प्यार की उड़ान – यशोदा सिंह

 “श्रुति बेटा,” कौशल्या देवी ने बहुत ही गंभीर लेकिन ममता भरी आवाज़ में बोलना शुरू किया, “मैं बहुत खुश हूँ कि मेरे बेटे ने अपने जीवनसाथी के रूप में तुम्हें चुना है। तुम बहुत प्यारी हो। लेकिन मुझे एक बात बताओ… इतनी रात गए तुम यहाँ मेरे बेटे के साथ हो, क्या तुम्हारे माता-पिता यह बात जानते हैं?”

श्रुति की आँखें भर आईं। उसने ना में सिर हिला दिया।

कौशल्या देवी ने एक गहरी सांस ली। “बेटा, प्रेम करना कोई पाप नहीं है। लेकिन प्रेम को पाने के लिए अपने जन्म देने वाले माता-पिता को धोखे में रखना बहुत बड़ा पाप है।

बाहर हल्की बारिश हो रही थी और मौसम में एक अजीब सी ठंडक थी। श्रुति ने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद किया और आईने के सामने खड़े होकर एक गहरी सांस ली। उसने अपने माता-पिता से झूठ बोला था कि ऑफिस की एक बहुत ज़रूरी ट्रेनिंग के लिए उसे दो दिन के लिए शहर से बाहर एक रिसॉर्ट में जाना है।

उसके पिता, जो स्वभाव से बेहद सख्त और पारंपरिक विचारों वाले थे, उन्होंने कई सवालों के बाद उसे जाने की अनुमति दी थी। श्रुति का मन अंदर ही अंदर अपराधबोध से घुट रहा था, लेकिन अपने प्यार, रोहन से मिलने की तड़प उस अपराधबोध पर हावी हो गई थी।

रोहन और श्रुति एक ही आईटी कंपनी में काम करते थे। पिछले दो सालों से वे एक-दूसरे के बेइंतहा प्यार में थे। रोहन एक बहुत ही सुलझा हुआ, समझदार और देखभाल करने वाला लड़का था।

श्रुति जानती थी कि उसके माता-पिता अंतरजातीय विवाह के सख्त खिलाफ थे, इसलिए उसने कभी घर पर रोहन का ज़िक्र करने की हिम्मत नहीं जुटाई। वह अक्सर ट्रेनिंग, सेमिनार या सहेलियों के घर ग्रुप स्टडी का बहाना बनाकर रोहन के साथ समय बिता लिया करती थी।

श्रुति ने अपना छोटा सा बैग उठाया, माँ के पैर छुए और कैब में बैठकर सीधे रोहन के फ्लैट पर पहुँच गई। जैसे ही रोहन ने दरवाज़ा खोला, श्रुति की सारी घबराहट और डर छूमंतर हो गए। सुंदर, समझदार और चहकती हुई श्रुति ने घर में आते ही अपना बैग सोफे पर फेंका और रोहन के गले लग गई। रोहन ने भी उसे प्यार से अपने आलिंगन में भर लिया। उस एक पल में श्रुति को लगा जैसे उसे दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना मिल गया हो।

दोनों ने पूरा दिन बहुत ही खूबसूरती से बिताया। उन्होंने साथ मिलकर पास्ता बनाया, अपनी पुरानी यादों को ताज़ा किया, बालकनी में बैठकर बारिश की बूंदों का आनंद लिया और भविष्य के हसीन सपने बुने। समय जैसे पंख लगाकर उड़ गया और कब शाम ढल गई, उन्हें पता ही नहीं चला। श्रुति को रात होने से पहले अपने घर लौटना था (क्योंकि उसका प्लान सिर्फ दिन बिताने का था और रात को सहेली के घर जाने का बहाना था), लेकिन आज उसका मन रोहन को छोड़कर जाने का बिल्कुल नहीं हो रहा था।

रात का खाना खाते हुए रोहन ने श्रुति का हाथ अपने हाथ में लिया और प्यार से कहा, “श्रुति, आज रात यहीं रुक जाओ ना। कल सुबह मेरी माँ गाँव से आ रही हैं। उनके आने के बाद घर में बहुत चहल-पहल रहेगी और फिर हम दोनों इस तरह अकेले समय नहीं बिता पाएंगे। कुछ दिन तो हमें ऐसे मिलने का मौका ही नहीं मिलेगा।”

