राघव ने तुरंत उठकर उसे अपने कंधों से पकड़ लिया। “नहीं मीरा, तुम में कोई कमी नहीं है। तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी नेमत हो। लेकिन तुम खुद को देखो! तुम सुबह से लेकर रात तक इस घर की चक्की में पिसती रहती हो। माँ की हालत ऐसी नहीं है कि वो तुम्हारी कोई मदद कर सकें।
काव्या और अंश अभी बहुत छोटे हैं और तुम उनके लिए पहले से ही एक माँ बन चुकी हो। अगर अभी तुम्हारा अपना बच्चा हो गया, तो तुम पर जिम्मेदारियों का ऐसा पहाड़ टूट पड़ेगा कि तुम शारीरिक और मानसिक रूप से खत्म हो जाओगी।”
रौनक एक बेहद महत्वाकांक्षी और जिम्मेदार युवा था। एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले रौनक ने अपने पिता के निधन के बाद बहुत कम उम्र में ही घर की जिम्मेदारियों का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। उसकी माँ, विमला देवी, ने बहुत संघर्षों से उसे और उसकी छोटी बहन को पाला था।
रौनक की मेहनत रंग लाई और उसे एक अच्छी सरकारी नौकरी मिल गई, लेकिन अभी उसकी नौकरी प्रोबेशन पीरियड (परिवीक्षा अवधि) पर थी। इसी बीच, रिश्तेदारों के दबाव और विमला देवी की जिद के कारण रौनक की शादी तय कर दी गई।
लड़की का नाम काव्या था। काव्या एक बहुत ही संस्कारी, पढ़ी-लिखी और सुंदर लड़की थी। दोनों परिवारों की रजामंदी से बहुत ही धूमधाम से रौनक और काव्या का विवाह संपन्न हुआ। लेकिन रौनक ने अपनी माँ और काव्या के परिवार के सामने एक शर्त रखी थी। उसने कहा था कि अभी उसकी नौकरी पक्की नहीं हुई है
और वह अपनी पत्नी को हर वह सुख-सुविधा देना चाहता है जिसकी वह हकदार है। इसलिए, उसने फैसला किया कि विवाह के बाद काव्या कुछ दिन ससुराल में रहकर वापस अपने मायके चली जाएगी और जब उसकी नौकरी स्थायी हो जाएगी, तब वह पूरे विधि-विधान से उसका ‘गौना’ (विदाई) कराकर उसे हमेशा के लिए अपने साथ ले आएगा।
काव्या के माता-पिता भी रौनक की इस जिम्मेदारी भरी सोच से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने खुशी-खुशी इस बात को मान लिया।
शादी के कुछ दिनों बाद काव्या अपने मायके लौट गई। दोनों के बीच फोन पर लंबी बातें होती थीं। रौनक अपने भविष्य के सपने बुनता और काव्या उन सपनों में अपने लिए एक प्यारा सा आशियाना सजाती।
सब कुछ बहुत ही खूबसूरत चल रहा था। लेकिन किस्मत को शायद उनका यह सुख मंजूर नहीं था। शादी के करीब छह महीने बाद काव्या की तबीयत अचानक बहुत ज्यादा खराब हो गई। उसे लगातार बहुत तेज बुखार रहने लगा।
रौनक के घर में उसकी एक ताई जी थीं, जिनका नाम सुलोचना था। सुलोचना ताई जी स्वभाव से बहुत ही चालाक, हावी रहने वाली और दूसरों के मामलों में दखल देने वाली महिला थीं। पूरे परिवार में उन्हीं का हुक्म चलता था और विमला देवी भी अपनी जेठानी की बातों को पत्थर की लकीर मानती थीं।
एक दिन सुलोचना ताई जी किसी दूर के रिश्तेदार के यहाँ एक शादी में गई थीं। वहाँ औरतों के बीच तरह-तरह की बातें हो रही थीं। बातों ही बातों में किसी ने काव्या के परिवार का ज़िक्र छेड़ दिया और कहा, “अरे, वो जो रौनक की बहू है ना काव्या, सुना है वो तो पूरी तरह पागल हो गई है। किसी को पहचानती नहीं है, दिन भर अजीब-अजीब हरकतें करती है।”
यह बात आग की तरह फैली और सुलोचना ताई जी के कानों तक पहुँच गई। उनके तो जैसे पैरों तले जमीन ही खिसक गई। बिना पूरी सच्चाई जाने, सुलोचना ताई जी ने घर लौटकर विमला देवी के कान भरने शुरू कर दिए। “देखा विमला! मैंने तो पहले ही कहा था कि लड़की वालों ने इतनी जल्दी शादी के लिए हाँ क्यों कर दी।
