बुरी बहू

“रवि, अब बस बहुत हुआ। मुझसे तुम्हारी माँ की सेवा नहीं होती। आज के बाद मैं उनके कमरे में पानी का एक गिलास लेकर भी नहीं जाऊंगी।” स्नेहा ने यह बात इतने सपाट और ठंडे लहजे में कही कि डायनिंग टेबल पर बैठे रवि के हाथ से निवाला छूटकर प्लेट में गिर गया। कमरे में … Read more

संस्कारों की कमी 

अंजलि की आँखों में आँसू आ गए। वही गुस्सा जब रमन ने किया तो ‘काम का तनाव’ था। जब प्रिया ने किया तो ‘बचपन की आदत’ थी। लेकिन जब उसने अपनी जायज़ तकलीफ बताई, तो वह ‘बदतमीज़ी’ और ‘संस्कारों की कमी’ बन गई। तभी घर के मुखिया, शर्मा जी, जो चुपचाप अखबार पढ़ रहे थे, … Read more

दिल पर पड़े बोझ

सावित्री देवी के घर में आज कोहराम मचा हुआ था। शहर की प्रतिष्ठित ‘महिला समिति’ की मासिक बैठक आज उन्हीं के घर पर थी। यह सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि सावित्री देवी के लिए अपनी नाक का सवाल था। शहर की मेयर की पत्नी और कई बड़े अधिकारियों की पत्नियां आने वाली थीं। सावित्री देवी … Read more

दहलीज के पार का उजाला

“मुझे माफ़ कर दो सुप्रिया… मुझे माफ़ कर दो,” कुणाल की आवाज़ कांप रही थी। “आज तुमने जब वो दरवाज़ा छोड़ा, तब पहली बार मुझे अपनी कायरता का अहसास हुआ। मैं घर पर बैठा रहा, लेकिन मेरा दम घुट रहा था। मिस्टर मल्होत्रा घर आए, माँ ने सब इंतज़ाम किए, लेकिन मैं डाइनिंग टेबल पर … Read more

फर्ज की मशाल

कौशल्या देवी ने अवनि का हाथ थामा और उसे अपनी छाती से लगाते हुए गर्व से कहा, “लोग कहते हैं कि बेटा घर का नाम चलाता है, लेकिन मैं कहती हूँ कि औलाद का कोई लिंग नहीं होता, औलाद सिर्फ कर्म और प्रेम से पहचानी जाती है। समाज बेटे को कभी ‘बेटी’ कहकर नहीं पुकारता, … Read more

संस्कारों की छाँव: एक नई सुबह

 “प्रणाम माँ जी,” अद्विका की आवाज़ में एक अजीब सी मिठास और ठहराव था। “मुझे पता है हमने आपका दिल दुखाया है, लेकिन मुझे अपनी बेटी मानकर आशीर्वाद दीजिए।” रुक्मिणी देवी का कठोर हृदय एक पल के लिए पिघल गया। उनके हाथ अपने आप उठकर अद्विका के सिर पर चले गए। “जीती रहो,” उनके मुँह … Read more

जड़ों की उड़ान

“मैं इस घर को नहीं बेचूंगी विकास, बल्कि मैं इस घर को एक नया जीवन दूंगी,” कल्याणी देवी की आंखों में एक नई चमक थी। “मैं शांति कुंज के इस बड़े से दालान में एक ‘कला केंद्र’ खोलूंगी। मैं मोहल्ले की उन औरतों और लड़कियों को मुफ्त में पेंटिंग, सिलाई और हैंडीक्राफ्ट सिखाऊंगी जो कुछ … Read more

पुनर्जन्म 

“साहिल, तुमने कभी उस पुराने खंडहर को ध्यान से देखा है?” नीरा ने अचानक पूछा, अपनी कॉफी का कप टेबल पर रखते हुए। हम दोनों कैफे की खिड़की के पास बैठे थे। बाहर बारिश हो रही थी, वैसी ही बारिश जैसी उस दिन हो रही थी जब मैं पहली बार नीरा से मिला था। नीरा, … Read more

दोहरे मापदंड 

रास्ते भर सुमन का दिमाग उबलता रहा। उसे याद आया कि कल रात जब उसने राकेश से कहा था कि ‘आज बर्तन तुम धो दो, मेरी कमर दुख रही है’, तो राकेश ने साफ़ मना कर दिया था। “मैं मर्द हूँ सुमन, ये औरतों वाले काम मुझसे नहीं होते,” यह कहकर वह टीवी देखने बैठ … Read more

धुंधली आँखे

“बाबूजी, अब बहुत हो गया,” रवि ने गंभीर स्वर में कहा। “मैंने सिडनी में सब इंतज़ाम कर लिया है। मेरा घर बहुत बड़ा है, वहां पार्क है, इंडियन कम्युनिटी है। आप यहाँ अकेले इस टूटे हुए घर में कैसे रह रहे हैं? मुझे रात-रात भर नींद नहीं आती आपकी चिंता में। इस बार मैं आपको … Read more

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