मैं विहान की पत्नी बाद में हूँ, आपकी बेटी पहले हूँ – रमा शुक्ला

शारदा के हाथों में आज भी जब वह पुरानी तस्वीर आती, तो उसकी आँखें अपने आप छलक उठती थीं। तस्वीर में वह अपने पति रमेश के साथ खड़ी थी, और उसकी गोद में छह महीने का नन्हा विहान था। शादी के महज तीन साल बाद ही एक सड़क दुर्घटना ने रमेश को हमेशा के लिए शारदा से छीन लिया था।

उस वक्त शारदा की उम्र ही क्या थी, मुश्किल से चौबीस साल। रमेश के जाने के बाद मानो शारदा के जीवन में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। जिन ससुराल वालों ने उसे बड़े अरमानों से बहू बनाकर लाया था, उन्हीं ने उसे ‘कुलक्षिणी’ और ‘मनहूस’ का ताना देकर घर से निकाल दिया। मायके में भी भाइयों ने बोझ समझकर मुँह फेर लिया।

उस घुप अंधेरे में शारदा के पास केवल एक ही रोशनी थी—उसका बेटा विहान। रमेश एक प्राइवेट स्कूल में अकाउंटेंट थे। जब स्कूल के प्रिंसिपल ने शारदा की यह दयनीय हालत देखी, तो उन्होंने इंसानियत के नाते उसे उसी स्कूल की लाइब्रेरी में असिस्टेंट की नौकरी दे दी। जिस शारदा ने कभी घर की दहलीज अकेले पार नहीं की थी,

वह अब अपने कलेजे के टुकड़े को पड़ोसन के भरोसे छोड़कर आठ घंटे नौकरी करने जाती। शुरुआत में उसे बहुत डर लगता, वह सहमी-सहमी सी रहती, लेकिन विहान के चेहरे की मुस्कान उसे दुनिया से लड़ने की ताकत दे देती थी।

वक्त गुज़रता गया और शारदा ने अपना पूरा वजूद विहान की परवरिश में झोंक दिया। उसने अपनी कोई इच्छा नहीं रखी, कोई शौक नहीं पाला। उसके उठने, बैठने, सोचने का एकमात्र केंद्र सिर्फ और सिर्फ विहान था।

विहान ने भी अपनी माँ के संघर्षों को बहुत करीब से देखा था। वह एक आज्ञाकारी और होनहार बेटा निकला। उसने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की और एक बड़ी कंपनी में अच्छी नौकरी पा ली। शारदा को लगा जैसे उसकी बरसों की तपस्या पूरी हो गई।

कुछ समय पहले ही शारदा ने बड़े चाव से विहान की शादी नैना  से करवाई थी। नैना  एक समझदार और पढ़ी-लिखी लड़की थी। शादी के शुरुआती कुछ दिन तो घर में बहुत उल्लास रहा, लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, शारदा के मन में एक अनजानी सी घुटन और असुरक्षा ने जन्म ले लिया।

जो विहान ऑफिस से आते ही सबसे पहले ‘माँ’ पुकारता था, अब वह सीधे अपने कमरे में चला जाता। जो विहान छुट्टी वाले दिन अपनी माँ के साथ बैठकर घंटों बातें करता था, अब वह नैना  के साथ फिल्म देखने या बाहर घूमने जाने लगा था। एक दिन जब शारदा ने देखा कि विहान खुद रसोई में जाकर नैना  के लिए चाय बना रहा है, तो उसके सीने में एक अजीब सी टीस उठी।

शारदा को अचानक अपना वह चौबीस साल पुराना एकाकीपन डराने लगा। उसे लगने लगा कि जिस बेटे को उसने अपना खून-पसीना एक करके पाला, वह अब धीरे-धीरे उससे दूर हो रहा है। यह डर इतना गहरा था कि शारदा अनजाने में ही नैना  को अपनी सौतन और अपनी खुशियों की दुश्मन समझने लगी थी। वह बात-बात पर नैना  में कमियां निकालने लगी। नैना  के कपड़ों से लेकर उसके खाना बनाने के तरीके तक, हर चीज़ पर शारदा ताने मारने लगी। विहान जब भी नैना  का पक्ष लेता, शारदा रोने लगती और कहती कि “अब तुझे माँ की क्या ज़रूरत, तेरा तो नया परिवार बस गया है।”

नैना  यह सब चुपचाप सहती थी। वह समझ रही थी कि यह गुस्सा नहीं, बल्कि एक अकेली माँ का डर है। एक दिन विहान को कंपनी के काम से एक हफ्ते के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा। घर में अब सिर्फ शारदा और नैना  ही थे। संयोग से उसी रात शारदा को बहुत तेज़ बुखार आ गया और उनके जोड़ों का दर्द उभर आया। बुखार इतना तेज़ था कि शारदा से बिस्तर से उठा भी नहीं जा रहा था। नैना  ने बिना एक पल की देरी किए रात भर जागकर शारदा के माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रखीं।

अगले दो-तीन दिन नैना  ने शारदा की जो सेवा की, उसने शारदा को अंदर तक झकझोर कर रख दिया। नैना  ने स्कूल से छुट्टी ले ली थी (वह एक टीचर थी)। वह शारदा को अपने हाथों से दलिया खिलाती, उनके पैर दबाती और उन्हें दवाइयां देती। तीसरे दिन जब शारदा की तबीयत कुछ संभली, तो उसने देखा कि नैना  रसोई में उनके लिए सूप बना रही है। शारदा धीरे-धीरे उठकर रसोई के दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई।

नैना  ने उन्हें देखा तो मुस्कुरा कर बोली, “माँ जी, आप क्यों उठ गईं? आपको मुझे आवाज़ लगा लेनी चाहिए थी।”

शारदा की आँखों में आँसू थे। उसने भर्राए गले से कहा, “नैना , तू मुझसे नफरत क्यों नहीं करती? मैं तो तुझे अपना दुश्मन समझ बैठी थी। मुझे डर था कि तू मेरे विहान को मुझसे छीन लेगी और मैं फिर से उसी तरह अकेली हो जाऊंगी जैसे पच्चीस साल पहले थी।”

नैना  ने गैस बंद की और शारदा के पास आकर उनके दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “माँ जी, विहान आपका अंश है, उसे आपसे कोई कैसे छीन सकता है? जब मैं इस घर में आई थी, तो मेरी माँ ने मुझसे कहा था कि मैं किसी का बेटा छीनने नहीं, बल्कि एक माँ का दर्द बांटने जा रही हूँ। आपने अपनी पूरी ज़िंदगी अकेले संघर्ष किया है। अब आपको डरने की ज़रूरत नहीं है। मैं विहान की पत्नी बाद में हूँ, आपकी बेटी पहले हूँ। हमने आपको अकेला करने के लिए नहीं, बल्कि आपके इस आशियाने को और भी भरा-पूरा बनाने के लिए यह रिश्ता जोड़ा है।”

नैना  के उन शब्दों ने शारदा के मन में जमी सारी कड़वाहट और असुरक्षा की बर्फ को एक पल में पिघला दिया। शारदा ने नैना  को कसकर अपने सीने से लगा लिया और फूट-फूट कर रो पड़ी। उस दिन शारदा को समझ आ गया कि प्यार कभी बंटता नहीं है, वह सिर्फ बढ़ता है। उसने अपनी ममता की उन बेड़ियों को हमेशा के लिए तोड़ दिया जो उसे स्वार्थी बना रही थीं। अब वह नैना  में अपनी दुश्मन नहीं, बल्कि अपनी एक परछाईं और अपनी बेटी देख रही थी।

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लेखिका : रमा शुक्ला

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