जरूर इस लड़की में पहले से ही कोई खोट होगा। हमारे होनहार बेटे के पल्ले एक पागल लड़की बांध दी और हमें भनक तक नहीं लगने दी।” विमला देवी भी घबरा गईं। उनके मन में अपने बेटे के भविष्य को लेकर दर पैदा हो गया।
सुलोचना ताई जी ने उसी वक्त काव्या के बड़े भाई, अंशुल को अपने घर बुलवा लिया। अंशुल बहुत ही शरीफ और सीधा इंसान था। जब वह रौनक के घर पहुंचा, तो रौनक अपनी ट्रेनिंग के सिलसिले में पंद्रह दिनों के लिए शहर से बाहर गया हुआ था। सुलोचना ताई जी ने बिना कोई शिष्टाचार दिखाए अंशुल पर सवालों की बौछार कर दी और सीधे-सीधे इल्जाम लगाया कि उन्होंने एक मानसिक रूप से बीमार लड़की को उनके गले मढ़ दिया है।
अंशुल ने हाथ जोड़कर और नम आंखों से पूरी सच्चाई बताने की कोशिश की। उसने बताया, “ताई जी, काव्या पागल नहीं हुई है। शादी के बाद उसे दिमागी बुखार (ब्रेन फीवर) और गंभीर टाइफाइड हो गया था। बुखार दिमागी नसों तक पहुंच गया था, जिसकी वजह से वह बहुत कमजोर हो गई है। डॉक्टरों का कहना है कि बुखार के गहरे असर के कारण उसे कुछ समय के लिए याददाश्त की समस्या और भ्रांति (डेलिरियम) हो रही है। लेकिन इलाज चल रहा है और वह धीरे-धीरे ठीक हो रही है। उसे बस थोड़े प्यार, समय और देखभाल की जरूरत है।”
लेकिन सुलोचना ताई जी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थीं। उनके दिमाग में यह बात घर कर गई थी कि काव्या हमेशा के लिए पागल हो चुकी है। उन्होंने बहुत ही बेरहमी से अंशुल से कहा, “ये डॉक्टरों की झूठी तसल्लियां हमें मत सुनाओ। हमें पता है कि ये पागलपन की बीमारियां कभी ठीक नहीं होतीं। अभी तो बस फेरे ही हुए हैं, हमारी तरफ से कोई गौना नहीं हुआ है। तुम अपनी बहन को अपने पास ही रखो। हम अपने होनहार और कमाऊ बेटे की पूरी जिंदगी एक पागल लड़की की तीमारदारी में बर्बाद नहीं कर सकते। तुमने जो भी दहेज या सामान दिया था, वो सब वापस ले जाओ और हमारी तरफ से जो खर्च हुआ है, वो हमें लौटा दो। आज से यह रिश्ता खत्म।”
अंशुल ने विमला देवी की तरफ देखा कि शायद वो एक माँ होने के नाते इस दर्द को समझेंगी, लेकिन विमला देवी भी अपनी जेठानी के दबाव में चुप रहीं। अंशुल रोता हुआ, अपनी बहन की उजड़ती हुई दुनिया का बोझ सीने में लिए वहां से चला गया। एक बहुत ही शानदार और प्यार से बुनी गई शादी, अपनों की एक गलतफहमी और संवेदनहीनता के कारण टूटने की कगार पर पहुंच गई थी। काव्या के घर में मातम छा गया। काव्या जो पहले से ही बीमारी से जूझ रही थी, उसे जब इस बात का हल्का सा भी अहसास हुआ कि उसके ससुराल वालों ने उसे छोड़ दिया है, तो उसकी हालत और बिगड़ने लगी।
पंद्रह दिन बाद जब रौनक अपनी ट्रेनिंग पूरी करके वापस लौटा, तो उसके हाथ में उसकी पक्की नौकरी का ‘कंफर्मेशन लेटर’ था। वह बहुत खुश था कि अब वह अपनी काव्या को हमेशा के लिए अपने घर ले आएगा। उसने घर में घुसते ही अपनी माँ को यह खुशखबरी दी और कहा कि वह अगले ही हफ्ते काव्या की विदाई की तारीख तय करना चाहता है।
तभी सुलोचना ताई जी सामने आईं और उन्होंने रौनक को बताया कि वे लोग काव्या के परिवार से रिश्ता तोड़ चुके हैं। जब रौनक ने पूरी बात सुनी, तो उसके हाथ से वह खुशी का लेटर नीचे गिर गया। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसने अपनी माँ की तरफ देखा, “माँ! आपने काव्या को बिना देखे, बिना मुझसे पूछे इतना बड़ा फैसला कैसे ले लिया? क्या काव्या कोई बाजार से लाई हुई वस्तु है जिसे खराब निकलने पर वापस कर दिया जाए? मैंने उसके साथ अग्नि के सात फेरे लिए हैं, सुख-दुख में साथ निभाने की कसमें खाई हैं। बीमारी किसी को भी हो सकती है, कल को मुझे कुछ हो जाता तो क्या आप मुझे भी घर से निकाल देतीं?”
