इश्क़ का नया सफर – दिव्या मिश्रा

 “मैं एक ऐसी लड़की का इंतज़ार कर रहा था, जिसने अपनी पूरी जवानी दूसरों के लिए कुर्बान कर दी। मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब उसके कंधों से ज़िम्मेदारियों का बोझ कम हो, कब वो अपने परिवार के दायित्वों से मुक्त हो और कब मैं उससे कह सकूं कि अब उसे अकेले चलने की ज़रूरत नहीं है,” विक्रम ने बिना पलक झपकाए कहा।

नीरा का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसके कानों में विक्रम की आवाज़ गूंज रही थी, लेकिन उसका दिमाग इस सच्चाई को स्वीकार करने में झिझक रहा था। “विक्रम… तुम… तुम ये क्या कह रहे हो?”

दिसंबर की उस सर्द शाम में कॉफी शॉप के अंदर एक अजीब सी गर्माहट थी। बाहर हल्की-हल्की धुंध गिर रही थी और कांच की खिड़की के पार सड़क पर दौड़ती गाड़ियां बस एक रोशनी की लकीर जैसी लग रही थीं। खिड़की के पास वाली टेबल पर नीरा और विक्रम आमने-सामने बैठे थे। विक्रम, जो नीरा के ऑफिस में पिछले आठ सालों से उसका सहकर्मी और एक बहुत अच्छा दोस्त था, आज कुछ गहरे ख्यालों में खोया हुआ लग रहा था। दोनों के बीच अक्सर काम, दुनियादारी और परिवार की बातें होती थीं, लेकिन आज हवा में एक अनकही सी खामोशी तैर रही थी।

विक्रम ने अपने कॉफी के मग को दोनों हाथों से पकड़ा, जैसे उससे गर्माहट ले रहा हो, और फिर नीरा की आँखों में देखते हुए एक ऐसा सवाल पूछ लिया जिसकी नीरा को बिल्कुल उम्मीद नहीं थी।

“नीरा, क्या तुम्हें कभी किसी से प्यार हुआ है?” एक बेहद करीबी और अच्छे दोस्त की तरह विक्रम ने पूछा।

नीरा इस अचानक आए सवाल पर थोड़ी सकपकाई। उसने अपनी नज़रें चुराईं और खिड़की के बाहर देखने लगी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी उदासी छा गई, जो उसकी उम्र से कहीं ज्यादा गहरी थी। एक ठंडी सांस लेते हुए नीरा बोली, “पता नहीं विक्रम। मेरे लिए घर की ज़िम्मेदारियां इतनी बड़ी और भारी थीं कि प्यार की वो गर्माहट या वो अहसास मैंने कभी महसूस ही नहीं किया।” नीरा के शब्दों में एक ऐसी कसक थी जो बता रही थी कि कहीं न कहीं, उसके मन के किसी बहुत गहरे और अंधेरे कोने में प्यार पाने की एक दबी हुई आस आज भी जिंदा थी।

नीरा की कहानी आसान नहीं थी। जब वह बाइस साल की थी, तभी उसके पिता का एक सड़क दुर्घटना में देहांत हो गया था। माँ पहले से ही दिल की मरीज़ थीं। घर में एक छोटा भाई और एक बहन थी, जिनकी पढ़ाई और भविष्य का पूरा बोझ नीरा के नाज़ुक कंधों पर आ गिरा था। जिस उम्र में लड़कियां सजने-संवरने, कॉलेज कैंटीन में दोस्तों के साथ गप्पे मारने और अपने सपनों के राजकुमार के ख्वाब बुनती हैं, उस उम्र में नीरा अस्पताल के बिल, घर के राशन के हिसाब और भाई-बहन की स्कूल फीस की चिंताओं में डूब गई थी। उसने अपनी जवानी अपने परिवार के नाम कर दी थी।

अपनी मेहनत से उसने छोटे भाई को इंजीनियरिंग करवाई और बहन की एक अच्छे घर में शादी की। भाई अब विदेश में सेटल हो चुका था और माँ दो साल पहले इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं। आज नीरा के पास अपना कहने को वो बड़ा सा सूना घर था, लेकिन उसमें अपनों की वो चहल-पहल नहीं थी जिसके लिए उसने अपनी पूरी ज़िंदगी दांव पर लगा दी थी।

