समर्पण का आँगन – कविया गोयल

अंशुल ने विमला देवी की तरफ देखा कि शायद वो एक माँ होने के नाते इस दर्द को समझेंगी, लेकिन विमला देवी भी अपनी जेठानी के दबाव में चुप रहीं। अंशुल रोता हुआ, अपनी बहन की उजड़ती हुई दुनिया का बोझ सीने में लिए वहां से चला गया। एक बहुत ही शानदार और प्यार से बुनी गई शादी, अपनों की एक गलतफहमी और संवेदनहीनता के कारण टूटने की कगार पर पहुंच गई थी। 

भोर के पांच बज रहे थे। बाहर आसमान में अभी भी हल्की सी धुंध छाई हुई थी, लेकिन राघव के घर की रसोई में चिमनियों की आवाज़ और चाय की उबलती हुई महक ने दिन की शुरुआत का ऐलान कर दिया था। मीरा ने गैस धीमी की और एक ट्रे में चाय के दो कप और कुछ दवाइयां सजा लीं। वह दबे कदमों से अपनी सास, सुमित्रा देवी के कमरे में गई। सुमित्रा देवी पिछले दो सालों से गठिया और रीढ़ की हड्डी की एक गंभीर बीमारी के कारण बिस्तर पर थीं। उनका चलना-फिरना पूरी तरह से बंद हो चुका था। 

मीरा की शादी को अभी महज़ दो साल ही बीते थे। मायके में जो मीरा सुबह आठ बजे से पहले कभी बिस्तर से नहीं उठती थी, जिसके हाथ का बना खाना खुद उसकी माँ भी डरते-डरते खाती थी, आज वही मीरा इस पूरे घर की धुरी बन चुकी थी। शादी से कुछ महीने पहले ही सुमित्रा देवी की हालत बिगड़ी थी। घर में राघव के अलावा उसके बूढ़े पिता, कॉलेज में पढ़ने वाली छोटी बहन निर्मला  और बारहवीं में पढ़ने वाला भाई अंश था। जब घर की मालकिन ही बिस्तर पर आ गई, तो पूरा घर बिखरने लगा था। ऐसे में रिश्तेदारों के दबाव और परिवार की ज़रूरत को देखते हुए राघव और मीरा की शादी बहुत जल्दबाज़ी में कर दी गई। 

मीरा ने इस घर की चौखट पर कदम रखते ही अपने मायके के उस अल्हड़पन को मानो उसी चौखट के बाहर छोड़ दिया था। सुबह उठकर सबके लिए नाश्ता बनाना, निर्मला  और अंश के टिफिन तैयार करना, ससुर जी की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का ख्याल रखना, और सबसे बढ़कर सुमित्रा देवी को नहलाने से लेकर उनकी दवाइयों तक का पूरा जिम्मा मीरा ने अपने सिर ले लिया था। वह दिन भर एक मशीन की तरह काम करती, लेकिन उसके होंठों पर कभी थकान की कोई शिकायत नहीं होती। उसकी इसी निस्वार्थ सेवा और मीठे स्वभाव ने उसे बहुत ही कम समय में पूरे परिवार की जान बना दिया था। ससुर जी उसे अपनी बेटी मानते थे, और निर्मला -अंश तो अपनी हर छोटी-बड़ी बात के लिए सिर्फ ‘भाभी’ को ही पुकारते थे।

राघव एक बेहद समझदार इंसान था। वह एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर था और अपनी पत्नी से बेइंतहा प्यार करता था। उसे इस बात की बहुत खुशी थी कि मीरा ने उसके बिखरे हुए घर को फिर से समेट लिया था। जब वह शाम को थका-हारा घर लौटता, तो मीरा की एक मुस्कान उसकी सारी थकान मिटा देती थी। लेकिन, राघव के दिल के एक कोने में एक गहरा अपराधबोध भी पलता था। वह देखता था कि मीरा कैसे अपनी जवानी, अपने शौक और अपने सपनों को इस घर की जिम्मेदारियों की भट्टी में झोंक रही है। उसने मीरा को कभी अपने लिए कुछ मांगते या अपने लिए जीते हुए नहीं देखा था।