सुलोचना ताई जी ने कड़क आवाज़ में कहा, “ज़बान मत लड़ा रौनक! हमने जो किया तेरी भलाई के लिए किया है। तू अभी जवान है, तेरी नई-नई नौकरी लगी है। हम तेरी शादी किसी अच्छी और स्वस्थ लड़की से करा देंगे। एक पागल औरत के साथ तू कैसे जिंदगी काटेगा?”
रौनक का खून खौल उठा। उसने अपने आँसू पोछे और एक दृढ़ निश्चय के साथ बोला, “ताई जी, रिश्ते कपड़ों की तरह नहीं बदले जाते। काव्या मेरी पत्नी है और मेरा आधा वजूद है। अगर वो बीमार है, तो उसका इलाज मैं करवाऊंगा। अगर वो जिंदगी भर ठीक नहीं हुई, तो मैं जिंदगी भर उसकी सेवा करूंगा। लेकिन मैं अपनी पत्नी को इस तरह लावारिस नहीं छोड़ सकता।”
रौनक उसी वक्त घर से निकला और सीधा काव्या के मायके पहुंच गया। जब उसने काव्या के घर में कदम रखा, तो वहां उदासी का सन्नाटा पसरा था। अंशुल ने रौनक को देखा तो उसके मन में गुस्सा और दर्द दोनों उभर आए। लेकिन रौनक ने अंशुल के पैर पकड़ लिए और अपने परिवार की तरफ से माफी मांगी। रौनक जब काव्या के कमरे में गया, तो काव्या बिस्तर पर लेटी हुई थी। वह बहुत कमजोर लग रही थी, उसकी आंखों के नीचे काले घेरे थे।
रौनक को देखते ही काव्या की सूनी आँखों में अचानक से एक चमक आ गई। उसने कांपते हाथों से रौनक को छूने की कोशिश की और धीमी सी आवाज़ में बोली, “तुम आ गए? सब कह रहे थे कि तुम मुझे छोड़कर चले गए।”
रौनक ने काव्या को कसकर अपने सीने से लगा लिया और फफक-फफक कर रो पड़ा। “मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जा सकता काव्या। तुम मेरी जान हो।”
रौनक ने उसी दिन तय किया कि वह काव्या का इलाज शहर के सबसे बड़े डॉक्टर से करवाएगा। उसने काव्या के परिवार को हिम्मत दी। वह दिन-रात काव्या की सेवा में लग गया। रौनक का निस्वार्थ प्रेम, उसका स्पर्श और उसके साथ होने का अहसास काव्या के लिए किसी भी संजीवनी बूटी से ज्यादा असरदार साबित हुआ। प्यार और सही इलाज के प्रभाव से काव्या कुछ ही महीनों में पूरी तरह से स्वस्थ हो गई। उसका दिमागी संतुलन बिल्कुल ठीक हो गया और उसके चेहरे की पुरानी रौनक लौट आई।
जब काव्या पूरी तरह ठीक हो गई, तो रौनक उसे लेकर अपने घर वापस गया। काव्या को पूरी तरह से स्वस्थ और हंसता-मुस्कुराता देखकर सुलोचना ताई जी और विमला देवी की आंखें शर्म से झुक गईं। उन्हें अपनी उस छोटी और स्वार्थी सोच पर बहुत पछतावा हो रहा था। विमला देवी ने रोते हुए अपनी बहू को गले लगा लिया और अपनी गलती की माफी मांगी। रौनक ने साबित कर दिया था कि विवाह सिर्फ खुशियों और स्वस्थ शरीर का मेल नहीं है, बल्कि यह हर परिस्थिति में एक-दूसरे का संबल बनने का पवित्र वचन है।
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लेखिका : मीना सहाय