कांच के महल – विनीता खन्ना 

ससुर ने दामाद की फटी जेब देखकर उसे भरी महफ़िल में ‘बेचारा’ कह दिया, लेकिन उसे नहीं पता था कि वक्त का पहिया जब घूमता है, तो वो राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है। क्या स्वाभिमान की जीत दौलत के अहंकार को हरा पाएगी? रवि ने अपनी पुरानी स्कूटर को तीसरी … Read more

दिल के रिश्ते: एक मां का फैसला – गीता गुप्ता

*जब बेटी ने पिता की चिता की राख ठंडी होने से पहले ही जायदाद का बंटवारा मांग लिया, तब एक मां ने जाना कि कोख से जन्म देने से कोई अपना नहीं होता। पढ़िए एक ऐसी मां की कहानी जिसने समाज के डर से नहीं, बल्कि अपने स्वाभिमान के लिए एक कठोर फैसला लिया।* सावित्री … Read more

जज़्बातों का डाकिया  – रोनिता कुंडु 

*इस डिजिटल युग में जब उंगलियों के एक टच से संदेश पहुँच जाते हैं, तब एक बूढ़ा जोड़ा पुराने संदूक से स्याही और कलम निकालकर टूटे हुए दिलों को जोड़ने का काम कर रहा था। क्या उनकी यह ‘पुरानी आदत’ आज के ‘नए दौर’ के रिश्तों को बचा पाएगी?* “सुधा… ओ सुधा! अरे, वो नीला … Read more

सिंदूर का कर्ज  – लतिका श्रीवास्तव

*जब एक औरत पर लगा अपने ही जीजा के साथ अवैध संबंध का घिनौना आरोप, तो उसने अपनी पवित्रता की कसम खाने के बजाय स्वीकार कर लिया वो गुनाह जो उसने किया ही नहीं था। आखिर किस सच को छिपाने के लिए एक भाभी अपनी ही ननद की सुहाग की सेज उजाड़ने को तैयार हो … Read more

आंगन की तुलसी – संगीता अग्रवाल

“सुधा! अरे ओ सुधा! तू अभी तक रसोई में ही है? देख तो ड्राइंग रूम के पर्दों पर धूल जमी है या नहीं? मेरी ‘मल्लिका’ आ रही है। उसे धूल से एलर्जी है। अमेरिका में रहती है वो, वहां जैसा साफ़-सुथरा माहौल यहाँ भी मिलना चाहिए उसे।” सावित्री देवी की आवाज़ पूरे घर में गूंज … Read more

माँ का आईना – रश्मि प्रकाश 

सुशीला देवी को लगा जैसे किसी ने उनके गाल पर ज़ोरदार तमाचा मारा हो। उनका अपना ही तर्क, उनके अपने ही शब्द, अब उन्हें चुभ रहे थे। जो ममता अपनी बेटी के लिए उमड़ रही थी, वही ममता बहू के लिए क्यों सूख गई थी? उनके हाथ से फोन का रिसीवर लगभग छूट ही गया। … Read more

पहला प्यार – नीलम शर्मा

सागर और संध्या समुद्र किनारे बैठे अपने भविष्य के सपने सजाने में डूबे थे ।लहरों की आवाज और ठंडी -ठंडी हवा बड़ी रोमांटिक और सुहानी लग रही थी। संध्या ने सागर के हाथों को अपने हाथों में लिया और आंखें बंद करके सागर के कंधे पर सिर टिका दिया। सागर ने संध्या के गालों को … Read more

झूठी शान के परिंदे – मुकेश पटेल 

 “माँ-बाप अक्सर अपने बच्चों की ‘चमक’ देखकर इतना खुश हो जाते हैं कि यह देखना भूल जाते हैं कि वो चमक सोने की है या पीतल की; और जब तक सच सामने आता है, तब तक घर की नींव बिक चुकी होती है।” “अरे भाई साहब, आप तो किस्मत वाले हैं। बड़ा बेटा बंगलौर में … Read more

वो बंद कमरा – संगीता अग्रवाल

“जिस मां ने अपने गहने बेचकर बेटे को विदेश भेजा, ताकि वो ‘बड़ा आदमी’ बन सके, आज उसी बेटे के आलीशान बंगले में उस मां के लिए दो वक्त की रोटी और एक खुली खिड़की भी मयस्सर नहीं थी… आखिर क्यों रिश्तों की कीमत ईंट-पत्थरों से कम हो गई? शेखर का खून जम गया। यह … Read more

चांदी के बर्तन – राधिका गोखले

“मयंक,” हरिनाथ जी ने बेटे के कंधे पर हाथ रखा, “तुमने सोचा कि पैसा फेंककर तुम हमें वो खुशी दे दोगे जो शायद तुम समय देकर नहीं दे पाए। पर बेटा, माँ-बाप को बुढ़ापे में ‘लग्जरी’ नहीं, ‘लिहाज़’ और ‘लगाव’ चाहिए होता है। यह विमला, जिसे तुम किचन में छुपाकर रखना चाहते थे, आज इसी … Read more

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