शादी के दो साल पूरे होने वाले थे। मोहल्ले की औरतों और रिश्तेदारों ने अब दबी ज़बान में ‘खुशखबरी’ को लेकर ताने कसने शुरू कर दिए थे। “अरी मीरा, अब तो गोद भर ले अपनी,” जैसी बातें अब आम हो गई थीं। मीरा भी अंदर ही अंदर एक नन्हे मेहमान के सपने बुनने लगी थी। एक रात जब सब सो गए थे, मीरा अपने कमरे में बैठी एक मैगज़ीन में बच्चों के कपड़ों के डिज़ाइन देख रही थी। 

तभी राघव कमरे में आया। उसने दरवाज़ा बंद किया और बहुत ही गंभीर चेहरे के साथ मीरा के पास आकर बैठ गया। उसने मीरा के हाथ से वह मैगज़ीन ले ली और उसके दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया। 

“मीरा, मुझे तुमसे एक बहुत ज़रूरी बात करनी है,” राघव की आवाज़ में एक अजीब सा ठहराव था।

मीरा ने हैरानी से राघव की तरफ देखा, “हाँ, कहो न। क्या बात है? ऑफिस में सब ठीक तो है?”

राघव ने एक गहरी सांस ली और सीधे उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “मीरा, मैंने एक फैसला लिया है। मैं चाहता हूँ कि हम अगले पांच सालों तक अपना कोई बच्चा न करें।”

ये शब्द मीरा के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजे। वह एक झटके में राघव के हाथों से अपने हाथ छुड़ाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। “ये तुम क्या कह रहे हो राघव? पांच साल? क्या तुम्हें मुझसे… या क्या मुझमें कोई कमी है?” मीरा की आवाज़ कांप रही थी और आँखों में आँसू छलकने लगे थे।

राघव ने तुरंत उठकर उसे अपने कंधों से पकड़ लिया। “नहीं मीरा, तुम में कोई कमी नहीं है। तुम मेरी ज़िंदगी की सबसे बड़ी नेमत हो। लेकिन तुम खुद को देखो! तुम सुबह से लेकर रात तक इस घर की चक्की में पिसती रहती हो। माँ की हालत ऐसी नहीं है कि वो तुम्हारी कोई मदद कर सकें। निर्मला  और अंश अभी बहुत छोटे हैं और तुम उनके लिए पहले से ही एक माँ बन चुकी हो। अगर अभी तुम्हारा अपना बच्चा हो गया, तो तुम पर जिम्मेदारियों का ऐसा पहाड़ टूट पड़ेगा कि तुम शारीरिक और मानसिक रूप से खत्म हो जाओगी।”

राघव की आँखों में भी अब नमी थी। “मैं नहीं चाहता कि मेरा बच्चा तुम्हें सिर्फ एक थकी हुई, चिड़चिड़ी और काम में उलझी हुई माँ के रूप में देखे। मैं तुम्हें ये पांच साल तुम्हारे लिए देना चाहता हूँ। निर्मला  की पढ़ाई पूरी हो जाने दो, अंश को कॉलेज जाने दो। जब घर की जिम्मेदारियां थोड़ी कम हो जाएंगी, तब हम अपने बच्चे का स्वागत करेंगे। मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता मीरा।”

मीरा के लिए राघव का यह फैसला किसी बड़े सदमे से कम नहीं था। एक औरत के लिए अपनी कोख सूनी रखने का फैसला करना कभी भी आसान नहीं होता। उस रात दोनों के बीच कोई और बात नहीं हुई। मीरा चुपचाप करवट बदलकर सो गई, लेकिन उसकी आँखों से आँसू बहते रहे। अगले कुछ दिनों तक मीरा घर में बहुत चुप-चुप रहने लगी। वह काम सारे करती, लेकिन उसकी वो पुरानी मुस्कान कहीं गायब हो गई थी। उसे लगता था कि राघव ने उससे उसका सबसे बड़ा अधिकार छीन लिया है।