श्रुति के चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान आ गई। “माँ के आने पर तो मुझे भी बहुत खुशी होती है रोहन। पिछली बार जब मैंने उनसे वीडियो कॉल पर बात की थी, तो वो कितनी अच्छी और अपनापन लुटाने वाली लगी थीं। उनका स्वभाव बिल्कुल मेरी दादी जैसा है।”

“तो फिर रुक जाओ आज,” रोहन ने मनुहार करते हुए कहा।

श्रुति कुछ देर सोच में पड़ गई। उसका दिल वहीं रुकने की ज़िद कर रहा था, लेकिन दिमाग में माता-पिता का डर मंडरा रहा था। “सोचती हूँ कि घर पर क्या बहाना करूँ? पापा का फोन आया तो क्या कहूँगी?”

“कह दो कि आज रिसॉर्ट से लौटते हुए बहुत देर हो गई थी, इसलिए तुम अपनी सहेली नेहा के घर ही स्लीपओवर कर रही हो। कल सुबह चली जाना,” रोहन ने उपाय सुझाया।

श्रुति को यह बात जंच गई। उसने तुरंत अपना फोन उठाया और अपनी सबसे करीबी सहेली नेहा को फोन लगाया। “हेलो नेहा! यार, एक बहुत ज़रूरी काम है। अगर मेरे घर से पापा या मम्मी का कोई फोन आए तो प्लीज कह देना कि मैं तुम्हारे साथ ही हूँ और हम लोग सो रहे हैं। मेरा फोन शायद स्विच ऑफ हो जाए, तो तू ज़रा संभाल लेना।”

नेहा ने दूसरी तरफ से झिझकते हुए कहा, “यार श्रुति, तू फिर से रोहन के पास है ना? देख, यह सब बहुत रिस्की है। अंकल बहुत सख्त हैं, अगर उन्हें पता चल गया तो बहुत बवाल हो जाएगा।”

“अरे कुछ नहीं होगा मेरी माँ! बस आज रात की बात है, तू ज़रा देख लेना,” श्रुति ने हंसते हुए फोन काट दिया।

रात के दस बज चुके थे। बाहर बारिश तेज़ हो गई थी। श्रुति और रोहन टीवी पर एक फिल्म देख रहे थे कि तभी अचानक डोरबेल बज उठी। दोनों एकदम से चौंक गए। इस वक़्त कौन आ सकता है? रोहन ने श्रुति को शांत रहने का इशारा किया और दबे कदमों से दरवाज़े के आई-होल से बाहर देखा।

बाहर का नज़ारा देखकर रोहन के चेहरे का रंग उड़ गया। “श्रुति… माँ हैं बाहर!”

“क्या?” श्रुति के हाथ-पैर ठंडे पड़ गए। “लेकिन वो तो कल सुबह आने वाली थीं ना?”

“शायद उन्होंने कोई और ट्रेन ले ली होगी। अब मैं क्या करूँ? तुम अंदर बेडरूम में छुप जाओ,” रोहन ने हड़बड़ाते हुए कहा।

“नहीं रोहन, अगर उन्होंने मुझे बाद में देख लिया तो और गलत लगेगा। तुम दरवाज़ा खोलो,” श्रुति ने खुद को संभालते हुए, कांपती आवाज़ में कहा।

रोहन ने धड़कते दिल के साथ दरवाज़ा खोला। सामने उसकी माँ, कौशल्या देवी, अपना सामान लिए भीगी हुई खड़ी थीं। “अरे बेटा, ट्रेन का समय बदल गया था और मेरा फोन रास्ते में बंद हो गया। इसलिए मैं सीधा घर आ गई,” कौशल्या देवी ने अंदर कदम रखते हुए कहा।

तभी उनकी नज़र सोफे के पास सिकुड़ कर खड़ी श्रुति पर पड़ी। कमरे में एक पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया। कौशल्या देवी ने अपने बैग नीचे रखे और श्रुति को बहुत ध्यान से देखा। श्रुति ने कांपते हाथों से आगे बढ़कर उनके पैर छुए।

“जीते रहो,” कौशल्या देवी ने बहुत ही शांत स्वर में कहा। उन्होंने रोहन की तरफ देखा और फिर श्रुति से पूछा, “तुम वही श्रुति हो ना, जिससे रोहन ने मुझे वीडियो कॉल पर मिलवाया था?”

