह दूं तो अपमान हो गया!”

आज सुबह भी हद हो गई थी। आलोक के ससुर घर आए हुए थे। सब लोग ड्रॉइंग रूम में चाय पी रहे थे। देवेन्द्र ने बातों-बातों में राजनीति पर अपनी कोई राय रख दी। कादम्बरी ने सबके सामने तपाक से टोक दिया, “आपको कुछ अक्ल तो है नहीं, जहां देखो अपनी बेतुकी राय लेकर बैठ जाते हैं। अंदर जाकर अपनी दवाई खाइए, यहां ज्ञानी बनने की जरूरत नहीं है।”

समधी जी के चेहरे पर झेंप तैर गई थी, आलोक ने नजरें झुका ली थीं और देवेन्द्र का कलेजा छलनी हो गया था। उस पल उनके स्वाभिमान ने अंतिम सांस ली थी। उन्होंने उसी क्षण ठान लिया था कि अब बहुत हो चुका। अब एक दिन भी इस अपमान के साए में नहीं रहना। जिस घर में मान न हो, वहां की रोटी जहर के समान होती है।

शाम के सात बज चुके थे। घर में अंधेरा घिरने लगा था। देवेन्द्र ने अपनी एक-दो जरूरी डायरियां और चश्मा भी बैग में रख लिया। वह बैग की ज़िप खींचने ही वाले थे कि अचानक उनके कमरे का दरवाजा खुला।

कादम्बरी हाथ में गर्म दूध का गिलास और दवाइयों की कटोरी लिए अंदर आई। उसकी कमर झुक चुकी थी, घुटनों के दर्द की वजह से वह थोड़ा लंगड़ा कर चल रही थी।

“यह लीजिए, अपनी बीपी और शुगर की दवा खाइए। और यह क्या, अभी तक आपने गर्म शॉल नहीं निकाली? ऋषिकेश जा रहे हैं, वहां पहाड़ों की ठंडी हवा चलती है। इस उम्र में ठंड लग गई तो कौन संभालेगा वहां?” कादम्बरी ने दवा की कटोरी मेज पर पटकते हुए हमेशा की तरह उसी रूखे अंदाज में कहा।

देवेन्द्र ने कोई उत्तर नहीं दिया। चुपचाप दवा मुंह में रखी और पानी पी लिया।

कादम्बरी मुड़ी, लेकिन कमरे से बाहर जाने के बजाय वह देवेन्द्र के बिस्तर के पास रखी कुर्सी पर बैठ गई। उसने अपने कांपते हाथों से अपना माथा पकड़ लिया। वह बहुत थकी हुई लग रही थी। अचानक उसने गहरी सांस छोड़ी और देवेन्द्र की तरफ देखा।

“सुनिए, वहां ऋषिकेश में ज्यादा पैदल मत चलिएगा। आपके घुटनों में गैप आ चुका है, डॉक्टर ने मना किया है। और हां… समय पर खाना खा लीजिएगा। मुझे पता है, आप अपने मन के मालिक हैं, मेरे बिना अपनी सुध ही नहीं रखते। चार दिन कैसे कटेंगे आपके बिना, सोचकर ही मेरा जी घबरा रहा है।”

कादम्बरी की आवाज में एक अजीब सा कंपन था। देवेन्द्र ने चौंक कर उसकी ओर देखा। उसकी आंखों के कोरों में नमी चमक रही थी।

“कादम्बरी?” देवेन्द्र के मुंह से अनायास ही निकला।

“क्या कादम्बरी? सच ही तो कह रही हूं। बचपन में मां-बाप का साया उठ गया, मौसी के घर हमेशा सहम कर जीती रही। कभी किसी पर अपना हक जताना सीखा ही नहीं। जब इस घर में आई, तो सिर्फ आप ही थे जिसे मैंने अपना माना। जिस पर मैं बिना डरे, बिना सोचे कुछ भी कह सकती थी। बाकी पूरी दुनिया के लिए तो मैं आज भी बहु, मां, सास और दादी के फर्ज निभाती हूं… सिर्फ आपके सामने ही मैं वो कादम्बरी होती हूं, जिसे किसी बात का पर्दा नहीं रखना पड़ता। पर आप तो मुझे हमेशा पराया ही समझते रहे।”

कादम्बरी की आंखों से दो बूंद आंसू लुढ़क कर उसकी झुर्रीदार गालों पर बह निकले। वह अपनी साड़ी के पल्लू से आंखें पोंछती हुई धीरे से उठी और कमरे से बाहर चली गई, ताकि देवेन्द्र उसके आंसुओं को ज्यादा न देख सकें।

कमरे में सन्नाटा पसर गया। उस सन्नाटे में देवेन्द्र के दिल पर जैसे कोई वज्रपात हुआ। उनका मस्तिष्क सुन्न पड़ गया।

अड़तालीस साल! पूरे अड़तालीस साल लग गए उन्हें इस कड़वे सच की मिठास को समझने में!

देवेन्द्र के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उन्होंने जिस औरत के कड़वे बोलों को हमेशा नफरत, बेरुखी और अपमान समझा था, वह दरअसल उसका अनगढ़, बेपरवाह और बेलौस हक था! जिस अनाथ लड़की ने सारी जिंदगी दूसरों को खुश रखने के लिए अपने अस्तित्व को दबाए रखा था, जिसने समाज के नियमों के डर से कभी किसी के सामने अपनी कमजोरी जाहिर नहीं होने दी थी, वह केवल और केवल अपने पति के सामने अपने सारे मुखौटे उतार फेंकती थी। उसका गुस्सा, उसका झिड़कना, उसकी तल्खी—वह कोई दुश्मनी या नफरत नहीं थी, वह उस स्त्री का अपने पति पर अनन्य, उग्र अधिकार था! वह दुनिया के सामने आदर्श बहू और ममतामयी मां का अभिनय करते-करते थक जाती थी, और अपनी सारी थकान, अपनी सारी उलझनें सिर्फ देवेन्द्र के कंधों पर उतार देती थी, क्योंकि उसे विश्वास था कि यह शख्स उसका अपना है, यह कहीं नहीं जाएगा।

और वह क्या करने जा रहे थे?

