सूने आँगन की छाँव

“समीर ने लंदन में खुद ही कोर्ट मैरिज कर ली है, रघुनाथ जी। ना हमसे कुछ पूछा, ना कोई बात की। बस एक मैसेज और दो तस्वीरें भेज दीं। क्या हम उसके जीवन में इतने गैर हो गए थे?” सुमित्रा जी की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। उनके हाथों में पकड़ा हुआ स्मार्टफ़ोन हल्का-हल्का कांप रहा था,

जिसकी स्क्रीन पर उनके इकलौते बेटे समीर की शादी की तस्वीरें चमक रही थीं। तस्वीर में समीर के साथ एक विदेशी लड़की खड़ी थी। दोनों बहुत खुश लग रहे थे, लेकिन उस तस्वीर ने यहाँ भारत के एक छोटे से शहर में बैठे दो बूढ़े माँ-बाप के दिल के टुकड़े कर दिए थे।

रघुनाथ जी, जो अब तक अपने चश्मे को साफ़ करने का बहाना कर रहे थे, उन्होंने अपनी नम आँखों को छुपाते हुए भारी आवाज़ में कहा, “तुम नाहक ही इतना दिल छोटा कर रही हो सुमित्रा।

अब ज़माना बदल गया है। बच्चे समझदार हो गए हैं। उसे वहां नौकरी करनी है, वहीं का नागरिक बनकर रहना है, तो उसे वही लड़की पसंद आ गई होगी जो वहां के तौर-तरीकों को समझती हो। इसमें इतना दुखी होने वाली क्या बात है? खुश होना चाहिए कि हमारा बेटा अपनी ज़िंदगी में सेटल हो गया है।”

लेकिन सुमित्रा जी के दिल की पीड़ा इतनी आसानी से कहाँ शांत होने वाली थी। एक माँ जिसने अपनी पूरी उम्र अपने बच्चे के भविष्य के ताने-बाने बुनने में निकाल दी हो, उसके लिए यह सच्चाई किसी वज्रपात से कम नहीं थी। “रघुनाथ जी, आप अपने आप को तसल्ली दे सकते हैं, पर मुझे नहीं।

वह हमारा इकलौता बेटा है। आपको पता है मैंने कितने सपने देखे थे? जब वह छोटा था, तब से ही मैंने सोच लिया था कि उसकी बारात में मैं कौन सी साड़ी पहनूंगी। मैंने अपनी बहु के लिए गहने जोड़ कर रखे थे। सोचा था जब नई बहु घर आएगी, तो मैं पूरे आँगन को दीयों से सजाऊंगी, ढोलक बजवाऊंगी, पूरे मोहल्ले को दावत दूंगी।

मेरे तो सारे के सारे अरमान धरे के धरे रह गए। अब तो यह भी नहीं पता कि वह अपनी उस विदेशी पत्नी को हमसे मिलाने इस जन्म में लाएगा भी या नहीं।” सुमित्रा जी का गला रुंध गया और वह अपने साड़ी के पल्लू से मुँह छुपकर फूट-फूट कर रोने लगीं।

रघुनाथ जी अपनी जगह से उठे और सुमित्रा जी के पास आकर उनके कंधे पर हाथ रखते हुए तसल्ली देने लगे। “शांत हो जाओ भाग्यवान। तस्वीरें मैंने भी देखी हैं। बहू देखने में अच्छी और सुलझी हुई लग रही है। शायद वही पली-बढ़ी है। जो भी हुआ, हमें समीर की ख़ुशी में ही अपनी ख़ुशी ढूंढ लेनी चाहिए।

हम उसे मजबूर तो नहीं कर सकते न? सब अच्छा ही रहेगा हमारे बेटे के लिए।” रघुनाथ जी के शब्द भले ही सांत्वना देने वाले थे, लेकिन उनकी अपनी आवाज़ में एक गहरा खालीपन था जिसे सुमित्रा जी बहुत अच्छी तरह महसूस कर पा रही थीं। वह जानती थीं कि बाहर से मज़बूत दिखने वाला उनका पति अंदर से उतना ही टूट चुका है जितनी कि वो खुद।