“जी आंटी,” श्रुति ने नज़रें झुकाए हुए कहा।

कौशल्या देवी जाकर सोफे पर बैठ गईं। उन्होंने न तो कोई गुस्सा किया और न ही कोई हंगामा मचाया। उन्होंने रोहन को पानी लाने का इशारा किया। पानी पीने के बाद उन्होंने श्रुति को अपने पास बैठने का इशारा किया। श्रुति डरते-डरते उनके पास बैठ गई।

“श्रुति बेटा,” कौशल्या देवी ने बहुत ही गंभीर लेकिन ममता भरी आवाज़ में बोलना शुरू किया, “मैं बहुत खुश हूँ कि मेरे बेटे ने अपने जीवनसाथी के रूप में तुम्हें चुना है। तुम बहुत प्यारी हो। लेकिन मुझे एक बात बताओ… इतनी रात गए तुम यहाँ मेरे बेटे के साथ हो, क्या तुम्हारे माता-पिता यह बात जानते हैं?”

श्रुति की आँखें भर आईं। उसने ना में सिर हिला दिया।

कौशल्या देवी ने एक गहरी सांस ली। “बेटा, प्रेम करना कोई पाप नहीं है। लेकिन प्रेम को पाने के लिए अपने जन्म देने वाले माता-पिता को धोखे में रखना बहुत बड़ा पाप है। तुमने अपनी सहेली के घर रुकने का या कोई और बहाना ज़रूर बनाया होगा। ज़रा सोचो, जिस पिता ने तुम्हें उंगली पकड़ कर चलना सिखाया, जिस माँ ने तुम्हारी एक छींक पर अपनी रातें काली कीं, वो इस वक़्त यही सोच कर चैन से सो रहे होंगे कि उनकी बच्ची जहाँ भी है, सुरक्षित है। अगर अभी उन्हें पता चल जाए कि उनकी बेटी ने उनका विश्वास तोड़ा है, तो उनके दिल पर क्या गुज़रेगी?”

श्रुति के गालों पर आँसुओं की धारा बह निकली। कौशल्या देवी की बातों ने उसके दिल के अंदर तक वार किया था।

“मैं एक माँ हूँ श्रुति,” कौशल्या देवी ने उसका हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा। “मैं जानती हूँ कि बच्चों को बड़ा करते हुए माता-पिता कितनी चिंताएं पालते हैं। जब तुम लोग झूठ बोलते हो, तो सिर्फ एक बात नहीं छिपाते, तुम उनके उस भरोसे का कत्ल करते हो जो उन्होंने तुम पर किया है। आज अगर कोई अनहोनी हो जाए, तो तुम्हारे माता-पिता को तो यह भी नहीं पता होगा कि उनकी बेटी असल में कहाँ है। जो रिश्ता झूठ की बुनियाद पर शुरू हो, उस पर भगवान का पूरा आशीर्वाद कभी नहीं फलता।”

श्रुति अब फूट-फूट कर रो रही थी। उसे अपनी गलती का बहुत गहरा अहसास हो चुका था। रोहन भी पास खड़ा अपनी माँ की बातों से शर्मिंदा था। उसने कभी इस नज़रिए से सोचा ही नहीं था।

“मुझे माफ़ कर दीजिए आंटी,” श्रुति सुबकते हुए बोली। “मुझे अपने पापा से बहुत डर लगता है। वो हमारी शादी के लिए कभी नहीं मानते, इसलिए मैंने यह रास्ता चुना। लेकिन आज मुझे अहसास हो रहा है कि मैंने कितना बड़ा गुनाह किया है। मैंने अपने प्यार के लिए अपनों को धोखा दिया है।”

कौशल्या देवी ने अपने पल्लू से श्रुति के आँसू पोंछे। “डरो मत बेटा। सच बोलने की हिम्मत रखो। अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है, तो वह तुम्हारे माता-पिता का दिल भी जीत लेगा। उठो और इसी वक़्त अपने पिता को फोन लगाओ।”

श्रुति बुरी तरह घबरा गई, “अभी? पापा बहुत गुस्सा करेंगे, शायद मुझे घर से निकाल दें।”

“जो भी हो, सच की शुरुआत आज ही से होगी। मैं हूँ तुम्हारे साथ,” कौशल्या देवी ने दृढ़ता से कहा।

श्रुति ने कांपते हाथों से अपने पिता का नंबर डायल किया। दो घंटी के बाद उसके पिता की भारी आवाज़ आई, “हेलो श्रुति? सब ठीक तो है बेटा? इतनी रात को फोन?” उनकी आवाज़ में वो फिक्र थी जिसे श्रुति ने आज से पहले कभी महसूस नहीं किया था।

