समर अपने घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ा और अपनी माँ के पैरों से लिपटकर दहाड़ें मारकर रोने लगा। “मुझे माफ़ कर दो माँ… मैं बहुत नीच हूँ। मैंने तुम्हें सिर्फ एक माँ के रूप में देखा, कभी एक इंसान और एक औरत के रूप में तुम्हारे दर्द को नहीं समझा। मैंने तुम पर बहुत जुल्म किए हैं माँ। मुझे सज़ा दो।”
बनारस के उस पुराने लेकिन शानदार पुश्तैनी मकान के आंगन में आज एक अजीब सी खामोशी छाई हुई थी। सर्दियों की गुनगुनी धूप में तख्त पर बैठे पंडित रामदीन अपनी माला फेर रहे थे,
और उनके सामने सिर झुकाए उनका सत्ताईस वर्षीय पोता, समर बैठा था। समर शहर का एक जाना-माना आर्किटेक्ट था, जिसकी हर बात इस घर में पत्थर की लकीर मानी जाती थी। लेकिन आज वह अपने दादाजी के सामने एक ऐसी इजाज़त मांगने आया था, जिसने आंगन की हवा को भी भारी कर दिया था।
“दादाजी, मैं मीना से शादी करना चाहता हूँ। वह एक बहुत ही सुलझी हुई और समझदार लड़की है,” समर ने झिझकते हुए बात शुरू की।
रामदीन जी ने अपनी माला रोक दी और अपनी पुरानी ऐनक के पीछे से समर की आँखों में झांकते हुए बहुत ही शांत स्वर में पूछा, “वह तो विधवा है न समर? भला उस से तुम्हारा रिश्ता कैसे जुड़ सकता है?”
समर को लगा जैसे उसके दादाजी पुरानी रूढ़िवादी सोच के कारण एतराज कर रहे हैं। उसके भीतर का आधुनिक युवा जाग उठा। उसने थोड़ा आवेश में आते हुए कहा, “तो क्या हुआ दादाजी? क्या किसी विधवा का पुनर्विवाह नहीं हो सकता? क्या उसके जीवन में खुशियों का कोई हक नहीं है? उसके पति का देहांत तीन साल पहले एक हादसे में हो गया था, इसमें मीना का क्या दोष? हमें समाज की इस पिछड़ी सोच से बाहर आना चाहिए।”
रामदीन जी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। उन्होंने एक गहरी सांस ली और बहुत ही सपाट लहजे में कहा, “पुनर्विवाह क्यों नहीं हो सकता? मैं तो हमेशा से इस पक्ष में रहा हूँ कि हर इंसान को ज़िंदगी दोबारा शुरू करने का हक है।”
समर थोड़ा भ्रमित हुआ। “तो फिर… तो फिर आप मेरे और मीना के रिश्ते के खिलाफ क्यों हैं? आप क्यों नहीं चाहते कि मैं उसे अपना जीवनसाथी बनाऊँ?”
रामदीन जी अपनी जगह से उठे, समर के कंधे पर हाथ रखा और एक ऐसा वाक्य कहा जिसने समर के पैरों तले ज़मीन खिसका दी। “क्योंकि तुम इस पक्ष में कभी नहीं रहे समर। तुम्हारे भीतर जो ये आधुनिकता और समाज सुधार का भूत सवार है, वह सिर्फ तुम्हारी अपनी सहूलियत और तुम्हारे अपने प्यार के लिए है।”
“मतलब? मैं कुछ समझा नहीं दादाजी,” समर की आवाज़ में घबराहट थी।
“तुम अपनी माँ से इतनी नफरत करते हो… जानते हो न उस नफरत का कारण क्या है?” रामदीन जी की आवाज़ अब कठोर हो चुकी थी। “उसका पुनर्विवाह ही तुम्हारी इस घृणा का कारण है। जो इंसान अपनी सगी माँ के साथ न्याय नहीं कर पाया, वो अपनी पत्नी के साथ क्या इंसाफ करेगा समर?”