विक्रम, जो इन आठ सालों में नीरा के हर सुख-दुख का मूक गवाह रहा था, उसकी इस उदासी को बहुत अच्छी तरह समझता था। उसने बहुत ही अपनेपन से नीरा का ध्यान खींचते हुए कहा, “पर नीरा, अब तो तुम्हारे कंधों पर कोई ज़िम्मेदारी नहीं है। अमन अपनी ज़िंदगी में खुश है, बहन अपने ससुराल में खुश है। तुमने सबके लिए सब कुछ कर दिया। अब तुम क्यों नहीं शादी कर रही हो? अब अपने बारे में क्यों नहीं सोचती?”

नीरा ने एक हताशा भरी, फीकी सी हंसी हंसी। “सच बताऊं विक्रम? एक तो अब मेरी उम्र हो गई है। 34 साल की हो चुकी हूँ मैं। इस उम्र में नए सिरे से ज़िंदगी कौन शुरू करता है? और दूसरा… अब इस ढलती उम्र में मुझे ढूंढ़ने वाला भी तो कोई चाहिए। लोग इस उम्र की लड़की में या तो कोई कमी तलाशते हैं या फिर समझौते की उम्मीद करते हैं।”

विक्रम को नीरा की यह बात बिल्कुल अच्छी नहीं लगी। उसने थोड़ा ज़ोर देते हुए कहा, “34-35 साल की उम्र कोई बहुत बड़ी उम्र नहीं होती नीरा। ज़िंदगी खत्म नहीं हो जाती इस उम्र में, बल्कि इंसान और ज्यादा समझदार और परिपक्व हो जाता है। प्यार और साथ की ज़रूरत तो इंसान को हर उम्र में होती है।”

नीरा इस बहस को और आगे नहीं बढ़ाना चाहती थी। वह जानती थी कि विक्रम हमेशा उसकी परवाह करता है, लेकिन वह अपने मन को झूठी तसल्लियां नहीं देना चाहती थी। “देखते हैं विक्रम, ज़िंदगी अब किस मोड़ पर ले जाती है। वैसे भी अब मुझे अकेले रहने की आदत सी हो गई है,” मुसकरा कर बात खत्म करने के इरादे से वह बोली।

नीरा ने अपना कॉफी का मग उठाया और एक घूंट लेते हुए अचानक पलटकर विक्रम से पूछा, “खैर मेरी बात तो छोड़ो, तुम बताओ। तुम्हारी उम्र भी तो मेरी जितनी ही है, बल्कि तुम तो 35 के हो चुके हो। तुमने आज तक शादी क्यों नहीं की? तुम्हारे घर वाले तो तुम्हारे लिए कितने रिश्ते लाते हैं, फिर तुम क्यों हर बार मना कर देते हो?”

विक्रम कुछ पल के लिए शांत हो गया। उसने अपनी नज़रें नीरा के चेहरे पर टिका दीं। उसकी आँखों में आज एक ऐसी चमक और एक ऐसा ठहराव था जिसे नीरा ने पहले कभी नहीं देखा था।

“मैं शादी इसलिए नहीं कर रहा था नीरा, क्योंकि मैं किसी का इंतज़ार कर रहा था,” विक्रम ने धीमी लेकिन बहुत ही स्पष्ट आवाज़ में कहा।

“इंतज़ार? किसका इंतज़ार?” नीरा ने हैरानी से पूछा। “तुमने तो कभी किसी लड़की का ज़िक्र नहीं किया ऑफिस में या मुझसे। कौन है वो जो इतने सालों से तुम्हें इंतज़ार करवा रही है?”

