उजास की ओर एक कदम

 यह सब सुनकर जयंत की मुट्ठियों में खून उतर आया। उसका मन किया कि वह अभी जाकर उस दरिंदे का गिरेबान पकड़ ले। लेकिन जयंत जानता था कि केवल गुस्से से काम नहीं चलेगा। अगर उसने कोई कानूनी या सामाजिक तमाशा खड़ा किया, तो यह पुरुष प्रधान समाज उस वहशी को सजा देने से पहले … Read more

अनकहा समर्पण

यह डिबिया उन्होंने कल शाम को ही खरीदी थी। कल करवा चौथ से ठीक एक दिन पहले की शाम थी। दीनानाथ जी बाजार गए थे और न जाने किस अंतःप्रेरणा से उनके कदम एक पुरानी सुनार की दुकान पर रुक गए थे। उन्होंने अपनी पेंशन के बचे हुए पैसों से सोने की एक पतली सी, … Read more

मुखौटे के पीछे का सच

यह सुनते ही जैसे राजेश्वरी देवी के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उनके सीने पर एक जोरदार हथौड़ा लगा। बिजली की कौंध में उन्होंने उस लड़के के चेहरे को ध्यान से देखा। वही सांवला चेहरा, वही बेबस आँखें, जो उस दिन उनकी कार के पीछे हांफती हुई दौड़ी थीं। राजेश्वरी देवी का पूरा शरीर … Read more

अनकहे समझौतों की महक

मां के हाथ से दाल की कलछी छूटते-छूटते बची। पिता जी ने नजरें झुका लीं। अवनि के हलक में निवाला अटक गया। उसकी आंखें डबडबा आईं। उसके आत्मसम्मान पर ऐसा गहरा वार हुआ था कि वह अंदर तक कांप गई। मां-बाप को दुख न पहुंचे, इसलिए उसने जैसे-तैसे दो घूंट पानी पिया, अपनी थाली किनारे … Read more

कंक्रीट के जंगल में खिली धूप

 सुजाता ने हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखों से बेबसी के आंसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उसने सिसकते हुए कहा, “अंकल जी, आप जो डांटेंगे, मैं सिर झुकाकर सुन लूंगी। लेकिन मेरी मजबूरी तो समझिए। मेरे पति एक निजी कंपनी में हैं और मैं एक बैंक में। इस महंगे शहर में घर का … Read more

संस्कारों की अनमोल धरोहर

मगर कौशल्या जी का दिल पिघलने का नाम नहीं ले रहा था। जब भी कोई बात होती, वे ताना मारने से नहीं चूकतीं, “अरे बहू, तुम्हारे मायके में तो शायद साबुन भी गिनकर इस्तेमाल होता होगा, यहाँ थोड़ा सलीके से रहा करो। हमारे बड़े घरों के कायदे-कानून अलग होते हैं।” ऐसे कड़वे तीर रोज सृष्टि … Read more

रोशनी की तलाश

कबीर ने सोहम को ऊपर से नीचे तक देखा। सोहम के पास न तो कोई खिलौना था, न ही कोई महँगे कपड़े। कबीर के मन में एक गहरा सवाल कौंधा। वह खुद को रोक नहीं पाया और संकोच करते हुए पूछ बैठा, “सोहम… तुम्हें दुख नहीं होता कि तुम इस दुनिया को नहीं देख सकते? … Read more

जीवन संध्या की सुनहरी धूप

 “लेकिन बेटा, असली अग्निपरीक्षा तो तब शुरू हुई जब मेरे ससुर जी का अचानक निधन हो गया,” आंटी की आवाज थोड़ी भारी हो गई। “ससुर जी के जाने के बाद मेरी सास बिल्कुल अकेली हो गईं। वे स्वभाव से बेहद अधिकारवादी, तेज-तर्रार और दबंग महिला थीं। सत्यप्रकाश अपने भाइयों में सबसे सीधे और अपनी माँ … Read more

चक्रव्यूह से मुक्ति की भोर

विवाह को अभी मुश्किल से चालीस दिन ही हुए थे कि एक दोपहर वर्तिका ने अपने सारे कीमती जेवर और कपड़े सूटकेस में भरे और मुख्य द्वार की ओर बढ़ चली। कौशल्या जी ने घबराकर पूछा, “अरे बहू, यह क्या? अचानक कहाँ की तैयारी है?” वर्तिका ने मुड़कर देखे बिना रूखेपन से कहा, “बाजार तक … Read more

पुण्य की पूँजी

यशोदा के भीतर एक ऐसा आत्मसम्मान था जो कभी झुकना नहीं जानता था। गाँव में अगर कोई उन पर दया दिखाता या तरस खाकर यूँ ही बिना कुछ लिए पैसे देने की कोशिश करता, तो यशोदा का चेहरा सख्त हो जाता था। वे तुरंत कहतीं, “बेटा, जब तक विधाता ने इन हाथों में जान दी … Read more

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