“पापा…” श्रुति इतना ही कह पाई और रो पड़ी। उसने हिम्मत जुटाकर सब कुछ सच-सच बता दिया। उसकी ट्रेनिंग का झूठ, नेहा का झूठ और रोहन के घर होने का सच। फोन के दूसरी तरफ एक भयानक सन्नाटा छा गया था।

इससे पहले कि उसके पिता कुछ कहते, कौशल्या देवी ने श्रुति के हाथ से फोन ले लिया। “नमस्ते भाई साहब। मैं रोहन की माँ बोल रही हूँ। मैं जानती हूँ कि इस वक़्त आपको बहुत ठेस पहुँची होगी। बच्चों ने गलती की है और इसकी कोई माफ़ी नहीं है। लेकिन मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि आपकी बेटी मेरे पास बिल्कुल सुरक्षित है। मैंने उसे घर जाने से रोक लिया है क्योंकि बाहर बहुत तेज़ बारिश है। कल सुबह मैं खुद रोहन और श्रुति को लेकर आपके घर आऊँगी। हम आमने-सामने बैठकर बात करेंगे। मेरी आपसे विनती है कि अपनी बच्ची को माफ़ कर दीजिएगा।”

दूसरी तरफ से एक लंबी खामोश सांस की आवाज़ आई और फोन कट गया। उस रात श्रुति एक पल के लिए भी नहीं सो पाई। अपराधबोध और डर ने उसे घेर रखा था। लेकिन कौशल्या देवी ने उसे अपने पास सुलाया और एक माँ की तरह उसके सिर पर हाथ फेरती रहीं।

अगली सुबह, जैसा कि तय हुआ था, कौशल्या देवी, रोहन और श्रुति उसके घर पहुँचे। घर का माहौल बहुत तनावपूर्ण था। श्रुति के पिता गुस्से और दुख से भरे हुए थे, और माँ की आँखें रो-रोकर सूज गई थीं। श्रुति दौड़कर अपने पिता के पैरों में गिर पड़ी।

“मुझे माफ़ कर दीजिए पापा। मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई है।”

उसके पिता ने उसे तुरंत खड़ा किया। उनके गुस्से से ज्यादा उनकी आँखों में अपनी बेटी के छलावे का दर्द था। कौशल्या देवी आगे आईं और उन्होंने हाथ जोड़कर श्रुति के पिता से बात करनी शुरू की। उन्होंने दोनों बच्चों की तरफ से माफ़ी मांगी और बहुत ही शालीनता से रोहन और श्रुति के रिश्ते की बात रखी। उन्होंने समझाया कि कैसे डर और संवाद की कमी के कारण बच्चे झूठ का सहारा ले लेते हैं।

कौशल्या देवी की परिपक्वता, उनकी समझदारी और संस्कार देखकर श्रुति के पिता का गुस्सा धीरे-धीरे शांत होने लगा। उन्होंने रोहन से भी कई सवाल किए। रोहन ने भी बिना किसी झिझक के अपनी गलती मानी और वादा किया कि वह श्रुति को हमेशा खुश रखेगा।

कई घंटों की लंबी बातचीत, आंसुओं और शिकायतों के बाद, अंततः श्रुति के माता-पिता का दिल पिघल गया। उन्होंने कौशल्या देवी जैसी समझदार और सुलझी हुई सास के हाथों में अपनी बेटी का हाथ सौंपना स्वीकार कर लिया। उस दिन श्रुति को समझ आ गया था कि झूठ बोलकर वह कुछ पलों की खुशी तो पा सकती थी, लेकिन जो सुकून उसे सच बोलकर और अपनों का आशीर्वाद पाकर मिला था, वह दुनिया की किसी और चीज़ में नहीं था।


दोस्तों, आपको क्या लगता है? क्या कौशल्या देवी ने श्रुति को उसी वक़्त अपने पिता को सच बताने के लिए कहकर सही किया था? या उन्हें बात को कुछ दिन के लिए टाल देना चाहिए था? क्या आज के दौर में युवा अपने माता-पिता के डर से अक्सर ऐसे झूठ का सहारा नहीं लेते, जो बाद में किसी बड़ी मुसीबत का कारण बन सकता है? अपनी राय हमें ज़रूर बताएं।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद


 लेखिका : यशोदा सिंह

error: Content is protected !!