उस कमरे की घुटन और अपनी उम्मीदों के टूटने के शोर से बचने के लिए सुमित्रा जी कुर्सी से उठीं और भारी कदमों से चलते हुए घर के बाहर बने बड़े से लॉन में आ गईं।

यह वही घर था जिसे रघुनाथ जी ने अपनी पाई-पाई जोड़कर बनाया था, ताकि समीर को एक बड़ा और खुला आँगन मिल सके। आज वही आँगन सुमित्रा जी को काटने को दौड़ रहा था। वह लॉन में रखी बेंत की कुर्सी पर बेसुध सी होकर बैठ गईं। उनकी नज़रें शून्य में टिकी थीं।

थोड़ी देर बाद रघुनाथ जी दो कप चाय बनाकर ले आए। उन्होंने एक कप सुमित्रा जी के सामने रखी छोटी मेज़ पर रख दिया और खुद दूसरी कुर्सी पर बैठ गए।

दोनों के बीच एक गहरी और उदास खामोशी पसरी हुई थी। उस सन्नाटे को चीरते हुए अचानक सुमित्रा जी की नज़र लॉन के कोने में खड़े उस विशाल आम के पेड़ पर पड़ी। पेड़ की हरी-भरी टहनियां हवा में धीरे-धीरे झूल रही थीं और उस पर लदे हुए कच्चे आम धूप में चमक रहे थे।

सुमित्रा जी एकटक उस पेड़ को देखते हुए बोलीं, “आपको याद है रघुनाथ जी? यह आम का पेड़ हमने तब लगाया था जब समीर ने अपना पहला जन्मदिन मनाया था। कितने जतन से मैंने इसे पाला था। आज यह कितना बड़ा और घना हो गया है। हर मौसम में कितनी छाँव और कितने सारे आम देता है।”

रघुनाथ जी ने चाय का एक घूंट भरा और पेड़ की तरफ देखते हुए गहरी सांस ली। “हां, तुम बिल्कुल सही कह रही हो सुमित्रा। मुझे अच्छी तरह याद है, उस दिन कितनी तेज़ बारिश हो रही थी, फिर भी हम दोनों ने मिलकर यह पौधा रोपा था। हमने इसे समय पर पानी दिया, खाद डाली, सर्दियों के पाले और गर्मियों की लू से बचाया। इसकी देखभाल की, तभी तो आज यह इस लायक बना है कि हमें इतने मीठे फल दे पा रहा है। कोई भी चीज़ बिना सींचे और बिना अपना खून-पसीना लगाए फलदार नहीं बनती।”

सुमित्रा जी ने अपनी चाय का कप उठाया, लेकिन चाय अब तक बिल्कुल ठंडी हो चुकी थी। उनका मन अब चाय पीने का नहीं था। उन्होंने कप को वापिस मेज़ पर रख दिया और एक ठंडी आह भरते हुए उस आम के पेड़ को ही निहारती रहीं। उनके जेहन में बचपन के समीर की छवियां किसी पुरानी फिल्म की तरह चलने लगीं। कैसे वह इसी पेड़ के इर्द-गिर्द भागता था, कैसे उन्होंने और रघुनाथ जी ने अपनी हर ख़ुशी और ज़रूरत को मार कर समीर को अच्छी शिक्षा दी। जब समीर ने विदेश जाकर पढ़ने की ज़िद की थी, तो रघुनाथ जी ने अपनी रिटायरमेंट की सारी पूंजी दांव पर लगा दी थी, सिर्फ इसलिए कि उनके बेटे का भविष्य संवर जाए। उन्होंने यह सब किसी स्वार्थ के लिए नहीं किया था, लेकिन हर माँ-बाप के मन के किसी कोने में यह उम्मीद ज़रूर होती है कि बुढ़ापे में उनके बच्चे उनके पास होंगे, उनका सहारा बनेंगे, उनके सूने आँगन को अपनी हंसी से आबाद करेंगे।

