सीरत का गहना

रश्मि जी ने मीरा के खून से सने माथे को चूम लिया। “मेरी दीदी मेरे लिए मेरी माँ के समान हैं। अगर आज तू अपने महँगे कपड़ों और इस दिखावे की परवाह करती, जैसे बाकी भीड़ कर रही थी, तो आज मैं अपनी माँ जैसी बहन को खो देती। तूने आज सिर्फ मेरी दीदी की … Read more

मृगतृष्णा और बरगद की छांव

नीता ने अपने आँसू पोंछे और अपने पिता के खुरदरे हाथों को अपने गालों से लगा लिया। “बाबूजी… मैं भी उस छोटी बच्ची की तरह खो गई थी। लेकिन भगवान ने और आपके संस्कारों ने मेरा हाथ पकड़ लिया और मैं वापस आपके पास लौट आई। मुझे कभी खुद से दूर मत करना बाबूजी।” रामदीन … Read more

तुम्हारे साथ, ढलती शाम तक…

 आदित्य ने मीरा की आँखों में गहराई से देखते हुए कहा, “मीरा, तुमने कल कहा था कि मैंने तुम्हें कभी प्रपोज नहीं किया। सच कहूँ तो, मुझे वो भारी-भरकम शब्द और फिल्मी डायलॉग बोलने नहीं आते। मुझे नहीं पता कि चाँद-तारे कैसे तोड़े जाते हैं, क्योंकि मुझे पता है कि हकीकत में हमें इसी ज़मीन … Read more

“आँगन की छाँव”

शिखा अपनी माँ की बात सुनकर सन्न रह गई। उसे पहली बार एहसास हुआ कि मायका सिर्फ बेटियों के आरामगाह का नाम नहीं है। उसे याद आया कि कैसे पिछली बार उसने अंजलि को कितना परेशान किया था। सुमित्रा देवी ने बहुत ही शांति से अपनी बेटी को जीवन का एक बहुत बड़ा पाठ पढ़ा … Read more

एक रंगीन खामोशी

 उनका यह दर्द सुनकर मैं अवाक रह जाता था। एक पिता, जिसने अपनी बेटी को जन्म दिया, उसे पाला, वो आज उसके लिए मौत की भीख मांग रहा था। प्रतीक्षा सचमुच बहुत थकान भरी और असह्य होती है, और जब प्रतीक्षा मौत की हो, तो वह जिंदगी से भी ज्यादा भयानक हो जाती है। लेकिन … Read more

परिश्रम का अजेय सिक्का

 अपनी सारी पीड़ा, दुकान जलने का दुख और परिवार की भुखमरी की हालत अपने भाई के सामने रख दी और हाथ जोड़कर कुछ रुपयों का कर्ज मांगा। विकास ने एक ठंडी सांस ली और व्यंग्यात्मक लहजे में कहा, “देखो रघु, आजकल हर दूसरे दिन कोई न कोई रिश्तेदार ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी लेकर आ जाता … Read more

कच्चे धागों का अटूट बंधन

प्रकाश की ये बातें सुनकर मालती की आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। उसने रोते हुए कहा, “बस कीजिए। एक शब्द और मत कहिएगा। माफी तो मुझे मांगनी चाहिए। पता नहीं मुझे क्या हो गया था जो मैं इतनी अंधी हो गई थी। मैं कैसे भूल गई कि इन मुश्किल हालातों में भी आप … Read more

विश्वास की डोर

सुमित्रा ताई ने बीच में ही बात काटते हुए चीखकर कहा, “चुप कर बेशर्म! एक तो चोरी, ऊपर से सीनाज़ोरी। अगर तू उसे घास नहीं डालती तो वो तेरे पीछे क्यों पड़ता? तालियां कभी एक हाथ से नहीं बजतीं मीना। कुछ तो इसने भी इशारा किया होगा, तभी तो उस लड़के की इतनी हिम्मत हुई। … Read more

दो आंगनों की धूप

स्वाति की आंखें नम हो गईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को होठों की मुस्कान से ढक लिया। वो एक झूठे, प्यार भरे गुस्से के अंदाज में बोली, “पापा! आप भी ना, हमेशा शिकायत करते रहते हैं। अरे, इसमें मेरी क्या गलती है? आप ही लोगों ने तो बचपन से कूट-कूट कर इतने अच्छे संस्कार दिए … Read more

एक झूठा कलंक

 “साहब, यह सब सरासर झूठ है। मेरी बहन तो यहाँ रहती भी नहीं है। मेरे पिता हार्ट पेशेंट हैं, वे किसी पर हाथ कैसे उठा सकते हैं? मैंने आज तक अपनी पत्नी से एक रुपये की मांग नहीं की।” अविनाश ने पुलिस वाले के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा। लेकिन वहाँ सुनने वाला कोई नहीं … Read more

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