कुछ हफ्ते ऐसे ही बीत गए। एक दिन अचानक अंश को बहुत तेज़ बुखार आ गया। उसे डेंगू हो गया था और उसकी हालत बहुत बिगड़ गई। राघव ऑफिस के टूर पर शहर से बाहर था। उन चार दिनों में मीरा ने दिन-रात एक कर दिया। वह पल भर के लिए भी अंश के सिरहाने से नहीं हटी। वह उसे अपने हाथों से दलिया खिलाती, उसकी पट्टियां बदलती और रात-रात भर जागकर उसके सिर पर हाथ फेरती रहती। निर्मला  भी घबराई हुई थी, तो मीरा उसे भी सीने से लगाकर ढांढस बंधाती।

जब अंश का बुखार उतरा और वह खतरे से बाहर आया, तो सुमित्रा देवी ने अपने बिस्तर से मीरा को आवाज़ दी। मीरा उनके पास गई, तो सुमित्रा देवी ने रोते हुए उसके हाथ चूम लिए। “तू मेरी बहू नहीं, मेरे इन बच्चों की यशोदा है मीरा। मैंने इन्हें जन्म ज़रूर दिया, लेकिन तूने इन्हें दूसरा जीवन दिया है।”

उसी रात राघव टूर से वापस लौटा। उसने जब अंश की हालत और मीरा की तपस्या के बारे में सुना, तो वह चुपचाप मीरा के कमरे में गया। मीरा बिस्तर पर थकी हारी लेटी थी। राघव ने उसके पैरों के पास बैठकर धीरे-धीरे उसके पैर दबाने शुरू किए। 

मीरा की आँख खुली तो उसने राघव को देखा। उस पल मीरा को सब कुछ शीशे की तरह साफ नज़र आने लगा। उसने महसूस किया कि राघव का वो फैसला किसी स्वार्थ के लिए नहीं था, बल्कि उसके अथाह प्रेम और फिक्र का नतीजा था। राघव नहीं चाहता था कि उसकी पत्नी जिम्मेदारियों के बोझ तले दबकर अपना अस्तित्व खो दे। और मीरा को भी यह अहसास हो गया कि वह तो पहले से ही इस घर की माँ है। निर्मला  और अंश का वो प्यार, ससुर जी का आशीर्वाद और राघव का वो निस्वार्थ साथ—यही तो उसका परिवार था। अगर वह अभी एक और बच्चे की जिम्मेदारी लेती, तो शायद वह अंश को वो समय न दे पाती जिसकी उसे इस बीमारी में सबसे ज्यादा ज़रूरत थी।

मीरा उठकर बैठी और उसने राघव के गालों को अपने हाथों में थाम लिया। उसके चेहरे पर अब कोई शिकायत नहीं थी, बल्कि वो पुरानी वाली खिलखिलाती मुस्कान वापस आ गई थी। उसने राघव की आँखों में देखते हुए कहा, “तुम सही कह रहे थे राघव। मुझे भी लगता है कि अंश और निर्मला  को अभी मेरी बहुत ज़रूरत है। और जब पांच साल बाद हमारा अपना बच्चा होगा न, तो उसे खिलाने के लिए अंश और निर्मला  ही मेरे सबसे बड़े मददगार बनेंगे। हम इंतज़ार करेंगे।”

राघव ने सुकून की एक गहरी सांस ली और मीरा को अपने गले से लगा लिया। उस घर में कोई नया बच्चा पैदा नहीं हुआ था, लेकिन एक पति की समझदारी और एक पत्नी के मौन समर्पण ने उस घर को दुनिया का सबसे खूबसूरत और प्यार से भरा आँगन ज़रूर बना दिया था।

दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या राघव का अपनी पत्नी के स्वास्थ्य और घर की परिस्थितियों को देखकर परिवार बढ़ाने में देरी करने का यह फैसला सही था? या मीरा को समाज की परवाह करते हुए माँ बनने का फैसला लेना चाहिए था? अपने विचार और अपनी बेबाक राय हमें कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।

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लेखिका : कविया गोयल 

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