“यह कच्चे आम थोड़े दिनों में पक जाएंगे, रघुनाथ जी,” सुमित्रा जी की आवाज़ में एक अजीब सा दर्द था। “जब यह पकेंगे और हम इन्हें तोड़कर खाएंगे, तब हमें समीर की और भी ज्यादा याद आएगी। उसे इस पेड़ के आम कितने पसंद थे। लेकिन क्या वह कभी इन आमों को खाने वापस आएगा? शायद नहीं।”

रघुनाथ जी चुप रहे। उनके पास सुमित्रा जी के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था।

सुमित्रा जी की आँखों से एक बार फिर आँसू छलक पड़े, लेकिन इस बार उनके शब्दों में एक गहरी दार्शनिक पीड़ा थी। उन्होंने पेड़ की मजबूत जड़ों और उसकी घनी शाखाओं को देखते हुए कहा, “पेड़ और इंसान में शायद यही फर्क होता है। इस पेड़ को हमने सींचा, तो इसने इस मिट्टी को, इस आँगन को अपनी जड़ों से जकड़ लिया। यह यहीं रहा। इसने अपना घर नहीं छोड़ा। यह हर साल फल देकर अपना कर्ज़, अपना फर्ज़ पूरा कर देता है। हमें मीठे फल देता है, गर्मियों में ठंडी छाँव देता है। लेकिन हमारे बेटे को देखो… हमने उसे भी सींचा, अपनी जान से ज्यादा प्यार दिया, लेकिन उसके पर निकलते ही वह इतनी दूर उड़ गया कि उसे हमारी याद तक नहीं आई। उसने अपनी नई दुनिया बसा ली। अब वह हर महीने बैंक में कुछ पैसे भेज देता है और समझता है कि उसने अपना फर्ज़ पूरा कर दिया।”

सुमित्रा जी की बात सुनकर रघुनाथ जी की भी आँखें भर आईं। वह जानते थे कि सुमित्रा का कहा एक-एक शब्द सत्य है। आज के दौर में रिश्ते सिर्फ डिजिटल हो गए थे। बच्चे डॉलर्स और पाउंड्स भेजकर अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो जाते हैं, लेकिन वो यह नहीं समझते कि बूढ़े होते माँ-बाप को पैसों से ज्यादा उनके समय, उनके स्पर्श और उनके साथ की ज़रूरत होती है। बैंक में जमा होते पैसे उस सूनेपन को नहीं भर सकते जो बच्चों के दूर चले जाने से घर के कोनों में पसर जाता है।

शाम ढलने लगी थी। सूरज की आख़िरी किरणें उस आम के पेड़ की पत्तियों से छनकर सुमित्रा जी और रघुनाथ जी के उदास चेहरों पर पड़ रही थीं। दोनों उसी तरह चुपचाप बैठे रहे, अपनी-अपनी यादों और खालीपन के बीच। वह आम का पेड़ अपनी जगह पर अडिग खड़ा था, जैसे उन्हें यह बता रहा हो कि प्रकृति के बनाए नियम इंसानी महत्वाकांक्षाओं से कहीं ज्यादा सच्चे और गहरे होते हैं। पेड़ को पता था कि जिसने उसे जीवन दिया है, उसे छाँव देना उसका परम धर्म है। लेकिन शायद इंसान, जो खुद को दुनिया का सबसे बुद्धिमान प्राणी समझता है, वह यह छोटी सी बात भूल गया था। उस दिन उस सूने आँगन में सिर्फ दो चीज़ें थीं, एक वह विशाल पेड़ जो अपना कर्ज़ चुका रहा था, और दो बूढ़े माँ-बाप, जो अपनी औलाद को बड़ा करने की कीमत चुका रहे थे।

कहानी पढ़ने के बाद अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं। क्या सुमित्रा जी और रघुनाथ जी का दर्द आज के समाज की एक कड़वी सच्चाई नहीं है? क्या बच्चों का विदेश में बस जाना और अपने माता-पिता से दूर हो जाना एक स्वाभाविक बदलाव है या फिर यह रिश्तों का पतन है?

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