रिश्तों की छाँव: जब आंगन सूना हो गया

 अम्मा जी कभी निहारिका के सामने उसकी तारीफ नहीं करती थीं। उन्हें लगता था कि ज्यादा तारीफ करने से बहू सिर पर चढ़ जाएगी। इसलिए वह अक्सर कमियां ही निकालती थीं—”सब्जी में नमक थोड़ा कम है”, “कपड़े ठीक से तह नहीं किए”। लेकिन निहारिका को उनकी असलियत तब पता चली, जब एक दिन वह बाज़ार … Read more

ज़िंदगी की दूसरी सुबह

सुमित्रा देवी ने डरते-डरते नज़रें उठाईं। उनके होंठ कांप रहे थे। उन्होंने माइक को बिना छुए ही अपनी रुंधी हुई आवाज़ में कहना शुरू किया, “मुझे… मुझे कोई पैसा या ज़ायदाद नहीं चाहिए। मैं बहुत पढ़ी-लिखी भी नहीं हूँ, बस रामचरितमानस पढ़ लेती हूँ। मुझे बस… बस एक ऐसा कोना चाहिए जहाँ मैं बिना किसी … Read more

साँसों से भारी ज़िम्मेदारियाँ

सुधा की उम्र यही कोई पैंतालीस के आस-पास रही होगी। वह उन आम भारतीय महिलाओं में से एक थी, जिनके दिन की शुरुआत घर के सबसे छोटे सदस्य के जागने से पहले होती थी और रात तब होती थी जब घर का आखिरी बल्ब बुझ जाता था। सुधा का परिवार एक टिपिकल मध्यमवर्गीय परिवार था। … Read more

एक जीवन, सात रिश्ते

मैं आज तक उसे सिर्फ एक ‘लड़ाकू’, ‘चिकचिक करने वाली’ और ‘अनपढ़ गृहणी’ समझता रहा। मैं अपनी झूठी शान, अपने पैसों और अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि मैंने कभी यह देखने की कोशिश ही नहीं की कि मेरे घर की उस चारदीवारी के अंदर, नमिता  मेरे लिए माँ, बहन, पिता, दोस्त … Read more

वो मीठा सा झूठ

 “बाबूजी कोई बच्चे नहीं हैं अनिकेत। उन्होंने दुनिया देखी है। वो जानते थे कि तुम झूठ बोल रहे हो, लेकिन उन्होंने तुम्हारा झूठ इसलिए सच मान लिया क्योंकि वो तुम्हारी खुशी देखना चाहते थे। और तुमने भी झूठ इसलिए बोला क्योंकि तुम उन्हें तकलीफ में नहीं देख सकते थे। ये जो झूठ बोलने की बीमारी … Read more

प्रेम की छाँव

घर में भले ही फैसले रोहन और मीरा लेते थे, लेकिन उन पर आखिरी मुहर हमेशा सावित्री देवी की ही होती थी। ये एक कड़वा सच है कि बेटा चाहे अपनी माँ को कितनी भी कड़वी बात कह दे, माँ उसे भूल जाती है। लेकिन अगर बहू ज़रा सी भी ऊँची आवाज़ में बात कर … Read more

बोया पेड़ बबूल का

पूर्वी का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उसने अपना पूरा गुस्सा अपने भाई पर उतार दिया। “अनिकेत भैया, आपको शर्म नहीं आती? पापा ने हमें पालने के लिए अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी और आप उन्हें यहाँ छोड़ने आ गए? और सिमरन भाभी कहाँ हैं? मुझे पता है, ये सब उसी का किया धरा होगा। … Read more

असली श्रृंगार

“मैं सच कह रहा हूँ माँ,” आदित्य ने दृढ़ता से कहा। “मुझे ऐसी जीवनसाथी की ही तलाश थी जो सिर्फ हां में हां मिलाने वाली न हो, बल्कि जिसकी अपनी एक स्वतंत्र सोच हो। जो मुश्किल वक्त में मेरे बैंक बैलेंस की मोहताज न हो, बल्कि अपने संस्कारों और आत्मविश्वास से मेरा साथ दे सके। … Read more

असली हीरा है मेरी बहू

सावित्री देवी के घर में आज कोहराम मचा हुआ था। शहर की प्रतिष्ठित ‘महिला समिति’ की मासिक बैठक आज उन्हीं के घर पर थी। यह सिर्फ एक बैठक नहीं, बल्कि सावित्री देवी के लिए अपनी नाक का सवाल था। शहर की मेयर की पत्नी और कई बड़े अधिकारियों की पत्नियां आने वाली थीं। सावित्री देवी … Read more

रिश्तों का सूती धागा

 उस दिन मीरा ने चाय की ट्रे जैसे-तैसे मेज पर रखी और बिना कुछ कहे वहां से अपने कमरे में चली गई। उसके दिल में एक अजीब सी खटास पैदा हो गई थी। जिस सास के साथ वह अपने दिल की हर बात साझा करती थी, अचानक वह उसे एक अजनबी और स्वार्थी औरत लगने … Read more

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