विक्रम के चेहरे पर एक बहुत ही प्यारी और सुकून भरी मुस्कान तैर गई। उसने अपना हाथ आगे बढ़ाया और टेबल पर रखे नीरा के हाथ को बहुत ही कोमलता से अपने हाथों में ले लिया। नीरा इस अचानक हुए स्पर्श से घबरा गई, लेकिन विक्रम की आँखों की सच्चाई ने उसे अपना हाथ खींचने नहीं दिया।

“मैं एक ऐसी लड़की का इंतज़ार कर रहा था, जिसने अपनी पूरी जवानी दूसरों के लिए कुर्बान कर दी। मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब उसके कंधों से ज़िम्मेदारियों का बोझ कम हो, कब वो अपने परिवार के दायित्वों से मुक्त हो और कब मैं उससे कह सकूं कि अब उसे अकेले चलने की ज़रूरत नहीं है,” विक्रम ने बिना पलक झपकाए कहा।

नीरा का दिल ज़ोरों से धड़कने लगा। उसके कानों में विक्रम की आवाज़ गूंज रही थी, लेकिन उसका दिमाग इस सच्चाई को स्वीकार करने में झिझक रहा था। “विक्रम… तुम… तुम ये क्या कह रहे हो?”

“मैं वही कह रहा हूँ नीरा, जो मैं पिछले आठ सालों से महसूस कर रहा हूँ। जब तुम अस्पताल के चक्कर काट रही थीं, जब तुम अपने भाई की फीस के लिए ओवरटाइम कर रही थीं, तब मैंने तुम्हारे उस त्याग, उस समर्पण और तुम्हारी उस हिम्मत से प्यार किया था। मैं जानता था कि अगर मैं उस वक्त तुम्हारे सामने अपने प्यार का इज़हार करता, तो तुम अपनी ज़िम्मेदारियों के चलते मुझे मना कर देतीं या खुद को अपराधी महसूस करतीं। इसलिए मैं बस एक दोस्त बनकर तुम्हारे साथ खड़ा रहा। तुम्हारी उम्र रुकी हुई नहीं है नीरा, और न ही मेरी। 35 की उम्र कोई ढलती उम्र नहीं है, यह तो वो उम्र है जहाँ हम बिना किसी बचपने के, एक-दूसरे को पूरी गहराई से समझ सकते हैं।”

नीरा की आँखों से आंसुओं की एक बूंद छलक कर विक्रम के हाथ पर गिरी। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि कोई इंसान उसके लिए अपने जीवन के इतने साल सिर्फ एक इंतज़ार में गुज़ार सकता है। जिस उम्र को वह अपनी सबसे बड़ी कमज़ोरी मान रही थी, विक्रम ने उसी उम्र को उनके रिश्ते की सबसे बड़ी ताकत बना दिया था।

“लेकिन विक्रम… क्या तुम सच में मेरी जैसी नीरस और उम्रदराज़ लड़की के साथ पूरी ज़िंदगी गुज़ार पाओगे? मैंने तो प्यार करना सीखा ही नहीं है,” नीरा ने सुबकते हुए कहा।

विक्रम ने नीरा के आंसू पोंछते हुए कहा, “प्यार कोई परीक्षा नहीं है जिसे सीखना पड़े। प्यार तो वो सुकून है जो मुझे तुम्हारे साथ बैठकर मिलता है। तुमने अपनों को प्यार देना ही तो सीखा है पूरी ज़िंदगी। अब बस मुझे तुम्हें वो प्यार लौटाने का मौका दो, जो तुमने आज तक सिर्फ दूसरों को दिया है। क्या इस 35 साल के इंतज़ार करने वाले लड़के को अपना जीवनसाथी बनाओगी?”

नीरा के पास अब कोई जवाब नहीं था। उसने बस अपनी नम आँखों से विक्रम की तरफ देखा और अपने सिर को धीरे से हाँ में हिला दिया। बाहर सर्द हवाएं चल रही थीं, लेकिन नीरा के दिल में आज सालों बाद एक ऐसा वसंत खिल उठा था, जिसने उसके जीवन के सारे पतझड़ और सारे खालीपन को एक ही पल में हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। उस शाम उस कॉफी शॉप की टेबल पर दो लोगों ने अपनी उम्र और समाज की सोच को पीछे छोड़ते हुए, एक नए और खूबसूरत सफर की शुरुआत की थी।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या सच में प्यार और शादी की कोई एक तय उम्र होती है, या जब दो लोग एक-दूसरे को समझ लें, वही सही वक्त होता है? क्या आपने भी अपने आस-पास किसी ऐसे इंसान को देखा है जिसने परिवार के लिए अपनी खुशियों का बलिदान दिया हो? अपने विचार हमें कमेंट करके ज़रूर बताएं।

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 लेखिका : दिव्या मिश्रा

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