देवेन्द्र ने कांपती नजरों से उस सूटकेस को देखा। अगर वह आज रात चले जाते, तो क्या होता? जो औरत उनके सिर के हल्के से दर्द पर भी पूरी रात जागकर गुजार देती थी, जो उनके चार दिन के सफर की बात सुनकर ही रो पड़ी थी, उनके हमेशा के लिए चले जाने पर वह तो जीते जी मर जाती! वह तिल-तिल कर खत्म हो जाती। देवेन्द्र की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा।

उन्हें आज कादम्बरी पर नहीं, खुद पर बेइंतहा गुस्सा आ रहा था। वह खुद को बहुत सुलझा हुआ, पढ़ा-लिखा और समझदार इंसान मानते थे, लेकिन वह आधी सदी तक अपनी ही जीवनसंगिनी के दिल के उस कोने को नहीं पढ़ पाए, जहां केवल उनका नाम लिखा था। प्रेम हमेशा मीठे शब्दों, गुलाबों और तारीफों में ही नहीं लिपटा होता; कभी-कभी प्रेम डांट, झिड़की और बेबाक हक जताने के रूप में भी सांस लेता है। कादम्बरी के पास प्रेम जताने का कोई सलीका नहीं था, लेकिन उसके दिल में देवेन्द्र के सिवा कोई दूसरा खुदा भी तो नहीं था।

देवेन्द्र ने एक गहरी सांस ली। उनके सीने का सारा भारीपन, सारा तनाव और सारी घुटन एक पल में बह गई थी।

उन्होंने आगे बढ़कर उस पुराने लेदर के सूटकेस की ज़िप खोली। एक-एक करके अपने सारे कपड़े निकाले और बहुत करीने से, तह लगाकर उन्हें वापस अलमारी में रखने लगे।

तभी दरवाजे पर फिर आहट हुई। कादम्बरी हाथ में गर्म पानी की बोतल लिए अंदर आई। उसने देवेन्द्र को कपड़े वापस अलमारी में रखते देखा, तो उसकी भौंहें तन गईं।

“यह क्या कर रहे हैं आप? अभी तक बैग तैयार नहीं हुआ और कपड़े निकाल कर फिर फैला दिए? ऐसे अस्त-व्यस्त रखेंगे तो सफर में क्या पहनेंगे? आप कभी कोई काम ढंग से नहीं कर सकते!” वह फिर उसी चिर-परिचित डांटने वाले लहजे में बड़बड़ाने लगी।

लेकिन इस बार देवेन्द्र के चेहरे पर कोई तनाव नहीं था। उनके दिल में कोई अपमान का भाव नहीं था। उन्होंने पलट कर कादम्बरी के उस झुर्रियों भरे, गुस्से से लाल चेहरे को देखा, जिसमें केवल और केवल उनके प्रति गहरा प्रेम और फिक्र छुपी थी।

देवेन्द्र मंद-मंद मुस्कुराए। उन्होंने कादम्बरी के हाथ से गर्म पानी की बोतल ली, उसे मेज पर रखा और बहुत नर्मी से उसके कांपते हुए दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया।

“कादम्बरी, मैंने ऋषिकेश जाने का कार्यक्रम रद्द कर दिया है। मैं कहीं नहीं जा रहा।” देवेन्द्र ने शांत स्वर में कहा।

कादम्बरी ने अचरज से आंखें बड़ी कीं, “क्यों? अचानक क्या हो गया? तबीयत तो ठीक है आपकी?” उसकी आवाज में पल भर में वही घबराहट और फिक्र लौट आई।

“मेरी तबीयत बिल्कुल ठीक है,” देवेन्द्र की आंखों में चमक थी और होठों पर एक सुकून भरी मुस्कान, “बस मुझे समझ आ गया कि जिस तीर्थ की तलाश में मैं बाहर जा रहा था, वह तीर्थ तो पिछले अड़तालीस सालों से मेरे इसी कमरे में, मेरे सामने बैठा है। और हां… अगर तुम्हें डांटने का इतना ही शौक है, तो जिंदगी भर डांटती रहो, मुझे अब तुम्हारी कोई बात बुरी नहीं लगेगी।”

कादम्बरी ने पहले तो उन्हें अचरज से देखा, फिर उसकी नजरें झुक गईं। उसने अपना हाथ छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की। अड़तालीस वर्षों के वैवाहिक जीवन में पहली बार दोनों के बीच का मौन इतना मुखर, इतना पवित्र और इतना शांत था। बाहर हल्की-हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी, और घर के भीतर अड़तालीस साल पुराना एक रिश्ता अपनी नई और खूबसूरत शुरुआत कर रहा था।

अक्सर हम अपनों के रूखे व्यवहार या कड़वी जुबान के पीछे छुपे उनके अगाध प्रेम और उस अनकहे अधिकार को नहीं समझ पाते, जो वे केवल हम पर जताते हैं। क्या आपके जीवन में भी कोई ऐसा रिश्ता है, जिसकी कड़वाहट के पीछे बेपनाह मोहब्बत छुपी है? अपने विचार नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।

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मूल लेखक 

 बालेश्वर गुप्ता

                  पुणे(महाराष्ट्र)

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