ये शब्द किसी तेज़ खंजर की तरह समर के सीने में उतर गए। उसका दिमाग बीस साल पीछे चला गया। समर जब महज़ सात साल का था, तब उसके पिता का एक लंबी बीमारी के कारण निधन हो गया था। उसकी माँ, सुजाता, उस वक्त केवल छब्बीस साल की थीं। एक युवा विधवा के रूप में सुजाता ने समाज के अनगिनत ताने सहे। कुछ सालों बाद, जब सुजाता के मायके वालों ने और खुद रामदीन जी ने ज़ोर डाला, तो सुजाता ने एक अच्छे इंसान से दूसरा विवाह कर लिया।
लेकिन बारह साल का किशोर समर अपनी माँ के इस फैसले को कभी बर्दाश्त नहीं कर पाया। उसके बालमन में समाज ने यह ज़हर घोल दिया था कि उसकी माँ ने उसके पिता की यादों को धोखा दिया है। उसने अपनी माँ के साथ जाने से साफ इंकार कर दिया और अपने दादाजी के पास ही रह गया। सुजाता जब भी उससे मिलने आती, वह दरवाज़ा बंद कर लेता। उसके लाए हुए खिलौने और मिठाइयां वह कूड़े में फेंक देता। उसने अपनी माँ को एक ‘स्वार्थी’ और ‘चरित्रहीन’ औरत का दर्ज़ा दे दिया था। आज पंद्रह साल बीत चुके थे, समर ने अपनी माँ की शक्ल तक नहीं देखी थी।
“तुम्हारे पास कोई जवाब है समर?” रामदीन जी ने समर की खामोशी को चीरते हुए कहा। “जब मीना ने अपने अकेलेपन से हारकर तुम्हारे प्यार को स्वीकार किया, तो तुम्हें वह बेचारी और हकदार लगी। तुम दुनिया की नज़रों में उसे अपनाकर एक ‘महान’ इंसान बनना चाहते हो। लेकिन जब छब्बीस साल की तुम्हारी माँ ने अपनी पूरी ज़िंदगी के उस भयानक अकेलेपन और समाज के भेड़ियों से बचने के लिए एक जीवनसाथी चुना, तो तुमने उसे एक ‘कुलटा’ करार दे दिया? एक औरत जब तुम्हारी प्रेमिका होती है, तो उसके लिए तुम्हारे नियम बदल जाते हैं, और जब वही औरत तुम्हारी माँ होती है, तो तुम समाज के सबसे क्रूर और जाहिल ठेकेदार बन जाते हो।”
समर की आँखों से आँसू छलक पड़े। उसका पूरा शरीर काँप रहा था। दादाजी के एक-एक शब्द ने उसके उस खोखले अहंकार और दोहरे मापदंड की धज्जियां उड़ा दी थीं। उसे आज पहली बार अपनी माँ की वो भीगी हुई आँखें याद आ रही थीं, जो हर त्योहार पर उसके दरवाज़े के बाहर इस उम्मीद में खड़ी रहती थीं कि शायद उसका बेटा उसे ‘माँ’ कहकर पुकारेगा। समर को एहसास हुआ कि वह कितना बड़ा पाखंडी था। उसने अपने स्वार्थ में अपनी माँ को जीते-जी मार दिया था।
बिना एक शब्द कहे समर अपनी जगह से उठा। वह सीधे अपनी गाड़ी में बैठा और उस शहर की तरफ निकल पड़ा जहाँ उसकी माँ सुजाता अपने नए परिवार के साथ रहती थी। तीन घंटे का वह सफर समर को तीन जन्मों के बराबर लग रहा था।
जब वह सुजाता के घर के दरवाज़े पर पहुँचा, तो उसके हाथ काँप रहे थे। उसने घंटी बजाई। कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला। सामने लगभग पचास के पार पहुँच चुकी एक महिला खड़ी थी, जिसके बालों में सफेदी आ चुकी थी। सुजाता ने जैसे ही पंद्रह साल बाद अपने बेटे को सामने देखा, उसके हाथों से पूजा की थाली छूटकर ज़मीन पर गिर गई।
“समर… मेरा समर…” सुजाता की आवाज़ गले में ही अटक गई।
समर अपने घुटनों के बल ज़मीन पर गिर पड़ा और अपनी माँ के पैरों से लिपटकर दहाड़ें मारकर रोने लगा। “मुझे माफ़ कर दो माँ… मैं बहुत नीच हूँ। मैंने तुम्हें सिर्फ एक माँ के रूप में देखा, कभी एक इंसान और एक औरत के रूप में तुम्हारे दर्द को नहीं समझा। मैंने तुम पर बहुत जुल्म किए हैं माँ। मुझे सज़ा दो।”
सुजाता ने तुरंत अपने बेटे को उठाया और अपने सीने से लगा लिया। एक माँ का दिल तो बस एक आँसू से ही पिघल जाता है। उसने समर का माथा चूमा और रोते हुए कहा, “पागल लड़के, माँ कभी अपने बच्चों से रूठती है क्या? तू आ गया, बस मेरी दुनिया पूरी हो गई।”
कुछ दिनों बाद, जब समर और मीना की शादी हुई, तो मंडप में सबसे आगे सुजाता और रामदीन जी बैठे थे। समर ने मीना का हाथ थामने से पहले अपनी माँ के पैर छुए। आज उसने सिर्फ एक विधवा को नहीं अपनाया था, बल्कि उसने अपनी माँ के सम्मान को वापस लौटाकर खुद अपने इंसान होने का सबूत दिया था। उस दिन उस घर में एक नया रिश्ता ही नहीं जुड़ा था, बल्कि अतीत के आईने में देखकर सुधारे गए एक बहुत बड़े अपराध का प्रायश्चित भी हुआ था।
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लेखिका : सावित्री मल्होत्रा